- मनमोहन
फासीवादी और तानाशाही सत्ताएं हमेशा किताबों से डरती हैं. किताबें इंसान को अंधभक्ति की नींद से जगाती हैं, सवाल पूछना सिखाती हैं और इतिहास की उन सच्चाइयों से रूबरू कराती हैं जिन्हें सत्ता अपने हितों के लिए छिपाना या मिटाना चाहती है. वे बराबरी, आजादी, न्याय और वैज्ञानिक चेतना के विचारों को जिंदा रखती हैं. लोगों को वह आलोचनात्मक नजरिया देती हैं, जिससे वे सत्ता के झूठ और प्रचार के पार देख सकें. इसीलिए जब कोई दमनकारी सत्ता किताबों, पुस्तकालयों और पुस्तक स्टाॅलों को निशाना बनाती है, तो उसका मकसद सिर्फ कागज और स्याही मिटाना नहीं, बल्कि स्वतंत्र चिंतन, सामाजिक स्मृति और प्रतिरोध की पूरी परंपरा को कुचलना होता है. 31 अक्टूबर को कोलकाता की सड़कों पर किताबें हाथ में लेकर निकला हजारों नागरिकों का जुलूस इसी वैचारिक दमन के खिलाफ एक बुलंद राजनीतिक और सांस्कृतिक हस्तक्षेप था.
काॅलेज स्ट्रीट से जादवपुर तक: बुलडोजर के सामने किताबें लेकर खड़ी जनता
31 अक्टूबर को कोलकाता की ऐतिहासिक काॅलेज स्ट्रीट, जिसे प्यार से ‘बोई पाड़ा’ यानी किताबों का मोहल्ला कहा जाता है, हजारों लोगों के प्रतिरोध की गवाह बनी. ‘लेट्स वाॅक फाॅर बुक्स’ के आह्वान पर निकला यह मार्च आम राजनीतिक जुलूसों से अलग था. लोगों के हाथों में किताबें थीं और जुबान पर प्रतिरोध के गीत. लेखक, बुद्धिजीवी, शिक्षक, छात्र, रंगकर्मी, प्रकाशक, राजनीतिक कार्यकर्ता और आम नागरिक कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे थे. यह मार्च पश्चिम बंगाल में भाजपा-आरएसएस की फासिस्ट हिंदुत्ववादी राजनीति और वामपंथी पुस्तक स्टाॅलों पर हुए हमलों के खिलाफ था. लेकिन इसका दायरा किसी एक पार्टी या संगठन के स्टाॅल बचाने तक सीमित नहीं रहा. यह पढ़ने, लिखने, स्वतंत्र रूप से सोचने, सवाल उठाने और असहमति जताने की आजादी की साझा लड़ाई बन गया.
काॅलेज स्क्वायर में बंगाल नवजागरण के महान शिक्षा-सुधारक ईश्वरचंद्र विद्यासागर की प्रतिमा के सामने जुटे लोगों में शायद ही कोई ऐसा था जिसके हाथ खाली हों. किसी के हाथ में रवींद्रनाथ टैगोर की रचनाएं थीं, तो किसी के पास कार्ल मार्क्स, भगत सिंह, डाॅ. अंबेडकर, शरतचंद्र चट्टोपाध्याय और सुकांत भट्टाचार्य की किताबें. कहीं अरुंधति राॅय और उमर खालिद की रचनाएं थीं, तो कहीं स्वामी विवेकानंद का साहित्य. कुछ लोग गीता, रामायण और महाभारत जैसे धार्मिक ग्रंथ भी लेकर आए थे. विचारों की यही विविधता मार्च की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत थी. यहां किसी एक विचारधारा को थोपने की नहीं, बल्कि हर विचार को पढ़ने, समझने, परखने और उससे सहमत या असहमत होने की आजादी बचाने की बात थी. यह उस संकीर्ण सांप्रदायिक सोच को सीधा जवाब था जो भारतीय संस्कृति को ‘एक धर्म, एक पहचान और एक राजनीतिक विचारधारा’ के दायरे में कैद करना चाहती है.
