वर्ष 35 / अंक - 22 / पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत: बंगाली ‘असाधारणता’...

पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत: बंगाली ‘असाधारणता’ और भद्रलोक उदारवाद के मिथक में दरार

पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत: बंगाली ‘असाधारणता’ और भद्रलोक उदारवाद के मिथक में दरार

-- अंकुश पाल

हालिया पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद, जिनमें भाजपा को जीत मिली और इसके साथ ही राज्य के इतिहास में पहली बार एक दक्षिणपंथी सत्ता का आगमन हुआ, सोशल मीडिया पर अंग्रेजी बोलने वाले बंगाली उदारवादियों के बीच एक खास तरह का शोक देखने को मिला. यह गहरे दुख और लगभग नाटकीय अंदाज में पेश किया गया विलाप था, जिसे रवींद्रनाथ टैगोर के उद्धरणों में लपेटकर ऐसे सवालों के साथ सामने लाया जा रहा था: ‘यह यहाँ कैसे हो गया? बाकी जगहों की बात अलग है, लेकिन बंगाल में कैसे?’

इस सवाल के पीछे का निहितार्थ साफ था: बंगाल अलग है. बंगाल सांस्कृतिक रूप से समृद्ध है. बंगाल ने पुनर्जागरण को जन्म दिया. बंगाल अपनी सभ्यतागत बुनियाद में हमेशा से धर्मनिरपेक्ष और मानवीय रहा है.

इस शोक को गंभीरता से लेने की जरूरत है, लेकिन इसलिए नहीं कि इसके पीछे का तर्क सही है, बल्कि इसलिए कि यह बहुत कुछ उजागर करता है. यह हमें पश्चिम बंगाल के बदल जाने के बारे में कम और उस आत्म-छवि के बारे में ज्यादा बताता है, जिसकी कभी गंभीर पड़ताल नहीं की गई. मौजूदा राजनीतिक दौर को समझने के लिए सबसे पहले उस आईने को समझना होगा, जिसे ‘भद्रलोक’ – यानी बंगाल का तथाकथित संभ्रांत और अभिजात तबका – लगभग दो सदियों से अपने सामने पकड़े हुए है, और उस चेहरे को भी, जिसे उसने लगातार देखने से इंकार किया है.

इससे पहले कि हम उस चीज का मातम मनाएं जिसे कथित तौर पर बंगाल ने खो दिया है, हमें यह पूछना होगा कि जब हम ‘बंगाल’ और ‘बंगाली’ की बात करते हैं, तो आखिर हम किसकी बात कर रहे होते हैं. यह सवाल अपनी सादगी में लगभग असहज या बेमौका लग सकता है, लेकिन जरा गंभीरता से सोचते ही इन शब्दों के मायने बिखरने लगते हैं.

रिजवाना शमशाद ने पश्चिम बंगाल में बंगाली पहचान और बांग्लादेशी प्रवासियों पर अपने अध्ययन में तर्क दिया है, बंगालियत उस आधार पर बनी है जिसे समाजशास्त्री एंथोनी डी. स्मिथ एथनी (मजीदपम) कहते हैं – यानी एक ऐसा नामित मानवीय समुदाय, जो साझा पूर्वजों की कथाओं, ऐतिहासिक स्मृतियों, एक साझा भाषा और एक खास मातृभूमि से जुड़े होने की भावना से बना हो. इस ढांचे के अनुसार, बंगाली पहचान पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश के बीच खींची गई अंतरराष्ट्रीय सीमा से कहीं आगे तक फैली हुई है. इसके भीतर दोनों तरफ की हिंदू-बहुसंख्यक और मुस्लिम-बहुसंख्यक आबादी शामिल है, जो भाषा, लोककथाओं, खान-पान, रिश्तेदारी और कई अन्य सामाजिक-सांस्कृतिक रिश्तों को साझा करती हैं.

शमशाद के शोध में पाया गया कि यह साझा बंगालियत – जो भाषाई, भौगोलिक और ऐतिहासिक आधारों पर टिकी है – अक्सर धार्मिक भिन्नताओं पर भारी पड़ती है और पश्चिम बंगाल के लोग अपने बांग्लादेशी समकक्षों को किस नजर से देखते हैं, इसे तय करने में अहम भूमिका निभाती है. यह निष्कर्ष एक तरफ मुस्लिम बांग्लादेशियों को ‘घुसपैठिया’ बताने वाली हिंदुत्ववादी सोच को चुनौती देता है, और दूसरी तरफ भद्रलोक की उस धारणा पर भी सवाल खड़ा करता है कि बंगाल की धर्मनिरपेक्ष पहचान सिर्फ हिंदू सांस्कृतिक परंपरा की देन है.

हालांकि, चुनावी नतीजों के बाद सार्वजनिक शोक-प्रदर्शनों में जिस बंगाली पहचान को पेश किया गया, वह बहुत ही संकुचित है. यह लगभग हमेशा एक खास भूगोल को सामने लाती है – मुख्यतः इछामती नदी के पश्चिम में बसे हिंदू समाज की दुनिया – और साथ ही एक खास वर्ग तथा खास सांस्कृतिक सौंदर्यबोध को भी: जैसे दुर्गा पूजा, सत्यजीत रे का सिनेमा, काॅफी हाउस, ‘लिटिल मैगजीन’ और कविता-पाठ की महफिलें. यही वह सांस्कृतिक विरासत है, जिसके क्षरण पर भद्रलोक शोक मना रहा है.

