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एसआइआर बुलडोजर पश्चिम बंगाल में चुनावी लोकतंत्र को बर्बाद कर रहा है

एसआइआर बुलडोजर पश्चिम बंगाल में चुनावी लोकतंत्र को बर्बाद कर रहा है

-- गुरशबद ग्रोवर

स्वतंत्र भारत के इतिहास में लोगों के मताधिकार-हरण का सबसे बड़ा अभियान पश्चिम बंगाल में चल रहा है. हाल के इतिहास में हुए ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (एसआइआर) का तर्क सीधा-सा रहा है: भारत का चुनाव आयोग लोगों पर ही यह जिम्मेदारी डाल रहा है कि वे खुद को वैध वोटर साबित करें.

इस बार पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग ने बिहार एसआइआर के लिए सुप्रीम कोर्ट से किए गए अपने सबसे बुनियादी वादों से भी मुंह मोड़ लिया है जिससे यह विनाशकारी और दुखद प्रक्रिया एक बड़े पैमाने की आपदा में बदल गई है. पश्चिम बंगाल एसआइआर में आयोग तब भी संतुष्ट नहीं होता, भले ही कोई वोटर खुद को 2002 की वोटर लिस्ट से जोड़कर दिखा दे. उनसे फिर भी अतिरिक्त दस्तावेज दिखाने की मांग की जा सकती है.

लोगों को 2002 के चुनाव से खुद को जोड़ने के मुश्किल काम के लिए मजबूर करने के अलावा चुनाव आयोग ने वोट देने के अधिकार से वंचित करने के लिए एक नई श्रेणी बनाई है: “तार्किक विसंगति”. आयोग यह स्वीकार करता है कि वह ऐसी नियम प्रणाली का इस्तेमाल कर रहा है जिससे दस्तावेजों में कहीं भी नाम की वर्तनी में अंतर होने के कारण वोटरों को लिस्ट से हटाया जा सकता है. भारतीय लिपियों को अंग्रेजी वर्णमाला में बदलने का कोई एक जैसा तरीका न होने के कारण ऐसी “विसंगतियां” होना तय है. दसियों लाख लोगों के लिए ये कोई तार्किक विसंगतियां नहीं हैं, बल्कि ये तो बस सरकारी प्रक्रियाओं की त्रुटियां हैं.

जाहिर है, ऐसी नियम प्रणाली इस श्रेणी के जरिए हिंदुओं और मुसलमानों, दोनों को लगभग बराबर संख्या में लिस्ट से बाहर करेगा. चुनाव आयेग ने जान-बूझकर अपने सार्वजनिक आंकड़ों को इस तरह से पेश किया है कि उसका विश्लेषण करना मुश्किल हो जाए. लेकिन ऑल्ट न्यूज और सबर इंस्टीट्यूट ने बड़ी मेहनत से रिकाॅर्ड को अंकीकृत (डिजिटाइज) किया और वे उसी नतीजे पर पहुंचे जिसका डर समझदार लोगों को था: जिन लोगों को ‘जांच के दायरे में’ रखा गया है और जिन्हें वोट देने के अधिकार से वंचित किया गया है, उनमें मुसलमानों की संख्या असंतुलित रूप से बहुत ज्यादा है.

ऑल्ट न्यूज ने छह निर्वाचन क्षेत्रों के 12 लाख वोटर रिकाॅर्ड को डिजिटाइज कर उनका विश्लेषण किया. जिन 3 लाख वोटरों को ‘जांच के दायरे में’ रखा गया था, उनमें से 92.6 प्रतिशत मुस्लिम हैं, जबकि कुल वोटरों में मुस्लिमों की हिस्सेदारी सिर्फ 51.7 प्रतिशत है. इन निर्वाचन क्षेत्रों में मुस्लिमों के लिए कुल जांच दर चौकाने वाली 42.2 प्रतिशत है, यानी पश्चिम बंगाल में किसी मुस्लिम वोटर का नाम वोटर लिस्ट से हटाए जाने की संभावना लगभग 50-50 है. वहीं, हिंदुओं के लिए यह जांच दर सिर्फ 3.5 प्रतिशत है.

