‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ के पंद्रह सप्ताह के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ चौदह-सूत्री ‘शांति समझौता’ पर हस्ताक्षर करके ‘ऑपरेशन एपिक रिट्रीट (बड़ी वापसी) को अंजाम दिया है. बेशक, यह अभी भी एक मसौदा समझौता (एमओयू) ही है और अंतिम समझौते पर साठ दिनों के बाद हस्ताक्षर किए जाएंगे. इस बीच इजराइल इस समझौते से सहमत नहीं है और लेबनान में उसका जारी सैन्य हमला शांति योजना को पटरी से उतार सकता है. शांति समझौते को हकीकत में बदलने के लिए एमओयू के कई बिंदुओं को तुरंत लागू करना होगा: लेबनान सहित सभी युद्ध मोर्चों पर युद्ध-विराम, अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी को हटाना और ईरान से अमेरिकी सशस्त्र बलों की वापसी, ईरान और ओमान द्वारा भविष्य के प्रशासन और समुद्री सेवाओं के मामले में निर्णय लिए जाने तक होर्मुज जलडमरू-मध्य से मुक्त अंतरराष्ट्रीय आवाजाही, ईरानी कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों और संबंधित बैंकिंग और परिवहन सेवाओं के निर्यात के लिए छूट, और ईरान के जब्त किए गए फंड की रिहाई.
ट्रंप ने 17 जून 2026 को वर्साय के महल में फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रां द्वारा आयोजित जी-7 डिनर में समझौते पर हस्ताक्षर किए. पर्यवेक्षकों ने तुरंत 1919 की वर्साय संधि के साथ इस समझौते की ऐतिहासिक समानता बताई, जिस पर जर्मनी को प्रथम विश्व युद्ध की पूरी जिम्मेदारी लेते हुए मित्र देशों (एलाइड पावर्स) के साथ हस्ताक्षर करना पड़ा था. हालांकि, अमेरिका के लिए मौजूदा स्थिति अभी उतनी अपमानजनक नहीं है जितनी प्रथम विश्व युद्ध के बाद जर्मनी के लिए थी. ट्रंप ने खुद अमेरिकी वापसी को सही ठहराने के लिए बीसवीं सदी के इतिहास के एक और पल का हवाला दिया. उन्होंने कहा कि वह हर्बर्ट हूवर के रूप में याद नहीं किया जाना चाहेंगे, जो 1929 की महामंदी के समय अमेरिकी राष्ट्रपति थे. ट्रंप को डर था कि होर्मुज नाकेबंदी और बढ़ते ऊर्जा संकट से अमेरिका और वैश्विक अर्थतंत्र एक और महामंदी में जा सकते हैं. हाल की समानताओं के लिए, दुनिया को वियतनाम में अमेरिकी हार और अफगानिस्तान में अमेरिकी योजना के ढहने की याद आई, जहां दो दशकों के युद्ध और कब्जे के बाद अमेरिका ने 2021 में अपनी सेना वापस बुला ली और सत्ता तालिबान को सौंप दी थी.
वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो के अपहरण के बाद ट्रंप को लगा कि ईरान में सरकार बदलना अगला आसान काम होगा. 28 फरवरी को ईरान पर अमेरिका-इजराइल के अचानक हमले और ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या के बाद अमेरिका-इजराइल युद्ध मशीन को लगा कि ईरान कुछ ही दिनों में ढह जाएगा. लेकिन फिर दुनिया ने ईरान की जबरदस्त हिम्मत और पलटवार देखा – ईरानी मिसाइलों और होर्मुज के मास्टरस्ट्रोक ने न केवल सरकार बदलने की साजिश को नाकाम कर दिया, बल्कि अमेरिका को शर्मनाक वापसी के लिए भी मजबूर कर दिया. ईरान की संप्रभुता का सम्मान करने और न केवल चल रही नौसैनिक नाकेबंदी और सैन्य हस्तक्षेप को वापस लेने, बल्कि दशकों पुराने आर्थिक प्रतिबंधों और ईरानी जमा-पूंजी पर लगी रोक को हटाने के लिए अमेरिका का सहमत होना ईरान के लिए एक बड़ी जीत है, और एक-ध्रुवीय दुनिया में बिना किसी चुनौती के अमेरिकी दबदबे की अमेरिकी साम्राज्यवादी योजना के लिए एक झटका है.
वास्तव में ईरानी प्रतिरोध ने अमेरिका के भीतर घरेलू विरोध और ट्रंप के ‘मागा’ (अमेरिका को पुनः महान बनाओ) आधार में दरार को भी बढ़ावा दिया है, क्योंकि ट्रंप ने अमेरिका को एक और युद्ध में धकेल दिया था – इस बार इजराइल के कहने पर. अमेरिका की स्थापना की 250वीं वर्षगांठ से पहले देश भर में ट्रंप के तानाशाही शासन के खिलाफ गुस्सा बढ़ रहा है. न्यूयाॅर्क शहर में मेयर चुनाव में जोरान ममदानी की जीत के बाद दो मशहूर अमेरिकी शहरों – लाॅस एंजिल्स और वाशिंगटन डी.सी. – में दो अन्य युवा डेमोक्रेटिक सोशलिस्टों, नित्या रमन और जेनीस लुईस जाॅर्ज, के मेयर बनने की संभावना दिख रही है. लोगों का ध्यान भटकाने की तमाम कोशिशों के बावजूद दिल दहला देने वाली एपस्टीन फाइलें – जिनमें ट्रंप-नेतन्याहू गठजोड़ की घिनौनी हरकतें गहराई से उजागर हुई हैं – लोगों की यादों से मिटने वाली नहीं हैं. सरकार बदलने का जो ऑपरेशन ईरान ने नाकाम करने में कामयाबी पाई है, वह अब खुद ट्रंप की तानाशाही से जूझ रहे अमेरिका के लिए हकीकत बन सकता है.
