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काॅमरेड स्वदेश भट्टाचार्य (शंभूजी): एक असाधारण क्रांतिकारी

काॅमरेड स्वदेश भट्टाचार्य (शंभूजी): एक असाधारण क्रांतिकारी

काॅमरेड स्वदेश भट्टाचार्य अब हमारे बीच नहीं रहे. वे उस ऐतिहासिक तीन-सदस्यीय केंद्रीय कमेटी के अंतिम सदस्य थे, जिसका गठन काॅमरेड चारु मजूमदार की शहादत की दूसरी बरसी पर किया गया था. उस पुनर्गठित केंद्रीय समिति के उनके दो साथी बहुत पहले ही हमें छोड़कर चले गए थे. काॅमरेड चारु मजूमदार के बाद दूसरे महासचिव बने काॅमरेड जौहर (सुब्रत दत्त) 29 नवंबर 1975 को भोजपुर में शहीद हो गए. काॅमरेड जौहर की शहादत के बाद पार्टी की कमान संभालने वाले काॅमरेड विनोद मिश्र का भी 18 दिसंबर 1998 को असामयिक निधन हो गया. 28 जुलाई 1974 से लेकर अब तक, इन 52 वर्षों में काॅमरेड स्वदेश भट्टाचार्य ने अपनी खास सूझबूझ, निस्वार्थ समर्पण, धैर्य और दृढ़ता के साथ पार्टी का मार्गदर्शन किया. अब हम अपने इस अभिभावक और उनकी मार्गदर्शक उपस्थिति की कमी महसूस करेंगे.

इन पांच दशकों में बहुत कुछ बदल गया है. 1974 में, जब आंदोलन के भीतर भारी भ्रम और अराजकता थी और राज्य की ओर से भीषण दमन हो रहा था, तब काॅमरेड जौहर, वीएम (विनोद मिश्र) और रघु (पार्टी के भूमिगत दिनों में काॅमरेड स्वदेश भट्टाचार्य इसी नाम से जाने जाते थे) ने संघर्ष की कमान फिर से संभाली. काॅमरेड चारु मजूमदार के अंतिम शब्द – पार्टी को जिंदा रखो, जनता के हितों को पार्टी का सर्वोच्च हित मानो और राज्य के भीषण दमन का मुकाबला करने के लिए व्यापक एकता कायम करो – क्रांतिकारी कम्युनिस्ट आंदोलन के पुनर्गठित केंद्र के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत बन गए. तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद इस छोटे से केंद्र ने आंदोलन को खाद-पानी दिया और इसे पूरे भारत में एक मजबूत आधर पर स्थापित किया. 1974 से 1980 तक के उन अत्यंत महत्वपूर्ण शुरूआती वर्षों में, काॅमरेड स्वदेश भट्टाचार्य ने बिहार में संगठन की जिम्मेदारी संभाली.

यहां हमें भोजपुर के एकवारी गांव की उस महान तिकड़ी को भी याद रखना चाहिए – काॅमरेड जगदीश महतो (मास्टर साहब), राम नरेश राम और रामेश्वर यादव. उनके प्रेरणादायक नेतृत्व में बहादुराना और जुझारू सामंतवाद-विरोधी संघर्ष ने शाहाबाद के मैदानी इलाकों और उससे सटे मगध क्षेत्र में अपनी जड़ें जमानी शुरू कर दी थीं. मुख्य रूप से दलित और उत्पीड़ित गरीबों के इस जागरण और उनके आत्म-सम्मान की दावेदारी ने ‘हरिजनिस्तान’ की मांग तक को जन्म दे दिया था (उस समय सामंती बिहार में, अंबेडकरवादी शब्दावली ‘दलित’ की तुलना में गांधीजी द्वारा दिया गया शब्द ‘हरिजन’ अधिक प्रचलित था). नक्सलबाड़ी की भावना और एकवारी की ऊर्जा के मेल ने पुनर्गठित भाकपा(माले) को तेजी से आगे बढ़ाया. ‘एकवारी की तिकड़ी’ के इन अग्रदूतों में से, काॅमरेड जगदीश मास्टर 10 दिसंबर 1972 को मारे गए, जब उत्पीड़ित गरीबों का यह आंदोलन अभी अपने शुरूआती दौर में ही था. 14 जनवरी 1975 को सहार के सोना टोला में पुलिस के साथ एक मुठभेड़ में काॅमरेड रामेश्वर शहीद हो गए. काॅमरेड रामनरेश राम 1980 में पार्टी की बिहार इकाई के सचिव बने. बाद में सहार से भाकपा(माले) के विधायक चुने जाने के बाद उन्होंने 1995 से लेकर 26 अक्टूबर 2010 को अपने निधन तक बिहार विधानसभा में पार्टी के विधायक दल के नेता के रूप में काम किया.

