वर्ष 35 / अंक - 33 / पश्चिम बंगाल पर फासीवादी कब्जा और सीपीआइ(एम)

पश्चिम बंगाल पर फासीवादी कब्जा और सीपीआइ(एम)

पश्चिम बंगाल पर फासीवादी कब्जा और सीपीआइ(एम)

-- आदित्य निगम

फासीवादी कब्जे को मुमकिन बनाना

‘द वायर’ में सुवेंदु अधिकारी के चुनावी भाषणों का विश्लेषण करते हुए कुणाल पुरोहित और आशना अजमेरा ने लिखा कि अप्रैल 2026 में, नंदीग्राम में वोट पड़ने से कुछ दिन पहले, अधिकारी ने एक चुनावी सभा में मुसलमानों पर सीधा हमला बोला. ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ की एक रिपोर्ट के हवाले से वे लिखते हैं कि राज्य के भावी मुख्यमंत्री ने मुसलमानों को चेतावनी देते हुए कहा: “गलती मत करना! सुधार जाओ... ताकि 4 मई (गिनती के दिन) के बाद कोई दिक्कत न हो. तुम आंखें दिखाकर ‘जय बांग्ला’ बोल सकते हो, लेकिन मैं सब कुछ नोट कर रहा हूं.” [1] अधिकारी की धमकी साफ थी – नंदीग्राम के 30,000 मुसलमान देश भर में भाजपा शासित राज्यों में काम करते हैं और अगर वे सीधे रास्ते पर नहीं चले, तो अंजाम बुरा होगा.

पुरोहित और अजमेरा आगे लिखते हैं कि दिसंबर 2020 में तृणमूल कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होने के बाद से अधिकारी की सार्वजनिक भाषा और राजनीति लगातार एक ही दिशा में चली है, वो है बंगाल के मुसलमानों को निशाना बनाना, उनके खिलाफ नफरत भड़काना, साजिश की कहानियां फैलाना और उनके सामाजिक बहिष्कार की वकालत करना.

दिसंबर 2025 के आखिर में बांग्लादेश उच्चायोग के बाहर हुए एक प्रदर्शन में सुवेंदु अधिकारी ने किसी तरह की गुंजाइश छोड़े बिना पत्रकारों से कहा था: “सबक सिखाना होगा. जैसे इजराइल ने गजा में किया, वैसे ही भारत के 100 करोड़ हिंदू सरकार हिंदुओं के कल्याण के लिए काम कर रही है. जैसे ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत ने पाकिस्तान को सबक सिखाया, वैसे ही सबक सिखाना होगा.” [2] वाक्य कुछ अटपटा था, लेकिन उसका मतलब बिल्कुल साफ था.

सीधी भाषा में कहें तो यह जनसंहार की राजनीति की खुली भाषा थी. कोई भी आधा-अधूरा लोकतांत्रिक दल या संगठन भी समझ सकता था कि क्या आने वाला है. अधिकारी के नंदीग्राम वाले भाषण के पहले उद्धरण में भी यह साफ था कि उसे चुनाव नतीजों का पूरा भरोसा था – तभी उसने  “4 मई के बाद परेशानी” की धमकी दी. कुल मिलाकर, उसके भाषणों में उसके जनसंहारी इरादों को लेकर कोई शक नहीं बचता था. और आखिरी बयान, जिसमें उसने साफ-साफ गजा को उदाहरण बनाते हुए कहा कि 100 करोड़ हिंदुओं को राज्य के मुसलमानों के साथ वैसा ही करना चाहिए, आने वाले खतरे की सबसे खुली घोषणा थी.

लेकिन पश्चिम बंगाल की सीपीआई(एम), ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस के प्रति अपनी बीमार और अंधी नफरत में इतनी डूबी हुई थी कि उसे कुछ दिखाई ही नहीं दिया. उसे बस नीले किनारे वाली सफेद साड़ी और हवाई चप्पल पहनी वह महिला दिखाई देती रही जिसने 2011 में उसे सत्ता से बाहर कर दिया था. उसने लगातार अपना सारा हमला तृणमूल पर ही केंद्रित रखा, जैसे असली खलनायक वही हो, और इस तरह उसने बार-बार लोगों का ध्यान उस बड़े फासीवादी खतरे से हटाया जो सामने खड़ा था. अब पीछे मुड़कर देखें तो साफ होता है कि नंदीग्राम भाषण में अधिकारी का यह इशारा कि 4 मई 2026 के बाद सत्ता बदलेगी, इस बात का संकेत था कि उन्हें प्लान पहले से पता था. राज्य सीपीआई(एम) ने वही किया जिसे फौजी जबान में “पूरब में चकमा दो, पश्चिम पर हमला करो”  कहते हैं. उन्होंने कथित “टीएमसी आतंक” पर ध्यान टिकाए रखा, जबकि अमित शाह और ज्ञानेश कुमार की मशीनरी राज्य पर कब्जा जमाती रही.

