गांधी जयंती के दिन देश ने ऐसा जन-आंदोलन पहले कभी नहीं देखा, जैसा इस साल देखने को मिला. सोशल मीडिया के एक चुटीले मीम में बिल्कुल सही कहा गया कि 2 अक्तूबर वह दिन है जब गांधी के हत्यारों का गुणगान करने वालों को भी मजबूरी में उन्हें नमन करना पड़ता है.
महात्मा गांधी, जिन्होंने सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह की ताकत से पूरी दुनिया को राह दिखाई, वे निहत्थी और आम जनता के शांतिपूर्ण प्रतिरोध के सबसे बड़े प्रतीक थे. उनकी 157वीं जयंती पर यह विरासत पूरे देश में फिर से जिंदा हो उठी, जब नौजवानों ने उनके अहिंसक आंदोलन के रास्ते को पूरे दम-खम के साथ अपना लिया.
जो लोग मान बैठे थे कि गांधी अब अप्रासंगिक हो चुके हैं, उन्हें करारा झटका लगा. कोलकाता में माकपा की एक नुक्कड़ सभा को जब दक्षिणपंथी भीड़ ने हिंसा करके तितर-बितर कर दिया, तब एक अकेली महिला अस्थायी मंच पर गांधी की तस्वीर थामे खड़ी रही. यह तस्वीर बहुत ज्यादा लोगों तक पहुंचनी चाहिए थी. जब वह भीड़ कुर्सियां फेंक रही थी, बैनर-पोस्टर फाड़ रही थी और भद्दी गालियां बक रही थी, तब भी वह महिला चट्टान की तरह अडिग और बेखौफ खड़ी रही.
दिल्ली में किले में तब्दील कर दिए गए जंतर-मंतर के चारों ओर सुरक्षा बलों की डराने-धमकाने वाली घेराबंदी थी. इसके बावजूद सैकड़ों छात्र कार्यकर्ता और नागरिक, बूढ़े-जवान, डटे रहे. उन्हें जिस बर्बरता से हिरासत में लिया गया, उस पर कोई हैरानी नहीं हुई. जंतर-मंतर 1.0 का जुल्म हमें अब भी याद है. बुजुर्ग नागरिक एकजुटता में चुपचाप मार्च करते रहे, जबकि जंतर-मंतर के आसपास युवा नारे लगाते रहे, गिटार बजाते रहे, सवाल उठाते रहे, बैरिकेड गिराते रहे, पुलिस के घेरे से निकल भागते रहे और कैमरे के सामने चुटकुले सुनाते रहे. बसों में बैठाए गए तो खिड़कियों से कूदकर फिर प्रदर्शन में लौट आए. दिल्ली में एक युवती तो एक बस की इग्निशन चाबी ही लेकर भाग गई.
मुंबई के शिवाजी पार्क में सैकड़ों लोगों ने राष्ट्रगान गाया, अपनी मर्जी से, किसी फरमान से नहीं. एक वायरल वीडियो में एक महिला पुलिसकर्मी प्रदर्शनकारी लड़कियों और उनकी माताओं को ‘बेशर्म’ कहकर गालियां देती दिखी. वहीं दूसरे वीडियो में प्रदर्शनकारियों ने घेरा बनाकर ड्यूटी के दौरान बेहोश हुई एक महिला पुलिसकर्मी को पंखा झला.
एक तरफ जहां नौजवान शांतिपूर्ण आंदोलन की गांधीवादी विरासत को बुलंद कर रहे थे, वहीं दूसरी तरफ सरकार ने सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा को कुचलने के लिए अंग्रेजों के जमाने के बर्बर दमन की यादें ताजा कर दीं.
देश भर के नागरिकों की तीन मांगें हैं: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का अविलंब इस्तीफा, एसआइआर को रद्द करना, और गलत तरीके से काटे गए हर मतदाता का वोट देने का अधिकार बहाल करना. लोग समझ चुके हैं कि 2023 के उस कानून को रद्द करना जरूरी है, जिसने सरकार को अपनी मर्जी का चुनाव आयोग चुनने की खुली छूट दे दी, जिसमें विपक्ष का कोई नुमाइंदा तक नहीं होता, और चुनाव आयुक्तों को ताउम्र छूट देकर कानून से ऊपर बैठा दिया.
