वर्ष 35 / अंक - 42 / भारतीय चेतना के लिए लोकतंत्र

भारतीय चेतना के लिए लोकतंत्र

भारतीय चेतना के लिए लोकतंत्र

-- राजीव भार्गव

(संविधान ने हमारी बहुलतावादी विरासत को संस्थागत ढांचा जरूर दिया, मगर संस्थाएं अपने आसपास की नैतिक सोच पर टिकी होती हैं, और उसी नैतिक सोच को लेकर अब जमीन पर संघर्ष छिड़ा है.)

लोकतंत्र हमारी किसी पुरानी परंपरा का हिस्सा नहीं है. सच कहें तो यह दुनिया की किसी भी पुरानी परंपरा का हिस्सा नहीं रहा. हमारे यहां या दुनिया के किसी भी कोने में, कोई ऐसा प्राचीन ग्रंथ नहीं मिलता जो उस लोकतंत्र की बात करता हो जिसे आज हम जानते हैं. यानी सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण, सबको साथ लेकर चलने वाली नागरिकता, सामाजिक-राजनीतिक बराबरी, सभी के लिए आर्थिक खुशहाली और एक ऐसा खुला सार्वजनिक दायरा, जहां विरोधी एक-दूसरे से बहस करें और अस्थायी प्रतिद्वंद्वी की तरह फैसले लें, न कि हमेशा के दुश्मन की तरह. एक वांछित सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था के तौर पर लोकतंत्र आधुनिक दौर की देन है, जो बीसवीं सदी से पहले दुनिया में कहीं भी हकीकत नहीं बन सका था. एथेंस में भी नहीं, जिसने औरतों और गुलामों को नागरिकता के दायरे से ही बाहर कर रखा था. जो लोग भारत के ‘मदर ऑफ डेमोक्रेसी’ होने का ऐलान करते हैं, वे इतिहास को फिर से खोज नहीं रहे, बल्कि अपनी सुविधा के हिसाब से एक अतीत गढ़ रहे हैं. उनका मकसद सिर्फ एक कड़वे और असुविधाजनक सवाल से मुंह चुराना है: हमारे अतीत में आखिर ऐसा क्या है जो लोकतंत्र को जिंदा रखता है, और क्या है जो इसे कुचलने पर आमादा है?

इसलिए भारतीय या किसी भी दूसरी परंपरा से हमें लोकतंत्र तक पहुंचने वाली कोई सीधी ऐतिहासिक विरासत नहीं मिलती. हां, इतिहास के अलग-अलग दौर में कुछ ऐसे वैचारिक दायरे जरूर खुले, जिनमें आधुनिक लोकतंत्र के लिए जरूरी बुनियादी तत्व पैदा हुए. ये बिखरे हुए तत्व लंबे समय तक दबे पड़े रहे. वे उस मौके का इंतजार कर रहे थे, जब उन्हें एक साथ जोड़कर एक नई शक्ल दी जा सके. आधुनिक भारत के निर्माताओं ने ठीक यही काम किया. उन्होंने इन तत्वों को एक साथ जोड़ा और उनसे भारतीय लोकतंत्र की कल्पना को साकार किया. लेकिन इसी इतिहास ने एक दूसरी चीज के लिए भी जगह बनाई थी: लोकतंत्र-विरोधी एक ऐसी परंपरा, जो उतनी ही मजबूत थी. ये दोनों परंपराएं एक-दूसरे के साथ आसानी से नहीं रह सकतीं. इनके बीच तीखे सामाजिक टकराव पैदा होते हैं. दोनों के बीच जारी संघर्ष में एक तभी आगे बढ़ता है, जब दूसरा पीछे हटता है. भारत में लोकतंत्र का विकास तब तक नहीं हो सकता, जब तक दूसरी परंपरा के जहरीले असर को खत्म नहीं किया जाता और समाज में उसकी वैधता को पूरी तरह चुनौती देकर खारिज नहीं किया जाता.

पहली परंपरा एक ऐसी बहुलतावादी सोच से बनी है, जो अलग-अलग धर्मों और दर्शनों को मानने वाले समूहों के बीच आपसी स्वीकार्यता और शालीनता को अहमियत देती है. यह ताकत के दम पर हुकूमत करने के बजाय बातचीत और विचार-विमर्श के जरिए शासन चलाने को तरजीह देती है. इसकी बुनियाद कई देवी-देवताओं में विश्वास रखने वाली निहित बहुलतावादी धार्मिक सोच में भी मिलती है, लेकिन इसका सबसे समृद्ध स्रोत सम्राट अशोक की सामाजिक और राजनीतिक नैतिकता है. हमारे अपने दौर में एम.के. गांधी, बी.आर. अंबेडकर और जवाहरलाल नेहरू ने इस परंपरा को नए सिरे से गढ़ा.

