वर्ष 35 / अंक - 35 / वो जुल्म लिखते रहें, हम संघर्ष लिखते रहेंगे: नेहा...

वो जुल्म लिखते रहें, हम संघर्ष लिखते रहेंगे: नेहा बोरा

वो जुल्म लिखते रहें, हम संघर्ष लिखते रहेंगे: नेहा बोरा

( संविधान के गढ़ नागपुर में 27 अगस्त को आयोजित ‘सब याद रखा जाएगा’ कार्यक्रम में आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा द्वारा दिया गया भाषण.)


बहुत शुक्रिया साथियो!

मुझे नहीं पता था कि यहा. स्याही की एक तस्वीर को लेकर चर्चा हो रही थी, और उस तस्वीर को देखकर मुझे हंसी आ गई. रांची में जब एक विद्यार्थी पर, जो एक प्रदर्शन में शामिल था, स्याही फेंकी गई थी, तो शायद उनका मकसद यह था कि लोग डर जाएं और सड़क पर उतरने से पहले सोचें कि कहीं उन पर भी स्याही न फेंक दी जाए. लेकिन उन्हें क्या पता था कि रांची से हजारों किलोमीटर दूर, सिर्फ कुछ ही दिनों बाद, दो हजार लोगों से भरा एक सभागार होगा, जहां लोग अपने गालों पर, अपने बदन पर, अपने कपड़ों पर स्याही के स्टीकर लगाकर बैठे होंगे. यह हंसी की ही बात है. जैसे 20 तारीख की हिंसा और राजकीय दमन उन्हें उल्टा पड़ गया था, वैसे ही यह भी उन्हीं पर उल्टा पड़ गया.

आप सबको मेरा जय भीम और लाल सलाम! बहुत-बहुत शुक्रिया कि आप यहां मौजूद हैं. मुझे यकीन है कि आप यहां किसी एक व्यक्ति को सुनने नहीं आए हैं. आप यहां इसलिए मौजूद हैं क्योंकि पिछले कुछ दिनों में इस देश के नौजवानों और विद्यार्थियों ने इस देश को एक नई उम्मीद दी है, और उसी उम्मीद को जिंदा रखने के लिए आप यहां बैठे हैं. आप चाहते हैं कि जब इतिहास लिखा जाए, तो उसमें यह दर्ज हो कि कौन लोग इतिहास के सही पक्ष में खड़े थे, कौन लोग जुल्म के खिलाफ जब आम जनता संघर्ष कर रही थी, तब मैदान में उतरे. मैं जानती हूं कि आप नागपुर की उस आम जनता में गिने जाना चाहते हैं जो जुल्म के खिलाफ लड़ने वालों को अकेला नहीं छोड़ती. इसीलिए आप यहां मौजूद हैं. आपको बहुत-बहुत शुक्रिया, आप सबको बधई. जय भीम, इंकलाब जिंदाबाद.

सबसे पहले, जो विद्यार्थी इस वक्त अपने छात्रावासों के लिए संघर्ष कर रहे हैं, उनके साथ इस मंच से मैं अपनी एकजुटता जाहिर करना चाहती हूं. इस देश में अलग-अलग तबकों को अलग-अलग तमगे थमा दिए गए हैं. जो भी सत्ता के खिलाफ बोलेगा, उसे देश-विरोधी, देशद्रोही, पाकिस्तानी या आईएसआई का एजेंट कह दिया जाएगा. सत्रह साल का वेदांत, जो सीबीएसई की परीक्षा के बाद हुई गड़बड़ी को लेकर सोशल मीडिया पर अपनी उत्तर पुस्तिका दिखाकर कहता है कि यह लिखावट उसकी नहीं है, उसे भी बीजेपी और आरएसएस के लोग पाकिस्तानी कह देते हैं. आज जब महाराष्ट्र के अलग-अलग जिलों में आदिवासी विद्यार्थी इसलिए प्रदर्शन कर रहे हैं ताकि उन्हें सम्मानजनक छात्रावास, ठीक भोजन और स्वास्थ्य सुविधाएं मिल सकें, तो उन्हें अर्बन नक्सल जैसे तमगों से नवाजा जाता है.