प्रतिरोध के गीतों ने इस एकजुटता को और ताकत दी. तुर्की के क्रांतिकारी कवि नाजिम हिकमत के गीत ‘वे हमें गाने नहीं देते’ का बांग्ला अनुवाद ‘ओरा आमादेर गान गाइते देय ना’ गूंजा. रवींद्रनाथ टैगोर का ‘बांध भेंगे दाओ’ और अंतरराष्ट्रीय प्रतिरोध गीत ‘वी शैल ओवरकम’ का बांग्ला रूप ‘आमरा कोरबो जाॅय’ हजारों कंठों से गूंज उठा. बैनरों पर लिखा था, ‘किताबें मत जलाओ, उन्हें पढ़ो’ और ‘किताब बनाम बुलडोजर’. मार्च के बाद हुए सांस्कृतिक कार्यक्रम में ‘तू जिंदा है’, पाॅल राॅबसन का ‘ओल्ड मैन रिवर’ और भूपेन हजारिका का ‘ओ गंगा बोइछो केनो’ प्रस्तुत किया गया. मार्च में वामपंथी और जनवादी संगठनों, छात्र-युवा समूहों तथा सांस्कृतिक मंचों की सक्रिय भागीदारी रही. आइसा सहित छात्र संगठनों ने साफ कहा कि फासीवादी ताकतें किताबों से इसलिए डरती हैं क्योंकि किताबें तर्क और विवेक को मजबूत करती हैं, जबकि उनकी राजनीति अंधभक्ति और नफरत पर टिकी है.
इस जुलूस में एक बुजुर्ग अखबार विक्रेता लोगों के बीच मिठाइयां बांट रहे थे. आर्थिक कठिनाइयों के कारण वे अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पाए, लेकिन अपनी बेटी को पढ़ाने का सपना जरूर पूरा किया. 90 वर्षीय शिक्षाविद और रवींद्र भारती विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति पवित्र सरकार की मौजूदगी तथा घुटने की सर्जरी के बावजूद मार्च में शामिल हुए पूर्व आईएएस अधिकारी जवाहर सरकार का संकल्प बता रहा था कि किताबों की यह लड़ाई किसी एक पीढ़ी की नहीं, पूरे समाज के साझा विवेक की लड़ाई है.
इस प्रतिरोध की तात्कालिक वजह दुर्गापूजा के दौरान हुई घटनाएं थीं. बंगाल में दुर्गापूजा में मेले, संगीत, नाटक, कविता और पुस्तक स्टाॅलों की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा भी है. जादवपुर के 8-बी बस स्टैंड के पास सीपीआई(एम), आइसा, एपीडीआर और एसयूसीआई(सी) के पुस्तक स्टाॅल वर्षों से इस परंपरा का हिस्सा रहे हैं. लेकिन इस बार मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने दुर्गापूजा समितियों से कहा कि जो वामपंथी स्टाॅल दुर्गापूजा के बजाय ‘शारदोत्सव’ शब्द का इस्तेमाल करें, उन्हें जगह न दी जाए. यह बयान हिंदुत्ववादी गिरोहों के लिए खुला इशारा बन गया. इसके बाद बनगांव, ढाकुरिया, बेहाला, कस्बा, हावड़ा के शिबपुर और नैहाटी समेत कई जगहों पर वामपंथी पुस्तक स्टाॅलों को रोकने, कार्यकर्ताओं से मारपीट करने और किताबें नष्ट करने की घटनाएं सामने आईं.