वास्तव में, आज सीपीआई(एम) यह कहकर नहीं बच सकती कि उसे पता नहीं था या वह आने वाले खतरे को देख नहीं पा रही थी. वह देख रही थी, और उसने इस प्रक्रिया में साथ दिया. यही उस पूरे घटनाक्रम का अपरिहार्य तार्किक निष्कर्ष है. यही वजह भी है कि शुरुआत में सीपीआई(एम) ने ज्ञानेश कुमार आयोग द्वारा कराए गए तथाकथित एसआइआर (विशेष गहन पुनरीक्षण) को लगभग सही ठहराने वाली भूमिका अपनाई थी.

फिर, 4 मई 2026 को, जब राज्य भर के कई निर्वाचन क्षेत्रों में गिनती की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठ रहे थे, सुवेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को हराने में मदद करने के लिए सीपीआइ(एम) का शुक्रिया अदा किया, जो सीपीआइ(एम) की फासीवाद-परस्त राजनीति का एक और सबूत था. उन्होंने पत्रकारों से कहा, “भवानीपुर में सीपीएम के 13,000 वोट थे, और उनमें से कम से कम 10,000 मुझे ट्रांसफर हुए. मैं वहां के सीपीआइ(एम) मतदाताओं का भी आभार व्यक्त करता हूं.” [3]

वोटों का यह ट्रांसफर, जिसके बारे में अधिकारी ने बात की, उस बड़े तबके से अलग था जो पहले ही सीपीआइ(एम) छोड़कर भाजपा में जा चुका था. सीपीआइ(एम) मतदाताओं का थोक के भाव भाजपा की तरफ खिसकने का रुझान सबसे पहले 2018 के पंचायत चुनावों के दौरान पत्रकारों ने देखा था, हालांकि राज्य के कई लोग 2016 से ही इस रुझान को पहचान रहे थे. इसके बाद, 2021 के विधानसभा चुनाव के दौरान यह बात पक्की हो गई, जब पार्टी के अंदर दबी जबान में यह नारा चल रहा था, “एकूशे राम, छब्बीशे बाम” (2021 में राम, 2026 में वाम).

इसलिए यह बात पूरी तरह साफ होनी चाहिए कि सीपीआइ(एम) न केवल भाजपा के लिए वोट जुटा रही थी, बल्कि वह यह भी पक्का कर रही थी कि नफरत फैलाने वाला अधिकारी जीते और खुद ममता बनर्जी को हराकर राज्य का नया मुख्यमंत्री बने.

अब बात यह है कि भाजपा ने 2026 का चुनाव जीता नहीं, बल्कि उसने लोकतंत्र को तहस-नहस करके राज्य पर कब्जा किया. शुरुआत से ही यह साफ था कि यह पार्टी किसी भी हद तक जा सकती है. फर्जी “एसआईआर” जिसके तहत राज्य की वोटर लिस्ट से 90.82 लाख मतदाताओं के नाम हटा दिए गए, बिना किसी पारदर्शिता के किया गया.

आखिरकार, जनता को बताया गया कि इनमें से 58.18 लाख मतदाताओं के नाम “अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत या डुप्लिकेट” बताकर काट दिए गए. बाकी बचे लगभग 27.16 लाख मतदाताओं को “विचाराधीन” मामलों की कथित “न्यायिक समीक्षा” के बाद हटाया गया. पूरी प्रक्रिया पूरी तरह से गोलमाल थी, यहां तक कि इलेक्शन कमीशन द्वारा नाम हटाने का कारण तक नहीं बताया गया. ठीक यही रणनीति पहले बिहार में अपनाई गई थी, जहां बिना कारण बताए 65 लाख नाम हटा दिए गए थे और एसोसिएशन फाॅर डेमोक्रेटिक रिफाॅर्म्स ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी.[4] पश्चिम बंगाल में नाम हटाना उतना ही संदिग्ध था, लेकिन यह साफ है कि उन्होंने मुस्लिम बहुल क्षेत्रों, दलितों और महिलाओं को निशाना बनाया, जो सभी मुख्य रूप से टीएमसी के वोटर माने जाते हैं. यह प्रक्रिया संदिग्ध हड़बड़ी में चलाई गई, जिससे राज्य की पूरी आबादी को भारी मानसिक तनाव और अपमान से गुजरना पड़ा और कई लोगों की मौत हो गई.

