-- क्लिफ्टन डी रोजारियो
इस साल 24 मई को दिल्ली के लाल किले के पास जनजाति सुरक्षा मंच ने बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती वर्ष के मौके पर एक विशाल ‘जनजाति सांस्कृतिक संगम’ आयोजित किया. बताया गया कि इसमें डेढ़ लाख से ज्यादा आदिवासी शामिल हुए. इस कार्यक्रम की सबसे बड़ी और मुख्य मांग थी कि जो आदिवासी ईसाई या इस्लाम धर्म अपना चुके हैं, उन्हें अनुसूचित जनजाति (एसटी) की सूची से बाहर कर दिया जाए. यानी उन्हें आरक्षण की सूची से बाहर करना और हक-अधिकार छीनना. यह सिर्फ एक मांग नहीं है. यह उस बड़ी राजनीतिक मुहिम का हिस्सा है, जो आदिवासियों की संस्कृति, धर्म और पहचान को बदलने के लिए चलाई जा रही है. संयोग नहीं है कि जनजाति सुरक्षा मंच, वनवासी कल्याण आश्रम से जुड़ा संघ परिवार का ही एक संगठन है. इसकी स्थापना 2006 में हुई थी. इसका एक ही मकसद था – धर्म बदल चुके आदिवासियों को एसटी सूची से बाहर करने की मांग को लेकर देशभर में अभियान चलाना.
इस रैली में इतनी बड़ी संख्या में लोगों का जुटना दिखाता है कि संघ परिवार ने आदिवासी इलाकों में अपनी पकड़ काफी बढ़ा ली है. इससे भी ज्यादा अहम बात यह है कि उसके राजनीतिक एजेंडे को आदिवासी समाज के एक हिस्से में स्वीकार्यता भी मिलने लगी है. संघ परिवार ‘आदिवासी’ शब्द को नहीं मानता. पहले वह ‘वनवासी’ शब्द चलाता रहा. अब उसने ‘जनजातीय’ शब्द को आगे बढ़ाना शुरू किया है.
यह सिर्फ शब्दों का फर्क नहीं है. इसके पीछे एक गहरी राजनीतिक सोच काम करती है. ‘आदिवासी’ का मतलब है इस धरती के मूल निवासी. यह उनकी जमीन, जंगल और प्राकृतिक संसाधनों पर ऐतिहासिक हक का दावा भी है. लेकिन ‘वनवासी’ या ‘जनजातीय’ कहकर उन्हें एक बड़े हिंदू समाज का सिर्फ एक हिस्सा बना दिया जाता है. इससे उनकी अलग पहचान और ऐतिहासिक अधिकारों को कमजोर किया जाता है.
दशकों से आरएसएस से जुड़े संगठन आदिवासी समाज को एक व्यापक हिंदू पहचान में समेटने की कोशिश कर रहे हैं. इसके लिए स्कूल, छात्रावास, सांस्कृतिक कार्यक्रम और धार्मिक अभियान चलाए गए हैं. मकसद आदिवासियों की सोच और पहचान को बदलना है. इस मुहिम से हिंदुत्व की राजनीति का सामाजिक आधार बढ़ता है. साथ ही, आदिवासियों की अपनी धार्मिक परंपराओं और संविधान में मिले अधिकारों पर भी हमला होता है. सबसे खतरनाक बात यह है कि आदिवासी समाज में धर्म को हथियार बनाकर धर्म के नाम पर लड़वाना और फूट डालना शुरू कर दिया गया है. इसी वजह से ईसाई आदिवासी लगातार हिंसा, भेदभाव और तथाकथित ‘घर वापसी’ अभियानों का निशाना बन रहे हैं.
डांग्स (गुजरात) और कंधमाल (ओडिशा) की हिंसा, चर्चों पर हमले और बार-बार लगाए जाने वाले ‘जबरन धर्मांतरण’ के आरोप दिखाते हैं कि आज आदिवासी इलाकों को अलग-अलग विचारधाराओं की लड़ाई का मैदान बना दिया गया है.
आदिवासी, संविधान और धर्म
पीढ़ियों से आदिवासियों की पहचान सिर्फ उनके धर्म से तय नहीं होती रही है. उनकी पहचान उनकी जमीन, जंगल, सामुदायिक जीवन, संस्कृति और साझा इतिहास से बनी है.