17 अक्टूबर को जादवपुर में प्रशासन ने इस दमन को बुलडोजर कार्रवाई में बदल दिया. कोलकाता पुलिस, केंद्रीय सशस्त्र बलों और नगर निगम की टीम जेसीबी लेकर दशकों पुराने पुस्तक स्टाॅलों को हटाने पहुंची. प्रशासन ने अनुमति न होने का बहाना बनाया, जबकि संबंधित संगठनों के पास नगर निगम को निर्धारित शुल्क चुकाने की रसीदें थीं. वामपंथी संगठनों ने सवाल उठाया कि यदि उनके पुराने स्टाॅल अवैध थे, तो उसी जगह पहली बार लगाया गया आरएसएस समर्थित स्टाॅल किस अनुमति से चल रहा था? प्रशासन के पास इसका कोई जवाब नहीं था. यह दोहरा मापदंड साफ कर रहा था कि सत्ता सार्वजनिक जीवन में किस विचार को जगह देना चाहती है और किसे बेदखल करना चाहती है.
लेकिन जादवपुर में लोगों ने बुलडोजर के सामने घुटने टेकने से इनकार कर दिया. स्थानीय नागरिकों और वामपंथी कार्यकर्ताओं ने रात भर जागकर मानव श्रृंखला बनाई और बुलडोजर के आगे प्रतिरोध की दीवार खड़ी कर दी. सीपीआई(एम), आइसा, एपीडीआर और एसएफआई के कार्यकर्ता एकजुट होकर डटे रहे. पुलिस के लाठीचार्ज और एपीडीआर, एसयूसीआई(सी) तथा आइसा के स्टाॅलों को तोड़ने की कार्रवाई के बावजूद कार्यकर्ताओं ने सुबह होते-होते अपने स्टाॅल फिर खड़े कर दिए और किताबों की बिक्री शुरू कर दी.
जादवपुर की घटना देश में विचारों और उनके प्रतीकों पर हो रहे हमलों की लंबी कड़ी का हिस्सा है. मार्च 2018 में त्रिपुरा के बेलोनिया में बुलडोजर से लेनिन की मूर्ति गिराई गई. मई 2019 में कोलकाता में ईश्वरचंद्र विद्यासागर की प्रतिमा तोड़ी गई. इस साल जुलाई में रानीगंज में बौद्ध विद्वान राहुल सांकृत्यायन की प्रतिमा रातों-रात गायब कर दी गई. सांकृत्यायन तिब्बत से संस्कृत और पाली की दुर्लभ पांडुलिपियां भारत लाने वाले महान विद्वान थे. ये घटनाएं बताती हैं कि निशाने पर तर्कवादी, वैज्ञानिक और बहुलतावादी बौद्धिक विरासत है.
दिसंबर 2024 में हैदराबाद पुस्तक मेले में ‘वीक्षणम’ के स्टाॅल पर जमनादास की पुस्तक ‘तिरुपति बालाजीः ए बुद्धिस्ट श्राइन’ को लेकर विवाद खड़ा किया गया. इसके संपादक एन. वेणुगोपाल को जिंदा जलाने की धमकियां दी गईं. तिरुपति पुस्तक मेले में एक तेलुगु किताब भी जलाई गई. यह उसी असहिष्णुता का विस्तार है जिसे सत्ता के शीर्ष से ‘दिमागी नक्सली’ जैसे संबोधनों के जरिए हवा दी जाती रही है.
बिहार के बिहारशरीफ में 31 मार्च 2023 को रामनवमी जुलूस के दौरान हुई सांप्रदायिक हिंसा में 110 साल पुराने मदरसा अजीजिया की ऐतिहासिक लाइब्रेरी को भी आग के हवाले कर दिया गया. वहां रखी करीब 4,500 किताबें, जिनमें दर्शन, विज्ञान, चिकित्सा और इस्लामी अध्ययन से जुड़ी किताबें शामिल थीं, जलकर राख हो गईं. लगभग 250 दुर्लभ हस्तलिखित किताबें और 1910 से मदरसे के शैक्षणिक रिकाॅर्ड भी नष्ट हो गए.