लेकिन बात सिर्फ नाम हटाने तक सीमित नहीं थी. अचानक 18 अप्रैल 2026 को, एसआईआर प्रक्रिया पूरी होने और 28 फरवरी 2026 को अंतिम सूची प्रकाशित होने के बाद, ईसीआई ने वोटर लिस्ट में 5 लाख नाम जोड़ दिए. क्षेत्रवार कोई ब्योरा नहीं दिया गया. “सार्वजनिक रूप से न तो उम्र या लिंग के आधार पर कोई वर्गीकरण दिया गया और न ही नए जुड़े मतदाताओं में पहली बार वोट देने वालों की संख्या बताई गई” और तो और, “सुप्रीम कोर्ट ने 20 अप्रैल 2026 को एसआईआर औपचारिक रूप से समाप्त होने के बाद फाॅर्म 6 के जरिए जोड़े गए इन नामों को चुनौती देने वाली मौखिक याचिका पर सुनवाई करने से इंकार कर दिया.”[5]

हमें यहां याद रखना होगा कि लाखों फर्जी मतदाताओं का इस तरह जोड़ा जाना, जिसका पर्दाफाश राहुल गांधी ने सितंबर और दिसंबर 2025 में अपनी दो प्रेस काॅन्फ्रेस में किया था, हरियाणा, महाराष्ट्र और बिहार में भाजपा की चुनावी जीत तय करने में बेहद अहम रहा था. और हालांकि ऐसे नाम कर्नाटक में भी जोड़े गए थे, लेकिन वे पूरे राज्य के नतीजे को उस तरह प्रभावित नहीं कर सके.

मैं भवानीपुर विधानसभा क्षेत्र के बारे में एक हालिया आंकड़ेबाजी के विश्लेषण का जिक्र करना चाहूंगा, जहां से सुवेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी के खिलाफ चुनाव लड़ा था. यहां, मतदाताओं की संख्या 2024 के आम चुनाव में 2,05,553 से घटकर 2026 के चुनाव से पहले एसआईआर के बाद की अंतिम सूची में 1,60,313 रह गई – यानी मतदाताओं की संख्या में 22% की गिरावट. “भाजपा को 2021 में 35.2% वोट मिले थे और तृणमूल को 57.7%, जिससे भाजपा 22.5 प्रतिशत अंक पीछे थी. 2026 में, भाजपा को 53.0% और तृणमूल को 42.2% वोट मिले, यानी +10.8 अंकों की बढ़त. इस प्रकार यह निर्वाचन क्षेत्र तृणमूल के मुकाबले भाजपा की तरफ 33.3 प्रतिशत अंक खिसक गया.”[6] यह इस बात की ओर भी इशारा करता है जिसे इस सांख्यिकीय विश्लेषण के लेखक कहने से बच रहे हैं कि भाजपा अपने शुरुआती 22.5 प्रतिशत के घाटे को पाटकर 2026 में 10.8 प्रतिशत की अतिरिक्त बढ़त तभी बना सकती थी, जब नाम चुन-चुनकर हटाए गए हों, न कि रैंडम तरीके से.

जो बात नंगी आंखों से भी साफ दिख रही थी और अब इन बारीक गणितीय विश्लेषणों से भी साबित हो चुकी है, वह राज्य सीपीआइ(एम) नेतृत्व को नजर नहीं आई. क्या यह जरा भी सच लग सकता है?

