हम भारत के नागरिक इस बात को लेकर गहरी फिक्र में हैं कि यूएपीए जैसे खास कानूनों का इस्तेमाल करके किस तरह लोगों को बिना किसी वजह लंबे-लंबे अरसे तक जेलों में सड़ाया जा रहा है.
हाल ही में स्वीडन में दिए गए एक भाषण में आपने न्यायपालिका की आजादी और नागरिकों की आजादी के प्रति उसकी वचनबद्धता को रेखांकित करते हुए के. ए. नजीब मामले (2021) में माननीय सुप्रीम कोर्ट के फैसले का जिक्र किया था. आपने कहा था कि नजीब मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह माना था कि यूएपीए के तहत जमानत पर लगी कानूनी पाबंदियों के बावजूद, अगर लंबी कैद किसी मुल्जिम के जल्द सुनवाई के मौलिक अधिकार (आर्टिकल 21 जीने और आजादी का अधिकार) को कुचल रही हो, तो अदालत को जमानत देने का अधिकार बना रहता है. लगभग 6 साल तक बिना मुकदमा चले जेल में रहे एक कैदी को रिहा करते हुए उस फैसले ने ‘जमानत नियम है और जेल एक अपवाद (एक्सेप्शन)’, के उसूल पर जोर दिया था – यानी यूएपीए जैसे सख्त कानूनों के तहत भी किसी को हमेशा के लिए जेल में नहीं रखा जा सकता, खासकर जब मुकदमा जल्द खत्म होने की कोई उम्मीद न हो. उस फैसले ने साफ कहा था कि ऐसे हालात में संविधान का आर्टिकल 21 यूएपीए की धारा 43-डी(5) पर भारी पड़ेगा, जो जमानत को बेहद मुश्किल बनाती है. यानी ऐसी सूरत में इन सख्त धाराओं का असर कमजोर पड़ जाता है.
उस फैसले में कहा गया था: ‘यूएपीए की धारा 43-डी(5) जैसी कानूनी पाबंदियों का होना ही संविधान की धारा 3 के उल्लंघन के आधार पर जमानत देने के संवैधानिक अदालतों के अधिकार को खत्म नहीं करता...जहां मुकदमा वाजिब वक्त में पूरा होने की कोई उम्मीद न हो और मुल्जिम पहले ही सजा के एक बड़े हिस्से जितना वक्त जेल में काट चुका हो, वहां ऐसी सख्त धाराओं की कड़ाई कमजोर पड़ जाती है.’
उस तीन-जजों की ऐतिहासिक बेंच में आप भी शामिल थे.
हम आपका ध्यान शरजील इमाम और उमर खालिद की तरफ दिलाना चाहते हैं, जो दिल्ली दंगा साजिश मामले (2020) में पिछले 6 साल से जेल में बंद हैं. वे अब भी बिना मुकदमा चले कैदी के तौर पर जेल में सड़ रहे हैं, और इस मामले में जहां पुलिस ने करीब 900 गवाह पेश करने की बात कही है (नजीब मामले में महज 276 गवाह थे), वहां अभी तक मुकदमे की शुरुआत तक नहीं हुई है. इसके बावजूद अलग-अलग अदालतों ने – जिसमें जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट की दो-जजों की बेंच भी शामिल है – बार-बार उनकी जमानत खारिज की है.
उन्हें आजादी से वंचित रखने वाले उस फैसले (गुलफिशा फातिमा बनाम राज्य) की आलोचना खुद सुप्रीम कोर्ट की एक और बेंच ने 18 मई 2026 के अपने फैसले (सैयद इफ्तिखार अंद्राबी बनाम राष्ट्रीय जांच एजेंसी) में की है. जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुयान की इस बेंच ने कहा कि जनवरी के फैसले में न सिर्फ जमानत देने से इनकार किया गया, बल्कि एक साल तक दोबारा जमानत के लिए अर्जी देने का अधिकार भी छीन लिया गया – जो गलत था. बेंच ने यह भी कहा कि जब तीन-जजों की बेंच ने नजीब मामले में साफ कानूनी सिद्धांत तय कर दिया था, तो न्यायिक अनुशासन की मांग यही थी कि दो-जजों की बेंच उसी का पालन करे.