ईरान युद्ध ने पश्चिमी दुनिया पर अमेरिकी दबदबे को भी कमजोर किया है. कई दशक बाद पहली बार अमेरिका के यूरोपीय सहयोगियों ने इस बार अमेरिकी-इजरायली सैन्य अभियान का पूर्णतः समर्थन करने से इनकार कर दिया. ‘नैटो’ की रणनीतिक एकता को मजबूत करने के लिए मार्को रुबियो ने उपनिवेशवाद की पुरानी नस्लवादी यादों और साझा ईसाई विरासत व मूल्यों का सहारा लेने की कोशिश की, लेकिन इससे बढ़ती दरारों को भरने में कोई खास मदद नहीं मिली. अमेरिका में जन्मे पहले बिशप, पोप लियो-16 ने ईरान पर अमेरिकी-इजरायली हमले को एक अन्यायपूर्ण युद्ध बताकर वस्तुतः उसका विरोध किया, और पोप के इस रुख की ट्रंप द्वारा निंदा किए जाने से अमेरिका और इटली के बीच दूरियां और बढ़ गईं. ध्यान देने वाली बात है कि इटली में मजदूर वर्ग आंदोलन मजबूत है जो गाजा में हो रहे नरसंहार का कड़ा विरोध करता है और खुलकर फिलिस्तीन का समर्थन करता है. इटली की धुर-दक्षिणपंथी प्रधान मंत्री जाॅर्जिया मेलोनी, जो कभी डोनाल्ड ट्रंप की बड़ी प्रशंसक थीं और ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में यूरोप को अमेरिका के और करीब लाना चाहती थीं, अब डोनाल्ड ट्रंप के साथ लगातार विवाद में उलझी हुई हैं.
हमला और युद्ध की अमेरिका-इजरायल धुरी के सामने घुटने टेकने की मोदी सरकार की विदेश नीति ने बदलते अंतरराष्ट्रीय माहौल में भारत को और अधिक कमजोर बना दिया है. लगातार टैरिफ और व्यापारिक झटकों के अलावा भारत को भारतीय प्रवासियों के साथ – जिनके पास वैध दस्तावेज हैं, उनके साथ भी – अपमानजनक नस्लवादी व्यवहार और होर्मुज जलडमरू-मध्य के पास भारतीय जहाजों और नाविकों पर अमेरिकी मिसाइल हमलों का सामना करना पड़ रहा है. जहां पाकिस्तान और कतर जैसे देशों ने युद्ध-विराम वार्ता में भूमिका निभाई है, वहीं मोदी सरकार में युद्ध के खिलाफ खड़े होने की हिम्मत नहीं थी, जबकि इस युद्ध ने कई तरह से भारत के हितों को नुकसान पहुंचाया है.
मोदी के दौर में भारत की विदेश नीति की प्रासंगिकता कम होती जा रही है. यह बात विदेशी राष्ट्राध्यक्षों के साथ मोदी के अजीब तरह से गले मिलने, हाथ मिलाने और लगातार हंसी-ठिठोली करने, और जी-7 शिखर सम्मेलन में बेवजह अतिथि बनकर शामिल होने तथा फोटो खिंचवाते रहने और प्रचार हथकंडों से साफ पता चलती है. उनमें इतनी भी हिम्मत नहीं कि वे अमेरिकी नौसेना द्वारा भारतीय नाविकों की हत्या के मामले में डोनाल्ड ट्रंप से माफी मांगने को कह सकें, और जब उन्होंने नाविकों की सुरक्षा का मुद्दा उठाया तो ट्रंप ने संवेदनहीनता और रूखेपन से जवाब देते हुए इसे ‘मुश्किल पेशा’ कहकर चलता कर दिया. मोदी और उनके समर्थकों को खुश करने के लिए ट्रंप ने कहा कि जब तक मोदी सत्ता में हैं, किसी भी हमले की स्थिति में अमेरिका भारत के साथ खड़ा रहेगा. अपने नेता की हत्या के बावजूद युद्ध के हालात में ईरान का अपनी संप्रभुता बनाए रखना देश के हितों और सम्मान की कीमत पर सिर्फ अपनी छवि चमकाने की मोदी की अहंकारोन्मादी विदेश नीति के तहत भारत की गिरती अंतरराष्ट्रीय हैसियत और रणनीतिक स्वायत्तता के बिल्कुल उलट है.