लेकिन कहानी यही खत्म नहीं होती. जैसा कि हम सभी जानते हैं, जैसे ही एसआईआर प्रक्रिया औपचारिक रूप से समाप्त हुई, तमिलनाडु के पूर्व राज्यपाल आरएन रवि, जो केंद्र के भरोसेमंद आदमी हैं और तमिलनाडु सरकार के काम में रोड़े अटकाने के लिए जाने जाते हैं, उन्हें पश्चिम बंगाल का राज्यपाल नियुक्त कर दिया गया. इसके बाद, पूरी चुनाव प्रक्रिया राज्य के अधिकारियों के हाथों से छीन ली गई और पूरे चुनाव को कराने और उस पर नजर रखने के लिए राज्य के बाहर से केंद्र के वफादार अफसरों को लाया गया. लेकिन इतना भी काफी नहीं था. केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) की 2400 कंपनियों को, जिनमें 2.4 लाख जवान थे, बख्तरबंद गाड़ियों के साथ तैनात किया गया, और यह ऐलान किया गया कि वे चुनाव के दो महीने बाद तक राज्य में ही रहेंगे. उत्तर प्रदेश से एक बदनाम एनकाउंटर पुलिस अफसर को भी साफ कारणों से लाया गया, जिसने खबरों के मुताबिक टीएमसी उम्मीदवारों को धमकाया. दूसरे शब्दों में, यह किसी लोकतांत्रिक राज्य में होने वाला आम चुनाव नहीं था. यह राज्य की दमनकारी मशीनरी के पूर्ण इस्तेमाल के साथ किया जाने वाला जबरदस्ती का फासीवादी कब्जा था.

राज्य सीपीआइ(एम) नेतृत्व को क्या लगता था कि क्या होने वाला है? इस निष्कर्ष से बचना मुश्किल है कि वे जानते थे कि क्या होने वाला है और वे फासीवादियों के साथ मिले हुए थे. नफरत फैलाने वाले अधिकारी ने ऐसे ही उनका खुले दिल से शुक्रिया अदा नहीं किया था. और अब जब सब कुछ खत्म हो चुका है और राज्य की जनता बुलडोजर राज और उसकी गुंडागर्दी की कीमत चुका रही है, सीपीआइ(एम) और उसके ट्रोल्स अभी भी अमित शाह द्वारा टीएमसी को तबाह किए जाने का जश्न मना रहे हैं. वे अभी भी अपनी तय भूमिका निभा रहे हैं ताकि इस बात से ध्यान भटकाया जा सके कि असल में लुटने वाले राज्य के गरीब, मुसलमान और खुद लोकतंत्र हैं. बेशक, गरीबों की दुकानों और फेरीवालों के बाजार को ढहाते बुलडोजरों के सामने वे भी विरोध करते दिखे हैं, लेकिन नया राज तो उन्हीं का बुलाया हुआ है, इसलिए अब उनके पास विरोध का नाटक करने के अलावा कोई चारा भी नहीं बचा है.

ऐसे में क्या इस बात पर कोई ताज्जुब होना चाहिए कि अलीपुर के एक सरकारी दफ्रतर में रहस्यमयी आग में 4000 ईवीएम जलकर राख हो गईं, और अपने साथ उस धांधली के कीमती सबूत भी ले गईं जो अमित शाह और ज्ञानेश कुमार आयोग की देखरेख में हुई थी, और सीपीआइ(एम) ने इस पर चुप्पी साध रखी है? सबूतों के इस खुलेआम विनाश पर उनके पास कहने को कुछ नहीं है, जिन्हें चुनाव आयोग की सुरक्षित हिरासत में होना चाहिए था. सच तो यह है कि कुल पड़े वोटों का 4 प्रतिशत से थोड़ा ही ज्यादा पाने के बावजूद यह पार्टी विजेताओं की तरह बर्ताव कर रही है – मानो “चुनाव” वही जीते हों.

