वर्ष 35 / अंक - 33 / आजादी का नारा राष्ट्र-विरोधी नहीं

आजादी का नारा राष्ट्र-विरोधी नहीं

आजादी का नारा राष्ट्र-विरोधी नहीं

नेहा बोरा (राष्ट्रीय अध्यक्ष, आइसा) से एक साक्षात्कार


सैयद इल्हाम जाफरी: आज हमारे साथ ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में नेहा बोरा हैं. नेहा ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, जो भाकपा(माले) लिबरेशन से जुड़ा हुआ संगठन है. हाय नेहा, आप कैसी हैं?

नेहा बोरा: मैं ठीक हूं, और यहां बुलाने के लिए शुक्रिया.

सैयद इल्हाम जाफरी: आप दो दिन के लिए झारखंड गई थीं. वहां आप पर स्याही फेंकी गई, और आपने यह भी कहा कि इसके पीछे आरएसएस का हाथ था. तो मेरा पहला सवाल यह है कि आप दिल्ली की मुख्यमंत्री कब बनने की सोच रही हैं?

नेहा बोराः देखिए, कई ऐसे मुख्यमंत्री रहे हैं जिन पर कभी स्याही नहीं फेंकी गई, और कई ऐसे लोग भी रहे हैं जो कभी मुख्यमंत्री नहीं बने लेकिन जिन पर स्याही फेंकी गई, बल्कि उससे भी बुरा हुआ. तो फिलहाल तो नजदीकी भविष्य में ऐसा कुछ नहीं है.

सैयद इल्हाम जाफरी: आपने खुले तौर पर कहा है कि आप चुनाव लड़ने के लिए तैयार हैं, और हमने देखा है कि छात्र राजनीति से लोग मुख्यधारा की राजनीति में जाते हैं. तो यह बताइए कि आपका यह राजनीतिक दायरा या सोच कितनी बड़ी है?

नेहा बोरा: देखिए, मेरी राजनीतिक कल्पना बहुत बड़ी है, बस बात यह है कि मेरी राजनीति सिर्फ चुनाव लड़ने तक सीमित नहीं है. बल्कि, अगर चुनाव वह जरिया है जिससे मेरी पार्टी, जैसा आपने कहा, भाकपा(माले) लिबरेशन, यह देखती है कि हम जमीन पर अपने संघर्षों को और बढ़ा सकते हैं, तो बस तभी मैं चुनाव लड़ूंगी. इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं है.

झारखंड का छात्र-आंदोलन और जमीनी हकीकत

सैयद इल्हाम जाफरी: झारखंड में क्या हुआ? हमने कुछ विरोध देखा; कुछ लोग कह रहे थे, ‘हमें नेहा बोरा और आईसा यहां नहीं चाहिए.’ हमने कुछ ऐसे वीडियो भी देखे जिनमें आपको मंच से दूर रहने के लिए कहा जा रहा था. इसके अलावा यह सवाल भी उठे कि आपने 7 अगस्त को मार्च क्यों निकाला, जबकि पहले से ही 10 अगस्त के आंदोलन का आह्वान था.

नेहा बोरा: ये बड़ा दिलचस्प है कि बीजेपी-आरएसएस पूरे देश में जो आंदोलन चला, उससे पूरी तरह गायब रहे. और जब झारखंड में छात्र धरने पर बैठे, तो अचानक उन्होंने कहा, ‘आज हमने तय किया है कि हम भी छात्रों के हक में खड़े हैं.’

तो उस आंदोलन के कुछ हिस्से आरएसएस-बीजेपी से जुड़े हो सकते हैं, और यही लोग काॅकरोच जनता पार्टी (CJP) की बातें कर रहे हैं, जो बिल्कुल ठीक है, ये उनका हक है. लेकिन जब मैं रांची पहुंची, वहां मेरा बहुत गर्मजोशी से स्वागत हुआ. दरअसल, जो वीडियो आरएसएस का इकोसिस्टम चला रहा है, अगर उसे गौर से देखो तो पीछे जहां मैं खड़ी हूं, लोग मुझसे हाथ मिला रहे हैं, मुस्कुरा रहे हैं, मैं भी उन पर मुस्कुरा रही हूं. कोई मुझे मंच छोड़ने को नहीं कह रहा.