फैसले में कहा गया: ‘गुरविंदर सिंह और गुलफिशा फातिमा के फैसले दो माननीय जजों की बेंच ने दिए थे, जबकि नजीब मामले का फैसला तीन माननीय जजों की बेंच का है. गुरविंदर सिंह और गुलफिशा फातिमा के फैसलों को पढ़ने से साफ पता चलता है कि दो-जजों की बेंच नजीब मामले में तय सिद्धांत से हट गई. न्यायिक अनुशासन और निश्चितता की मांग है कि छोटी बेंचें बड़ी बेंचों के फैसलों का ख्याल रखें और उनका पालन करने के लिए बाध्य हों. अगर छोटी बेंच बड़ी बेंच के सिद्धांत से सहमत नहीं है, तो एकमात्र सही रास्ता यही है कि मामला मुख्य न्यायाधीश के पास और बड़ी बेंच से विचार कराने के लिए भेजा जाए. दो जजों की इस बेंच के तौर पर हम तीन-जजों की बेंच द्वारा नजीब मामले में तय सिद्धांत से बंधे हैं. हम इतना ही कहते हैं, और कुछ नहीं.’
इसके बाद यह मामला आजादी, राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे बड़े सवालों पर गौर करने के लिए एक बड़ी बेंच के पास भेज दिया गया है. लेकिन इस बीच उमर खालिद और शरजील इमाम अब भी जेल की सलाखों के पीछे हैं.
हम आपसे दखल देने की अपील करते हैं ताकि इंसाफ के साथ हो रहा यह मजाक रुके. मुकदमे से पहले इस तरह की बेमियादी कैद के प्रति न्यायिक बेरुखी सत्ता में बैठे लोगों को यूएपीए जैसे कानूनों को हथियार बनाकर आलोचकों और असहमति रखने वालों की आवाज दबाने के लिए और शह देगी, बिना किसी इल्जाम को साबित किए. इससे निष्पक्ष सुनवाई का संवैधानिक सिद्धांत और ‘जमानत असल है, जेल अपवाद’ का वह सिद्धांत खोखला हो जाएगा, जिसे सुप्रीम कोर्ट खुद बार-बार दोहरा चुका है. सच तो यह है कि जब इतने साल पहले ही सलाखों के पीछे गुजर चुके हों, तो बाद में मिली बाइज्जत रिहाई भी बेमानी हो जाती है. ‘जमानत नियम है और जेल एक अपवाद (एक्सेप्शन)’, सिर्फ किताबी जुमला बनकर न रह जाए, बल्कि हकीकत में लागू हो – इसके लिए हम आपसे इन दोनों नौजवानों की आजादी और इंसाफ सुनिश्चित करने की अपील करते हैं.
असहमति ही किसी गणराज्य में लोकतंत्र की जान है. जब तक ऐसे कानून असहमति जताने वालों की आजादी और इंसाफ को छीनते रहेंगे, तब तक हम लोकतंत्र के सिद्धांतों के साथ नाइंसाफी ही करते रहेंगे.
निवेदक,
भारत के फिक्रमंद नागरिक
(इस खुले खत पर चर्चित लेखिका अरुंधति राॅय,
पद्मश्री व ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता लेखक अमिताव घोष,
अभिनेता व निर्देशक प्रकाश राज,
इतिहासकार व लेखक रामचंद्र गुहा,
फिल्मकार आनंद पटवर्धन,
राजद सांसद मनोज कुमार झा,
भाकपा(माले) सांसद राजा राम सिंह,
सामाजिक-राजनीतिक व सूचना अधिकार कार्यकता अरुणा राॅय,
भारत जोड़ो अभियान के राष्ट्रीय संयोजक योगेंद्र यादव,
पत्रकार व स्तंभकार राणा अय्यूब,
लेखक व निर्देशक वरुण ग्रोवर,
चर्चित अभिनेत्री स्वरा भास्कर,
पूर्व राज्यसभा सांसद राजमोहन गांधी,
अर्थशास्त्री व प्रोफेसर जयति घोष,
लेखिका व कार्यकर्ता गुरमेहर कौर,
लेखक व शांति कार्यकर्ता हर्ष मंदर,
राजनीतिक अर्थशास्त्री व लेखक पराकाला प्रभाकर,
समाजशास्त्री व इतिहासकार पार्थ चटर्जी,
प्रोफेसर एमेरिटा,
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय जोया हसन,
लेखिका मीना कंडासामी,
जेएनयू की सेवानिवृत्त प्रोफेसर निवेदिता मेनन,
आधुनिक इतिहास केंद्र,
जेएनयू की सेवानिवृत्त प्रोफेसर तनिका सरकार,
इतिहासकार उमा चक्रवर्ती,
दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर नंदिनी सुंदर आदि समेत देश की कई चर्चित हस्तियों ने हस्ताक्षर किए हैं.)