यह विकृति राजनीतिक है

यह याद दिलाना और रिकाॅर्ड पर रखना जरूरी है कि पार्टी के कुछ शीर्ष नेताओं, जैसे पूर्व महासचिव, स्वर्गीय सीताराम येचुरी, त्रिपुरा के पूर्व मुख्यमंत्री माणिक सरकार और पोलित ब्यूरो सदस्य हन्नान मुल्ला ने अलग-अलग मौकों पर सीपीआइ(एम) समर्थकों द्वारा भाजपा को वोट देने की खतरनाक संभावना को स्वीकार किया था या इसके प्रति चेताया था. हालांकि, साफ कारणों से, उन्होंने इसे केवल आम सीपीआइ(एम) मतदाताओं की अपनी पहल के रूप में पेश किया. अफसोस की बात है कि यह रुख पूरा सच नहीं बताता. इतने बड़े बदलाव का पूरा दोष केवल वामपंथी आधार पर मढ़ना और पार्टी को बचाना बेईमानी है. पार्टी के व्हाट्सएप ग्रुपों में कुछ जिलों में शेयर हो रहे इस संदेश का उदाहरण लीजिए. यह एक लंबा संदेश है जिसकी सिर्फ शुरुआती पंक्तियां मैं यहां कोट कर रहा हूं: “अगर 2026 में भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आती है, तो 2031 में वाममोर्चा की सत्ता में वापसी की संभावनाएं खुल जाएंगी. इस सच्चाई को ध्यान में रखते हुए मैं निचले स्तर के कार्यकर्ताओं से अनुरोध कर रहा हूं कि कृपया अपना वोट बेकार न करें. तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ वोट दें.” इसके बाद संदेश में समझाया गया है कि यह राजनीति है, जहां कोई स्थायी दुश्मन या दोस्त नहीं होता. “याद रखें, भाजपा से आपका वैचारिक विरोध हमेशा था और भविष्य में भी रहेगा,” उसमें यह भी कहा गया था.

इस संदेश की मुख्य बात राज्य पार्टी नेतृत्व के रुख से पूरी तरह मेल खाती है, खासकर टीएमसी को मुख्य दुश्मन मानने में, जिसे हर कीमत पर हराया जाना चाहिए, भले ही इसका मतलब भाजपा का सत्ता में आना ही क्यों न हो. दोनों ताकतों के “बराबर” होने के दावे पर सोशल मीडिया पर हुई जबरदस्त बहसें और सीपीआइ(एम) के योद्धाओं द्वारा इस सुझाव का मजाक उड़ाना कि टीएमसी एक छोटा खतरा हो सकती है, इस बात का साफ सबूत था.

राज्य में वामपंथियों के मुख्य विरोधी के रूप में टीएमसी की पहचान करने पर किसी को कोई ऐतराज नहीं हो सकता, खासकर तब से जब उसने 2011 में वामपंथियों को सत्ता से उखाड़ फेंका था. लेकिन अजीब बात यह है कि यह बात 2011 से – एक ऐसा समय जब क्षितिज पर भाजपा का कोई खतरा नहीं था – 2016 के बाद तक लगातार बिना रुके चलती रही, जब पश्चिम बंगाल पर एक जहरीली फासीवादी भाजपा के इरादे पूरी तरह से साफ हो चुके थे. मुख्य दुश्मन कौन है, इस पर वामपंथियों का नजरिया नहीं बदला.

पश्चिम बंगाल पर नजर रखने वाला कोई भी व्यक्ति जानता है कि 2014 से, और 2016 के बाद तो और भी उग्र रूप से, पश्चिम बंगाल में भाजपा/आरएसएस ने रामनवमी की रैलियां आयोजित की हैं जहां बच्चों सहित प्रतिभागी, तलवारें और त्रिशूल लेकर, “जिहादियों” के खिलाफ हिंदुओं को एकजुट करने के हिंसक नारे लगाते हैं.

नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 के लागू होने के बाद से यह भी साफ हो गया था कि राजनीतिक स्तर पर भाजपा/आरएसएस का प्रोजेक्ट मुसलमानों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाना है. बाकी भारत की तरह, इसका इरादा असली मुस्लिम नागरिकों को रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठिया बताकर उनकी नागरिकता छीनने का है. आरएसएस/भाजपा के नजरिए से, पश्चिम बंगाल को विभाजन से गुजरने का बड़ा फायदा मिला है, जहां विभाजन की हिंसा के खौफ को आरएसएस की हिंसक और बांटने वाली राजनीति के लिए बहुत आसानी से भड़काया जा सकता है. चूंकि इसकी सीमा बांग्लादेश से लगती है, इसलिए यह नफरत की राजनीति का लगातार खेल रचने के लिए एक आदर्श मंच भी बन जाता है.