सबर इंस्टीट्यूट द्वारा नंदीग्राम की वोटर लिस्ट के विश्लेषण में भी ऐसा ही रुझान देखने को मिला – नंदीग्राम उस विधानसभा क्षेत्र का हिस्सा है जहां से भाजपा के मुख्य मंत्री पद के उम्मीदवार शुभेंदु अधिकारी चुनाव लड़ रहे हैं. नंदीग्राम की कुल आबादी में मुस्लिमों की हिस्सेदारी 25% है, लेकिन वोटर लिस्ट से नाम हटाए जाने के मामलों में उनकी हिस्सेदारी 95% है. सबर इंस्टीट्यूट ने वोटर लिस्ट से नाम हटाए जाने के इन पैटर्न को पश्चिम बंगाल में “टांचागत” समस्या करार दिया है.

समसेरगंज से मोथाबाड़ी तक और भवानीपुर से मानिकचक तक, इस निर्वाचन क्षेत्र के आधे से ज्यादा मुस्लिम मतदाताओं को ‘निर्णयाधीन’ श्रेणी में डाल दिया गया (जबकि हिंदू मतदाताओं के मामले में यह आंकड़ा 2.3% था). ये आंकड़े न सिर्फ चुनावों का रुख पूरी तरह से बदलने के लिए काफी हैं, बल्कि ये पूरे-पूरे समुदायों को उनके मतदान के अधिकार से भी वंचित कर देंगे.

पता चला है कि इस व्यवस्था की अपारदर्शिता और ‘तार्किक विसंगति’ नामक वर्गीकरण का आविष्कार असल में मुसलमानों को अभूतपूर्व पैमाने पर मतदान के अधिकार से वंचित करने का बस एक नया बहाना है. धर्म के नाम पर किया जा रहा यह उत्पीड़न इस पूरी प्रक्रिया का महज एक हिस्सा ही नहीं है, आंकड़ों के विश्लेषण से तो यह भी संकेत मिलता है कि शायद यही इस पूरी कवायद का मुख्य उद्देश्य है.

और उन 91 लाख मतदाताओं के लिए, जिन्हें इस सूची से बाहर कर दिया गया है, ‘निर्णयाधीन’ स्थिति का आखिर क्या मतलब है? ऐसे 59.8 लाख मामलों पर न्यायिक अधिकारियों ने बेहद लापरवाही और जल्दबाजी में हस्ताक्षर कर दिए, जिन्होंने 27 लाख मतदाताओं को ‘हटा दिए जाने योग्य’ घोषित कर दिया – और इस तरह, महज कुछ ही दिनों के भीतर उनसे मतदान का उनका संवैधानिक अधिकार छीन लिया गया.

असल में अब बहुत कम रास्ता बचा है. 27 लाख लोग ऐसे हैं जो अपीलीय ट्रिब्यूनल में अपना केस लड़ सकते हैं. इनमें से सिर्फ 19 ट्रिब्यूनल ही बनाए गए हैं और वे सभी कोलकाता की एक ही बिल्डिंग में हैं. न्यूजलाॅन्ड्री ने पाया कि पूरे राज्य से लोग – मजदूर और अपनी रोज की दिहाड़ी छोड़कर आईं अकेली मांएं और बुजुर्ग – वहां अपना केस लड़ने और अपने सबसे बुनियादी अधिकारों की रक्षा के लिए  पहुंचे, लेकिन सरकारी बुलावा नहीं रहने की वजह से उन्हें बिल्डिंग में घुसने से रोक दिया गया. न्यूजलाॅन्ड्री ने सही कहा कि ये ट्रिब्यूनल एक ‘ब्लैक होल’ हैं और कोलकाता में असली अपील की उम्मीद तेजी से खत्म होती जा रही है.

22 अप्रैल तक चुनाव आयेग ने 27 लाख लोगों में से सिर्फ 136 लोगों को ही वापस वोटर लिस्ट में जोड़ा था. उसने 138 केस सुने थे, जिससे न सिर्फ उसके फैसले सुनाने की बेहद धीमी रफ्तार साबित होती है, बल्कि यह भी कि ज्यादातर प्रभावित लोगों को एक अहम चुनाव से गलत तरीके से बाहर कर दिया गया है. 27 लाख लोगों को आयोग के उस फैसले का नतीजा भुगतना पड़ रहा है, जिसमें उसने अपने तय काम, यानी वोटर लिस्ट का आम संशोधन, को पूरा करने के बजाय लोगों के अधिकारों को बड़े पैमाने पर खत्म कर दिया.