वीडियो के अगले हिस्से में जहां लोग ‘हटो, हटा’ कह रहे हैं, अगर असली वीडियो बिना छेड़छाड़ किए हुए ऑडियो के साथ सुनिये, तो वो मीडिया वालों से कह रहे हैं कि मंच से हटो और बाइट लो. लोग मुझसे हाथ मिला रहे थे, मेरा नंबर ले रहे थे, और शुक्रिया कह रहे थे कि मैं एकजुटता में आई. तो ऐसा कुछ नहीं था. जो लोग वहां आंदोलन कर रहे थे, उसकी यही राय थी कि जो कोई भी इस आंदोलन को अपनी आवाज और समर्थन देना चाहे, वो आ सकता है. मैं दूसरे दिन भी गई थी, भूख हड़ताल करने वालों से मिली, तमाम आयोजकों से मिली. अगर इतना विरोध होता तो मैं वहां जा ही नहीं पाती.

जहां तक 7 अगस्त के प्रदर्शन की बात है, तो कई तारीखों पर आह्वान किए गए थे. असल में 6 तारीख के लिए भी एक आह्वान था जिसे बाद में रद्द कर दिया गया था. 8 तारीख के लिए भी एक आह्वान था जिसे रद्द कर दिया गया. हमारा आह्वान भी इन सबसे बहुत पहले आ चुका था, इसलिए हम झारखंड के अलग-अलग जिलों से तैयारी कर रहे थे. लोग आए, पर इसका मतलब यह नहीं कि हम 10 तारीख के प्रदर्शन में नहीं होंगे. हम 10 तारीख के प्रदर्शन में पूरी ताकत के साथ मौजूद रहेंगे – न सिर्फ वैचारिक या नैतिक समर्थन से, बल्कि अपनी पूरी लामबंदी (मोबिलाइजेशन) के साथ.

मैं खुद शारीरिक रूप से वहां मौजूद नहीं रह पाऊंगी क्योंकि मुझे कोलकाता जाना है, लेकिन हमारे जो साथी, हमारे आइसा के काॅमरेड जो पहले दिन से वहां हैं, वे वहीं रहेंगे. यह दुष्प्रचार कि ‘हमें आईसा नहीं चाहिए’ – अरे, आईसा तो आंदोलन के पहले दिन से जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में बैठा हुआ है. तो हमारे सारे साथी वहां डटे रहेंगे.

आंदोलन में तालमेल, गठबंधन और राजनीतिक आंदोलनों का मिजाज

सैयद इल्हाम जाफरी: हमने देखा कि आप जहां बैठी थीं और सोनम वांगचुक जहां बैठे थे, दोनों के स्तर में फर्क था. गांधीवादी तरीके के इस आंदोलन में भी यह क्या संदेश देता है, जहां भूख हड़ताल करने वालों और गांधीवादी रास्ते पर योगदान देने वालों के बीच एक दूरी या असमानता दिखाई देती है?

नेहा बोरा: मुझे लगता है कि इसका संबंध उस व्यवस्था (लाॅजिस्टिक्स) से था जिसके तहत सीजेपी ने सोनम वांगचुक के लिए प्रबंध किया था. मीटिंग में यही बात हुई थी कि सोनम जी काफी बुजुर्ग हैं और उन्हें थोड़ी जगह चाहिए, और अगर सब लोग मंच पर आ जाएंगे तो असुविधा होगी, आदि-आदि. तो यह उसी सिलसिले में था.

लेकिन हम जहां भी बैठे थे, हमारे साथ दूसरे हड़ताल करने वाले लोग भी बैठे थे, बहुत सारे लोग, क्योंकि अकेले हम थोड़े ही थे! और भी आम छात्रा बैठे थे, तो हम सब साथ ही बैठे थे. यह कोई बहुत बड़ा मुद्दा नहीं था.