आलोचनात्मक विवेक से डरती सत्ता
इतिहास गवाह है कि तानाशाही और फासीवादी सत्ताएं सबसे ज्यादा स्वतंत्र बुद्धि, आलोचनात्मक चिंतन और सवाल पूछने की ताकत से डरती हैं. किताबें सामाजिक स्मृति पर सत्ता के एकाधिकार को तोड़ती हैं. वे उन वैकल्पिक इतिहासों, गवाहियों और अनुभवों को बचाए रखती हैं जिन्हें सरकारी प्रचार मिटा देना चाहता है. वे पाठक को सवाल करना और प्रचार पर शक करना सिखाती हैं. पुस्तकालय, स्वतंत्र प्रकाशन और छोटे पुस्तक स्टाॅल सत्ता के नियंत्रण से बाहर संवाद और संगठन के वैकल्पिक जनमंच भी बनते हैं. इसीलिए किताबें जलाना या पुस्तक स्टाॅलों पर बुलडोजर चलाना भय पैदा करने और स्वतंत्र सोच को दबाने की कार्रवाई है.
इसका सबसे भयावह उदाहरण 10 मई 1933 को नाजी जर्मनी में सामने आया. हिटलर के सत्ता में आने के कुछ ही महीनों बाद बर्लिन के ओपेर्नप्लात्ज, जिसे आज बेबेलप्लात्ज कहा जाता है, सहित जर्मनी के तीस से अधिक विश्वविद्यालयी शहरों में नाजी छात्र संगठनों ने हजारों किताबें आग के हवाले कर दीं. प्रचार मंत्री जोसेफ गोएबल्स भी बर्लिन के आयोजन में शामिल था. सिगमंड फ्रायड, अल्बर्ट आइंस्टीन, कार्ल मार्क्स, बर्टाेल्ट ब्रेख्त, एरिक मारिया रेमार्क और हेलेन केलर जैसे लेखकों की रचनाएं निशाने पर थीं. कवि हाइनरिख हाइने ने अपने नाटक ‘अल्मांसोर’ में 1821 में ही चेतावनी दी थी, ‘जहां किताबें जलाई जाती हैं, वहां अंततः इंसान भी जलाए जाते हैं.’ नाजी जनसंहार ने इस चेतावनी को इतिहास की सबसे भयावह सच्चाइयों में बदल दिया.
लेकिन किताबें जलाने वाले विचारों को नहीं जला सके. हेलेन केलर ने पुस्तक-दहन की बर्बरता का विरोध किया और विचारों की अमर शक्ति पर भरोसा जताया. निर्वासन में रह रहे लेखकों और बुद्धिजीवियों ने भी जलाई गई किताबों की स्मृति और साहित्यिक विरासत बचाने के प्रयास किए. नाजी जर्मनी की पुस्तक-दहन की घटनाएं बताती हैं कि फासीवाद का पहला सांस्कृतिक हमला अक्सर विचारों की विविधता और आलोचनात्मक चेतना पर होता है. 1559 में रोमन कैथोलिक चर्च की प्रतिबंधित पुस्तकों की सूची और 1973 में चिली में पिनोशे के सैन्य तख्तापलट के बाद वामपंथी साहित्य को जलाने की घटनाएं भी ज्ञान और विचारों पर पहरा बैठाने की इसी प्रवृत्ति की गवाह हैं.
भारत में ज्ञान पर पहरे और उसके खिलाफ आलोचनात्मक विवेक के संघर्ष का इतिहास भी बहुत पुराना है. प्राचीन समाज में ज्ञान पर जाति आधारित एकाधिकार कायम किया गया. गौतम धर्मसूत्र जैसे ग्रंथों में शूद्रों के वेद सुनने और उनका पाठ करने पर कठोर दंड के विधान इसी सामाजिक नियंत्रण की मिसाल हैं. गौतम बुद्ध ने ज्ञान और नैतिकता पर ऐसे ब्राह्मणवादी एकाधिकार को चुनौती दी. उन्होंने आम लोगों की भाषा में उपदेश दिए. ‘कालाम सुत्त’ में उन्होंने कहा कि किसी बात को केवल परंपरा, ग्रंथ या गुरु के कहने भर से सच न मानें, बल्कि अपने विवेक और अनुभव से उसकी परख करें. ‘महापरिनिब्बान सुत्त’ से जुड़ा उनका संदेश ‘अप्प दीपो भव’ भी आत्मनिर्भर विवेक की इसी भावना को सामने रखता है. आगे चलकर चार्वाक और लोकायत जैसे भौतिकवादी दर्शनों ने धार्मिक रूढ़ियों और परलोकवादी मान्यताओं को चुनौती दी. इन परंपराओं की मूल रचनाएं बहुत कम बची हैं. आज उनके विचारों की जानकारी का बड़ा हिस्सा विरोधियों के लिखे विवरणों से मिलता है. यह भी बताता है कि विचारों को मिटाने का एक तरीका उनकी किताबों और अभिलेखों को नष्ट करना है.