अविभाजित बंगाल के बंगाली मुसलमान, जिनके भाषाई और जातीय संघर्ष ने 1971 में एक स्वतंत्र राष्ट्र के निर्माण का रास्ता बनाया, इस तस्वीर से गायब नहीं हैं; बल्कि सच यह है कि उन्हें इस तस्वीर का विषय ही नहीं बनाया गया है. जैसा कि शमशाद अपने अध्ययन में दर्ज करती हैं, 1971 का मुक्ति संग्राम ही वह घटना थी जिसने बंगाली हिंदुओं और मुसलमानों के बीच उस साझी ‘बंगालियत’ को फिर से मजबूत किया, जो विभाजन से पहले धार्मिक मतभेदों के कारण कमजोर पड़ गई थी. इसके बावजूद, अंग्रेजी बोलने वाले बंगाली उदारवादियों के चुनाव बाद के विलाप में धर्म से परे इस बंगाली एकजुटता की लगभग कोई गूंज सुनाई नहीं देती.

दूसरे शब्दों में कहें तो, ‘बंगाली असाधारणता’ (Bengali exceptionalism) का यह दावा हमेशा से ही अधूरा और सीमित रहा है. लेकिन यह सवाल कि इसमें किसे बाहर रखा गया, सिर्फ भूगोल या धर्म का मामला नहीं है. जैसा कि जया चटर्जी ने अपने ऐतिहासिक शोध ‘बंगाल डिवाइडेड: हिंदू कम्युनलिज्म एंड पार्टिशन, 1932-1947’ में बहुत स्पष्टता से दिखाया है, यह सवाल इस बारे में भी है कि शुरुआत से किन हिंदुओं को इस पहचान में शामिल माना गया था. 1932 के ‘कम्युनल अवाॅर्ड’ के खिलाफ चलाया गया प्रचार, जिसका उद्देश्य बंगाली मुसलमानों को विधायी प्रतिनिधित्व में उनकी आबादी के अनुपात में हिस्सेदारी देना था, ‘बंगाल के हिंदू समुदाय’ के नाम पर चलाया गया था. लेकिन चटर्जी के दस्तावेज दिखाते हैं कि यह तथाकथित एकीकृत हिंदू समुदाय दरअसल भद्रलोक की अपनी छवि के आधार पर गढ़ी गई एक रचना थी.

बंगाल के औपनिवेशिक गवर्नर के नाम ‘जेटलैंड मेमोरियल’, जिसमें ‘कम्युनल अवाॅर्ड’ के खिलाफ तीखा विरोध दर्ज किया गया था, पर ऐसे लोगों के हस्ताक्षर थे जो भद्रलोक वर्ग के निर्विवाद प्रतिनिधि माने जाते थे. ये लोग दावा कर रहे थे कि वे ‘बंगाल के पूरे हिंदू समुदाय’ की ओर से बोल रहे हैं. लेकिन जिस सांस्कृतिक परंपरा का वे हवाला दे रहे थे, उसका ‘सभ्य समाज’ के हाशिए पर रहने वाली औपचारिक रूप से हिंदू मानी जाने वाली जातियों और आदिवासी समुदायों – जैसे संथाल, बागदी और बाउरी – के जीवन से लगभग कोई वास्ता नहीं था. इतना ही नहीं, यह परंपरा नामशूद्र, राजबंशी, महिष्य, साहा, सद्गोप और कैवर्त जैसी निचली और मध्यवर्ती जातियों की सामाजिक-सांस्कृतिक प्रथाओं से भी कोसों दूर थी, जबकि वास्तव में यही समुदाय बंगाल की हिंदू आबादी का विशाल हिस्सा थे.

बंगाल में साथ-साथ मौजूद और एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करने वाली अनेक सांस्कृतिक परंपराओं की विविधता को दबा दिया गया और उसकी जगह ‘हिंदू बंगाल’ की एक ऐसी तस्वीर गढ़ी गई, जिसे दुनिया के सामने मानो कोई सभ्यतागत सत्य बनाकर पेश किया गया हो. संक्षेप में कहें तो, ‘बंगाली असाधारणता’ का दावा हमेशा से ही अधूरा और सीमित रहा है, और जिसे इसके दायरे से बाहर रखा गया, वही तबका अक्सर सबसे ज्यादा उत्पीड़न और पीड़ा झेलता रहा है.

मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को गंभीर और कठोर जांच के दायरे में लाना जरूरी है. आंकड़ों को लेकर कोई विवाद नहीं है, और मामला बेहद गंभीर है. चुनाव से ठीक पहले, नई दिल्ली में भाजपा-नीत केंद्र सरकार ने मतदाता पंजीकरणों की जांच, डुप्लीकेट नामों की पहचान और ऐसे नामों को हटाने की प्रक्रिया शुरू की, जिनकी पुष्टि नहीं हो सकी थी. इसके परिणामस्वरूप पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची से लगभग 91 लाख नाम हटा दिए गए – एक ऐसा आंकड़ा जिसकी मिसाल भारतीय चुनावी इतिहास में पहले कभी नहीं मिली. चुनाव आयोग ने इसे एक ‘सफाई अभियान’ का नाम दिया, लेकिन आलोचकों और विपक्षी दलों – जिनमें उस समय की सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) भी शामिल थी – ने इसे बिल्कुल अलग नजरिए से देखा. बाद में भारत के सर्वाेच्च न्यायालय ने भी इसे उसी नजर से देखा.

‘इंडियन एक्सप्रेस ’ द्वारा प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार, पश्चिम बंगाल विधानसभा की 293 सीटों में से 49 ऐसी थीं, जहां जीत का अंतर उस निर्वाचन क्षेत्र से एसआईआर की सिर्फ न्यायिक जांच प्रक्रिया के दौरान हटाए गए मतदाताओं की संख्या से भी कम था. यह वही चरण था, जिसमें कुल 91 लाख हटाए गए नामों में से 27 लाख से अधिक मामलों की जांच सर्वाेच्च न्यायालय के निर्देश पर नियुक्त न्यायिक अधिकारियों द्वारा की गई थी. इन 49 निर्वाचन क्षेत्रों में से 26 पर भाजपा ने जीत हासिल की, 21 पर तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) जीती, जबकि दो सीटें कांग्रेस के खाते में गईं.

तस्वीर तब और साफ हो जाती है जब भाजपा द्वारा जीती गई सीटों पर बारीकी से नजर डाली जाती है. इन 26 सीटों में से 25 भाजपा ने तृणमूल कांग्रेस से छीनकर हासिल की थीं. दार्जिलिंग एकमात्र ऐसी सीट थी जिसे भाजपा ने इस बार भी जीता और 2021 के पिछले विधानसभा चुनाव में भी अपने पास बरकरार रखा था. इनमें से पांच सीटों पर हटाए गए मतदाताओं की संख्या और जीत के अंतर के बीच का फर्क 10,000 वोटों से भी ज्यादा था. दूसरी ओर, स्क्राॅल द्वारा सबर इंस्टीटड्ढूट के आंकड़ों के आधार पर किए गए एक अलग विश्लेषण में पाया गया कि भाजपा द्वारा जीती गई 105 सीटों पर – जो 294 सीटों वाली विधानसभा में भाजपा की कुल 207 सीटों के लगभग आधे के बराबर हैं – एसआईआर के दौरान हटाए गए मतदाताओं की कुल संख्या पार्टी की जीत के अंतर से अधिक थी. इनमें से 86 ऐसी सीटें थीं, जहां भाजपा ने इससे पहले कभी जीत हासिल नहीं की थी.

मतदाता सूची से हटाए गए लोगों की जनसांख्यिकीय तस्वीर इस चिंता को और गहरा कर देती है. बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, हटाए गए कुल 91 लाख मतदाताओं में लगभग 31 लाख मुसलमान थे – यानी लगभग 34 प्रतिशत, जबकि भारत की पिछली जनगणना के अनुसार पश्चिम बंगाल की कुल आबादी में उनकी हिस्सेदारी 27 प्रतिशत है. बीबीसी ने राजनीतिक दलों के हवाले से यह भी बताया कि न्यायिक जांच चरण में हटाए गए नामों में लगभग दो-तिहाई मुसलमानों के थे. इसका असर भौगोलिक रूप से भी खास इलाकों में केंद्रित दिखाई दिया. कोलकाता के उत्तरी जिलों, जहां राजधानी के कुछ सबसे बड़े मुस्लिम-बहुल इलाके स्थित हैं, वहां लगभग 30 प्रतिशत मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए, जबकि दक्षिणी जिलों में यह आंकड़ा लगभग 27.5 प्रतिशत था. सीमावर्ती जिलों की तस्वीर इससे भी ज्यादा गंभीर थी: उत्तर 24 परगना, नदिया, मुर्शिदाबाद और मालदा – जहां मुस्लिम आबादी की उल्लेखनीय हिस्सेदारी है – सबसे ज्यादा नाम हटाए जाने वाले जिलों में शामिल थे.

मतदान के दिन तक, मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के खिलाफ दायर 34 लाख से अधिक अपीलों में से दो हजार से भी कम मामलों का निपटारा अपीलीय ट्रिब्यूनलों द्वारा किया गया था. भारतीय सेना के पूर्व तकनीशियन मोहम्मद दाऊद अली, जिनके पास वैध पासपोर्ट और सेवा रिकाॅर्ड मौजूद थे, ने पाया कि उनका और उनके तीन बच्चों का नाम मतदाता सूची से हटा दिया गया था, जबकि उनकी पत्नी का नाम बरकरार था. उन्होंने बीबीसी से कहा, ‘मैं स्तब्ध हूं. मुझे गहरी ठेस पहुंची है और मेरा अपमान हुआ है.’ राजनीतिक वैज्ञानिक सिबाजी प्रतिम बसु ने इसे ‘लोकतंत्र के लिए शर्मनाक’ बताया. वहीं मानवशास्त्री मुकुलिका बनर्जी ने टिप्पणी की कि नाम हटाए जाने का यह पैटर्न इस ओर इशारा करता है कि आबादी के कुछ खास वर्गों को ‘चुनिंदा तरीके से निशाना’ बनाया गया हो सकता है.