सैयद इल्हाम जाफरी: मैं आपकी पहले की बातचीत सुन रहा था, जिसमें आपने बताया कि कैसे आपने सीजेपी के साथ हाथ मिलाया. 6 तारीख को सीजेपी नेतृत्व ने छात्र संगठनों से संपर्क किया और आप लोग जुड़ गए, जबकि आप उस संगठन की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और ढांचे से वाकिफ नहीं थे, और मुद्दा छात्रों और शिक्षा का साझा था. तो मेरा सवाल यह है कि विरोध प्रदर्शन के दौरान जो कुछ भी हुआ, उसके बाद क्या आप अब सीजेपी के नेतृत्व को समझती हैं? अगर वे ऐसे ही और आंदोलन बुलाएंगे, तो क्या आप उनके साथ संघर्ष जारी रखेंगी?

और जैसा हमने अन्ना आंदोलन में देखा था कि लोगों ने आम आदमी पार्टी बना ली और आंदोलन के चेहरे राजनीति में आ गए, तो क्या आप भी ऐसे किसी संगठन का हिस्सा बनेंगी?

नेहा बोरा: मुझे नहीं लगता कि सीजेपी का ढांचा और सांगतिक समझ अभी पूरी तरह तय है, वे समझने के लिए बैठकें कर रहे हैं कि इसे कैसे चलाना है. तो मुझे कैसे पता होगा? मुझे नहीं पता, क्योंकि यह अभी बन ही रहा है.

दूसरा, अगर सीजेपी कोई आंदोलन बुलाती है, तो क्या हम उनके साथ काम करेंगे? बिल्कुल काम करेंगे, जब तक वे आम जनता के लिए काम कर रहे हैं. हम इस एक बात पर एकजुट हैं कि हमारी सारी राजनीतिक ताकत उन मुद्दों को हल करने में लगनी चाहिए जो देश के छात्रों और युवाओं से जुड़े हैं. तो फिर क्यों नहीं?

आजादी का नारा राष्ट्र-विरोधी नहीं

सैयद इल्हाम जाफरी: हम देख रहे हैं कि आप पहले दिन से इस आंदोलन का हिस्सा रही हैं, साथ में कई छात्र संगठन भी हैं. कुछ नारे लगाए गए और कुछ नारों को दबाया गया. आप जेएनयू जैसी जगह से आती हैं, जिसने ‘आजादी’ के नारे को एक आवाज दी, उसे लोकप्रिय बनाया और भारत की राजनीतिक चर्चा में स्थापित किया. अब जब सीजेपी और आंदोलन के कई लोग इससे किनारा कर रहे हैं, तो खास तौर पर यह क्या संदेश देता है? इस पर आपका क्या रुख है?

नेहा बोरा: देखिए, जिस दिन वह घटना हुई, मैं आंदोलन की जगह पर नहीं थी क्योंकि मुझे लगता है कि यह मेरी भूख हड़ताल टूटने के एक-दो दिन बाद की बात है और मुझे बुखार था. लेकिन मुझे अपने साथियों से पूरी बात पता चली जो वहां मौजूद थे. उन्होंने बताया कि ये नारे लगाए जा रहे थे, और मंच से या स्वयंसेवकों ने आकर कहा कि ‘ये नारे मत लगाइए.’ यह बात मंच से भी कही गई थी. ठीक है, जब स्वयंसेवकों ने कहा, तो लोगों ने वह नारा और जोर से लगाना शुरू कर दिया.

दक्षिणपंथी ताकतों ने ‘आजादी’ के नारे को बदनाम करने के लिए बहुत पैसा खर्च किया है. आजादी का नारा सबसे पहले और मुख्य रूप से एक नारीवादी (फ्रीडमिस्ट/विमेन राइट्स) नारा था – यह महिलाओं की उस स्वायत्तता और आजादी के बारे में था जो उन्हें समाज में बिना हिंसा या डर के जीने और अपने फैसले लेने का हक देती है. फिर यह दूसरे आंदोलनों से भी जुड़ गया.

अब, जब हम जेएनयू की बात करते हैं, तो दक्षिणपंथियों ने जेएनयू को कमजोर करने और बदनाम करने के लिए जो अभियान चलाया है, वह बहुत सुनियोजित और वैचारिक रहा है – उसमें बहुत पैसा, समय और ऊर्जा खर्च की गई है. इसलिए जब जंतर-मंतर के प्रदर्शनों के दौरान लोगों ने उस नारे को फिर से अपनाया और कहा – ‘पेपर लीक से आजादी, भ्रष्टाचार से आजादी’ – तो यह बहुत ताजी हवा का झोंका था. हम इस देश के आम लोग हैं, और जो भी नारे हम अपने देश के लिए अपनाते हैं, वे हमारे ही हैं. इस देश को हम बनाते हैं.