आदिवासी समाज के भीतर अलग-अलग धर्मों को मानने वाले लोग हमेशा साथ रहे हैं. इससे उनकी साझा पहचान कभी नहीं टूटी. उदाहरण के लिए, उरांव और मुंडा समुदायों में हिंदू, ईसाई और सरना – तीनों धर्मों को मानने वाले लोग मिलते हैं. मध्य भारत के भीलों में भी ईसाई, मुस्लिम और हिंदू हैं. कर्नाटक के सिद्दी समुदाय में भी यही स्थिति है. सिर्फ सरना ही नहीं, अनेक आदिवासी समुदाय अपनी पारंपरिक आस्थाओं को मानते हैं. ये आस्थाएं ऐतिहासिक रूप से ब्राह्मणवादी वर्चस्व को चुनौती देती रही हैं. साथ ही, इन्हीं समुदायों के दूसरे लोग अलग-अलग स्थापित धर्मों को भी मानते हैं. धर्म अलग हो सकता है, लेकिन उनकी संस्कृति, रीति-रिवाज और सामुदायिक जीवन साझा हैं.
इसीलिए संविधान ने आदिवासियों को ऐसे ऐतिहासिक समुदायों के रूप में देखा, जिन्हें विशेष संरक्षण की जरूरत है. इसकी वजह उनका धर्म नहीं, बल्कि उनका भौगोलिक अलगाव, सदियों का शोषण और शासन से बाहर रखा जाना था. यही कारण है कि संविधान अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के मामले में अलग-अलग व्यवस्था करता है. संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के तहत अनुसूचित जाति का दर्जा कुछ तय धर्मों से जुड़ा हुआ है. लेकिन अनुसूचित जनजातियों के लिए ऐसा कोई धार्मिक प्रतिबंध नहीं है. अनुच्छेद 342 के तहत आदिवासी पहचान की बुनियाद उनका वंश, जातीय पहचान, पारंपरिक सामाजिक संस्थाएं, समुदाय की मान्यता और ऐतिहासिक वंचना है – न कि उनका धर्म. अदालतें बार-बार यह बात साफ कर चुकी हैं. हाल ही में 24 मार्च 2026 को चिंथाडा आनंद बनाम आंध्र प्रदेश राज्य एवं अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फिर दोहराया कि केवल धर्म परिवर्तन हो जाने से किसी व्यक्ति का अनुसूचित जनजाति का दर्जा अपने-आप खत्म नहीं हो जाता.
हिंदुत्व परियोजना का हिस्सा है एसटी सूची से बाहर करना
संघ परिवार की राजनीति का सबसे बड़ा आधार आज भी मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैलाना है. लेकिन अब उसका निशाना ईसाई समुदाय, खासकर ईसाई आदिवासी भी बन रहे हैं. आरएसएस आदिवासी समाज को इसलिए भी अपने प्रभाव में लाना चाहता है, क्योंकि उसे लगता है कि ईसाई और दूसरे गैर-हिंदू समुदाय उसके हिंदू राष्ट्र के सपने के रास्ते में बाधा हैं. हिंदुत्ववादी संगठन ‘जबरन धर्मांतरण’ का डर फैलाते हैं. वे दावा करते हैं कि इससे हिंदुओं की आबादी घट रही है. इसी बहाने ईसाइयों के खिलाफ जहर फैलाया जाता है और हिंसा को हवा दी जाती है.
1990 के दशक से आदिवासी ईसाइयों पर लगातार हमले हुए. 1998 में गुजरात के आदिवासी इलाकों में बड़ी संख्या में चर्च जलाए गए और तोड़े गए. उसी साल मध्य प्रदेश के एक आदिवासी जिले में ननों के साथ बलात्कार किया गया.
1999 की शुरुआत में ओडिशा के एक आदिवासी जिले में विदेशी मिशनरी ग्राहम स्टेन्स और उनके दो छोटे बेटों को जिंदा जलाकर मार डाला गया. इसके बाद ईसाइयों के खिलाफ सबसे भयावह हिंसा ओडिशा के आदिवासी जिले कंधमाल में हुई. वहां अनेक ईसाइयों की हत्या कर दी गई. सैकड़ों चर्च और हजारों घर जला दिए गए. ननों के साथ बलात्कार हुए. इसके बाद आदिवासी ईसाइयों को जबरन ‘घर वापसी’ और ‘शुद्धि’ जैसे अभियानों में शामिल करने की कोशिशें भी चलती रहीं.