इन तमाम तथ्यों की गंभीर जांच, कानूनी चुनौती और राजनीतिक जवाबदेही तय की जानी चाहिए. यह ढांचागत हेरफेर वास्तविक है, इसके दस्तावेजी प्रमाण मौजूद हैं और इसके गंभीर परिणाम भी सामने आए हैं. लेकिन इसके बावजूद, ऐसी ढांचागत बढ़त हवा से वोट पैदा नहीं कर सकती. भाजपा ने ऐतिहासिक दो-तिहाई बहुमत हासिल किया है. 206 सीटों पर उसकी जीत का औसत अंतर लगभग 28,000 वोटों का था. भाजपा की जीत को पूरी तरह से एसआईआर का नतीजा मान लेना एक अलग तरह की बच निकलने की कोशिश होगी – जो अपने तरीके से उतनी ही संरक्षणवादी और ऊपर से देखने वाली है, जितनी वह बहुसंख्यकवादी राजनीति जिसका वह विरोध करती है.

ऐसा सोचना लाखों बंगाली मतदाताओं को या तो धोखाधड़ी का निष्क्रिय शिकार मानता है या फिर ऐसे लोगों की तरह देखता है, जिनमें अपनी राजनीतिक समझ और निर्णय लेने की क्षमता ही नहीं है. यह उस कठिन और जरूरी सवाल से भी बच निकलता है: आखिर इतने सारे लोगों ने भाजपा के पक्ष में वोट क्यों दिया?

इसका उत्तर बहुआयामी और असहज करने वाला है. तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ सत्ता-विरोधी माहौल और वास्तविक नाराजगी मौजूद थी. यह गुस्सा सिंडिकेट राजनीति, स्थानीय संरक्षण तंत्रों पर कब्जे और उन समुदायों की हताशा से पैदा हुआ था, जिन्हें टीएमसी के 15 वर्षों के शासन के दौरान विकास के लाभों से बाहर रखा गया था. भाजपा की लामबंदी के जरिए जातिगत आकांक्षाएं भी सामने आ रही थीं, खासकर मध्यवर्ती जातियों के बीच – ऐसे समुदाय जो ऐतिहासिक रूप से प्रभुत्वशाली भद्रलोक जातियों और जाति-व्यवस्था की सबसे निचली पायदानों के बीच स्थित रहे हैं. इन समुदायों को भद्रलोक-प्रधान सांस्कृतिक वामपंथ ने भाषणों में तो एकजुटता का भरोसा दिया, लेकिन व्यवहार में अक्सर संरक्षणवादी रवैया ही दिखाया. इसके साथ आर्थिक चिंताएं भी थीं. और हां, बंगाल के मतदाताओं के एक हिस्से में भाजपा की बहुसंख्यकवादी राजनीति के प्रति वास्तविक समर्थन और भरोसा भी था – एक ऐसा झुकाव जिसकी जड़ें उसी परंपरा में गहराई से मौजूद हैं, जिसके क्षरण पर आज भद्रलोक मातम मना रहा है.

इन सारी जटिलताओं को समेटकर अगर इसे सिर्फ ‘गढ़ी गई सहमति’ की एक कहानी बना दिया जाए, तो यह राजनीतिक विश्लेषण नहीं है. जैसा कि माइकल गिलान ने पश्चिम बंगाल में हिंदू राष्ट्रवाद पर अपने अध्ययन में लिखा है, यह बंगाल की राजनीतिक परिस्थिति की जटिलताओं से जूझने में नाकामी है – एक ऐसी परिस्थिति, जिसमें एरिल्ड एंगेल्सन रूड के शब्दों में, “हिंदू राष्ट्रवादी विमर्श ‘बंगाली संस्कृति’ के साथ एक असहज समझौते की स्थिति में मौजूद है.”

शिक्षित बंगाली को जन्मजात उदारवादी और मानवतावादी मानने वाली छवि हमेशा से ही एक गढ़ा हुआ मिथक रही है, और इस मिथक की भारी कीमत भी चुकानी पड़ी है –  जिनमें कुछ नतीजे घातक भी रहे हैं. इसका सबसे असहज करने वाला प्रमाण किसी भूले-बिसरे अभिलेखागार में दफ्न नहीं है. उस पर रवींद्रनाथ टैगोर के हस्ताक्षर मौजूद हैं.

1932 के कम्युनल अवाॅर्ड के प्रति भद्रलोक की प्रतिक्रिया पर जया चटर्जी के शोध से एक ऐसा इतिहास सामने आता है, जिसे चुनावी नतीजों के बाद के शोक-विमर्श में बड़ी सावधानी से भुला दिया गया है. इस अवाॅर्ड के खिलाफ दर्ज की गई उनकी आपत्तियां हिंदू वर्चस्व को गढ़ने की ऐसी खुली कोशिशें थीं कि आज उन्हें पढ़ते हुए वे लगभग उकसावे की भाषा जैसी लगती हैं.