1980 के दशक में बिहार में सामाजिक मर्यादा, भूमि अधिकारों और उचित मजदूरी के लिए चलाए जा रहे क्रांतिकारी किसान आंदोलन का काफी विस्तार हुआ. देश के कई अन्य हिस्सों में भी इसी तरह के संघर्ष शुरू हुए. इंडियन पीपुल्स फ्रंट (आइपीएफ) के एक खुले जन-संगठन के रूप में गठित होने से बिहार और उसके बाहर चल रहे इस सामंतवाद-विरोधी जागरण की आवाज पूरे भारत में गूंजने लगी. आइपीएफ के बैनर तले बिहार के वोट के अधिकार से वंचित दलितों और उत्पीड़ित जातियों के मेहनतकश लोगों ने अपने मताधिकार का वास्तविक उपयोग करना शुरू कर दिया. नवंबर 1989 के लोकसभा चुनावों में भोजपुर के संघर्षशील गरीबों ने अपने वोट के अधिकार का इस्तेमाल करके इतिहास रच दिया और खेत मजदूर नेता काॅमरेड रामेश्वर प्रसाद को आरा से लोकसभा में पहुंचाया. काॅमरेड विनोद मिश्रा और रामनरेश राम के साथ-साथ काॅमरेड स्वदेश भट्टाचार्य क्रांतिकारी किसान आन्दोलन की इस महान दावेदारी के मुख्य सूत्रधर थे.

बहरहाल, 1990 का दशक एक अलग ही मोड़ के साथ शुरू हुआ. भाजपा और आरएसएस ने एक हमलावर मुहिम चलाई, जिसके चलते ‘रथ यात्रा’ के नाम पर दंगे और खून-खराबे हुए और अंततः, संविधान का खुलेआम उल्लंघन करते हुए और सुप्रीम कोर्ट के सामने उ.प्र. सरकार द्वारा किए गए वादे को दरकिनार करते हुए, दिन-दहाड़े 16वीं सदी की बाबरी मस्जिद को ढहा दिया गया. यह घटना कोलकाता में भाकपा(माले) का पांचवां महाधिवेशन शुरू होने से ठीक दो सप्ताह पहले हुई. पार्टी बाबरी मस्जिद विध्वंस के निहितार्थों को अच्छी तरह समझ रही थी. पांचवें महाधिवेशन ने भारत में सांप्रदायिक फासीवाद के बढ़ते खतरे को भांप लिया था, और पार्टी ने खुले रूप में सामने आने तथा मोर्चे पर डटकर लड़ने का संकल्प लिया. इसके साथ ही, पार्टी के लिए एक नई कार्यालय प्रणाली और संगठनात्मक ढांचा तैयार करने की नई चुनौती भी सामने आई. काॅमरेड स्वदेश भट्टाचार्य ने दिल्ली में पार्टी का नया केंद्रीय कार्यालय स्थापित करने की जिम्मेदारी संभाली. 28 जुलाई 2012 को इस कार्यालय को ‘चारु भवन’ के रूप में अपनी मौजूदा पहचान मिली.

1970 के दशक के गंभीर धक्कों के बाद पार्टी को उबारने से लेकर, उसे एक जीवंत कम्युनिस्ट पार्टी के रूप में ढालने और फासीवाद-विरोधी संघर्ष के मौजूदा चुनौतीपूर्ण दौर के लिए तैयार करने तक, काॅमरेड स्वदेश भट्टाचार्य पार्टी की निरंतरता व स्थिति के साथ तालमेल बिठाने की क्षमता, एकता व स्थिरता, मजबूती और परिपक्वता के जीवंत प्रतीक बन गए थे. उन्होंने लगातार बदलते हालात के उतार-चढ़ाव और मोदी दौर में फासीवादी हमलों के तेज होने से पैदा हुई चुनौतियों के बीच पार्टी को संभाले रखा. पार्टी में पूर्णकालिक संगठक के रूप में शामिल होने से पहले काॅमरेड स्वदेश भट्टाचार्य रांची में सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी हेवी इंजीनियरिंग काॅरपोरेशन (एचईसी) में एक कर्मचारी थे. आंदोलन के लिए उस धक्के के दौर में, जब सत्ता पक्ष गर्व के साथ भाकपा(माले) के खत्म होने की घोषणा कर रहा था और कुछ भ्रमित व निराश क्रांतिकारी पीछे हटने लगे थे, तब काॅमरेड स्वदेश भट्टाचार्य एक पेशेवर क्रांतिकारी के रूप में आगे आए. उनका यह दृढ़ संकल्प और अदम्य साहस ही उनके पूरे कम्युनिस्ट जीवन की पहचान बना. पिछले कुछ वर्षों में कैंसर से जूझने के बावजूद वे पार्टी की रोजमर्रा की गतिविधियों में पूरी तरह सक्रिय रहे. अस्पताल में रहते हुए भी वे ‘जेन-जी’ के प्रतिवादों और आइसा के साथियों की जोशीली व साहसिक भूमिका पर पैनी नजर रखे हुए थे. जब तक वे बोल पाने की स्थिति में रहे, तब तक वे केवल पार्टी संगठन को मजबूत करने और पार्टी की भूमिका को बढ़ाते रहने की ही बात करते रहे.

अलविदा काॅमरेड शंभूजी (पूरे भारत में साथियों के बीच काॅमरेड स्वदेश भट्टाचार्य इसी नाम से सबसे ज्यादा जाने जाते थे)! शक्ति और संघर्ष की आपकी विरासत अमर रहे! आपकी प्रिय पार्टी आपके अधूरे मिशन को पूरा करने के लिए हर संभव प्रयास करती रहेगी.

07 November, 2026