ज्ञान और बौद्धिक विरासत पर हमले अलग-अलग ऐतिहासिक दौरों और अलग-अलग सत्ताओं के तहत हुए हैं. नालंदा महाविहार का विनाश भी इस संदर्भ में आमतौर पर 1193 ईस्वी में तुर्क हमले से जोड़कर बताया जाता है. लेकिन इतिहासकार डी.एन. झा ने तिब्बती बौद्ध इतिहासकार तारानाथ के विवरण के आधर पर बौद्ध भिक्षुओं और ब्राह्मण संन्यासियों के बीच टकराव का जिक्र किया है.
औपनिवेशिक दौर में ब्रिटिश सत्ता ने भी लेखन और अभिव्यक्ति की आजादी कुचलने के लिए सेंसरशिप और प्रतिबंधों का सहारा लिया. दीनबंधु मित्र के ‘नील दर्पण’ पर कार्रवाई, 1878 का वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट और 1933 में सज्जाद जहीर, अहमद अली, रशीद जहां तथा महमूदुज्जफर के कहानी संग्रह ‘अंगारे’ की जब्ती इसी दमनकारी परंपरा के उदाहरण हैं. लेकिन दमन ने प्रतिरोध को भी जन्म दिया. 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ का गठन इसी साहित्यिक और राजनीतिक प्रतिरोध का ऐतिहासिक पड़ाव बना.
आजाद भारत में भी सरकारें किताबों पर प्रतिबंध लगाने से पीछे नहीं रहीं. 1988 में सलमान रुश्दी की ‘द सैटेनिक वर्सेज’ पर रोक लगी, तो 2003 में पश्चिम बंगाल की वाम मोर्चा सरकार ने तसलीमा नसरीन की ‘द्विखंडिता’ पर प्रतिबंध लगाया. लेकिन पिछले दो दशकों में किताबों और विचारों पर हमले सरकारी प्रतिबंधों से आगे बढ़कर संगठित भीड़ की हिंसा और लेखकों-बुद्धिजीवियों की हत्याओं तक पहुंच गए. 2004 में पुणे के भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट की पांडुलिपियों पर हमला हुआ. 2010 में मुंबई विश्वविद्यालय में रोहिंटन मिस्त्री की पुस्तक ‘सच अ लाॅन्ग जर्नी’ की प्रतियां हटाई गईं. 2011 में दिल्ली विश्वविद्यालय से ए.के. रामानुजन का निबंध हटाया गया. 2014 में वेंडी डोनिगर की पुस्तक वापस ली गई. 2015 में तमिल लेखक पेरुमल मुरुगन को इस हद तक प्रताड़ित किया गया कि उन्होंने अपनी ‘लेखकीय मृत्यु’ घोषित कर दी. नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे, एम.एम. कलबुर्गी और गौरी लंकेश की हत्याएं इसी वैचारिक असहिष्णुता के खतरनाक विस्तार को दिखाती हैं. हाल के वर्षों में जनरल एम.एम. नरवणे की आत्मकथा ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ को आवश्यक आधिकारिक मंजूरियां न मिलने के कारण प्रकाशित न किया जाना भी अभिव्यक्ति की आजादी और सरकारी नियंत्रण के बीच बढ़ते टकराव की ओर इशारा करता है.