जिस विदर्भ में यह सरकार विकास का वादा करके सत्ता में आई थी, उसी विदर्भ में किसानों की आत्महत्या के आंकड़े अभूतपूर्व हैं. उसी विदर्भ में आदिवासी विद्यार्थी पिछले चौदह दिनों से बारिश में, खुले आसमान के नीचे प्रदर्शन करने को मजबूर हैं. वहां जब आदिवासी लड़कियां छुट्टियों के बाद छात्रावास लौटती हैं, तो उनकी अनिवार्य गर्भावस्था जांच करवाई जाती है. यहां जानबूझकर आश्रमों और छात्रावासों को शहर से अलग-थलग रखा जाता है ताकि वहां विद्यार्थियों के साथ होने वाला बर्ताव किसी की नजर में न आए. इसी विदर्भ में नागपुर शहर आता है, जिसे यह लोग अपना जन्मस्थान बताकर गर्व करते हैं. आज इसी नागपुर में खड़े होकर भाजपा की अलोकप्रियता का सबूत देने के लिए आप सबको बहुत-बहुत बधाई.

पिछले कुछ महीनों में भाजपा ने कभी कल्पना नहीं की होगी कि वह नौजवानों के बीच इतनी अलोकप्रिय हो जाएगी, और इस अलोकप्रियता की जिम्मेदारी वे हम पर डालते हैं. हम यह जिम्मेदारी गर्व से अपने कंधें पर लेते हैं. आप बिल्कुल सही समझते हैं, इस देश के विद्यार्थी और नौजवान आपको सत्ता में नहीं देखना चाहते. आपने एक दशक से ज्यादा इस देश पर राज किया और बेरोजगारी को अंग्रेजी हुकूमत के दौर के स्तर तक पहुंचा दिया. इसी दशक में आपने अमीर और गरीब के बीच की खाई को भी उतना ही गहरा कर दिया. आप विकास का वादा करके आए थे, लेकिन आज सत्ता में बैठे लोगों के अलावा किसी का विकास नहीं हो रहा. इस एक दशक का हिसाब आज इस देश के छात्र और नौजवान आपसे मांग रहे हैं, और यह हिसाब आपको देना ही होगा.

इस कार्यक्रम का विषय है, ‘सब याद रखा जाएगा’. तो सवाल यह है कि हम क्या-क्या याद रखेंगे? क्या सिर्फ 20 तारीख की हिंसा याद रखेंगे, या पिछले एक दशक में हिंदुस्तान में जो कुछ बीता है, वह भी याद रखेंगे?

क्या हम याद रखेंगे कि 2016 में रोहित वेमुला की संस्थागत हत्या के बाद भाजपा सरकार ने उनकी मां राधिका वेमुला को बार-बार सड़कों पर घसीटकर अपनी जाति साबित करने के लिए उकसाया? क्या हम याद रखेंगे कि जब हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के विद्यार्थी जातीय भेदभाव के खिलाफ ‘रोहित एक्ट’ की मांग कर रहे थे, तब भाजपा की पुलिस और सुरक्षा बलों ने उनके सिर लाठियों से फोड़ दिए थे?

क्या हम याद रखेंगे कि 2016 में जेएनयू और जामिया मिलिया इस्लामिया के विद्यार्थियों को अपराधी घोषित कर दिया गया, उन्हें देश की उम्मीद नहीं बल्कि करदाताओं का पैसा चूसने वाला दीमक कहा गया, और हमारे साथी बार-बार जेल भेजे गए? क्या हम याद रखेंगे कि इसी महाराष्ट्र में भीमा कोरेगांव मामले में कितने ही प्रोफेसर और कार्यकर्ता आज तक जेल में बंद हैं?