इनमें से किसी भी बात ने भाजपा या टीएमसी को लेकर पश्चिम बंगाल सीपीआइ(एम) की समझ को नहीं बदला और न ही इसका उनकी चुनावी-राजनीतिक रणनीति पर कोई असर पड़ा. अगर कुछ हुआ भी, तो 2021 में ‘एकूशे राम, छब्बीशे बाम’ और 2026 के चुनावों के दौरान ‘एबार राम, पोरे बाम’ के नारों से पता चलता है कि वे भाजपा के उभार को एक ईश्वरीय अवसर के रूप में देख रहे थे जो उनके दफ्तरों को टीएमसी के कब्जे से छुड़ाने में मदद करेगा. इस तरह, जब यह साफ हो गया कि भाजपा बंगालियों के जीवन, उनके खान-पान, उनके देवी-देवताओं, यहां तक कि उनकी भाषा को भी पूरी तरह बदलना चाहती है, तब भी वामपंथियों की यह उम्मीद बनी रही कि भाजपा उन्हें “टीएमसी के आतंक” से मुक्ति दिलाएगी.

ऐसा लगता है कि इस घटिया सोच के पीछे एकमात्र मकसद टीएमसी से बदला लेना था, जिसने राज्य सीपीआइ(एम) को सत्ता से बेदखल किया था. यह तथ्य कि उन्हें सत्ता से एक महिला, एक “कॉलोनी की लड़की” ने बेदखल किया था, एक ऐसी बात है जिसे पार्टी की अभिजात वर्ग की पितृसत्ता कभी स्वीकार नहीं कर पाई. अब यह पूरी तरह साफ है कि राज्य, इसके मुस्लिम अल्पसंख्यकों, इसकी भाषा और इसकी संस्कृति का क्या होता है, इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता. आखिरकार उन्होंने अपना बदला ले ही लिया!

‘नतीजों’ के ऐलान के तुरंत बाद राज्य सचिव मोहम्मद सलीम के बयान ने अमित शाह की दिन-दहाड़े की गई डकैती पर पर्दा डालते हुए उसे एक निष्पक्ष चुनाव का रूप दे दिया. उन्होंने कहा कि ‘पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों से साफ है कि जनता ने तृणमूल के बेतहाशा भ्रष्टाचार और तानाशाही शासन के खिलाफ वोट दिया है. राज्य की जनता तृणमूल कांग्रेस सरकार का पतन चाहती थी. भाजपा ने इस गुस्से का फायदा उठाया है.’ याद रखिए, यह बात कुल पड़े वोटों का 4 प्रतिशत से थोड़ा ही ज्यादा पाने वाली पार्टी उस पार्टी के बारे में कह रही थी जिसने इस दिन-दहाड़े डकैती के बावजूद 41 प्रतिशत वोट हासिल किए. चुनाव आयोग की मिलीभगत, अर्धसैनिक बलों के डर, एसआईआर के जरिए नाम हटाए जाने और ईवीएम घोटाले जैसे तमाम कारणों से राज्य और लोकतंत्र पर किए गए पूरी तरह से जबरदस्ती के कब्जे को सीपीआइ(एम) ने पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया.

टीएमसी का सवाल – सीपीआइ(एम) के झांसे से परे

सीपीआइ(एम) के बयानों में, जिस किसी ने भी दूर-दूर तक यह सुझाव दिया कि भाजपा लोकतंत्र और अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए बड़ा खतरा है, उसे अपने आप और बिना किसी माफी के ममता बनर्जी का चमचा मान लिया गया. ज्यादातर मामलों में गाली-गलौज के शब्द खुले तौर पर महिला-विरोधी और जातिवादी/वर्गवादी थे, लेकिन उन्हें यहां दोहराने की जरूरत नहीं है, क्योंकि कई लोगों ने अलग-अलग मौकों पर इस ओर इशारा किया है और मैंने खुद इस बारे में लिखा है.

लेकिन यहां दो बातें साफ-साफ कहना जरूरी है. पहली बात, कोई यह नहीं मानता, और मैं तो बिल्कुल यह मानता  कि तृणमूल कांग्रेस फासीवाद-विरोधी संघर्ष की कोई “पाक” या बेदाग पार्टी है. यहां अपना पूरा तर्क दोहराना संभव नहीं है, इसलिए संक्षेप में सिर्फ इतना कहूंगा कि:

(क) भारत में, और दुनिया के दूसरे देशों की तरह, फासीवादी राजनीति का उभार पारंपरिक पार्टियों के संकट से गहराई से जुड़ा हुआ है. इन सभी पार्टियों ने मिलकर लोकतांत्रिक राजनीति के इस व्यापक संकट को पैदा किया है. कोई भी पार्टी इससे मुक्त नहीं है. मेरे तर्क का यह हिस्सा काफी हद तक ग्राम्शी की उन समझों पर आधारित है जो उन्होंने इटली की स्थिति का विश्लेषण करते हुए विकसित की थीं.