इन अभियानों की बुनियाद यह सोच है कि आदिवासी मूल रूप से हिंदू हैं और ईसाई धर्म अपनाने से उन्होंने अपनी असली पहचान खो दी है. इसलिए ‘घर वापसी’ को उनकी कथित पुरानी आस्था में लौटना बताया जाता है. लेकिन ‘घर वापसी’ और ‘शुद्धि’ का मकसद सिर्फ धर्म परिवर्तन नहीं है. इसका बड़ा राजनीतिक लक्ष्य आदिवासियों की अलग संस्कृति, आस्था और पहचान को एक जैसी हिंदुत्ववादी पहचान में समेट देना है. इससे आदिवासियों की अपनी स्वतंत्र पहचान, उनके धर्म और आत्मनिर्णय के अधिकार को कमजोर किया जाता है.
इस तरह हिंदुत्ववादी ताकतें आदिवासी इलाकों के ईसाइयों और मुस्लिम कारोबारियों को ‘हिंदू राष्ट्र’ के बाहर का बताती हैं. उन्हें हिंदू समाज के लिए खतरा बताया जाता है. साथ ही आदिवासियों से कहा जाता है कि वे अपनी ‘हिंदू पहचान’ बचाने के लिए खड़े हों और अपने धर्म की रक्षा करें. आदिवासी ईसाइयों को निशाना बनाते समय धर्मांतरण का मुद्दा जरूर उठाया जाता है. लेकिन असली मकसद इससे कहीं बड़ा है. लक्ष्य पूरे आदिवासी समाज को ‘हिंदू समाज’ में समेट देना है. हिंदुत्ववादी आंदोलन आज तक इस मकसद को पूरी तरह हासिल नहीं कर पाया है, इसलिए यह मुहिम लगातार तेज की जा रही है.
हाल के वर्षों में, खासकर छत्तीसगढ़ में, ईसाई आदिवासियों के खिलाफ डराने-धमकाने, सामाजिक हुक्का-पानी बंद करने, हिंसा करने और गांवों से बेदखल करने का संगठित अभियान चलाया गया है. इसके पीछे संघ परिवार से जुड़े संगठन, खास तौर पर जनजाति सुरक्षा मंच, सक्रिय रहे हैं. ईसाई आदिवासियों पर हमले किए जाते हैं. उन्हें धमकी दी जाती है कि अगर उन्होंने अपना धर्म नहीं छोड़ा तो गांव से निकाल दिया जाएगा.
यह भेदभाव सिर्फ हिंसा तक सीमित नहीं है. ईसाई आदिवासियों का बार-बार सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार किया गया है. उन्हें सार्वजनिक कुओं और जलस्रोतों से पानी लेने से रोका गया. अपनी फसल काटने नहीं दी गई. गांव की संस्थाओं से बाहर रखा गया. उन पर धर्म छोड़ने का दबाव बनाया गया. कई गांवों में ईसाइयों को सामुदायिक कब्रिस्तान में अपने मृतकों को दफनाने नहीं दिया गया. कहीं-कहीं उन्हें अपनी निजी जमीन पर भी अंतिम संस्कार करने से रोका गया. कुछ जगहों पर तो दफनाए जा चुके शवों को भी कब्र से निकाल दिया गया. इसी साल फरवरी में सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम आदेश देकर छत्तीसगढ़ के गांवों में आदिवासी ईसाइयों के शवों को कब्रों से जबरन निकालने और दूसरी जगह ले जाने पर रोक लगा दी.
