मोदी सरकार अब आर्थिक संकट से इनकार नहीं कर सकती, जो दिन-प्रतिदिन गंभीर होता जा रहा है. सभी आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं. वहीं, बेरोजगारी अपने चरम पर है और वास्तविक आय में लगातार गिरावट आ रही है. यह भारत के अधिकांश लोगों की वास्तविक रोजमर्रा की कहानी है, चाहे वे ग्रामीण और शहरी गरीबों की विशाल आबादी से हों या फिर वे भारत के मध्यम वर्ग में अपनी जगह बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हों.
संकट को और अधिक अनदेखा करने में असमर्थ नरेंद्र मोदी अब लोगों से कम-से-कम एक वर्ष के लिए कमखर्ची पैकेज का पालन करके इससे निपटने का आग्रह कर रहे हैं. नोटबंदी और कोविड काल के लाॅकडाउन की तरह कमखर्ची का यह पैकेज भी एक और नागरिकता अभ्यास या देशभक्ति परीक्षा के रूप में तैयार किया गया प्रतीत होता है. अमीरों और प्रभुत्वशाली लोगों के लिए कभी-कभी काफिले के सफर की जगह अपनी बहु-प्रचारित मेट्रो यात्रा दिखलाना मजेदार हो सकता है, लेकिन दिहाड़ी मजदूर घर से काम कैसे करेंगे? स्पष्टतः, विभिन्न वर्गों के लिए मोदी की ‘कमखर्ची मुहिम’ के अलग-अलग मायने हैं. धनी अल्पसंख्यक वर्ग के लिए यह उनकी देशभक्तिपूर्ण कुर्बानी दिखलाने का मौका हो सकता है, लेकिन गरीब और मध्यम वर्ग के लिए यह बढ़ती कठिनाइयों का थोपा गया बोझ है.
समृद्धि से कमखर्ची तक, ‘अच्छे दिन’ और ‘अमृत काल’ से लेकर ‘आपदाओं के दशक’ की नई खोज तक – मोदी सरकार का आर्थिक विमर्श अब अचानक एक नई दिशा में मुड़ गया है. सरकार चाहती है कि हम आर्थिक संकट को अमेरिका-इजराइल द्वारा ईरान पर थोपे गए युद्ध के कारण सामने आई एक आकस्मिक घटना के रूप में देखें. नरेंद्र मोदी बार-बार कोविड महामारी की याद दिलाकर लोगों से कह रहे हैं कि वे इस आर्थिक संकट को अपरिहार्य वैश्विक हकीकत के रूप में स्वीकार करें, इसके घरेलू कारणों की तलाश न करें और सरकार को उसकी नीतिगत विफलताओं के लिए जवाबदेह न ठहराएं.
यह तथ्यों का सरासर मजाक है. भाजपा ने 2014 में मोदी के चुनावी अभियान के दौरान अर्थतंत्र के दो लोकप्रिय मानदंडों का व्यापक रूप से इस्तेमाल किया था: अमेरिकी डाॅलर के मुकाबले रुपये का विनिमय मूल्य और पेट्रोल की प्रति लीटर कीमत. दोनों उस समय लगभग साठ रुपये के आसपास थे. वादा था कि इन्हें पचास रुपये तक वापस लाया जाएगा, लेकिन 28 फरवरी को अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर हमले से पहले ही दोनों नब्बे रुपये के पार पहुंच गए थे. तब से रुपये की कीमत और गिर गई है, अब यह लगभग सौ रुपये प्रति डाॅलर के करीब है. अधिकांश राज्यों में पेट्रोल की कीमत सौ रुपये प्रति लीटर के पार पहुंच गई है.