जेटलैंड मेमोरियल – जिसके हस्ताक्षरकर्ताओं में रवींद्रनाथ टैगोर, उपन्यासकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय, दार्शनिक ब्रजेंद्रनाथ सील, रसायनशास्त्री पी.सी. रे और कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति श्यामा प्रसाद मुखर्जी शामिल थे – ने सरकार का ध्यान इस ओर खींचा कि प्रांत के ‘बौद्धिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, पेशेवर और व्यापारिक जीवन’ में हिंदुओं की ‘बेहद प्रमुख भूमिका’ रही है. इसी दस्तावेज में यह भी कहा गया कि बंगाल के हिंदू, ‘संख्यात्मक रूप से अल्पसंख्यक होने के बावजूद सांस्कृतिक रूप से अत्यधिक श्रेष्ठ हैं और साक्षर आबादी का लगभग 64 प्रतिशत हिस्सा बनाते हैं.’ इसका संकेत बिल्कुल साफ था: सांस्कृतिक श्रेष्ठता हिंदुओं को उनकी आबादी से अधिक राजनीतिक शक्ति पाने का अधिकार देती है, और कम्युनल अवाॅर्ड – जो मुसलमानों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व दे रहा था – स्वाभाविक व्यवस्था के खिलाफ एक हमला था.

उस समय जारी किए गए ‘हिंदू नेताओं के घोषणापत्र’ ने तो इससे भी आगे बढ़ते हुए कहा था कि, ‘कला, साहित्य और विज्ञान के क्षेत्रों में हिंदू बंगालियों की उपलब्धियां पूरे भारत में सबसे अग्रणी हैं, जबकि बंगाल के मुस्लिम समुदाय ने अब तक इन क्षेत्रों में अखिल भारतीय स्तर की पहचान रखने वाला एक भी नाम पैदा नहीं किया है.’ जया चटर्जी के विश्लेषण के मुताबिक, इस मेमोरियल के हस्ताक्षरकर्ताओं ने कम्युनल अवाॅर्ड को ऐसी व्यवस्था बताया जिसमें महान हिंदू समुदाय को ‘अपने सांस्कृतिक और बौद्धिक रूप से कथित तौर पर हीन, तिरस्कृत बंगाली मुसलमानों का स्थायी गुलाम’ बना दिया जाएगा. यह किसी ऐसी परंपरा की भाषा नहीं है जिसे अपने उदारवाद पर भरोसा हो. यह उस जातिगत वर्चस्व की भाषा है, जो इतनी सामान्य और स्वाभाविक बना दी गई थी कि बंगाल के सबसे प्रतिष्ठित कवि और वैज्ञानिक भी बिना किसी झिझक के उस पर अपने हस्ताक्षर कर सकते थे.

शरतचंद्र चट्टोपाध्याय – जिनके ग्रामीण बंगाल के जीवन पर आधारित उपन्यास आज भी स्कूलों में संवेदनशीलता और सहानुभूति के प्रतीक के रूप में पढ़ाए जाते हैं, और जिनकी देवदास तथा श्रीकांत जैसी रचनाओं को भद्रलोक बंगाल की अटूट मानवता के प्रमाण के रूप में पेश करता है – इस सोच के तार्किक नतीजे को व्यक्त करने वालों में सबसे स्पष्ट थे. उन्होंने लिखा थाः ‘हिंदुस्तान हिंदुओं की मातृभूमि है. मुसलमानों की निगाहें तुर्की और अरब की ओर रहती हैं, उनका दिल भारत में नहीं बसता.’

मुद्दा इन हस्तियों को सीधे-सीधे खलनायक बना देना नहीं है, और न ही यह कहना है कि किसी एक मेमोरियल पर टैगोर के हस्ताक्षर उनकी पूरी राजनीतिक सोच का प्रतिनिधित्व करते हैं. जैसा कि शुभोरंजन दासगुप्ता ने तणिका सरकार की पुस्तक ‘‘हिंदू नेशनलिज्म इन इंडिया’’ की 2022 की समीक्षा में उल्लेख किया है, टैगोर का बाद का लेखन, संकीर्ण राष्ट्रवाद का उनका लगातार विरोध, और नेहरू को उनकी यह चेतावनी कि ‘वंदे मातरम्’ अपने संपूर्ण रूप में मुसलमानों और ईसाइयों के लिए स्वीकार्य नहीं होगा – यह सब उनकी वैचारिक विरासत के भीतर मौजूद एक वास्तविक प्रतिरोधी परंपरा को भी दर्शाता है.

मुख्य बात यह है कि जिस परंपरा पर आज मातम मनाया जा रहा है, वह शुरू से ही भीतर से विरोधाभासी थी. उसमें एक ओर टैगोर की गीतांजलि जैसी विश्वमानवीय दृष्टि पैदा करने की क्षमता थी, तो दूसरी ओर जेटलैंड मेमोरियल जैसी सांप्रदायिक सोच को भी जन्म देने की क्षमता थी – कभी एक ही व्यक्ति में, कभी एक ही दशक के भीतर. इस विरोधाभास के सिर्फ एक हिस्से को याद रखने की भद्रलोक की आदत कोई मासूम भूल नहीं है. यह मिथक को जिंदा बनाए रखने की एक सक्रिय प्रक्रिया है.


