वर्ष 35 / अंक - 19 / प्रेम का अधिकार: ऑनर किलिंग के खिलाफ कर्नाटक का नय...

प्रेम का अधिकार: ऑनर किलिंग के खिलाफ कर्नाटक का नया कानून एक महत्वपूर्ण कदम और अभी भी लंबा सफर बाकी

प्रेम का अधिकार: ऑनर किलिंग के खिलाफ कर्नाटक का नया कानून एक महत्वपूर्ण कदम और अभी भी लंबा सफर बाकी

मुझे पूरा यकीन है कि असली इलाज अंतरजातीय विवाह है. खून का मिलना ही अपनेपन और रिश्तेदारी का एहसास पैदा कर सकता है. जब तक यह भावना कि दूसरे भी अपने हैं, सर्वाेपरि नहीं हो जाती, तब तक जाति से उपजी अलगाव की भावना – एक-दूसरे को पराया समझने की भावना – खत्म नहीं होगी ..... जाति-प्रथा तोड़ने का असली उपाय अंतरजातीय विवाह ही है. इसके अलावा कोई भी चीज काम नहीं करेगी.

– बाबासाहेब डाॅ. बी.आर. अंबेडकर

कर्नाटक विधानसभा ने हाल ही में ‘कर्नाटक फ्रीडम ऑफ चाॅइस इन मैरिज एंड प्रिवेंशन एंड प्रोहिबिशन ऑफ क्राइम्स इन द नेम ऑफ ऑनर एंड ट्रेडिशन एक्ट, 2026 (एवा नम्मावा एक्ट)’ पारित किया है. यह तथाकथित ‘सम्मान’ के नाम पर होने वाले अपराधों की लगातार बनी हुई समस्या से निपटने की दिशा में एक बेहद जरूरी और साहसिक कदम है.

बाबासाहेब डाॅ. बी. आर. अंबेडकर ने साफ तौर पर पहचाना था कि जाति व्यवस्था को सदियों से जिंदा रखने और आगे बढ़ाने का सबसे प्रमुख हथियार एंडोगैमी यानी अपनी ही जाति के अंदर विवाह की प्रथा है. अपनी क्लासिक पुस्तक एनिहिलेशन ऑफ कास्ट (जाति का विनाश) में उन्होंने लिखा कि जाति की दीवारें केवल सामाजिक और व्यावसायिक अलगाव से नहीं, बल्कि सबसे गहराई से विवाह पर नियंत्रण के माध्यम से कायम रखी जाती हैं. अपनी ही जाति के भीतर विवाह को अनिवार्य बनाकर जाति व्यवस्था पीढ़ी दर पीढ़ी अपना अस्तित्व बचाए रखती है और इसी के जरिए ऊंच-नीच, बहिष्कार तथा भेदभाव को संस्थागत रूप प्रदान करती है.

अंतरजातीय विवाह इस पूरी व्यवस्था को सीधी चुनौती देता है. यही वजह है कि ऐसे रिश्तों के खिलाफ समाज का तीखा और हिंसक विरोध सामने आता है – जिसे आम तौर पर ‘ऑनर किलिंग’ कहा जाता है. दरअसल, ‘ऑनर किलिंग’ या ‘ऑनर क्राइम’ जैसे शब्द भ्रामक और खतरनाक हैं. इन हत्याओं में न कोई ‘सम्मान’ है, न कोई जायज वजह. ‘सम्मान’ जैसा शब्द इन अपराधों की असली सच्चाई को ढक देता है – कि ये दरअसल हत्याएं हैं और हिंसा के वे कृत्य हैं जिनका मकसद लोगों – खासकर औरतों – को अपनी मर्जी से जीने और प्रेम करने की सजा देना है. जरूरी है कि हम इन अपराधों को ‘सम्मान’ से जोड़ने की हर कोशिश को सिरे से खारिज करें. इन्हें उसी रूप में पहचाना जाए जैसे ये हैं – व्यक्ति की आजादी, अधिकार और सम्मान पर बर्बर हमले. ऐसे अपराधों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई के साथ-साथ गहरे सामाजिक हस्तक्षेप की भी उतनी ही जरूरत है.