(ख) और इससे भी बड़े स्तर पर देखें तो आज स्वयं “पार्टी” का जो रूप है , यानी पार्टी-फाॅर्म, वह दुनिया भर में लोकतंत्रों के विनाश की जड़ में पहुंच चुका है. इसकी एक वजह यह है कि सत्ता की तलाश, जो धीरे-धीरे उनके अस्तित्व का अकेला कारण बन जाती है, उन्हें न सिर्फ लोकतंत्र-विरोधी ताकतों के साथ राजनीतिक गठजोड़ करने पर मजबूर करती है, बल्कि कई बार वे ऐसे छिपे हुए गुटों और नेटवर्कों का हिस्सा भी बन जाती हैं जो लोकतंत्र को भीतर से खत्म करने में लगे होते हैं.

मेरे तर्क का यह हिस्सा ग्राम्शी से अलग है; यह इक्कीसवीं सदी की राजनीति और जन आंदोलनों के मेरे अपने अध्ययन पर आधारित है. इसलिए आज फासीवादी और दक्षिणपंथी राजनीति के खिलाफ संघर्ष को लेकर मैं जो कुछ लिखता और कहता हूं, वह एक बिल्कुल अलग स्तर पर स्थित है – ऐसा स्तर जिसे सीपीआई(एम) के ट्रोलों से समझने की उम्मीद करना मुश्किल है. तृणमूल, आम आदमी पार्टी, कांग्रेस या समाजवादी पार्टी के बारे में मेरा रूख इस समझ पर आधारित है कि उनकी गंभीर सीमाओं के बावजूद, आज हमारे पास यही वे औजार हैं जिनके जरिए हम अपनी संयुक्त ताकतों को चुनावी रूप दे सकते हैं और फासीवादी ताकतों के खिलाफ मोड़ सकते हैं.

दूसरी बात, अगर हम अलग-अलग पार्टियों के इतिहास और भाजपा के साथ उनके अलग-अलग समय पर हुए गठबंधनों को ही कसौटी बना लें, तो फासीवादी खतरे से लड़ने के लिए हमारे पास बहुत कम बच जाएगा. डीएमके, एआईएडीएमके, बीजू जनता दल, जद(यू), समता दल, तेलुगु देशम पार्टी और बहुजन समाज पार्टी जैसी कई पार्टियां अटल बिहारी वाजपेयी के दौर में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का हिस्सा रह चुकी हैं. यह उसी बड़े तर्क से जुड़ा है जिसका मैंने ऊपर जिक्र किया. इन पार्टियों में से ज्यादातर कांग्रेस से टूटकर बनी थीं, इसलिए उनके लिए मुख्य विरोधी कांग्रेस थी. यह भी याद रखना चाहिए कि 1996 के बाद भारतीय राजनीति का पूरा खेल बदल गया था और क्षेत्रीय पार्टियां राष्ट्रीय राजनीति की अहम खिलाड़ी बन चुकी थीं. उस परिस्थिति में उनके सामने राजनीतिक अस्तित्व बचाने के लिए प्रतिद्वंद्वी खेमे में जाने के अलावा बहुत कम रास्ते थे. यह अवसरवाद भी था और अस्तित्व बचाने की रणनीति भी. 1997 में जब कांग्रेस ने गैर-भाजपा संयुक्त मोर्चा सरकार से समर्थन वापस लिया और 1998 के चुनाव हुए, तब यह सवाल कई क्षेत्रीय पार्टियों के लिए जीवन-मरण का सवाल बन गया.