दूसरी परंपरा मर्दवादी योद्धा-नीति पर टिकी है. यह सत्ता की ऐसी व्यावहारिक राजनीति से चलती है, जिसमें सत्ता का सवाल आते ही नैतिकता और उसके नियमों को किनारे रख दिया जाता है. सत्ता हासिल करने या उसे बनाए रखने के लिए यह हिंसा करने से भी नहीं हिचकती. साथ ही, यह धर्मशास्त्रों पर आधारित ऊंच-नीच वाले सामाजिक ढांचे को मजबूत करती है. पहली परंपरा यह सवाल उठाती है कि एक राजनीतिक समुदाय में हम बराबरी के साथ मिल-जुलकर कैसे रह सकते हैं. दूसरी परंपरा का सरोकार सिर्फ इससे है कि सत्ता पर कब्जा कैसे किया जाए, हुकूमत को कैसे मजबूत किया जाए और समाज में उसे जायज कैसे ठहराया जाए.

आइए, पहले उस विचारधारा को समझें जो ताकत की पूजा करती है. ऋग्वेद के कुछ हिस्सों में इंद्र अपनी शारीरिक ताकत के दम पर राज करता है. वह अपने प्रतिद्वंद्वियों को मारता, काटता और कुचलता है. जो लोग उसे अपना आदर्श बनाते हैं, वे ‘शूर’ यानी बाहुबली कहलाते हैं. इस नीति में नैतिकता के लिए कोई जगह नहीं है और यही इसकी शान मानी जाती है. यह सिर्फ जीत जानती है, न्याय नहीं. इसमें कौटिल्य के अर्थशास्त्र को भी जोड़ लीजिए. वह राजसत्ता की राजनीति को नैतिकता और धर्म से अलग करता है, दुनिया में कामयाबी को हर चीज से ऊपर रखता है और दंड यानी बलपूर्वक आदेश मनवाने वाली सत्ता को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाता है. अंत में, बौद्ध धर्म और अशोक की चुनौती के जवाब में सामने आए धर्मशास्त्रीय विचार को भी देखिए. इसने धार्मिक कर्मकांडों को चार वर्णों पर टिके कठोर सामाजिक ढांचे से जोड़ दिया. इस व्यवस्था में महिलाओं को बेहद नीचे घोर गैर-बराबरी के साथ बांध दिया. साथ ही, इस सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखना और इसे सख्ती से लागू करना राजा का कर्तव्य बना दिया गया. इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि भारतीय इतिहास के ज्यादातर दौर में उपमहाद्वीप के शासक वर्ग की सामाजिक-राजनीतिक सोच में इस परंपरा की बेहद मजबूत पकड़ रही है.

आधुनिक दौर की लोकतंत्र-विरोधी सोच ने इन तीनों धाराओं को एक साथ मिला दिया. वी.डी. सावरकर ने अशोक के अहिंसा की राह अपनाने को “राष्ट्र-विरोधी” कदम बताया. उनके मुताबिक, यह ऐसी कमजोरी थी जिसने देश को पस्त किया और विदेशी हमलों का रास्ता खोला. सावरकर का मानना था कि धर्मसम्मत युद्ध के नियम तभी तक मानने चाहिए, जब तक दुश्मन भी उनका पालन करे. अगर दुश्मन ऐसा न करे, तो सांप को कुचलने के लिए अचानक हमला करने, धोखा देने और हर मुमकिन तरीके का इस्तेमाल करने से भी परहेज नहीं करना चाहिए.

वे प्राचीन कबीलाई गणराज्यों के प्रशंसक थे, लेकिन इसलिए नहीं कि वहां विचार-विमर्श की परंपरा थी, बल्कि इसलिए कि वहां के नागरिक सैन्य ढंग से संगठित थे. इन विरासतों के साथ उन्होंने एक और विचार जोड़ा. शुरुआती आधुनिक यूरोप में धर्मों को एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी वैचारिक समुदायों के रूप में देखने की जो सोच उभरी थी, उसी के सहारे उन्होंने डेमोस यानी जनता को एथनोस यानी नस्लीय-सांस्कृतिक पहचान वाले समुदाय में बदल दिया. उनके मुताबिक, उपमहाद्वीप में जन्मे वही लोग हिंदू माने जा सकते थे, जिनका धर्म भी यहीं पैदा हुआ हो. इस कसौटी पर मुसलमान, ईसाई, यहूदी और पारसी बाहरी ठहरा दिए गए.

नैतिकता से बेपरवाह, हिंसक, अति-मर्दवादी और दूसरों को बाहर रखने वाली: यही भारत की लोकतंत्र-विरोधी परंपरा है.