क्या हम याद रखेंगे कि जब सरकार का मन हुआ, रातोंरात नोटबंदी की घोषणा करके पूरे मुल्क को सड़कों पर लाइनों में खड़ा कर दिया, और उन लाइनों में जान गंवाने वाले आम लोगों का हिसाब आज तक किसी ने नहीं दिया?

क्या हम याद रखेंगे कि 2019 में समान नागरिकता आंदोलन के दौरान जामिया के बाहर प्रदर्शनकारी विद्यार्थियों पर आंसू गैस के गोले छोड़े गए, गोलियां चलाई गईं, और जब मुस्लिम महिलाओं ने जगह-जगह शाहीन बाग खड़े किए तो उन्हें पांच सौ रुपये में खरीदी हुई औरतें कहा गया?

क्या हम याद रखेंगे कि कोविड की तालाबंदी में सरकार के भारी कुप्रबंधन के बाद यमुना में लाशें तैरती मिलीं, और जब पत्रकारों और जनता ने जवाबदेही मांगी तो सरकार ने कहा कि कोविड पूरी तरह नियंत्रण में है, कोई अनावश्यक मौत नहीं हुई?

क्या हम याद रखेंगे कि तालाबंदी (लाॅकडाउन) में रातोंरात देश-भर के मजदूरों को हजारों किलोमीटर पैदल चलकर घर लौटने को मजबूर किया गया, और पटरियों पर सुस्ता रहे मजदूर ट्रेन के नीचे आकर मौत के घाट उतार दिए गए?

क्या हम याद रखेंगे कि महाराष्ट्र, झारखंड और असम में हजारों एकड़ जंगल कौड़ियों के भाव अडानी-अंबानी के नाम कर दिए गए? क्या हम याद रखेंगे कि उग्रवाद खत्म करने के नाम पर गढ़चिरौली, झारखंड और छत्तीसगढ़ में आम आदिवासियों पर जिस बर्बरता और हिंसा की बरसात की गई, वह उनका कैसा अपमान थी?

क्या हम उन सात सौ से ज्यादा किसानों की शहादत याद रखेंगे, जिन्होंने एक साल से ज्यादा दिल्ली की सीमाओं को अपना घर बनाया, और तब जाकर सरकार को उनकी मांगें माननी पड़ीं?

क्या हम याद रखेंगे कि जब इस देश की युवा महिला पहलवान इंडिया गेट से जंतरमंतर तक यौन उत्पीड़न के खिलाफ बृजभूषण शरण सिंह को जेल भेजने की मांग कर रही थीं, तब भाजपा के नेता ऊपर से नीचे तक उन्हें बचाने के लिए कतार में खड़े हो गए थे?

क्या हम याद रखेंगे कि इस सरकार ने पिछले एक दशक में हमें डरा-डराकर कायर बना दिया? अशफाकउल्ला खान और भगत सिंह जैसी हिंदुस्तान की गौरवशाली विरासत को झुठलाकर, इन लोगों ने हमें यह यकीन दिला दिया कि न किसी और के लिए आवाज उठानी है, न खुद के लिए. अपने ही इतिहास से यह गद्दारी क्या हम भूल जाएंगे?

अगर याद रखना है, तो यह सब कुछ याद रखना होगा. जो लाठियां हम पर पड़ीं, जो हमारे दोस्तों पर पड़ीं, जो उन तमाम अनजान लोगों पर पड़ीं जिनके नाम हम कभी नहीं जानेंगे, जिनके शहरों में हम कभी नहीं जा पाएंगे, उन सबकी शहादत, उनकी हिंसा, उनके आंसू और उनका दर्द याद रखना होगा. तभी सही मायने में यह दर्ज होगा कि आज की पीढ़ी पिछले एक दशक की हिंसा, गैर-बराबरी और जुल्म का हिसाब ले रही है. इतिहास के सही पक्ष में खड़े होने के लिए हमें अपना संघर्ष, अपना प्रदर्शन, इन तमाम जुल्मों के खिलाफ दर्ज करना होगा.