उत्पीड़न का सबसे खतरनाक पहलू यह रहा कि गांव की संस्थाओं और ग्राम सभा के प्रस्तावों का इस्तेमाल इस अन्याय को वैध ठहराने के लिए किया गया. पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम (पेसा) के प्रावधानों का दुरुपयोग करके ऐसे प्रस्ताव पारित किए गए, जिनमें धर्म न छोड़ने वाले ईसाई आदिवासियों को गांव से निकालने का फैसला किया गया. ईसाई परिवारों को साफ अल्टीमेटम दिया गया – या तो हिंदू धर्म अपना लो, या अपने पुश्तैनी गांव में रहने का अधिकार छोड़ दो. यह पूरा अभियान जनजाति सुरक्षा मंच के बैनर तले चलाया जा रहा है. इसे सत्ता का खुला संरक्षण हासिल है. यही वजह है कि इस तरह की कार्रवाइयां बिना किसी डर या जवाबदेही के जारी हैं.
सबसे चिंता की बात यह है कि यह सब ऐसे समय में हो रहा है, जब आदिवासियों के जीवन, आजीविका और अस्तित्व पर ही केंद्र सरकार की ओर से सबसे बड़ा हमला चल रहा है.
मोदी सरकार ने आदिवासियों पर ऐसा हमला शुरू किया है, जिसकी मिसाल पहले नहीं मिलती. इसका मकसद उनकी अलग पहचान, उनके अस्तित्व और उनकी सांस्कृतिक स्वायत्तता को मिटा देना है. आजादी के समय जो वादे किए गए थे, वे आज पूरी तरह तोड़े जा चुके हैं. कहा गया था कि इस देश के मूल निवासी और जल-जंगल-जमीन के असली रखवाले आदिवासियों के अधिकार सुरक्षित रहेंगे. लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल उलट है. एक तरफ हिंदुत्व के एजेंडे के तहत आदिवासियों की अलग संस्कृति को मिटाकर उन पर एक जैसी पहचान थोपने की कोशिश हो रही है. दूसरी तरफ उन्हें बड़े पैमाने पर उनकी जमीनों से उजाड़ा जा रहा है और उनका आर्थिक शोषण किया जा रहा है. देश को पहली आदिवासी राष्ट्रपति मिलने को बड़ी उपलब्धि बताया गया. लेकिन इसी दौर में आदिवासियों की जिंदगी, रोजी-रोटी और संस्कृति पर सबसे भीषण हमला हुआ. माओवाद से लड़ाई के नाम पर चलाया जा रहा ऑपरेशन कगार दरअसल आदिवासियों के खिलाफ एक जंग बन गया है. आज पहले से कहीं ज्यादा आदिवासियों की जमीन और जंगल काॅरपोरेट कंपनियों को सौंपे जा रहे हैं. उन्हें विस्थापन और शोषण से बचाने वाले कानूनों को योजनाबद्ध ढंग से कमजोर किया जा रहा है.
देश में विकास के तमाम दावों के बावजूद आदिवासी आज भी सबसे नीचे खड़े हैं. केंद्र और राज्य, दोनों स्तरों की सरकारों ने बार-बार उन्हें निराश किया है. आजाद भारत में उन्हें उनका हक मिलेगा, यह भरोसा बार-बार तोड़ा गया है. एक ओर आदिवासी अपनी रोजमर्रा की बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हैं. दूसरी ओर सरकार के संरक्षण में काॅरपोरेट कंपनियां जल, जंगल और जमीन की लूट में लगी हैं. जंगल संरक्षण के नाम पर भी आदिवासियों को उनके जंगलों और जमीन से बेदखल किया जा रहा है. इससे उनकी संस्कृति और पहचान दोनों पर हमला हो रहा है. लेकिन आज आदिवासियों का संकट सिर्फ गरीबी या रोजगार का नहीं है. यह उनके अस्तित्व का संकट है. इसमें कोई शक नहीं कि लोकतंत्र और विकास के सात दशकों में आदिवासियों ने सबसे कम पाया और सबसे ज्यादा खोया है. बीते एक दशक ने यह भी साबित कर दिया है कि लोकतंत्र की अनेक संस्थाएं भी उन्हें इंसाफ दिलाने में नाकाम रही हैं.
आज जब आदिवासियों के अस्तित्व पर अब तक का सबसे बड़ा हमला हो रहा है, उसी समय उन्हें जबरन हिंदू पहचान में समेटने की मुहिम भी तेज कर दी गई है. उनकी अलग धार्मिक आस्थाओं, परंपराओं और पहचान को मिटाने की कोशिश हो रही है. आदिवासी इलाकों में हिंदुत्व की यह आक्रामक मुहिम लगातार फैल रही है. इसी मुहिम का एक नया मोर्चा है – आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति की सूची से बाहर करने की मांग. यह लड़ाई उन आदिवासियों के खिलाफ है, जो खुद को जल-जंगल-जमीन के मूल रक्षक और मालिक मानते हैं. दूसरी ओर संघ परिवार उन्हें सिर्फ ‘जनजातीय’ या ‘वनवासी’ बताकर उनकी ऐतिहासिक पहचान मिटाना चाहता है.
