वर्ष 35 / अंक - 25 / होर्मुज में भारतीय नाविकों की हत्या और ‘सेवा तीर्थ...

होर्मुज में भारतीय नाविकों की हत्या और ‘सेवा तीर्थ’ का आत्मसमर्पण

होर्मुज में भारतीय नाविकों की हत्या और ‘सेवा तीर्थ’ का आत्मसमर्पण

अमेरिका सिर्फ भारतीय नाविकों को ही क्यों निशाना बना रहा है? यह सवाल उन भारतीय नाविकों के मन में उठ रहा है जो होर्मुज जलडमरू-मध्य में फंसे हुए व्यापाहिक जहाजों पर सवार हैं. इन जहाजों पर सिलसिलेवार अमेरिकी हमलों में भारतीय नाविकों की जान भी जा चुकी है. इन हमलों पर मोदी सरकार की प्रतिक्रिया राष्ट्रीय गौरव और वैश्विक प्रतिष्ठा के उसके दावों का खोखलापन सबसे बुरी तरह उजागर कर रही है. जब अमेरिकी मिसाइलों से भारतीय नागरिक मारे गए और उन्हें समुद्र में बुनियादी मानवीय सहायता तक नहीं मिली, तो मोदी सरकार न तो आवाज उठा पाई और न ही हिम्मत दिखा पाई. इसके बजाय, वह वाशिंगटन के सामने झुकती रही और अमेरिका के नेतृत्व वाले साम्राज्यवादी गंठजोड़ के सामने भारत की निर्भरता को और गहरा करती रही.

चार दिनों के भीतर अमेरिकी सेना ने इस क्षेत्र में भारतीय चालक दल वाले तीन जहाजों पर हमला किया. पहला हमला 8 जून को एमटी मैरीवेक्स (तेलवाहक जहाज) पर हुआ, और विदेश मंत्रालय अमेरिकी दूत को केवल एक सामान्य विरोध-पत्र सौंपकर शांत हो गया. इसके बाद 10 जून को ओमान की खाड़ी में एमटी सेट्टेबेलो पर हमला हुआ, जब एक अमेरिकी मिसाइल जहाज के इंजन रूम से टकराई जिससे तीन भारतीय नाविक – पटनाला सुरेश, आदित्य शर्मा और शिवानंद चौरसिया – मारे गए. जब अमेरिकी हमले के बाद भारतीय नाविक मारे गए और लापता हो गए, तब भी प्रधान मंत्री मोदी यही कहते रहे कि वे भारत-अमेरिका संबंधों को और आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं. उन्होंने भारतीय नागरिकों की मौत पर एक शब्द भी नहीं कहा. ठीक अगले दिन ओमान की तट पर भारतीय चालक दल वाले एक और जहाज एमटी जलवीर पर हमला हुआ. भारतीय चालक दल वाले जहाजों पर तीन हमलों और भारतीय नाविकों की मौत के बाद भी मोदी सरकार ने खुद को कूटनीतिक औपचारिकता और तनाव कम करने की सामान्य अपीलों तक ही सीमित रखा, उसने उन हमलों के लिए अमेरिका की स्पष्ट निंदा करने से इनकार कर दिया जिनमें भारतीय नागरिकों की जान गई थी. विदेश मंत्रालय के बयान में आगे कहा गया कि ये जहाज ‘अमेरिकी प्रतिबंधों’ के दायरे में थे, मानो प्रतिबंधित दायरे में किसी जहाज के होने से भारतीयों की जान की कीमत कम हो जाती है अथवा भारतीय नाविकों की हत्या को सही ठहराया जा सकता है.

इन हमलों के बाद अमेरिका का रवैया भी कम आपराधिक नहीं था. आस-पास अमेरिकी नौसेना की मौजूदगी के बावजूद मुसीबत में फंसे चालक दल को कोई मदद नहीं दी गई. अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून, लंबे समय से चले आ रहे समुद्री नियम और सदियों पुरानी परंपरागत जिम्मेदारियां यह साफ तौर पर कहती हैं कि समुद्र में मुसीबत में फंसे लोगों की मदद की जाए. ऐसी जिम्मेदारियों को सशस्त्र संघर्ष के समय भी स्वीकार किया गया है और इन्हें समुद्र में आचरण तय करने वाले सबसे बुनियादी सिद्धांतों में से एक माना जाता रहा है. बेशक, किसी को यह उम्मीद नहीं थी कि अमेरिका – जिसका अंतरराष्ट्रीय कानून तोड़ने और मानवता के सबसे बुनियादी नियमों को कुचलने का लंबा इतिहास रहा है – इन जिम्मेदारियों का पालन करेगा. हालांकि, ऐसी घटनाओं पर मोदी सरकार की चुप्पी और निष्क्रियता से यह भी उतना ही स्पष्ट हो जाता है कि जब भारतीय नागरिकों की जान, सम्मान और सुरक्षा का सवाल वाशिंगटन के साथ रणनीतिक तालमेल से टकराता है, तो यह सरकार कहां खड़ी होती है.