मोदी युग के अधिकांश समय में वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें काफी कम रही थीं. महामारी और उसके परिणामस्वरूप आर्थिक व्यवधान और मंदी ने वास्तव में वैश्विक तेल की कीमतों में भारी गिरावट ला दी थी. लेकिन इस मूल्य गिरावट का लाभ आम भारतीय उपभोक्ता तक कभी पहुंचा ही नहीं. जब भारत ट्रंप के प्रतिबंधें के आगे झुकने से पहले रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीद रहा था, तब भी अंबानी समूह ने यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पर प्रतिबंध लगाने वाले पश्चिमी देशों को परिशोधित पेट्रोलियम वापस बेचकर भारी मुनाफा कमाया. इस सब के बीच मोदी सरकार ने काॅरपोरेट करों में भारी कटौती की भरपाई के लिए भारतीय उपभोक्ताओं से भारी-भरकम तेल राजस्व वसूलना जारी रखा.
चूंकि ईरान युद्ध मौजूदा आर्थिक संकट के बढ़ने का कारण है, इसलिए सबसे पहला सवाल यह उठता है कि मोदी सरकार ने ईरान पर इस स्पष्ट रूप से अन्यायपूर्ण युद्ध में अमेरिका-इजराइल गठबंधन का साथ क्यों दिया? मोदी सरकार ने भारत के संप्रभु आर्थिक और व्यापारिक निर्णयों पर अमेरिकी दबाव के आगे घुटने क्यों टेक दिए? क्या भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और आर्थिक हितों की यह कुर्बानी वह कीमत है जो मोदी सरकार ने अडानी समूह को अमेरिका में काॅरपोरेट धेखाधड़ी के आरोपों में दंडात्मक कार्रवाई से बचाने के लिए भारत पर थोपी है?
सरकार की अपनी नीतियों, खासकर काॅरपोरेट-परस्त आर्थिक नीतियों और अमेरिका-परस्त विदेश नीति के कारण उत्पन्न संकट की जिम्मेदारी लेने के बजाय सरकार इस संकट का बोझ आम जनता पर डालने में लगी है. जहां कहीं भी लोग उचित वेतन की मांग को लेकर सड़कों पर उतर रहे हैं – जैसा कि नोएडा, मानेसर और अन्य स्थानों पर श्रमिकों के शक्तिशाली प्रदर्शनों में देखा गया – सरकार प्रदर्शनकारियों की बड़े पैमाने पर गिरफ्तारी कर रही है और कार्यकर्ताओं के खिलाफ कठोर राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम भी लागू कर रही है. जहां सर्वोच्च न्यायालय की एक पीठ ने सरकार की इस दमनात्मक कार्रवाई की आलोचना करते हुए श्रमिकों के उचित वेतन की मांग करने के अधिकार का बचाव किया है, वहीं भारत के मुख्य न्यायाधीश ने भारत के प्रदर्शनकारी युवाओं को व्यवस्था पर हमला करने वाले तिलचट्टे और परजीवी बताया है.
जब आम भारतीय आर्थिक तंगी की मार झेल रहे हैं और राहत व इंसाफ की गुहार लगा रहे हैं, तब मोदी सरकार का मानना है कि वह गढ़े-गढ़ाए जनादेशों, ताबड़तोड़ प्रचार और बुलडोजर शासन के बल पर लोगों को चुप करा दे सकती है. जब असम, पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में विधान सभा चुनाव चल रहे थे, तब सरकार हमें बताती रही कि चिंता की कोई बात नहीं है. लेकिन चुनाव के तुरंत बाद खाना पकाने के कमर्शियल गैस सिलेंडरों की कीमतों में भारी वृद्धि हुई, जिसके बाद सभी उपभोक्ताओं के लिए ईंधन की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी जारी रही. चुनाव के दौरान पश्चिम बंगाल में मोदी की ‘झालमुढ़ी रील’ दिखाई गई, लेकिन चुनाव के बाद पूरे राज्य में सड़क विक्रेताओं को बड़े पैमाने पर उजाड़ा जा रहा है.