इस एसआइआर के साथ आयोग के “स्वतंत्र” होने का दिखावा पूरी तरह से उतर गया है. ऐसा नहीं है कि वे इसे छिपाने की कोशिश कर रहे हैं: आयोग के आधिकारिक ट्यूटर अकाउंट पर तृणमूल कांग्रेस को हल्की-ढंग-से-छिपी एक धमकी दी गई, और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने कुछ सवाल पूछने पर इस पार्टी के प्रतिनिधिमंडल से “दफा हो जाओ” कह दिया.

इस गंभीर अन्याय पर भारत के सुप्रीम कोर्ट की प्रतिक्रिया उसके सामान्य पतन और कार्यपालिका के प्रति उसकी मातहती को भी दर्शाती है. 13 अप्रैल को उसने अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों को पूरी तरह से त्याग दिया और उन लोगों को अंतरिम मताधिकार देने से इनकार कर दिया जिनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए थे. इस प्रकार न्यायपालिका ने पिछले कम से कम 30 वर्षों में – और शायद जब से सार्वभौमिक मताधिकार एक वैश्विक मानदंड बना है, तब से – दुनिया में मतदाता सूची से नाम हटाने के सबसे बड़े एकल समन्वित अभियान को मौन स्वीकृति दे दी है.

‘दोषी साबित होने तक निर्दोष’ के सिद्धांत को पूरी तरह से उलट दिया गया है, और अब कोई व्यक्ति तब तक ‘न्यायिक प्रक्रिया के अधीन’ माना जाएगा जब तक उसका नागरिक होना साबित न हो जाए – यह स्थिति प्रभावी रूप से व्यापक पैमाने पर दमन को संभव बनाती है और भाजपा तथा चुनाव आयोग को उनकी फासीवादी प्रवृत्तियों के लिए उत्साहित करती है. बड़े पैमाने पर मताधिकार छीनने की प्रक्रिया पूरी होने के साथ, भाजपा समय से पहले ही अपनी जीत की घोषणा करने को बेताब है. एक साक्षात्कार में शुभेंदु अधिकारी ‘सनातनी’ वोटों को एकजुट करने पर गर्व करते हुए दिखाई दिए. जब उनसे 2024 के लोकसभा चुनावों में पश्चिम बंगाल से भाजपा की सीटें कम होने के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने मुस्लिम वोट बनाम हिंदू वोट का एक अजीबोगरीब विश्लेषण प्रस्तुत किया, और गर्व से कहा कि “एसआइआर के बाद मुकाबला अब खत्म हो चुका है”.

चुनाव लड़कर भाजपा के इस अहंकार से निपटना अत्यंत महत्वपूर्ण है. भले ही यह हिंदू राष्ट्रवादी पार्टी चुनावों को केवल एक दिखावटी रस्म बना देने पर आमादा हो, फिर भी कुछ स्थानीय सर्वेक्षण भाजपा की हार की ओर ही संकेत करते हैं. खुद एसआइआर आगामी चुनावी मुकाबले का मुख्य केंद्र बिंदु बन गया है, और हमें प्रतिनिधित्वमूलक लोकतंत्र में लोगों को मुश्किल से हासिल हुए अधिकारों के लिए अपना संघर्ष जारी रखना चाहिए.

पश्चिम बंगाल में लाखों लोगों के मतदान अधिकारों की बहाली की फौरी जरूरत को किसी भी तरह से कम करके नहीं आंका जा सकता है. बड़े पैमाने पर मताधिकार छीनने की यह प्रक्रिया भाजपा के आदर्श घटना-क्रम के बिल्कुल अनुरूप है – अनेकानेक लोगों के लिए एक प्रमुख पहचान दस्तावेज का अमान्य हो जाना उन्हें अन्य सरकारी योजनाओं से वंचित किए जाने और भविष्य में मंडराते और भी अधिक गंभीर खतरों का संकेत देता है. पश्चिम बंगाल के चुनावों में हम न केवल ऐसे मोर्चे को आगे बढ़ा रहे हैं जो भारत के सबसे बुनियादी अधिकारों की रक्षा करता है, बल्कि हम भाजपा की बेशर्म कट्टरता और लोकतंत्र को भीतर से खोखला करने की उसकी कुटिल चाल को ध्वस्त करने के लिए भी संघर्ष कर रहे हैं.

(यह पश्चिम बंगाल में मतदान व चुनाव नतीजों के आने से पहले लिखित और ‘लिबरेशन’ में प्रकाशित मूल अंग्रेजी आलेख का हिंदी अनुवाद है)


09 May, 2026