भद्रलोक की सांस्कृतिक स्मृति में बंगाली इस्लाम के ऐतिहासिक व्यवहार पर नजर डालिए. संदीपन सेन द्वारा 19वीं सदी की शुरुआत में फोर्ट विलियम काॅलेज में बंगाली भाषा के संस्कृतकरण पर किए गए अध्ययन से एक ऐसा इतिहास सामने आता है, जिसमें ब्रिटिश औपनिवेशिक शासकों और संस्कृतनिष्ठ भद्रलोक विद्वानों के बीच एक सुविधाजनक गठजोड़ बन गया था. एक तरफ अंग्रेजों को प्रशासनिक उद्देश्यों के लिए एक मानकीकृत बंगाली भाषा की जरूरत थी, जबकि दूसरी तरफ भद्रलोक इसे मुस्लिम संरक्षण में फली-फूली बोलचाल की स्थानीय भाषा पर ब्राह्मणवादी भाषाई प्रभुत्व को फिर से स्थापित करने के अवसर के रूप में देख रहा था. जैसा कि सेन ने अपने अध्ययन में दिखाया है, बंगाल के मुस्लिम सुल्तानों ने 15वीं सदी से ही बंगाली भाषा और साहित्य के विकास को सक्रिय रूप से प्रोत्साहित किया था. इस संरक्षण से जो जीवंत और गैर-संस्कृतनिष्ठ बंगाली भाषा उभरी थी, संस्कृतकरण की यह परियोजना उसी को विस्थापित करना चाहती थी. परिणाम यह हुआ कि बंगाली भाषा के औपचारिक स्वरूप से अरबी और फारसी के उन शब्दों को व्यवस्थित ढंग से बाहर निकाल दिया गया, जो आम लोगों की बोलचाल का स्वाभाविक हिस्सा थे. इस तरह एक ऐसी सांस्कृतिक परंपरा गढ़ी गई, जिसने अपनी महानता को उन्हीं लोगों के योगदान को मिटाकर परिभाषित किया, जिन्होंने वास्तव में उसे संभव बनाया था.

बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय इस पूरे इतिहास के केंद्र में एक असहज पात्र के रूप में मौजूद हैं. वे 19वीं सदी के बंगाली साहित्य की सबसे प्रभावशाली हस्तियों में से एक थे और साथ ही हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा को आकार देने वाली प्रमुख प्रेरणाओं में भी शामिल थे. उनके उपन्यास आनंदमठ का मूल संदेश, जैसा कि दासगुप्ता ने सरकार की किताब की समीक्षा में संक्षेप में कहा है, अनिवार्य रूप से यही है कि भारत के पतन के लिए ब्रिटिश साम्राज्यवादियों से अधिक मुसलमान जिम्मेदार हैं. दासगुप्ता यह भी रेखांकित करते हैं कि “बंगाली साम्यवाद के संस्थापक मुजफ्फर अहमद ने इस उपन्यास को ‘शुरू से अंत तक सांप्रदायिक नफरत से भरा हुआ’ बताया था.” इस उपन्यास का राष्ट्रवादी गीत ‘वंदे मातरम्’ – जिसे हिंदू दक्षिणपंथ लंबे समय से भारत के राष्ट्रगान के रूप में स्थापित करने की कोशिश करता रहा है – एक ऐसे पाठ से निकला है जिसमें मुसलमानों के खिलाफ हिंसा के लिए खुला उकसावा मौजूद है. यह एक ऐसा तथ्य है जिसे भद्रलोक जरूरत पड़ने पर स्वीकार तो करता है, लेकिन उसके तुरंत बाद उसे दरकिनार भी कर देता है.

भद्रलोक द्वारा एक एकीकृत हिंदू समुदाय का निर्माण सिर्फ मुसलमानों को बाहर करने तक सीमित नहीं था. जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, चटर्जी के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि 1932 के मेमोरियल्स में जिस सांस्कृतिक परंपरा का हवाला दिया गया था, वह वास्तव में बंगाल की हिंदू आबादी के विशाल बहुमत को भी अपने संदर्भ से पूरी तरह बाहर रखती थी. जिसे एक संयुक्त हिंदू समुदाय की उपलब्धि के रूप में पेश किया गया, वह व्यवहार में उस समुदाय के भीतर एक अत्यंत संकीर्ण और विशेषाधिकार प्राप्त तबके की आत्म-श्रेष्ठता थी – और इसे सार्वभौमिक इसीलिए बनाया जा सका क्योंकि जिन लोगों को बाहर रखा गया था, उनके पास इस दावे को चुनौती देने का कोई मंच ही नहीं था. उनका संरचनात्मक बहिष्करण संस्थागत ढांचे के जरिए कायम रखा गया. संदीपन सेन के शोध के अनुसार, 1817 में हिंदू काॅलेज (वर्तमान प्रेसीडेंसी यूनिवर्सिटी) की स्थापना, जिसका स्पष्ट मेंडेट सिर्फ उच्च-वर्गीय हिंदू पुरुषों को शिक्षित करना था – यह भद्रलोक की बौद्धिक परियोजना के लिए कोई आकस्मिक घटना नहीं थी, बल्कि उसका आधारभूत हिस्सा थी. काॅलेज की ऊंची फीस, जिसने उच्च शिक्षा को केवल संपन्न वर्ग तक सीमित कर दिया, और बंगाली भाषा का संस्कृतकरण, जिसने औपचारिक साक्षरता को प्रभुत्वशाली जातियों के सांस्कृतिक पूंजी का प्रतीक बना दिया, मिलकर ऐसी व्यवस्था बनाई जिसमें भद्रलोक का सांस्कृतिक वर्चस्व योग्यता के आवरण में ढके संरचनात्मक बहिष्करण के जरिए कायम रखा गया.