चुनाव आयोग के भीतर चल रहे मतभेदों को उजागर करने वाली ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की 25 सितंबर की धमाकेदार रिपोर्ट और उसके बाद आयोग की लीपापोती की कोशिशों ने जनता के गुस्से को और भड़का दिया है.
तीन में से दो चुनाव आयुक्तों ने 10 महीनों में 14 आपत्तियां उठाई थीं. इसके बाद 6 अक्तूबर को इंडियन एक्सप्रेस ने एक और पड़ताल छापी. इससे पता चला कि 11 अगस्त को 11 अपीलीय ट्रिब्यूनल के प्रमुखों की बैठक हुई थी, जिसमें अपील जमा करने वाले पोर्टल की कम से कम पांच बड़ी खामियां उठाई गईं. जो पहले शक था, वह अब तथ्य है: भारत के चुनावी लोकतंत्र और सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के संवैधानिक अधिकार के साथ बहुत बड़ा संस्थागत फर्जीवाड़ा किया गया है.
अब जब पूरे देश में 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम काटे जाने का हल्ला मच गया है, तो चुनाव आयोग ने सभी मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को फरमान सुनाया है कि वे एक महीने के भीतर इन ‘छूटे हुए’ मतदाताओं तक पहुंचें! ‘छूटे हुए’ शब्द दरअसल मनमाने और चुन-चुनकर नाम काटने की साजिश पर पर्दा डालने का ढकोसला है. ये एक ऐसी साजिश थी जो चुनाव का पलड़ा भाजपा और उसके सहयोगियों के पक्ष में झुकाने के लिए रची गई थी.
चुनाव आयोग जब 1 अक्तूबर को यह सर्कुलर जारी कर रहा था, ठीक उसी वक्त पटना में भाकपा(माले) के कार्यकर्ता मतदाता सूची से बाहर किए गए मतदाताओं की जन सुनवाई कर रहे थे. पार्टी कार्यकर्ताओं ने जून से सितंबर के बीच 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में पार्टी की लड़ी 20 में से 10 सीटों के 50 चुने हुए बूथों पर घर-घर जाकर जमीनी पड़ताल की थी.
उन्होंने ठीक वही काम किया जो चुनाव आयोग अब बीएलओ से करने को कह रहा है. यानी एसआइआर से पहले की जून 2025 की मतदाता सूची और एसआइआर के बाद की सूची का मिलान करके बाहर किए गए मतदाताओं की पहचान करना. इस सर्वे में यह चौंकाने वाला सच सामने आया कि गलत तरीके से काटे गए नामों की तादाद 17 फीसदी जैसी भारी-भरकम थी.
फाॅर्म 6 और फाॅर्म 7, दोनों को भाजपा और चुनाव आयोग ने हथियार बना लिया है. न सिर्फ बड़े पैमाने पर नाम काटने के लिए, बल्कि चुन-चुनकर नाम जोड़ने के लिए भी. 6 अक्तूबर को रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने खुलासा किया कि एसआइआर के शुरुआती चरण में उत्तर प्रदेश की मतदाता सूची में 16.18 लाख मतदाता जोड़े गए, जिनके न नाम दर्ज थे, न कोई ब्योरा.
अब जब साबित हो गया है कि फाॅर्म 6 में किए गए बदलाव मनमाने, बिना अधिकार और गैरकानूनी थे, क्योंकि फाॅर्म की शर्तें बदलने का अधिकार सिर्फ संसद को है, तो चुनाव आयोग ने बिना कोई सफाई दिए विवादित शर्तें वापस ले ली हैं. आयोग ने यह दावा किया कि सुप्रीम कोर्ट ने इन बदलावों को मंजूरी दी थी, लेकिन भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने इसका साफ खंडन कर दिया. ये बदलाव साफ तौर पर जेन जी मतदाताओं को सूची में शामिल होने से रोकने के लिए किए गए थे.
फाॅर्म 6 पहली बार मतदाता बनने वालों के लिए होता है. जिन मतदाताओं के नाम साजिश के तहत काट दिए गए, उन्हें दोबारा जुड़ने के लिए इसी फाॅर्म को भरने पर मजबूर करना सरासर गैरकानूनी है. पहले दिन से आपत्तियों के बावजूद चुनाव आयोग इस गड़बड़ी पर अड़ा रहा.