‘मोदीशाही से आजादी, पेपर लीक से आजादी, भ्रष्टाचार से आजादी’ – यह नारा किसी भी रूप में राष्ट्र-विरोधी नहीं है, यह आम जनता का हक है. यह तो बीजेपी थी जिसने लोगों के मन में यह भर दिया कि ‘यह इतनी बुरी चीज है कि इसे कभी नहीं बोलना चाहिए.’ और जनता ने ही विरोध प्रदर्शनों के दौरान इसे फिर से हासिल किया. तो यह बहुत बढ़िया है, मैं इसके समर्थन में हूं. हर तरह के नारों को जनता द्वारा फिर से अपनाए जाने के पक्ष में हूं.

जेएनयू को निशाना बनाने की साजिश

सैयद इल्हाम जाफरी: क्या आपको लगता है कि पिछले कुछ सालों में जेएनयू की राजनीतिक संस्कृति में कोई बदलाव आया है? दूसरी बात, क्या यह आंदोलन सीएए विरोधी आंदोलन या अन्ना आंदोलन जैसे पिछले आंदोलनों से आगे बढ़ा है?

नेहा बोरा: जहां तक जेएनयू की बात है, जैसा मैंने कहा, इसके खिलाफ एक सुनियोजित अभियान चलाया गया है. 2016 में उन्होंने औपचारिक रूप से ‘शट डाउन जेएनयू’ अभियान शुरू किया, जिसमें पहले उनके मुखपत्र  में छपता है कि जेएनयू ऐसा है, और कुछ महीनों बाद बाहर के कुछ ऐसे लोग – जो जेएनयू के छात्र भी नहीं हैं – वे कैंपस के अंदर आते हैं और खुद कुछ नारे लगाते हैं. फिर जिन छात्र कार्यकर्ताओं ने ऐसे नारे नहीं लगाए होते, उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाता है या गोदी मीडिया द्वारा उनके वीडियो से छेड़छाड़ करके दिखाए जाते हैं. यह जेएनयू को बर्बाद करने का एक सुनियोजित अभियान है.

इस वैचारिक लड़ाई के साथ-साथ, एनईपी (नई शिक्षा नीति) के जरिए फंड और सीटें काटी जा रही हैं, विश्वविद्यालयों में खास किस्म की नियुक्तियां थोपी जा रही हैं, और धीरे-धीरे जेएनयू के उस लोकतांत्रिक माहौल को कुचला जा रहा है जिसे उसने हमेशा सहेज कर रखा था.

ऐसा कभी नहीं हुआ था कि जेएनयू से कोई आंदोलन उठ रहा हो, मार्च निकाला जा रहा हो और छात्रों को तिहाड़ जेल भेज दिया जाए. यह इस साल फरवरी में हुआ. मैं तिहाड़ गई; दानिश तिहाड़ गई; अदिति, जो जेएनयूएसयू की अध्यक्ष हैं, वे तिहाड़ गईं; और दूसरे 14 छात्र तिहाड़ भेजे गए. क्यों? सिर्फ विरोध प्रदर्शन करने के लिए! विरोध करना कौन सा अपराध है? यह कोई तुक नहीं बनता, लेकिन यह उस हुक्मरान व्यवस्था का तरीका है जिससे वह यह मिसाल कायम कर सके कि ‘अगर तुम विरोध करोगे, तो हम तुम्हारे साथ ऐसा ही करेंगे.’

जेएनयू के छात्र हर दिन इसका विरोध कर रहे हैं. आज भी जेएनयूएसयू के चारों पदाधिकारी और पिछले अध्यक्ष नीतीश अपने विश्वविद्यालयों में निलंबित (सस्पेंड) चल रहे हैं, उन्हें कैंपस से बाहर घोषित किया गया है. एक तरफ जहां बीजेपी-आरएसएस इसे बदनाम कर रही है, वहीं आम छात्र और छात्र संगठन इसका डटकर मुकाबला कर रहे हैं.