वे हमसे पूछते हैं कि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से क्या हासिल हुआ, वे तो एक व्यक्ति थे, उनकी जगह आरएसएस का कोई और व्यक्ति आ जाएगा. लेकिन हासिल यह हुआ कि रांची से बिहार तक, बंबई से नालसार तक, दिल्ली से नागपुर तक, जो सड़कें जुल्म के वक्त सुनसान रह जाती थीं, वे आज आप जैसे आम नौजवानों और विद्यार्थियों से आबाद हैं. इस आंदोलन ने यह कमाया है कि जो पिछली पीढ़ी सोचने लगी थी कि अब ऐसा हिंदुस्तान नहीं देख पाएगी जहां लोग बेखौफ अपनी बात रख सकें, वही पीढ़ी आज कहती है कि अब डर नहीं लगता, क्योंकि देश का भविष्य सही हाथों में है. और इस आंदोलन की सबसे खूबसूरत उपलब्धि है सत्ता में बैठे लोगों का डर. किसी भी लोकतंत्र में आम जनता को सरकार से नहीं, बल्कि सरकार को जनता के गुस्से और उसकी जवाबदेही से डरना चाहिए. आज यह डर भाजपा और आरएसएस के दिलों में घर कर गया है, और इससे खूबसूरत बात इस आंदोलन के लिए कुछ और नहीं हो सकती.

जो अमित शाह देश के हर कोने में घूमाकर दलितों, मुसलमानों और महिलाओं के खिलाफ जहर उगला करते थे, वे धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद संसद में अपनी शक्ल तक नहीं दिखा पाए, यह इस आंदोलन की जीत है. जो प्रधानमंत्री अपने छप्पन इंच के सीने के पीछे अपनी हर नाकामी छुपाते रहे, आज उन्हें इस देश के नौजवानों ने मजबूर कर दिया कि वे तीस-तीस सेकंड की इंस्टाग्राम रील बनाकर नई पीढ़ी की भाषा में बात करें. यह भी हमने इस आंदोलन से हासिल किया है. भाजपा तो छोड़िए, उनके आका आरएसएस के प्रमुख मोहन भागवत तक ‘जे के साथ वार्ता’ जैसे कार्यक्रम चलाकर नौजवानों के बीच अपनी स्वीकार्यता तलाशने पर मजबूर हो गए हैं. जिस आरएसएस को यह गुमान था कि नागपुर उसकी जन्मभूमि है और यहां वह जो चाहे कर सकता है, जिस विदर्भ के दम पर महाराष्ट्र की सत्ता हथियाई गई, उसी विदर्भ के लोगों की यह महफिल आज महाराष्ट्र सरकार के लिए धिक्कार बनकर खड़ी है. यह भी इस आंदोलन की जीत है.

चूंकि हम नागपुर में हैं, तो यहां उन लोगों की भी बात करनी जरूरी है जो इस देश की रगों में नफरत और जहर घोलने के लिए जिम्मेदार हैं. आरएसएस दावा करता है कि उससे बड़ा राष्ट्रवादी संगठन कोई नहीं. असल में राष्ट्रवाद क्या होगा, यह भी आरएसएस ही तय करता है.

उनका राष्ट्रवाद यह है कि जब एक मुस्लिम दंपत्ति दिल्ली की एक दुकान में हिंदुस्तान का पहला तिरंगा सिलकर तैयार कर रहा था, तब आरएसएस के मुखपत्र में यह छप रहा था कि हिंदू तीन रंगों को शुभ नहीं मानते, इसलिए इस देश के हिंदू इस तिरंगे को कभी स्वीकार नहीं करेंगे.

उनका राष्ट्रवाद यह है कि आजादी के कई दशकों बाद तक आरएसएस ने अपने मुख्यालय पर तिरंगा नहीं फहराया. उनका राष्ट्रवाद यह है कि जब सत्रह साल के खुदीराम बोस और तेईस साल के भगत सिंह जैसे हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के नौजवान क्रांतिकारी आजादी के लिए हंसते-हंसते जान देने को तैयार थे, तब आरएसएस के लोग नौजवानों को अपनी शाखाओं में बुला रहे थे, क्योंकि उनका मकसद अंग्रेजी हुकूमत को हराना नहीं, बल्कि मुगल सल्तनत को हराना था.