इन अपराधों में शामिल हिंसा अक्सर एक या दोनों साथियों को निशाना बनाती है. जो महिलाएं अपनी मर्जी से जाति की तय सीमाओं से बाहर जाकर साथी चुनती हैं, उन्हें कड़ी सजा मिलती है – कैद और सामाजिक बहिष्कार से लेकर हमले या हत्या तक. वहीं उत्पीड़ित समुदायों के पुरुष इस हिंसा का सबसे ज्यादा शिकार बनते हैं – उन्हें बेरहमी से पीटा जाता है या मार डाला जाता है, उन तमाम लोगों को चेतावनी देने के लिए जो इसी तरह जाति की मर्यादाओं को तोड़ने की हिम्मत कर सकते हैं.

इस हिंसा की जड़ें बहुत गहरी हैं. मनुस्मृति औरतों को उनके शरीर और उनके फैसलों पर अधिकार से वंचित करती है और उन्हें हमेशा के लिए पिता और पति की सत्ता के अधीन रखती है. आज जिसे “ऑनर किलिंग” कहा जाता है, वह दरअसल मनुस्मृति के नियमों को ही लागू करना है. ठीक इसी व्यवस्था को तोड़ने के लिए भारत का संविधान बनाया गया था.

यह भी समझना जरूरी है कि “ऑनर” के नाम पर होने वाली हिंसा सिर्फ अंतरजातीय रिश्तों तक सीमित नहीं है, बल्कि अंतरधार्मिक शादियों को भी निशाना बनाती है. अंतरधार्मिक रिश्ते अब संगठित धमकी और हमलों का बढ़ता हुआ निशाना बन रहे हैं.

समस्या का पैमाना काफी बड़ा है, लेकिन उसे न तो ठीक से पहचाना जाता है और न ही पूरी तरह दर्ज किया जाता है. नेशनल क्राइम रिकाॅड्र्स ब्यूरो की रिपोर्ट के मुताबिक 2015 के बाद से भारत में ऐसी 530 “ऑनर” हत्याएं दर्ज हुई हैं. यह भी ध्यान रखना चाहिए कि इसे अपराध की अलग श्रेणी के तौर पर 2014 के बाद ही शामिल किया गया, और तभी से इसका रिकाॅर्ड रखा जा रहा है.

भारत के सुप्रीम  कोर्ट ने बार-बार “ऑनर” के नाम पर होने वाले अपराधों, खासकर अंतरजातीय और अंतरधार्मिक जोड़ों पर होने वाली हिंसा का गंभीर संज्ञान लिया है. अदालत ने इन्हें सिर्फ आपराधिक कृत्य ही नहीं, बल्कि संविधान के तहत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन भी माना है, और इस मामले में कानून बनाने की जरूरत पर भी खासतौर पर जोर दिया है. हाल के वर्षों में कर्नाटक ऐसे अपराधों में बढ़ोतरी की चिंताजनक तस्वीर पेश करता रहा है. अब राज्य ने इस दिशा में ठोस कदम उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट के आह्वान का जवाब दिया है. कर्नाटक में लाया गया यह नया कानून नागरिक समाज और सामाजिक कार्यकर्ताओं के दशकों लंबे संघर्ष का परिणाम है.

