वर्ष 35 / अंक - 42 / 12 अक्टूबर 2026 को दिल्ली से मिला संदेश

12 अक्टूबर 2026 को दिल्ली से मिला संदेश

12 अक्टूबर 2026 को दिल्ली से मिला संदेश

बिहार में 25 जून 2025 को एसआइआर शुरू होने के बाद मताधिकार-हरण और चुनावी धोखाधड़ी के खिलाफ जो प्रतिवाद शुरू हुए थे वे सितंबर 2026 में ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की खोजी रिपोर्ट, जिसमें चुनाव आयोग के अंदरूनी कामकाज का खुलासा हुआ था, सामने आने के पश्चात और प्रबल हो गए, और अब यह प्रतिवाद एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है. जंतर-मंतर की घेराबंदी करने, मेट्रो स्टेशन बंद करने, भारी संख्या में सुरक्षा बलों की तैनाती और पुलिस, अर्ध-सैनिक बलों और सरकार समर्थित गुंडों द्वारा की गई भयानक हिंसा के बावजूद 25 सितंबर से दिल्ली में लगातार ये मांगें उठाई जा रही हैं – ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दो, एसआइआर को खत्म करो और 2023 के उस चुनाव आयुक्त नियुक्ति कानून को रद्द करो जिसने आयोग की स्वायत्तता और जवाबदेही छीन ली है.

इस दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने फाॅर्म 6 में किए गए बदलावों के बारे में चुनाव आयोग के झूठ का पर्दाफाश किया और सरकार को आगाह किया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों पर कोई कड़ी कार्रवाई न की जाए. जहां सरकार अभी भी अपनी हरकतें सुधारने को तैयार नहीं है, वहीं 12 अक्टूबर को दिल्ली में विरोध प्रदर्शन अपने चरम पर पहुंच गया, जब हजारों लोग कौंस्टिट्यूशन क्लब से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक मार्च में उतर पड़े.

दिल्ली में 12 अक्टूबर का मार्च फासीवादी मोदी-शाह शासन के खिलाफ एकजुट जन-जागरूकता की उस क्षमता की झलक दिखाता है जिसका इस्तेमाल अब तक नहीं हुआ था. 2019-20 में दिल्ली ने नागरिकता कानून में भेदभावपूर्ण संशोधनों के खिलाफ शाहीन बाग का ऐतिहासिक प्रतिवाद देखा, किंतु वह मुख्यतः नागरिक समाज का मामला बनकर रह गया था और गैर-वामपंथी विपक्ष इससे दूर ही खड़ा रहा. जब नवंबर 2020 के आखिर में किसानों का आंदोलन शुरू हुआ तो दिल्ली ने अपेक्षाकृत बड़े पैमाने पर प्रतिक्रिया दी, लेकिन एक बार फिर गैर-वामपंथी विपक्ष इससे दूर रहा. इस साल की शुरूआत में हमने ईरान युद्ध और रसोई गैस की कीमतों में भारी बढ़ोतरी के बीच दिल्ली के आसपास मजदूरों के अभूतपूर्व प्रतिवाद देखे, लेकिन मजदूरों की मुश्किलों और उनके प्रतिवादों को बहुत कम सामाजिक समर्थन मिला.

इसके बाद जून और जुलाई में जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन हुए. शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग ने छात्रा समुदाय को एकजुट किया और युवाओं के बीच इसे जबरदस्त समर्थन मिला. वामपंथी छात्रा आंदोलन और प्रगतिशील नागरिक समाज के बड़े हिस्सों ने इन प्रतिवादों का नेतृत्व किया और इसे समर्थन दिया, लेकिन ‘इंडिया’ गठबंधन के मुख्य हिस्से इन प्रतिवादों से कुछ हद तक अलग ही रहे. 20 जुलाई को हुई बेरहम कार्रवाई ने देशव्यापी हलचल पैदा कर दी, जिससे अधिकाधिक पार्टियां सीधे तौर पर इसमें शामिल हो गईं और सरकार के पास धर्मेंद्र प्रधान को हटाने के अलावा कोई चारा नहीं बचा. एसआइआर हमले के अनुभव और चुनाव आयोग, खासकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की घटती विश्वसनीयता ने देश को इस व्यवस्था के साथ एक निर्णायक टकराव की स्थिति में ला खड़ा किया है, जिसमें ज्ञानेश कुमार को तुरंत हटाने की मांग की जा रही है. और इस बार व्यापक राजनीतिक विपक्ष, नागरिक समाज और जमीनी स्तर पर चल रहे जन आंदोलन सभी एक साथ आते दिख रहे हैं.