किताबों के दमन, इतिहास के पुनर्लेखन और वैचारिक असहमति को दुश्मन ठहराने की राजनीति में नाजी जर्मनी और आज के भारत की चिंताजनक समानताएं दिखाई देती हैं. वहां ‘गैर-जर्मन’ कहकर लेखकों और विचारकों को निशाना बनाया गया था. आज यहां वामपंथियों, अल्पसंख्यकों, दलितों और तर्कवादियों को ‘राष्ट्र-विरोधी’, ‘सनातन-विरोधी’ और ‘दिमागी नक्सली’ बताकर निशाने पर लिया जाता है. वहां किताबें आग के हवाले की गईं. यहां कभी उन पर पाबंदी लगती है, कभी उन्हें जलाया जाता है और कभी बुलडोजर से पुस्तक स्टाॅल उजाड़े जाते हैं. ‘अतिक्रमण’, ‘अनुमति नहीं’ और ‘भीड़ की भावनाओं’ की आड़ में चलने वाला यह दमन गंभीर चेतावनी है.
बुलडोजर संस्कृति के खिलाफ साझा जन-प्रतिरोध
किताबों पर बुलडोजर चलाने की कोशिश उसी व्यापक हिंदुत्ववादी फासीवादी परियोजना का हिस्सा है जो पाठड्ढपुस्तकों में इतिहास का चुनिंदा पुनर्लेखन करती है, विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता पर हमला बोलती है, असहमत छात्रों, शिक्षकों और लेखकों को निशाना बनाती है, गरीबों की बस्तियों और अल्पसंख्यकों के घरों पर बुलडोजर चलाती है और नागरिकों के वोट देने के अधिकार पर भी हमला करती है. आज बुलडोजर सत्ता के दमनकारी और संवाद-विरोधी चरित्र का प्रतीक बन चुका है. किसी किताब का जवाब दूसरी किताब, तर्क और बहस से दिया जा सकता है. आगजनी और बुलडोजर का रास्ता वही चुनता है जो खुली बहस में अपने विचारों का बचाव नहीं कर सकता.
कोलकाता की काॅलेज स्ट्रीट और जादवपुर के संघर्ष ने देश के सामने एक जरूरी सवाल खड़ा किया है: क्या हम सार्वजनिक जीवन, शिक्षा और संस्कृति को फासीवादी सत्ता की शर्तों पर चलने देंगे? वामपंथी और जनवादी ताकतों, छात्र-युवा संगठनों, सांस्कृतिक मंचों, लेखकों, शिक्षकों, प्रकाशकों और जागरूक नागरिकों को कोलकाता में दिखी इस एकजुटता को लगातार चलने वाले सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन में बदलना होगा. क्योंकि, जहां किताबों पर हमला शुरू होता है, वहां अगला निशाना इंसान की आजादी और उसका अस्तित्व बनता है. कोलकाता की सड़कों से उठी आवाज देश के कोने-कोने तक पहुंचनी चाहिए. फासीवाद के खिलाफ यह लड़ाई किताबों, गीतों, तर्क, वैज्ञानिक चेतना और जनता की व्यापक एकजुट ताकत के सहारे ही आगे बढ़ेगी.
संदर्भ
यूनाइटेड स्टेट्स होलोकाॅस्ट मेमोरियल म्यूजियम (USHMM) का पुस्तक दहन पर विश्वकोश लेख.
मई 1933 की समकालीन रिपोर्टिंग (जैसे एसोसिएटेड प्रेस), याद वाशेम और जर्मन अभिलेखीय सामग्री.
हाइनरिख हाइने, ‘अल्मांसोर’ (1821).
विनय पिटक (चुल्लवग्ग), अंगुत्तर निकाय (कालाम सुत्त), गौतम धर्मसूत्र.
रोमिला थापर, डी. एन. झा और अन्य इतिहासकारों के शुंग, शशांक, मिहिरकुल और नालंदा संबंधी अध्ययन.
आनंदबाजार पत्रिका और अन्य रिपोर्टें: कोलकाता और पश्चिम बंगाल की 2026 की घटनाओं के लिए.