पिछले आंदोलनों से हौसला मिला, हम किसी खाली जगह पर पैदा नहीं हुए हैं. हर आंदोलन और हर वजूद का एक इतिहास होता है, और हर जन आंदोलन पिछले जन आंदोलनों से कुछ लेता है.

अगर हमने 2019 में छात्रों को बड़े आंदोलन खड़े करते हुए न देखा होता, तो आज हम में से जो लोग छात्र कार्यकर्ता हैं, शायद कभी न बन पाते. क्योंकि बराबरी और नागरिकता के उन आंदोलनों ने ही हमें यह हिम्मत दी कि हम एकजुट होकर लड़ाई लड़ सकते हैं. हमने देखा कि कैसे लोगों ने भारी निजी कीमत चुकाकर – यूएपीए जैसे काले कानूनों के तहत जेल जाने का जोखिम उठाकर भी – संविधान और देश की मूल भावना के लिए संघर्ष जारी रखा.

बेशक, इसकी जड़ें किसान आंदोलन में भी हैं, जिन्होंने दिल्ली की सीमाओं पर एक साल से ज्यादा समय तक डेरा डाला, जो पीछे नहीं हटे, जो लगातार काॅरपोरेट लूट के खिलाफ और राजनीतिक कैदियों की रिहाई के लिए बोलते रहे. किसान सिर्फ एमएसपी या कृषि कानूनों के खिलाफ नहीं लड़ रहे थे, बल्कि उन्होंने देश के तमाम जन-आंदोलनों को जोड़ दिया था.

जब सीएए विरोधी या कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन हुए, तो लोगों ने उसमें एक नई उम्मीद देखी. इसलिए हमारा इतिहास है, हम इतिहास के बिना नहीं हैं.

असल राजनीति क्या है?

सैयद इल्हाम जाफरी: आंदोलनों को देखते हुए हमने बहुत सुना कि यह ‘नेताविहीन आंदोलन’ है, और लोगों ने कहा कि ‘हम किसी नेता या विचारधारा के लिए नहीं, बल्कि मुद्दों के लिए आए हैं.’ आपको क्या लगता है कि इसके नुकसान क्या हैं, और देश को आगे बढ़ाने में ऐसे आंदोलनों को टिकाए रखने में क्या दिक्कतें आती हैं?

नेहा बोरा: मुझे लगता है कि यह कोई समस्या नहीं है अगर लोग यह कहें कि ‘हम किसी विचारधारा या नेता के लिए नहीं आए हैं, हम इसलिए आए हैं क्योंकि मुद्दा हमारे दिल से जुड़ा है.’ लेकिन यह कह पाना भी अपने आप में एक राजनीति है.

हमें राजनीति की उस संकीर्ण परिभाषा से बाहर निकलकर यह देखना होगा कि असल में राजनीति क्या है. राजनीति क्या है? राजनीति समाज में अपनी बात मनवाने के लिए विचारों की प्रणालियों के बीच का संघर्ष है. समाज कैसा होना चाहिए, इसकी अलग-अलग कल्पनाएं होती हैं, और जब ये अलग-अलग विचार आपस में टकराते हैं और समाज में अपनी जगह बनाते हैं – वही राजनीति है. सिर्फ चुनाव लड़ना या किसी राजनीतिक दल में होना ही अकेली राजनीति नहीं है.

जब लोग सड़कों पर उतरकर यह कहते हैं कि हम जनता के साथ खड़े होने आए हैं, हम किसी पार्टी या नेता के पिछलग्गू बनकर नहीं आए हैं – तो यह बहुत बड़ी राजनीतिक बात है. इसका मतलब यह है कि आपकी निष्ठा धर्म, जाति या इलाके के आधार पर नहीं बंटी है, बल्कि आप जनता के अधिकारों के लिए एकजुट हैं.

इस बात का नुकसान यह होता है कि जब आंदोलन खत्म हो जाते हैं, तो लोग अपने दिमाग में यह बात नहीं बैठा पाते कि वे जो कर रहे थे, वह असल में राजनीति ही थी. लोग इसे एक ऐसा अजीब दौर मान लेते हैं जो दोबारा कभी नहीं आएगा. लोगों के मन में राजनीति को लेकर यह गलतफहमी भी बैठाई गई है कि राजनीति कोई गंदी चीज है, क्योंकि वे विधायकों-सांसदों को देखते हैं जो जनता के मुद्दों पर ध्यान नहीं देते, बल्कि चुनाव जीतने के बाद अपनी तिजोरियां भरते हैं और उनके मकान कई मंजिला ऊंचे हो जाते हैं.