उनका राष्ट्रवाद यह है कि जब जलियांवाला बाग में जनरल डायर की तोपों से हिंदुस्तानी शहीद हो रहे थे, तब इनके विचारक अंग्रेजों से पेंशन लिया करते थे. उनका राष्ट्रवाद यह है कि गोविंद पानसरे, नरेंद्र दाभोलकर और गौरी लंकेश जैसे साथियों की हत्या की जांच जब भी किसी संगठन तक पहुंची, वह संगठन इन्हीं का निकला.

उनका राष्ट्रवाद यह है कि जो स्टेन स्वामी आदिवासियों के बीच अंधविश्वास के खिलाफ और वैज्ञानिक सोच के पक्ष में काम करते थे, अस्सी साल की उम्र में उन्हें जेल में बंद करके उनकी जान ले ली गई. उनका राष्ट्रवाद यह है कि जब आम लोग जंतर मंतर पर पेपर लीक के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे, तब आरएसएस के केरल के एक विचारक ने कहा कि जंतर मंतर पर मौजूद औरतों की बलात्कारी मानसिकता है और उनका बलात्कार होना चाहिए.

उनका राष्ट्रवाद यह है कि जिस शिवाजी को यह अपना प्रतीक बताकर महाराष्ट्र में वोट बटोरते हैं, उसी शिवाजी की जाति-विरोधी और सांप्रदायिकता-विरोधी विरासत से गद्दारी करते हैं. उनका राष्ट्रवाद यह है कि जब अंबेडकर पिछड़ी और दलित जातियों की महिलाओं के लिए शिक्षा और संपत्ति में हक की लड़ाई लड़ रहे थे, तब यही लोग उनके खिलाफ रामलीला मैदान भरा करते थे. और जो लोग आजादी की लड़ाई में कभी शामिल नहीं रहे, महात्मा गांधी की हत्या की जिम्मेदारी उन्हीं के संगठन से जुड़े व्यक्ति पर आती है.

जिस दिन धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा आया, उस दिन जंतर मंतर पर हमसे पूछा गया था कि हम चाहते हैं इस आंदोलन को इतिहास में कैसे याद किया जाए. हमने कहा था कि हम चाहते हैं कि जंतर मंतर की इस जीत को भाजपा-आरएसएस के इस देश पर कब्जे के अंत की शुरुआत के रूप में याद किया जाए. महाराष्ट्र में ही पुणे स्थित फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीटड्ढूट ऑफ इंडिया से भाजपा सरकार के खिलाफ पहला छात्र आंदोलन लड़ा गया था. मैं आप सबसे अपील करती हूं कि जिस महाराष्ट्र ने भाजपा के खिलाफ पहला छात्र आंदोलन दिया, वहीं से भाजपा के अंत की शुरुआत भी हो. इसी उम्मीद के साथ मैं नागपुर, पुणे और मुंबई आई हूं.

आरएसएस ने नागपुर पर यह काला  धब्बा लगाया है कि यहीं से उसकी शुरुआत हुई थी. मुझे उम्मीद है कि नागपुर के लोग इस धब्बे को मिटाकर साबित करेंगे कि यह शहर आरएसएस का गढ़ नहीं, बल्कि लोकतंत्र, संविधान और जुल्म के खिलाफ न्याय की आवाज का गढ़ है. यह हमारे आजादी के आंदोलन के सबसे खूबसूरत मूल्यों का गढ़ बने, यही उम्मीद रहेगी.