इससे भी ज्यादा खतरनाक है योग्य मतदाताओं को बाहर करने के लिए फाॅर्म 7 का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग. पहले से भरे हुए फाॅर्म 7 के बंडलों की बरामदगी साफ इशारा करती है कि मुस्लिम मतदाताओं और भाजपा व उसके सहयोगियों के खिलाफ वोट देने वालों को चुन-चुनकर निशाना बनाने की पूरी साजिश रची गई थी.
नियम यह कहता है कि अगर फाॅर्म 7 के जरिए किसी का नाम काटने की शिकायत आती है, तो नाम हटाने से पहले उस मतदाता को बाकायदा नोटिस मिलना चाहिए और अपनी बात रखने का पूरा मौका दिया जाना चाहिए. लेकिन इस बुनियादी सुरक्षा और नियम को खुलेआम ताक पर रख दिया गया.
निशाना बनाने और प्रताड़ित करने का सबसे चौंकाने वाला पैटर्न पश्चिम बंगाल में देखने को मिला. अपीलीय ट्रिब्यूनल 11 के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे चुके रिटायर्ड जस्टिस इंद्रजीत चटर्जी ने खुलासा किया कि खुद पश्चिम बंगाल के अतिरिक्त मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने उनके ट्रिब्यूनल में 2.54 लाख फाॅर्म 7 की अपीलें दायर की थीं, ताकि न्यायिक अधिकारियों द्वारा सही पाए गए मतदाताओं के नाम भी काटे जा सकें.
इंडियन एक्सप्रेस की पहली रिपोर्ट के मुताबिक चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधु ने यह दर्ज किया था कि न तो उन्हें, न उनके साथी चुनाव आयुक्त विवेक जोशी को और न ही पश्चिम बंगाल के सीईओ को इस बात की कोई भनक थी कि चुनाव आयोग की तरफ से 16 लाख से ज्यादा (ज्यादातर कंप्यूटर से ऑटोमेटेड) अपीलें दायर करने की इजाजत आखिर किसने दी.
भारत के संसदीय लोकतंत्र का पूरा संस्थागत ढांचा, शक्तियों के बंटवारे का सिद्धांत और नियंत्रण-संतुलन की व्यवस्था, जिन पर आजादी के बाद से भारत में लोकतंत्र टिका रहा है, अपनी सबसे कड़ी परीक्षा से गुजर रहे हैं.
सुप्रीम कोर्ट, जिसे चुनाव आयोग की मनमानी पर नकेल कसनी चाहिए थी, उसने इस बड़े पैमाने पर चुनावी फर्जीवाड़े को अंजाम देने के लिए आयोग को लगभग खुली छूट दे दी. अगर ‘एक देश, एक चुनाव’ बिल की जांच कर रही संयुक्त संसदीय समिति और सुप्रीम कोर्ट के बीच 6 अक्तूबर की प्रस्तावित बैठक टली न होती, तो यह संसद और न्यायपालिका के बीच की लक्ष्मण रेखा को मिटाने की एक और साफ मिसाल होती.
जब पूरी व्यवस्था और संस्थाओं में ऊपर से नीचे तक सड़न फैल चुकी है, तो अब लोकतंत्र का बचना लगभग पूरी तरह भारत की जनता की राजनीतिक समझदारी, एकजुटता और चौकसी पर टिका है.
30 सितंबर की इंडिया गठबंधन की बैठक और वामपंथी छात्र कार्यकर्ताओं, जेन जी प्रदर्शनकारियों, प्रगतिशील नागरिकों, वैकल्पिक मीडिया के कार्यकर्ताओं और गैर-एनडीए विपक्षी दलों की बढ़ती दावेदारी लोकतंत्र को फिर से पटरी पर लाने की उम्मीद जगाती है. क्या हम फासीवादी शिकंजे को तोड़ पाएंगे? इसका जवाब अखबार के पन्नों में नहीं, सड़कों पर लिखा जा रहा है. पन्ने नहीं, सड़कें देखिए.
(नेशनल हेराल्ड, 10 अक्टूबर 2026 में प्रकाशित)