एक विचारधारा रखना, एक राजनीति रखना – इसका मतलब यह है कि आप दुनिया में अपनी सही जगह को पहचानते हैं. इसका मतलब किसी के पीछे आंख मूंदकर चलना नहीं है. यह जानना कि किस परिस्थिति में आपको क्या रुख अपनाना है, यही राजनीति है. और यही वह नुकसान है जब लोग नेताविहीन आंदोलनों की हद से ज्यादा तारीफ करने लगते हैं. बेशक, कुछ लोग आगे बढ़कर नेतृत्व कर रहे थे, और जमीन पर मौजूद लोग भी यह जानते थे. लेकिन राजनीति को सिर्फ नकारात्मक रूप में देखना ही असली समस्या है.

छात्र राजनीति और व्यक्ति-पूजा

सैयद इल्हाम जाफरी: कई आलोचक यह कहते हैं कि भारत में छात्र राजनीति राजनीतिक पार्टियों की नर्सरी बन चुकी है, जहां स्वतंत्र छात्र प्रतिनिधित्व की जगह चमकीले करियर के सपने देखे जाते हैं. कन्हैया कुमार जैसे लोगों का उदाहरण हमारे सामने है. तो आप लोगों को यह कैसे यकीन दिलाती हैं कि आइसा सिर्फ वामपंथ की पिछलग्गू नहीं है, बल्कि सचमुच छात्रों का प्रतिनिधित्व करती है?

नेहा बोरा: देखिए, राजनीति को देखने के हमारे नजरिए में व्यक्ति-पूजा (फेटिशाइजेशन) बहुत ज्यादा है, और राजनीति को सिर्फ चुनावी राजनीति मान लेना ही समस्या है. और इसमें एक पाखंड भी है.

हम बार-बार कन्हैया कुमार की बात करते हैं. लेकिन जो लोग एक व्यक्ति विशेष के पीछे पागल रहते हैं, क्या वे सुचेता डे का नाम जानते हैं, जो जेएनयूएसयू की अध्यक्ष थीं? वे कहां हैं? वे सीपीआई(एमएल) लिबरेशन में ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता हैं. क्या वे संदीप सौरभ का नाम जानते हैं, जो जेएनयूएसयू के पदाधिकारी थे? वे कहां हैं? वे सीपीआई(एमएल) लिबरेशन से पालीगंज के विधायक हैं.

यह व्यक्ति-पूजा बहुत सेलेक्टिव है. आप उन्हीं लोगों की बात करना चाहते हैं जिन्हें आप अवसरवादी मानते हैं, लेकिन आप उन हजारों छात्र कार्यकर्ताओं की बात नहीं करना चाहते जो आज ट्रेड यूनियनों और महिला संगठनों में जमीनी स्तर पर काम कर रहे हैं. यह चकाचौंध एक समस्या है, और मुझे पता है कि यह बुद्धिजीवियों की तरफ से भी आती है क्योंकि उन्हें किसी एक ‘शुद्ध नेता’ की तलाश रहती है जिसके पीछे वे सब खड़े हो सकें. ऐसे लोग हकीकत में नहीं होते.

लोग अपना रास्ता खुद चुनेंगे. कुछ लोग जन-आंदोलनों को छोड़कर शासक दलों के साथ जुड़ जाएंगे, लेकिन बहुत से लोग अपनी पूरी जिंदगी इन जन-आंदोलनों को समर्पित कर देते हैं. जंतर-मंतर पर जो हुआ, उसके केंद्र में श्वेता राज, आलोक, प्रसेनजित या अभिज्ञान जैसे लोग थे, जो मेरे से पहले आइसा के प्रतिनिधि रहे हैं और आज भी ट्रेड यूनियनों और महिला संगठनों के साथ जमीन पर डटे हुए हैं.