अहिंसा और बहुलतावाद

इस परंपरा के खिलाफ अशोक का धम्म एक दूसरी राह पेश करता है. योद्धा-नीति को ठुकराते हुए अशोक ने राजा का मकसद विजय हासिल करना नहीं, बल्कि “सर्वलोक हित” (स्तंभलेख 6) यानी सबकी भलाई करना बताया. इंसानों और जानवरों, दोनों के लिए बाग-बगीचे, कुएं, विश्रामगृह और छाया देने वाले बरगद के पेड़ लगवाए जाने थे.

अशोक के पास आज के दौर की ‘नागरिकता’ की कोई अवधारणा नहीं थी, फिर भी वह अपनी प्रजा के बीच ऊंच-नीच का भेद नहीं करता था. महिलाओं, गुलामों और सेवकों की देखभाल भी उसके दायित्व में शामिल थी. हालांकि, सबको प्रजा मानना और सबको बराबर नागरिक अधिकार देना दो अलग बातें हैं. फिर भी, समान नागरिकता तक पहुंचने का रास्ता संभवतः सबको प्रजा मानने की इसी सोच से होकर गुजरता है, न कि नस्लीय-सांस्कृतिक पहचान पर टिके समुदाय की अवधारणा से.

यहां तीन और बातें बेहद अहम हैं. पहली बात, धम्म का पालन ‘निझती’ यानी समझाकर और सहमति से होना चाहिए, न कि ‘नियम’ या डंडे के जोर से (स्तंभलेख 7). मकसद लोगों पर जोर-जबरदस्ती करना नहीं, बल्कि उनकी सोच बदलना होना चाहिए. दूसरी बात, न्यायाधीशों और सरकारी अधिकारियों को निष्पक्ष होना चाहिए. प्राचीन दुनिया में कानून के सामने बराबरी की अवधारणा के सबसे करीब पहुंचने वाली सोच यही थी. तीसरी बात, धम्म खुद सम्राट से ऊपर है और इस तरह राजा की मनमर्जी पर लगाम लगाता है. यहीं उस श्रेष्ठतर कानून का शुरुआती बीज दिखाई देता है, जिसके सामने शासकों को भी जवाबदेह होना था. और यही वह जमीन है जिस पर आगे चलकर संवैधानिक शासन की बुनियाद खड़ी होनी थी.

अशोक का सबसे उल्लेखनीय कदम उस सोच पर हमला था, जिसे हम शब्दों के जरिए लड़ने वाली योद्धा-नीति कह सकते हैं. उस दौर में जब वैदिक ब्राह्मण, आजीवक, जैन और बौद्ध आपस में तीखी जुबानी जंग लड़ रहे थे, अशोक ने ‘वचोगुति’ यानी जुबान पर संयम को सामाजिक धम्म का बुनियादी उसूल बनाया. शिलालेख 12 आलोचना पर रोक नहीं लगाता, बल्कि उसे एक सलीका सिखाता है. दूसरों की आलोचना सिर्फ ठोस वजह से करो, सही मौके पर करो और कभी भी हद से बाहर जाकर मत करो. इसके बाद एक बारीक मोड़ आता है: अपने मत या अपने समूह की तारीफ भी इसी संयम के साथ करो. अपनी ही महिमा का बखान करना भी उतना ही नुकसानदेह है जितना दूसरों को नीचा दिखाना, क्योंकि दोनों ही लोगों और समुदायों के बीच दूरियां बढ़ाते हैं और यह दूरी एक-दूसरे से सीखने और समझने के रास्ते बंद कर देती है. इसके बजाय, अलग-अलग समुदायों को समवाय यानी आपसी मेल-मिलाप और संवाद के लिए साथ आना चाहिए. उन्हें बहुश्रुत यानी बहुतों की बात सुनने और अलग-अलग विचारों को समझने वाला बनना चाहिए. इस तरह हर समुदाय दूसरे समुदाय के संपर्क से अपनी नैतिक समझ को और बेहतर बना सकता है. इस नजरिए में अपनी समझ कोई बंद दरवाजा नहीं है. बातचीत और आपसी सीख के जरिए हमारी समझ लगातार विकसित होती है. यह विचार सिर्फ पत्थरों पर खुदा नहीं रहा, बल्कि सामूहिक सोच में उतर गया और लोक-कथाओं, नाटकों, जनसंस्कृति और कला के जरिए समाज की रगों में उतरकर आगे बढ़ता गया. किसी भी धार्मिक मत ने खुद को सच्चा और बाकी सबको झूठा ठहराकर सख्त दीवारें खड़ी नहीं कीं. राज्य ने भी खुद को किसी एक समुदाय के साथ पूरी तरह नहीं बांधा. टकराव हुए, यहां तक कि एक-दूसरे को दानव भी ठहराया गया, लेकिन उस कड़वाहट को कभी स्थायी दुश्मनी में बदलने से अक्सर बचा गया. मेरे विचार से, धर्म और दर्शन के स्तर पर मौजूद यही गहरी बहुलतावादी परंपरा भारतीय लोकतंत्र की सबसे अहम बुनियादी शर्त है. और दूसरी वर्चस्ववादी परंपरा को अगर अपना वर्चस्व कायम करना है, तो उसे सबसे पहले इसी बहुलतावाद को तोड़ना होगा.