इस इतिहास और मौजूदा दौर के बीच मौजूद समानता पर थोड़ी देर ठहरकर विचार करना जरूरी है. एसआईआर के दौरान मतदाता सूची से नामों को असंगत रूप से मुस्लिम समुदायों और दलित हिंदू समुदायों से अधिक हटाया गया. जैसा कि बीबीसी ने बताया, “मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे जिलों में मुसलमानों पर सबसे अधिक असर पड़ा, जबकि उत्तर 24 परगना और नदिया में दलित हिंदू – विशेषकर बांग्लादेशी प्रवासी मतुआ समुदाय – सबसे ज्यादा प्रभावित हुए.” चुनाव के बाद भद्रलोक का दुख लगभग पूरी तरह इस चिंता पर केंद्रित रहा कि कहीं धर्मनिरपेक्ष बंगाली संस्कृति को खतरा न हो जाए. लेकिन वे समुदाय, जो सीधे तौर पर मताधिकार से वंचित किए गए – सीमावर्ती जिलों के बंगाली मुसलमान, और उत्पीड़ित जातियों के हिंदू जिनके नाम एक एआई-आधारित प्रक्रिया द्वारा “तार्किक विसंगतियों” के आधार पर सूची से हटा दिए गए – इस शोक के केंद्र में नहीं, बल्कि उसके हाशिए पर भी मुश्किल से दिखाई देते हैं. इस पूरी संरचनात्मक तर्क-व्यवस्था में एक परेशान करने वाली निरंतरता है, जो लगभग एक सदी से चली आ रही है: भद्रलोक उस चीज के खोने पर विलाप करता है जो कभी उसकी अपनी थी, लेकिन इस बात के प्रति असाधारण रूप से उदासीन रहता है कि दूसरों के पास वह कभी थी ही नहीं.

प्रगतिशील राजनीति के लिए ग्राम्शी का प्रसिद्ध सूत्र – “बुद्धि का निराशावाद, इच्छा का आशावाद” – आज बहुत अधिक इस्तेमाल किए जाने के कारण महज एक सजावटी मुहावरा बन जाने का जोखिम उठाता है. लेकिन यह मौजूदा दौर की सटीक तस्वीर पेश करता है. ‘बुद्धि का निराशावाद’ इस बात की मांग करता है कि जो कुछ हुआ है, उसे वास्तव में देखा जाए: सिर्फ चुनावी गणित और एसआईआर के आंकड़ों को नहीं, बल्कि उन ऐतिहासिक प्रक्रियाओं को भी जिन्होंने इस नतीजे को संभव बनाया. इसमें उन तरीकों को समझना भी शामिल है जिनसे भद्रलोक के सांस्कृतिक वर्चस्व ने अपने ही विघटन की जमीन तैयार की, और उन समुदायों की वास्तविक शिकायतों को समझना भी, जिन्हें उस वर्चस्व से व्यवस्थित रूप से बाहर रखा गया था और जिन्होंने भाजपा में – चाहे वह कितनी भी अवसरवादी और खतरनाक क्यों न हो – अपनी राजनीतिक अभिव्यक्ति का एक माध्यम देखा.

‘टैगोर की धरती’ वाला विमर्श दरअसल इसी बौद्धिक आत्ममंथन से बचता है. वह समस्या को पूरी तरह बाहर खोजने की कोशिश करता है – कभी नई दिल्ली की साजिशों में, कभी अशिक्षित लोगों की अज्ञानता में, तो कभी उन मतदाताओं के कथित भोलेपन में जो यह नहीं समझते कि वे क्या खो रहे हैं. लेकिन सच यह है कि भाजपा हिंदू सांप्रदायिकता को हिंदी पट्टी से आयात करके बंगाल में नहीं लाई. उसे यहां पहले से मौजूद ऐसी सामग्री मिल गई, जिसे लंबे समय से पोषित किया गया था और जिसे इतिहास ने सम्मानजनक वैधता भी दे रखी थी.