आइसा की विरासत 

सैयद इल्हाम जाफरी: हमने देखा है कि जंतर-मंतर के प्रदर्शन में जो छात्रा संगठन शामिल हुए, उनमें से ज्यादातर वामपंथ से जुड़े थे. भारत में वामपंथी चुनावी राजनीति लगातार कमजोर क्यों होती जा रही है? ऐसा लगता है कि यह लगभग सिमट सी गई है, और यह भी कहा जाता है कि वामपंथ के पास अपनी जमीन और वैचारिक आधार न होने के कारण उसे छात्र राजनीति और दूसरे गठबंधनों का सहारा लेना पड़ रहा है.

नेहा बोरा: आज आइसा का स्थापना दिवस है – आइसा की स्थापना 1990 में इलाहाबाद में हुई थी. हम इस हुकूमत के खिलाफ और सांप्रदायिकता के खिलाफ बहुत लंबे समय से संघर्ष कर रहे हैं.

90 के दशक में, जब बाबरी मस्जिद विवाद और रथ यात्राओं के जरिए पूरे देश में नफरत और हिंसा फैलाई जा रही थी, तब हमारे साथी उसके खिलाफ सबसे आगे खड़े थे. विश्वविद्यालयों में ओबीसी आरक्षण को सही तरीके से लागू करवाने में, जेएनयू में महिलाओं और पिछड़े इलाकों के छात्रों के लिए ‘डप्रिवेशन पाॅइंट्स’ (अतिरिक्त अंक) की नीति बहाल करवाने में, यूजीसी-नेट स्काॅलरशिप खत्म किए जाने के खिलाफ, डीयू में एफवाइयूपी (FYUP) के खिलाफ, ‘ऑक्यूपाई यूजीसी’ आंदोलन में, निर्भया आंदोलन में और सीएए विरोधी आंदोलनों में – हर जगह हमारे साथी सबसे आगे रहे हैं.

जब शाहीन बाग और जामिया से सीएए विरोधी आंदोलन शुरू हुआ, तो हमारे साथी वहां सबसे आगे थे. जब किसान आंदोलन सिंघु और गाजीपुर बाॅर्डर पर चल रहा था, तो हमारे साथी वहां महीनों रहे, उन्होंने वहां लाइब्रेरी लगाई. सिर्फ इसलिए कि कुछ लोगों ने पिछले दो महीनों में आइसा का नाम सुना है, इसका यह मतलब नहीं है कि हमने कल से काम शुरू किया है.

जब आप शिक्षा व्यवस्था की कमियों या नीट-पेपर लीक की बात करते हैं, तो एक आइसा का कार्यकर्ता आपको एक-एक बात विस्तार से समझा सकता है क्योंकि छात्रा आंदोलन इसी जमीन पर खड़ा है.

जहां तक चुनावी राजनीति की बात है: भले ही संस्थाओं का गलत इस्तेमाल करके, चुनावों में हेरफेर करके वामपंथ को दबाने की कोशिश की जा रही हो, लेकिन ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ का सिद्धांत ही लोकतंत्र की असली ताकत है. देश में फासीवाद विरोधी मोर्चे को मजबूत करने में वाम दलों की भूमिका से कोई इंकार नहीं कर सकता. हमारी लड़ाई उस मेहनतकश वर्ग के लिए है जिसे लंबे समय से मतदान प्रक्रिया से बाहर रखा गया है.

नक्सलबाड़ी आंदोलन और ग्रामीण संघर्ष

सैयद इल्हाम जाफरी: नक्सलबाड़ी और पिछले कुछ दशकों में हुई घटनाओं को देखते हुए ‘हिंसक नक्सलवाद’ पर आइसा और नेहा बोरा का क्या रुख है?

नेहा बोरा: जब हम ‘हिंसक नक्सलवाद’ जैसे शब्दों का बहुत आसानी से इस्तेमाल करते हैं – ठीक वैसे ही जैसे सरकार ने नक्सलबाड़ी आंदोलन को हमेशा एक विकृत रूप में और भारत के खिलाफ हिंसा के रूप में पेश किया है – तो हमें थोड़ा संभलकर बोलना चाहिए.

नक्सलबाड़ी आंदोलन इस बात का ऐलान था कि इस देश में इतने साल आजाद होने के बाद भी बहुसंख्यक आबादी के पास उस जमीन पर कानूनी हक नहीं है जिस पर वे दिन-रात पसीना बहाते हैं. नक्सलबाड़ी आंदोलन यह चीखकर कहने वाला आंदोलन था कि अगर हम 12 से 18 घंटे खेत में काम कर रहे हैं, अगर हम इस समाज की बुनियाद बना रहे हैं, तो हमें कम से कम जीने का अधिकार, न्यूनतम मजदूरी और इंसान की तरह इज्जत क्यों नहीं मिलनी चाहिए?