तृणमूल कांग्रेस भी इस तरह के गठबंधन में शामिल होने की दोषी है. 1998 और 1999 के लोकसभा चुनावों में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार का हिस्सा बनी. 2001 में यह गठबंधन टूटा, फिर कुछ समय बाद दोबारा बना और ममता फिर एनडीए में चली गईं. मुख्य वजह यह थी कि पश्चिम बंगाल में वह सीपीआई(एम) की लगभग अजेय चुनावी मशीन से लड़ रही थीं. 2004 में जब सीपीआई(एम) पहली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए)) सरकार में एक महत्वपूर्ण ताकत बनकर उभरी, तब ममता एक बार फिर एनडीए की तरफ चली गईं. यह वही राजनीतिक गतिशीलता थी जो दूसरे क्षेत्रीय एनडीए सहयोगियों के मामले में भी दिखाई देती है.

कोई चाहे तो ममता बनर्जी के इस रुख की आलोचना कर सकता है. लेकिन फिर वही कसौटी इस श्रेणी की सभी पार्टियों पर समान रूप से लागू करनी होगी, और ऐसा करना फासीवाद के खिलाफ संघर्ष को हारने का सबसे पक्का तरीका साबित हुआ है, जैसा कि अब तक होता आया है.

असल में, सीपीआई(एम) के रुख के विपरीत, अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन का अनुभव यह बताता है कि मुख्य दुश्मन को अलग-थलग करने के लिए ज्यादा से ज्यादा साथियों और सहयोगियों को अपने पक्ष में लाना पड़ता है.

फासीवाद के खिलाफ संघर्ष की यही सबसे बड़ी सीख है. और यही बात माओ त्से तुंग के चीनी क्रांति संबंधी लेखन में लगातार एक धगे की तरह चलती दिखाई देती है.

संदर्भ:

[1] कुणाल पुरोहित और आशना अजमेरा, Threats, Social Boycotts, Backing Violence: How Suvendu Adhikari Ran an Anti-Muslim Campaign to Win Benga, द वायर 12 मई 2026, https://thewire.in/communalism/suvendu-adhikari-anti-muslim-rhetoric

‘Don’t Forget You Work in BJP States’: Suvendu Adhikari’s Warning in Bengal’ द टाइम्स ऑफ इंडिया, 14 अप्रैल 2026, https://timesofindia.indiatimes.com/india/dont-forget-you-work-in-bjp-states-suvendu-adhikaris-warning-in-bengal/articleshow/130248741.cms

[2] BJP’s Suvendu Adhikari Draws Flak After Calling for Gaza-Like ‘Lesson’ at Protest Against Dipu Das’s Murder, द वायर, 28 दिसंबर 2025, https://thewire.in/communalism/bjp-suvendu-adhikari-bangladesh-dipu-das-lynching-lesson-like-gaza - यह वाक्य “100 करोड़ हिंदुओं” के बाद थोड़ा अधूरा रह जाता है लेकिन बात पूरी तरह साफ है.

[3] संजय बसाक, Suvendu Adhikari Thanks CPM for Vote Transfer as “Aage Ram, Pore Bam” Ghost Returns to Bengal, डेक्कन क्राॅनिकल, 5 मई 2026, https://www.deccanchronicle.com/nation/suvendu-adhikari-thanks-cpm-for-vote-transfer-asaage-ram-pore-bam-ghost-returns-to-bengal-1954841

[4] रिमझिम सिंह, ECI Hid Reasons for Deleting 6.5 Million Voters in Bihar Draft Roll: ADR to SC, बिजनेस स्टैंडर्ड, 6 अगस्त 2025, https://www.business-standard.com/elections/bihar-elections/eci-voter-deletion-bihar-draft-roll-adr-supreme-court-electoral-data-125080601267_1.html

[5] विस्तृत गणितीय विश्लेषण के लिए देखें, शुभाशीष डे, How the Invisible Maths of Electoral Roll Revision Altered West Bengal’s Election, द इंडिया फोरम, 12 जून 2026,  https://www.theindiaforum.in/politics/how-invisible-maths-electoral-roll-revision-altered-west-bengals-election. इस और पिछले पैराग्राफ के संदर्भ और जानकारियां, बिहार के नाम हटाने वाले मामले को छोड़कर, इसी लेख पर आधारित हैं.

[6] भानू जोशी और निलंजन सरकार, Data Analysis: How SIR Deletions Shaped BJP’s Land-slide in Bengal, स्क्रॉल.इन, 16 जून 2026, https://scroll.in/article/1093602/data-analysis-how-sir-deletions-shaped-bjps-landslide-in-bengal

https://ddkosambirf.org.in/2026/07/the-fascist-capture-of-west-bengal-and-the-cpim/



15 August, 2026