1932 के मेमोरियल्स पर हस्ताक्षर करने वाले लोग हिंदू दक्षिणपंथ के मूल संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के कार्यकर्ता नहीं थे. वे भद्रलोक समाज के अपने सबसे प्रतिष्ठित लोग थे – कवि, वैज्ञानिक, दार्शनिक, कुलपति – जो यह दावा कर रहे थे कि बंगाल के ‘तिरस्कृत मुसलमान’ हिंदू समुदाय की तुलना में सांस्कृतिक रूप से हीन हैं, और इसलिए लोकतंत्र की संरचना भी उसी के अनुसार तय की जानी चाहिए. भाजपा की चुनावी जीत पर आज जो सदमा दिखाई दे रहा है, वह बंगाल के बदलने का सदमा नहीं है; यह उस आत्म-छवि के टूटने का सदमा है, जिसे दशकों तक चुनिंदा यादों और सुविधाजनक भूलों के सहारे बहुत सावधानी से बनाए रखा गया था, और जिसे अब बनाए रखना मुश्किल होता जा रहा है.

मालदा जिले के हरिश्चंद्रपुर की 35 वर्षीय हसनारा खातून, जिनके पिता, दादा और परदादा सभी मतदाता रहे थे, और जिनके सात सदस्यीय परिवार में से पांच लोगों के मताधिकार को निलंबित कर दिया गया, वे चुनाव के बाद बंगाल के खो जाने पर किए गए अधिकांश विलापों में कहीं दिखाई नहीं देतीं. उन्होंने बीबीसी से कहा, ‘हमें व्यवहार में गैर-नागरिक बना दिया गया है. कौन जानता है कि अगला कदम क्या होगा?’ उनका गुस्सा उस व्यक्ति का गुस्सा है, जिसके लिए वह उदारवादी बंगाल, जिस पर आज मातम मनाया जा रहा है, कभी पूरी तरह वास्तविक था ही नहीं. उसके वादे हमेशा अधूरे थे, और उसकी सहिष्णुता भी शर्तों से बंधी हुई थी – ऐसी सहिष्णुता जिसे जब भी भद्रलोक के हितों की जरूरत पड़ती, वापस लिया जा सकता था. ‘इच्छा का आशावाद’ – जिसे व्यक्त करना कहीं अधिक कठिन है क्योंकि उसे न तो मंचित किया जा सकता है और न सोशल मीडिया पर प्रदर्शित – अगर कहीं जीवित है, तो वह ऐसी राजनीति को बनाने की वास्तविक मेहनत में है, जो बंगाली पहचान की बहुलता को गंभीरता से लेती हो.

जैसा कि शमशाद का शोध स्पष्ट करता है, बंगाली एथनी (ethnie) ने ऐतिहासिक रूप से धार्मिक विभाजनों को पार कर जाने की क्षमता दिखाई है. इसका सबसे गहरा उदाहरण 1971 का मुक्ति संग्राम है, जब बंगाली हिंदुओं और मुसलमानों ने उस पाकिस्तानी सेना के खिलाफ एक साथ लड़ाई लड़ी, जो बंगाली भाषा का दमन करना चाहती थी. इसी दौर में नए बने बांग्लादेश ने अपने राष्ट्रगान के रूप में टैगोर के एक गीत को अपनाकर उस साझा भाषाई पहचान की पुष्टि की, जिसे विभाजन हमेशा के लिए तोड़ देना चाहता था. यह क्षमता वास्तविक है. लेकिन यह अपने आप पैदा हो जाने वाली या सुनिश्चित चीज नहीं है, और निश्चित रूप से यह सिर्फ भद्रलोक की निजी विरासत भी नहीं है. बंगाल के विभाजन में उसकी भूमिका, जिसे जया चटर्जी ने बिना किसी लाग-लपेट के विस्तार से दर्ज किया है, ‘‘उदार हिंदू सज्जन’’ की उस मिथकीय छवि से कहीं अधिक जटिल थी, जिसे भद्रलोक अपने बारे में पेश करता रहा है.

भद्रलोक जो आईना इतने समय से अपने सामने पकड़े हुए था, वह चुनावी नतीजों से टूटा नहीं है; वह पहले से ही टूटा हुआ था. बदला सिर्फ इतना है कि अब रोशनी का कोण बदल गया है, और आईने की दरारों से नजरें चुराना पहले जितना आसान नहीं रह गया है. मौजूदा समय जिस बौद्धिक आत्ममंथन की मांग करता है, उसे ‘खोए हुए बंगाल’ के विलाप में नहीं समेटा जा सकता. इसके बजाय, उस कठिन काम की जरूरत है जिसमें यह समझा जाए कि बंगाल हमेशा से बहुल रहा है, हमेशा संघर्षों और विवादों से भरा रहा है, और हमेशा उस वर्ग से कहीं बड़ा रहा है जिसने उसकी ओर से बोलने का दावा किया. इसी कम आकर्षक, लेकिन अधिक ईमानदार जमीन पर ऐसी राजनीति खड़ी करनी होगी जो वास्तविकताओं के अनुरूप हो.

फिलहाल, इतना ही: इच्छाशक्ति इतनी अडिग होनी चाहिए कि शुरुआत की जा सके.

साभारः
https://kwww.himalmag.com/politics/bjp-west-bengal-bhadralok-caste-hindutva

(अंकुश पाल एक समाजशास्त्री हैं, जिन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इकोनाॅमिक्स से शिक्षा प्राप्त की है.)

30 May, 2026