राजनीतिक समानता की मांग भारतीय परंपराओं के भीतर से पैदा नहीं हुई. यह मांग औपनिवेशिक हुकूमत के खिलाफ लड़ाई से पैदा हुई. लेकिन आधुनिक भारत के निर्माताओं ने पुरानी विरासतों से जरूरी तत्व चुने और यह काम उन्होंने पूरी ऐतिहासिक समझदारी के साथ किया. नेहरू और अंबेडकर जानते थे कि प्राचीन गणराज्य केवल ऊंचे सामाजिक तबकों तक सीमित थे. इसलिए उन्होंने आजाद भारत के गणराज्य को समावेशी बनाने के लिए उसके आगे एक ही शब्द जोड़ा: “लोकतांत्रिक”. अंबेडकर को यह भ्रम नहीं था कि सिर्फ कानूनी समानता का अधिकार दे देने से जाति व्यवस्था खत्म हो जाएगी. वे विशेषाधिकार प्राप्त जातियों के वर्चस्व को तोड़ना चाहते थे. इसके लिए उन्होंने दलितों के लिए विशेष प्रतिनिधित्व का प्रस्ताव रखा, ताकि सामाजिक समानता के सवाल को राजनीतिक व्यवस्था के दायरे में लाया जा सके.

गांधी ने भी योद्धा-नीति को पूरी तरह नकार दिया और राजनीति में ‘दोस्त बनाम दुश्मन’ के बंटवारे को भी खारिज कर दिया. राजनीति में सिर्फ विरोधी होते हैं जिनकी सोच और जमीर को जगाया जा सकता है. सत्याग्रह में संयम यानी खुद पर काबू रखने को केंद्रीय जगह दी गई. यह ऐसा आंदोलन नहीं हो सकता, जिसमें “डींगें हांकी जाएं, धौंस जमाई जाए या झांसा दिया जाए.” अशोक के शिलालेख 12 की तर्ज पर गांधी ने दूसरे धर्मों की बुराई करने से मना किया. उनके लिए नम्रता और आपसी सम्मान में ही अहिंसा की जान बसती है. उनका कहना था, “जो चीज नम्रता से आसानी से हासिल की जा सकती है, वह ताकत के जोर से कभी हासिल नहीं की जा सकती.”

इस तरह, ये दोनों परंपराएं हमारी अपनी विरासत का हिस्सा हैं. इनमें से न तो कोई बाहर से थोपी गई चीज है, और न ही कोई मासूम पुरानी निशानी. यह मान लेना कि हमारा पूरा अतीत लोकतांत्रिक रहा है, खुद को धोखा देना है. लेकिन यह मान लेना कि हमारा पूरा अतीत ऊंच-नीच, दमन और लोकतंत्र-विरोध से भरा रहा है, इतिहास को सीधे उन ताकतों के हवाले कर देना है जो आज भी जनता को दबाकर रखना चाहती हैं. संविधान ने हमारी बहुलतावादी विरासत को संस्थागत ढांचा दिया, लेकिन संस्थाएं अपने दम पर कायम नहीं रह सकतीं. उन्हें अपने आसपास मौजूद नैतिक सोच और सामाजिक मूल्यों से ताकत मिलती है. आज जमीनी स्तर पर इसी सोच और इन्हीं मूल्यों को लेकर संघर्ष चल रहा है. ताकतवर शासक का महिमामंडन किया जा रहा है, संयम को कमजोरी बताकर उसका मजाक उड़ाया जा रहा है और अल्पसंख्यकों से कहा जा रहा है कि वे इस देश में सिर्फ मेहमान हैं.

यह लड़ाई तेज होती जा रही है. बहुत से लोग इसे ठीक ही देश के बुनियादी चरित्र को बचाने की लड़ाई मानते हैं. ऐसे में सवाल यह नहीं है कि हमारे अतीत में लोकतंत्र के बीज थे या नहीं. इसका जवाब हां भी है और नहीं भी. असली सवाल यह है कि हम अपने अतीत की किन परंपराओं को अपना भविष्य गढ़ने देंगे.

(राजीव भार्गव राजनीतिक विचारक हैं. वे दिल्ली स्थित सीएसडीएस में मानद प्रोफेसर और संस्थान के पारिख इंस्टीट्यूट ऑफ इंडियन थाॅट के निदेशक हैं.)

द फ्रंटलाइन से साभार: https://youtu.be/soXwMDQLcsY?si=Qi-ZDb7T2i_-xHrk

17 October, 2026