कानून के मुख्य पहलू

  1. चुनने का अधिकार: कानून की शुरुआत एक स्पष्ट और बेलाग बात से होती है: हर व्यक्ति को आजादी, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अपनी पसंद से विवाह करने का अधिकार है – चाहे उसकी जाति, धर्म या समुदाय कुछ भी हो. किसी व्यक्ति या समूह द्वारा इस पसंद में दखल देने की कोई भी कोशिश अपराध मानी जाएगी.
  2. हिंसा के हर रूप को अपराध के दायरे में लाना: यह कानून केवल हत्या तक सीमित नहीं है. यह ‘ऑनर’ या सम्मान के नाम पर की जाने वाली हिंसा और उत्पीड़न के पूरे दायरे को अपराध घोषित करता है. इसमें शारीरिक धमकियां, सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार, हुक्का-पानी बंद करना और बेदखल करने की प्रतीकात्मक रस्में – सब कुछ शामिल है.
  3. राज्य की जिम्मेदारियां: यह कानून सरकार को कानूनी तौर पर बाध्य करता है कि वह अधिकारियों को प्रशिक्षित करे, लगातार जन-जागरूकता अभियान चलाए, और सुनिश्चित करे कि यह कानून उन तक पहुंचे जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है.
  4. फास्ट ट्रैक अदालतें: इस कानून के तहत विशेष अदालतें स्थापित की जाएंगी ताकि पीड़ितों को त्वरित और सुनिश्चित न्याय मिल सके, न कि ऐसे मामलों में होने वाली लंबी देरी में न्याय खो जाए.
  5. संस्थागत निगरानी: ‘एवा नम्मावा वेदिके’ और जिला स्तर की माॅनिटरिंग कमेटियां बनाई जाएंगी ताकि कानून के लागू होने की निगरानी हो, शिकायतों का समाधान हो, और यह सुनिश्चित किया जा सके कि कानून सिर्फ कागजी वादा बनकर न रह जाए.

इस जरूरी कानून का स्वागत करते हुए, यह चिंता जताना भी जरूरी है कि ‘ऑनर’ के नाम पर की गई हत्या के लिए न्यूनतम पांच साल की सजा का प्रावधान रखा गया है. यह भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) के उस प्रावधान से सीधे टकराता है जिसमें हत्या के लिए उम्रकैद या फांसी की सजा तय है. ‘ऑनर किलिंग’ को सामान्य हत्या से कम गंभीर मानने का कोई औचित्य नहीं है, और इस असंगति को तुरंत दूर किया जाना चाहिए.

इस कानून का पारित होना एक शुरुआत है, अंत नहीं. सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि कानून सख्ती से लागू हो. साथ ही ठोस कदम उठाने होंगे – जैसे अंतरजातीय विवाह को बढ़ावा देने के लिए योजनाएं और प्रोत्साहन देना, अंतरजातीय जोड़ों के लिए आरक्षण सुनिश्चित करना, और इस दिशा में अन्य आवश्यक पहल करना.

संविधान में निहित ‘भाईचारे’ का वादा हमें हर उस ढांचे को जड़ से मिटाने का आह्वान करता है जो समाज को बांटता है, बाहर करता है या अपमानित करता है. जाति प्रथा और धार्मिक विभाजन ठीक ऐसे ही ढांचे हैं, जो समाज को खंडित करते हैं और भाईचारे की संभावनाओं को खत्म कर देते हैं. कर्नाटक का यह नया कानून सही दिशा में उठाया गया एक कदम है. हालांकि, कोई भी कानून केवल उतना ही प्रभावी होता है जितनी उसे लागू करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति होती है. जातिगत पूर्वाग्रहों को खत्म करने का बड़ा काम केवल कानून बनाकर पूरा नहीं किया जा सकता. एक समाज के रूप में हमें अपने भीतर मौजूद उन दरारों का सामना करना होगा – जाति और धर्म के उन ऊंच-नीच और बंटवारों को चुनौती देनी होगी जिन्हें हमने विरासत में पाया है, जिन्हें सामान्य मान लिया गया है और जिन पर अक्सर सवाल नहीं उठाए जाते. असली और बड़ी जिम्मेदारी हम सबकी है: हमें असमानता और बहिष्कार के इन ढांचों को तोड़ना होगा और मिलकर एक ऐसे समाज का निर्माण करना होगा जो समानता और बंधुत्व के संवैधानिक वादे पर टिका हो.

09 May, 2026