इस मोड़ पर मौजूदा व्यवस्था कैसी प्रतिक्रिया दे रही है? यह लगातार क्रूरता का इस्तेमाल कर रही है, किंतु 12 अक्टूबर को जब लोग इतनी बड़ी संख्या में बाहर निकले, तो पुलिस को पीछे हटना पड़ा और मार्च की इजाजत देनी पड़ी. लेकिन साथ ही, दिल्ली पुलिस कमिश्नर ने जंतर-मंतर को प्रतिवाद की तय जगह के तौर पर रद्द करने और शहर के मुख्य हिस्से से मीलों दूर नई जगहें निर्धारित करने का आदेश जारी कर दिया. बेशक रामलीला मैदान अभी भी उपलब्ध रहेगा, लेकिन ज्यादातर समय यह धार्मिक कार्यक्रमों और अन्य उत्सवों के लिए आरक्षित रहता है. वर्ष 2026 के बाकी समय के लिए, खबरों के मुताबिक, यह सिर्फ 29, 30 और 31 दिसंबर को 1.21 लाख रुपये प्रतिदिन के शुल्क पर उपलब्ध है. शांतिपूर्ण सार्वजनिक विरोध प्रदर्शनों के लिए जंतर-मंतर जैसी मुफ्त जगहों को छोड़ने का सवाल ही नहीं उठता.

इस बीच, जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग न करने और शांतिपूर्ण विरोध के संवैधानिक अधिकार का सम्मान करने की सर्वोच्च न्यायालय की सलाह को दिल्ली पुलिस ने अब तक पूरी तरह नजरअंदाज किया है. अब सर्वोच्च न्यायालय के सामने अवमानना याचिका दायर है और यह देखना बाकी है कि शीर्ष अदालत अपने ही आदेशों को लागू करवाने को लेकर कितनी गंभीर है.

दूसरी प्रतिक्रिया भारत के चुनाव आयोग की तरफ से आ रही है. जिन राज्यों में एसआइआर चल रही है या पूरी हो चुकी है, वहां छूटे हुए वोटरों को शामिल करने के लिए लगभग सभी जगह सर्कुलर जारी किए गए हैं. दिल्ली के मुख्य चुनाव अधिकारी (सीईओ) ने बताया कि 33 लाख ‘विवादित’ मामलों में से लगभग 20 लाख मामलों का समाधान कर लिया गया है, और उन्होंने दिल्ली के वोटरों से कहा कि वे अपनी शिकायतों के समाधान के लिए 14,947 बीएलओे, 902 एईआरओ, 70 ईआरओ, 13 डीईओ या सीईओ में से किसी से भी बेझिझक संपर्क कर सकते हैं. लगभग सभी राज्यों में ऐसे ही सर्कुलर जारी किए जा रहे हैं. हालांकि, यह बहुत कम है और बहुत देर से किया गया है. यह चुनाच आयोग के पास शक्तियों के अनावश्यक केंद्रीकरण, वोटरों को गलत तरीके से और जान-बूझकर सूची से हटाने, और ऐसी कार्रवाई के असर, चाहे वह तुरंत चुनाव के लिहाज से हो या हर प्रभावित वोटर के अधिकारों और सुरक्षा के नुकसान के लिहाज से हो, से जुड़े किसी भी सवाल का जवाब नहीं देता है. यह प्रणालीगत हमला आरएसएस और भाजपा के फासीवादी एजेंडे की उपज है, लेकिन इसकी चपेट में वे राज्य भी आ रहे हैं जहां भाजपा फिलहाल सत्ता में नहीं है.

जिस दिन दिल्ली के लोग सड़कों पर पुनः अपना हक हासिल करते और शांतिपूर्ण प्रतिवाद के अपने अधिकार की फिर से दावेदारी जताते दिख रहे थे, उसी दिन बेंगलुरु में ‘मेरा वोट, मेरा अधिकार’ अभियान चलाने वालों को पुलिस के बेरहम दमन और अपमान का सामना करना पड़ रहा था. कांग्रेस या अन्य गैर-भाजपा दलों द्वारा शासित राज्य पुलिस को प्रदर्शनकारियों के साथ उस तरह की बर्बरता करने की इजाजत नहीं दे सकते, जो तथाकथित ‘डबल इंजन’ वाले राज्यों में भाजपा शासन की पहचान बन गई है.

इसलिए, ‘हम भारत के लोग’ के लिए 12 अक्टूबर का संदेश बिल्कुल साफ है. 20 जुलाई के संसद मार्च की तरह 12 अक्टूबर के सुप्रीम कोर्ट मार्च ने भी सत्ता को पीछे हटने पर मजबूर किया है, लेकिन फासीवादी मंसूबों को निर्णायक रूप से शिकस्त देने के लिए हमें ऐसे और भी कई प्रहार करने होंगे और इससे भी बड़ी एकता व प्रतिरोध की ताकत दिखानी होगी. लोगों की ताकत में वृद्धि हो, उनके एकजुट और दृढ़ संघर्षों को और भी जीतें हासिल हों!

17 October, 2026