साफ है कि अनुसूचित जनजाति की सूची से बाहर करने की इस मुहिम का आदिवासी कल्याण से कोई लेना-देना नहीं है. यह हिंदुत्व की विचारधारा से प्रेरित राजनीतिक हमला है. इसका निशाना वह संवैधानिक वादा है, जिसके तहत धर्म की परवाह किए बिना अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिया गया है. साथ ही, इसका मकसद आदिवासियों में फूट डालना और उनका ध्यान जल-जंगल-जमीन की लड़ाई से भटकाना भी है.
बिरसा की विरासत से गद्दारी: संघ का डीलिस्टिंग एजेंडा
इस पूरी मुहिम का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि संघ परिवार इसे सही ठहराने के लिए बिरसा मुंडा की विरासत का इस्तेमाल कर रहा है. हाल में हुए जनजाति सांस्कृतिक संगम में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बार-बार बिरसा मुंडा को ऐसे नेता के रूप में पेश किया, जिन्होंने ‘धर्म, जंगल और पहचान’ की रक्षा का आह्वान किया था. उन्होंने दावा किया कि बिरसा ने आदिवासियों से कहा था, ‘यह हमारा देश है, हमारा धर्म ही सच्चा धर्म है और हमारे जंगलों पर कोई कब्जा नहीं कर सकता.’
लेकिन यह बिरसा मुंडा के जीवन और संघर्ष की अधूरी और तोड़ी-मरोड़ी तस्वीर है. अपने समय के ज्यादातर आदिवासियों की तरह बिरसा मुंडा का बचपन भी गरीबी, विस्थापन और जमींदारों तथा अंग्रेजी हुकूमत के जुल्म के बीच बीता. रोजगार की तलाश में उनका परिवार गांव-गांव भटकता रहा. बचपन से ही उन्होंने अपने समाज का अपमान, शोषण और पीड़ा देखी. अपने जीवन में बिरसा कई धार्मिक और सामाजिक धाराओं के संपर्क में आए. उन्होंने ईसाई धर्म अपनाया, मिशनरी स्कूलों में पढ़ाई की, हिंदू सुधारवादी विचारों और स्थानीय आध्यात्मिक परंपराओं से भी प्रभावित हुए. बाद में वे अपने समुदाय की पारंपरिक आस्था की ओर लौटे. लेकिन बिरसा को सबसे गहराई से जिसने बदला, वह कोई धर्म नहीं था. वह था आदिवासी समाज पर बढ़ता संकट.
जमीन छिन रही थी. पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था तबाह की जा रही थी. अंग्रेजी हुकूमत आदिवासियों की पीड़ा से पूरी तरह बेपरवाह थी. इन हालात ने बिरसा को यह यकीन दिलाया कि अपने लोगों को एक संगठित और लड़ाकू संघर्ष खड़ा करना होगा. बिरसा ने खुद को सिर्फ धार्मिक सुधारक तक सीमित नहीं रखा. वे एक राजनीतिक नेता बनकर उभरे. उन्होंने मुंडा, उरांव, खड़िया, ईसाई और गैर-ईसाई – सभी आदिवासियों को जमीन और इंसाफ की साझा लड़ाई में एकजुट किया. बिरसा के लिए आदिवासियों के असली दुश्मन अंग्रेजी हुकूमत, जमींदार, शोषक हुक्मरान तबका और वे सभी लोग थे जो आदिवासियों की जमीन और अधिकारों की लूट से फायदा उठा रहे थे. इसलिए बिरसा की विरासत औपनिवेशिक शासन के खिलाफ जुझारू प्रतिरोध, सामूहिक आत्मनिर्णय और जल-जंगल-जमीन की लड़ाई की विरासत है.