होर्मुज जलडमरू-मध्य में और उसके आस-पास हजारों भारतीय नाविक अभी भी व्यापारिक जहाजों पर फंसे हुए हैं. यह अमेरिका की गैर-कानूनी नौसैनिक नाकेबंदी और अमेरिका-इजराइल गठजोड़ द्वारा ईरान के खिलाफ किए गए साम्राज्यवादी हमले का सीधा नतीजा है. भारतीय चालकों वाले जहाजों पर हमले उनपर मंडराते संकट का सिर्फ एक पहलू हैं. उतना ही शर्मनाक भारतीय अधिकारियों का वह रवैया रहा है जिसमें उन्होंने इस इलाके में फंसे भारतीय नाविकों की भलाई और सुरक्षा के प्रति पूरी तरह से बेरुखी दिखाई है.

11 जून को ‘एमटी सेलेस्टियल सी’ पर तैनात 35-वर्षीय सेकंड ऑफिसर उर्थानाथन की मेडिकल मदद के लिए बार-बार गुहार लगाने के बावजूद जहाज पर ही मौत हो गई. कई दिनों तक जब उनकी हालत बिगड़ती गई तो उनके साथियों ने हर उपलब्ध अंतरराष्ट्रीय प्रोटोकाॅल के जरिए मदद के लिए जरूरी अपीलें कीं. जहाज बचाव समन्वय समिति से अपील की गई, जहाज की प्रबंधन कंपनी ‘रोमाना शिपिंग कंपनी’ को संदेश भेजे गए और ओमान के डुक्म बंदरगार्ह के अधिकारियों से भी मदद मांगी गई. तीन दिनों से भी ज्यादा समय तक वे जहाज पर गंभीर रूप से बीमार रहे, जबकि जहाज तट से ज्यादा दूर नहीं था और मदद मिल सकती थी. उन्हें मेडिकल मदद दिलाने की हर मुमकिन कोशिश की गई. हालात की गंभीरता के बावजूद समय पर कोई कारगर कदम नहीं उठाया गया और न ही उन्हें वहां से निकाला जा सका. आखिरकार, उर्थानाथन की मौत हो गई – वे कई दिनों तक तकलीफ सहते रहे और उन्हें वह मेडिकल इलाज नहीं मिल पाया जो उनकी जान बचा सकता था. उनकी मौत के बाद भी उनके साथियों ने मदद की गुहार जारी रखी और उनके शव को सड़ने से बचाने के लिए उन्हें बेहद मामूली तरीकों का सहारा लेना पड़ा. जब चालक दल ने अपनी मुश्किलों को दिखाने वाला एक वीडियो जारी किया, तब जाकर भारतीय अधिकारियों ने उन्हें वहां से निकालने की व्यवस्था करने के लिए कदम उठाए.

यह दुखद घटना एक सीधा लेकिन बहुत गंभीर सवाल खड़ा करती है. पीएम मोदी के विदेशी दौरों, फोटो खिंचवाने, गले मिलने, हाथ मिलाने और भारत की वैश्विक हैसियत का लगातार बखान करने का क्या मतलब है, अगर विदेश में मुसीबत में फंसे भारतीय नागरिकों को तब भी सबसे बुनियादी मदद नहीं मिल पाती जब उनकी जान दांव पर लगी हो? मोदी के इन तमाम विदेशी दौरों का फायदा सिर्फ अडानी और दूसरे बड़े काॅर्पोरेट घरानों को ही मिलता है जो सामरिक साझेदारी और व्यापार समझौतों का लाभ उठाते हैं, जबकि संकट के समय आम भारतीयों को अपने हाल पर छोड़ दिया जाता है.

जो कुछ किया जा रहा है और जो नहीं किया जा रहा है, उससे पता चलता है कि मोदी सरकार भारतीयों की जिंदगी और सुरक्षा की बिल्कुल परवाह नहीं करती है. यह वही बेपरवाही है जो तब दिखी थी जब ट्रंप ने भारतीयों को हथकड़ी और बेड़ियों में जकड़कर अमेरिका से निकाला था और सरकार चुप रही थी. यह वही बेपरवाही है जो बार-बार तब सामने आती है जब आम भारतीयों के हितों का टकराव अमेरिका के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी बनाए रखने की सरकार की इच्छा से होता है. भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और राष्ट्रीय हितों को अमेरिकी-इजराइली साम्राज्यवादी गठजोड़ के आगे गिरवी रखने की यह अपरिहार्य कीमत है.

मारे गए नाविकों के परिवार न्याय और पूरा मुआवजा पाने के हकदार हैं. सरकार को उस इलाके में फंसे भारतीय नाविकों की सुरक्षा और भलाई पक्की करने के लिए तुरंत सभी जरूरी कदम उठाने चाहिए और भारतीय चालक दल वाले जहाजों पर हुए हमलों और भारतीय नाविकों की मौत की जवाबदेही तय करने के लिए हर उपलब्ध कूटनीतिक और कानूनी रास्ता अपनाना चाहिए.

मोदी सरकार ने हाल ही में प्रधान मंत्री कार्यालय का नाम बदलकर ‘सेवा तीर्थ’ कर दिया है, लेकिन हम जो देख रहे हैं, वह ट्रंप के लिए तो सेवा है मगर भारत के लोगों के लिए कुछ भी नहीं. भारतीय नागरिकों के खिलाफ हुए अपराधों के बावजूद अमेरिका और ट्रंप के सामने मोदी का यह दब्बू समर्पण न तो भुलाया जाएगा और न ही बर्दाश्त किया जाएगा.

20 June, 2026