इस बीच, भारतीयों को कमखर्ची का उपदेश देने के बाद, प्रधान मंत्री मोदी तुरंत एक और बहु-देशीय यात्रा पर रवाना हो गए – इस बार यूरोप के लिए. नाॅर्वे की उनकी बहुचर्चित यात्रा, जो 43 वर्षों में किसी भारतीय प्रधान मंत्री की पहली यात्रा थी, ने पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित किया क्योंकि वे नाॅर्वे की मीडिया से दूर भागते रहे जबकि विश्लेषक छिपाए गए अडानी एजेंडे की ओर इशारा कर रहे थे. नाॅर्वे ने अमेरिका में अडानी समूह पर काॅरपोरेट धेखाधड़ी के आरोप लगाए जाने के बाद दुनिया के सबसे बड़े 1.2 ट्रिलियन डाॅलर के संप्रभु धन कोष के निवेश पोर्टफोलियो से अडानी ग्रीन एनर्जी को हटा दिया था. लेकिन अडानी समूह द्वारा अमेरिकी न्याय विभाग और ट्रंप प्रशासन के साथ समझौता करने के बाद माना जा रहा है कि अडानी को फिर से स्थापित करवाने के मकसद से ही मोदी ने नाॅर्वे की यात्रा की है.
नोटबंदी से लेकर कमखर्ची मुहिम तक, पश्चिम बंगाल में ‘झालमुढ़ी रील’ से लेकर इटली की प्रधानमंत्री जाॅर्जिया मेलोनी के साथ ‘मेलोडी टाॅफी मूमेंट’ तक, नरेंद्र मोदी एक घिसी-पिटी रणनीति को दोहरा रहे हैं. वहीं भाजपा के मुख्यमंत्री – उत्तर प्रदेश में योगी और असम में हेमंत विश्व सरमा से लेकर बिहार में सम्राट चौधरी और अब पश्चिम बंगाल में शुभेंदु अधिकारी तक – सभी लोग अपने-अपने बुलडोजरों की धैंस दिखा रहे हैं और मुस्लिम विरोधी नफरती अभियानों में एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में लगे हैं. एसआईआर द्वारा प्रायोजित चुनावी जीत के नवीनतम दौर के बाद, अब सोलह राज्यों में भाजपा के अपने मुख्य मंत्री हैं जबकि एनडीए के सहयोगी पांच अन्य राज्यों में सत्ता में हैं, जिससे कुल संख्या इक्कीस यानी हर चार में से तीन हो जाती है. पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत और तमिलनाडु में स्थापित राजनीतिक ढांचे में आए विघटन ने विभाजित विपक्ष के लिए बड़ी चुनौतियां खड़ी कर दी हैं. इसके अलावा, लगभग सभी संवैधानिक निकाय और प्रमुख मीडिया अब वैचारिक रूप से आरएसएस-भाजपा प्रतिष्ठान के साथ जुड़ गए हैं.
फिर भी, अप्रत्याशित जन-विरोध प्रदर्शनों की नई चिंगारी भड़क रही है. पश्चिम बंगाल में पशुवध पर प्रतिबंध लगानेवाले आदेश का हिंदू पशु व्यापारियों ने कड़ा विरोध किया है. छात्र एकबार फिर नीट परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक होने के विरोध में उग्र हो उठे हैं. यह पिछले दस वर्षों में प्रश्नपत्र लीक होने की 89वीं घटना है. मुख्य न्यायाधीश की ‘तिलचट्टा’ वाली टिप्पणी ने सोशल मीडिया पर अभूतपूर्व विरोध प्रदर्शनों को जन्म दिया है जिसे मुखर, मायूस और डिजिटल रूप से विद्रोही पीढ़ी लगातार हवा दे रही है. भारत के फासीवाद-विरोधी कार्यकर्ताओं को इन सभी मुद्दों को तत्परता से उठाना चाहिए और प्रतिरोध का और ज्यादा जोशीला व जीवंत मंच तैयार करना चाहिए.