आयोजकों ने बार-बार बताया कि नागपुर में इतनी बड़ी संख्या में लोगों का इकट्टा होना आसान नहीं था, क्योंकि जैसे बाकी देश में होता है, यहां भी लोग अपने-अपने छोटे दायरों में सिमटे रहना आसान समझते हैं. साथ आने में जोखिम है, डर है, और आज के दौर की एक बीमारी यह भी है कि हम एक-दूसरे से यह साबित करने में लगे रहते हैं कि हम ज्यादा क्रांतिकारी हैं. लेकिन यह वक्त एक-दूसरे को नीचा दिखाने का नहीं, यह साबित करने का है कि हम साथ मिलकर कितना बेहतर संघर्ष कर सकते हैं. अगर आप इस क्षण में साथ आए हैं, तो उम्मीद है कि आने वाले समय में यही नागपुर वह जगह बने जहां से एक ऐसे छात्र आंदोलन, एक ऐसे युवा आंदोलन की कल्पना हो सके, जिसमें हर विद्यार्थी को सम्मानजनक शिक्षा, सम्मानजनक रोजगार और सम्मानजनक जिंदगी मिले. आज इंद्रधनुष के हर रंग के लोग यहां जिस एकजुटता के साथ जुटे हैं, उसे बनाए रखना बहुत जरूरी है, क्योंकि इसी एकजुटता को तोड़कर उन्होंने इतने लंबे समय तक हिंदुस्तान पर राज किया है.

वे बार-बार आपसे कहेंगे कि आपके बगल में खड़ा साथी आपसे अलग धर्म का है, अलग जाति का है, अलग भाषा बोलता है, अलग क्षेत्र से आता है. हर पांच साल में एक बार वे आएंगे और जाति, धर्म, लिंग, भाषा और क्षेत्र के नाम पर आपको बांटने की कोशिश करेंगे. जब भी वे आपको यह बताने की कोशिश करें कि आप एक-दूसरे से कितने अलग हैं, तब उन्हें याद दिलाइए कि यह हिंदुस्तान किसी एक व्यक्ति से नहीं, बल्कि ‘हम भारत के लोग’ से बनता है. यही ‘हम भारत के लोग’ उस लोकतंत्र के मालिक हैं जिस पर आप राज कर रहे हैं, और अब यही जनता विनम्रता से आपसे कह रही है कि या तो सत्ता छोड़ दीजिए, या आने वाले समय में हम आपको न सिर्फ संसद से, बल्कि अपने दिलों से, अपने दफ्तरों से, अपने घरों से और अपनी मोबाइल स्क्रीन से भी विदा कर देंगे.

इतने धैर्य से इतनी देर तक मुझे सुनने के लिए आप सबका बहुत-बहुत शुक्रिया. आने वाले सालों में हमें बार-बार अपने भीतर इस एकजुटता की भावना को फिर से जगाने की जरूरत पड़ेगी, क्योंकि आने वाला भविष्य हमसे बहुत कुछ मांगेगा. यह भविष्य बार-बार कहेगा कि आगे आइए, जोखिम उठाइए, हिम्मत दिखाइए, और हर चुनौती के सामने इसी हिम्मत और एकजुटता के साथ खड़े रहिए. अगर हम इतिहास और भविष्य की इस चुनौती के सामने कमजोर पड़ गए, तो जिस देश को यह लोग बिखेरने में लगे हैं, उसे बचाने का यह आखिरी मौका भी हमारे हाथ से निकल जाएगा.

तो आने वाले हर संघर्ष में एकजुटता के लिए आप सबको मेरी शुभकामनाएं. मुझे उम्मीद है कि जिन सड़कों पर हमें अपनी एकजुटता का प्रमाण देना है, हम वहां मिलेंगे, और साथ मिलकर लिखेंगे कि इस देश को फिर से कैसे आबाद किया जाता है. वे जुल्म लिखते रहें, हम संघर्ष लिखते रहेंगे. वे हमें बांटते रहें, हम एक-दूसरे का हाथ थामे रहेंगे. वे इस देश के संविधान को कुचलकर मनुस्मृति की बात करते रहें, हम बार-बार संवैधानिक मूल्यों की बात करते रहेंगे, और एक बार फिर इस देश को लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी गणराज्य बनाएंगे. इंकलाब जिंदाबाद.


29 August, 2026