बिहार में यह लड़ाई सामंती जुल्म के खिलाफ, दलितों-मुस्लिमों पर होने वाले नरसंहारों के खिलाफ और गरीब महिलाओं की इज्जत बचाने के लिए एक बड़ा संघर्ष बनी. इसके केंद्र में यही बात थी कि देश के बाकी हिस्सों के लिए तो लोकतंत्र हो, लेकिन मेहनतकश और गरीब जनता के लिए सिर्फ सामंती जंगलराज हो – यह नहीं चल सकता.

उमर खालिद और राजनीतिक कैदियों की रिहाई

सैयद इल्हाम जाफरी: उमर खालिद को लेकर आपका क्या नजरिया है, और इस आंदोलन के दौरान इस सवाल को कैसे उठाया गया?

नेहा बोरा: आज जब लोग उमर खालिद की बात करते हैं, तो अक्सर वे ऐसा इसलिए नहीं करते कि वे सच में समझना चाहते हैं कि क्या हुआ था, बल्कि वे सिर्फ शोर मचाना चाहते हैं. किसी को भी ‘देश-विरोधी’ कह देना उन लोगों का सबसे आसान हथियार बन गया है जिनके पास न कोई तर्क है, न कोई विचार और न ही जनता के लिए कोई राजनीति.

उमर खालिद उस छात्र आंदोलन का हिस्सा था जो आलोचनात्मक सोच और राजनीतिक संवाद में विश्वास रखता था. यह बहुत दुख की बात है कि जो लोग उसका नाम लेते हैं, वे इतना शोर मचाते हैं कि असली मुद्दा ही दब जाता है. जंतर-मंतर के प्रदर्शनों के दौरान मंच से शिक्षा और पेपर लीक के अलावा दूसरे नारे नहीं लगाए गए थे, लेकिन जब मीडिया ने हमसे पूछा, तो हमने साफ तौर पर सभी राजनीतिक कैदियों की रिहाई की मांग की.

दक्षिणपंथी ताकतें जब भी घबराती हैं, तो वे जेएनयू, उमर खालिद, शरजील इमाम और भीमा कोरेगांव के गिरफ्तार लोगों का नाम लेने लगती हैं ताकि असली मुद्दों से ध्यान भटकाया जा सके.

यह जिम्मेदारी हम सबकी है – यहां तक कि उन छात्रों की भी जो सोचते हैं कि उमर खालिद को जेल में होना चाहिए – कि वे पढ़ें और समझें कि अदालतें क्यों होती हैं. अदालतें इसलिए होती हैं ताकि निष्पक्ष सुनवाई हो सके और कोई फैसला भीड़ या मीडिया ट्रायल के आधार पर नहीं, बल्कि कानून की प्रक्रिया से हो. उमर खालिद पिछले छह साल से जेल में हैं, और अभी तक उनका ट्रायल (मुकदमा) भी शुरू नहीं हुआ है. अदालत ने उन्हें किसी भी देश-विरोधी गतिविधि में दोषी नहीं पाया है.

तो यह सवाल राष्ट्रभक्ति या देश-द्रोह का नहीं है, बल्कि यह सवाल इस बात का है कि आप कानूनी प्रक्रिया के साथ हैं या उस व्यवस्था के साथ जहां किसी को भी सड़क पर गोदी मीडिया के फर्जी वीडियो दिखाकर पीट दिया जाए. मेरा संगठन और हम सब हमेशा सभी राजनीतिक कैदियों – जिनमें उमर खालिद और शरजील इमाम भी शामिल हैं – की रिहाई की मांग करते रहेंगे.

सैयद इल्हाम जाफरी: बहुत-बहुत शुक्रिया नेहा, आपसे बात करके बहुत अच्छा लगा. आप द इंडियन एक्सप्रेस देख रहे थे.

(द इंडियन एक्सप्रेस, वीडियो, 12 अगस्त 2026)

15 August, 2026