लेकिन संघ परिवार बिरसा मुंडा को सिर्फ ईसाई मिशनरियों का विरोधी बनाकर पेश करना चाहता है. इससे वह इस सच्चाई को छिपाता है कि बिरसा का संघर्ष हर तरह के शोषण और जुल्म के खिलाफ था. मिशनरियों की आलोचना उन्होंने इसलिए की थी क्योंकि उनका रिश्ता औपनिवेशिक सत्ता से था. लेकिन बिरसा ने कभी गरीब ईसाइयों या गैर-आदिवासी आम लोगों को अपना दुश्मन नहीं माना. उनकी पुकार धार्मिक टकराव की नहीं थी. वह शोषण से मुक्ति, आदिवासियों की जमीन और समाज पर उनके अपने अधिकार की बहाली की पुकार थी.
बिरसा मुंडा ने भारतीय इतिहास के सबसे बड़े उपनिवेश-विरोधी विद्रोहों में से एक का नेतृत्व किया. उन्होंने जमीन की लूट, बेदखली, महाजनों और जमींदारों के शोषण तथा उस पूरी औपनिवेशिक व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष किया, जिसने इस लूट को बढ़ावा दिया. उनकी लड़ाई उन ताकतों के खिलाफ थी जो आदिवासियों का शोषण करके अमीर बन रही थीं. उन्होंने लोगों को शोषण और दमन के खिलाफ संगठित किया, न कि उन आदिवासियों के खिलाफ जो अलग धर्म मानते थे.
इसलिए संघ परिवार का यह अभियान सिर्फ इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश करना नहीं है. यह अपने राजनीतिक एजेंडे के मुताबिक इतिहास को दोबारा लिखने की कोशिश है.
निष्कर्ष
आजादी के बाद से आदिवासी अपने पुश्तैनी जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए लगातार संघर्ष करते रहे हैं. उन्होंने विस्थापन, जंगलों की तबाही और प्राकृतिक संसाधनों को काॅरपोरेट कंपनियों के हवाले किए जाने का विरोध किया है. लंबे संघर्षों के बाद ही पेसा कानून और वनाधिकार कानून जैसे कानूनी संरक्षण हासिल हुए.
हिंदुत्व की राजनीति इसी आदिवासी एकता को धर्म के नाम पर तोड़ना चाहती है. अगर आदिवासी एकजुट रहें, तो वे विस्थापन, हकमारी और काॅरपोरेट लूट के खिलाफ मजबूत लड़ाई लड़ सकते हैं. लेकिन अनुसूचित जनजाति की सूची से बाहर करने की राजनीति इस साझा प्रतिरोध को कमजोर करती है और आदिवासियों को आपस में बांट देती है.
जैसा कि एक टिप्पणीकार ने कहा है, खतरा सिर्फ अनुसूचित जनजाति की सूची से बाहर करने की मांग तक सीमित नहीं है. असली खतरा उस जहरीली राजनीति का है, जिसे आदिवासी इलाकों में उतारा जा रहा है. यही राजनीति पहले ही भारतीय समाज के बड़े हिस्से को बांट चुकी है. यह शक, नफरत और फूट पर पलती है. यह पड़ोसियों को दुश्मन और शोषण के शिकार लोगों को ही एक-दूसरे का विरोधी बना देती है.
इस परियोजना को हराना आज की सबसे बड़ी जरूरत है. अगर यह कामयाब हो गई, तो जल-जंगल-जमीन, आजीविका, स्वशासन और संविधान में मिले अधिकारों की लड़ाई पीछे धकेल दी जाएगी. उसकी जगह धर्म की पहचान के नाम पर खड़े किए गए झूठे विवाद ले लेंगे. यह बिरसा मुंडा की विरासत के साथ ऐतिहासिक विश्वासघात होगा.
बिरसा मुंडा को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हर धर्म के आदिवासी जल-जंगल-जमीन, प्राकृतिक संसाधनों, संविधान में मिले अधिकारों, सम्मान और स्वशासन की रक्षा के लिए एकजुट हों. यही बिरसा की विरासत का सम्मान होगा. यही रास्ता आदिवासी आंदोलन को धर्म और सांप्रदायिक फूट के खोखले सवालों से निकालकर जल-जंगल-जमीन, संसाधनों और स्वशासन की असली लड़ाई की ओर ले जाएगा.