-- मनमोहन
दिल्ली की सड़कों से
अक्तूबर 2026 की बगावती फिजा में दिल्ली में उठ रहा आंदोलन मोदी सरकार और उसके गिरोह की वोट-चोरी, संविधान-विरोधी और अवैध कारगुजारियों तथा जनता के भरोसे के साथ किए गए धोखे के खिलाफ फूटे आक्रोश की अभिव्यक्ति है. यह आक्रोश अब ‘दूसरी आजादी की लड़ाई’ का रूप लेता जा रहा है.
तानाशाही निजाम ने दमन का पूरा तामझाम उतार दिया है. सड़कों पर लोहे की बैरिकेडिंग की गई. खबरों के मुताबिक, करीब 70,000 पुलिस और अर्धसैनिक जवान तैनात किए गए. जंतर-मंतर को प्रदर्शन की जगह मानने से इनकार कर दिया गया. निषेधाज्ञा लगाई गई, मेट्रो स्टेशनों के प्रवेश और निकास बंद किए गए और प्रदर्शन-स्थल के आसपास मोबाइल इंटरनेट ठप कर दिया गया. तिरंगा थामे नौजवानों पर हिंदुत्ववादी गुंडा गिरोहों ने पुलिस की सरपरस्ती में हमले किए. प्रदर्शनकारियों को रोका गया, पीटा गया और पत्रकारों तक को उनके साथ बसों में घसीटा गया. बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां हुईं.
लेकिन दमन का असर उलटा हुआ. आक्रोश और गहरा हुआ, और लोग बड़ी तादाद में सड़कों पर उतरने लगे. 23 अक्तूबर को दिल्ली समेत कई शहरों में नागरिक समाज के आह्वान पर मार्च निकाले गए और पुलिस-प्रशासन की पाबंदियां धरी रह गईं.
यह कहानी सिर्फ भारत की नहीं है.
यूरोप से एशिया और अफ्रीका तक: 70 से अधिक देशों में सुलगता प्रतिरोध
इसी अक्तूबर में दिल्ली से हजारों किलोमीटर दूर फ्रांस की सड़कों पर भी लाखों स्कूली बच्चे उतर आए. सितंबर के मध्य से शुरू हुई इस लहर के दौरान फ्रांस के 3,700 हाई स्कूलों में से 891 में पढ़ाई ठप रही. 6 अक्तूबर को गृह मंत्रालय के मुताबिक, करीब 2.56 लाख लोग मार्च में शामिल हुए, जबकि छात्र संगठनों ने यह संख्या साढ़े चार लाख बताई. सड़कों पर उतरे वामपंथी धड़ों और ‘येलो वेस्ट’ आंदोलन से जुड़े लोगों को भी शामिल किया जाए, तो इस जनसैलाब का आकार पांच लाख से अधिक पहुंचता दिखा. स्कूली बच्चों के इस प्रतिरोध को अभिभावकों, विश्वविद्यालय के छात्रों, मजदूरों और ट्रेड यूनियनों का समर्थन मिला. फ्रांसीसी राज्य ने आंदोलन को कुचलने की कोशिश की, लेकिन बेरहम दमन के बावजूद जेन जी की यह बगावत देशव्यापी प्रतिरोध का रूप लेती जा रही है.
फ्रांस अकेला नहीं है. इटली में सरकारी कटौतियों और युद्ध के खिलाफ बड़ी रैलियां हुईं. पुर्तगाल में महंगाई और आवास संकट के खिलाफ हजारों लोग लिस्बन की सड़कों पर उतरे. स्पेन में आवास संकट ने सरकार पर दबाव बढ़ाया. बेल्जियम के लीज शहर में पुलिस ने जमावड़ों पर पाबंदियां लगाईं, तो अल्बानिया में छात्रों के प्रदर्शन कई दिनों तक जारी रहे.
इससे पहले, 2024 में बांग्लादेश और केन्या के नौजवान सड़कों पर उतरे थे. 2025 में नेपाल और मेडागास्कर में नौजवानों के आंदोलनों ने सरकारों को सत्ता से बाहर कर दिया. 2024 से 2026 के बीच सर्बिया, स्लोवाकिया, इंडोनेशिया, माली, मेक्सिको, नेपाल, बांग्लादेश और केन्या समेत 70 से अधिक देशों में उठी प्रतिरोध की लहर एक बड़ी सच्चाई की ओर इशारा करती है: नवउदारवादी माॅडल अपनी ऐतिहासिक और नैतिक सीमाओं तक पहुंच चुका है. अब इस व्यवस्था के विकल्प की तलाश तेज हो रही है.
इस संघर्ष की अगली कतार में स्कूल-काॅलेजों के छात्र, जेन जी और जेन अल्फा के नौजवान हैं. वे सार्वजनिक शिक्षा की तबाही, सामाजिक सुरक्षा के बिखराव, लोकतांत्रिक अधिकारों के हनन और बजट कटौतियों की क्रूर राजनीति के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं. उनकी बगावत अब एक देश की सीमाओं में कैद नहीं है.
बिहार से फ्रांस तक: शिक्षा की तबाही
दुनिया भर में उठती इन आवाजों को अलग-अलग देशों के विरोध-प्रदर्शनों की तरह नहीं देखा जा सकता. सबसे दिलचस्प बात है उनकी शिकायतों में मौजूद समानता.
यूरोप से कुछ महीने पहले भारत में भी छात्र, जेन जी और जेन अल्फा के बच्चे सड़कों पर उतर आए थे. ‘जंतर-मंतर-1’ के बाद ‘काॅकरोच जनता पार्टी’ ने ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान शुरू किया था. इससे पहले बिहार में स्कूली शिक्षा की बदहाली के खिलाफ भाकपा(माले) की पहल पर ‘सड़क पर स्कूल’ आंदोलन चलता रहा है.
फ्रांस और दूसरे यूरोपीय देशों के छात्र जिन स्कूलों की शिकायत कर रहे हैं, उनकी हालत बिहार में हमारे अभियान के दौरान देखे गए जर्जर स्कूलों से बेहतर हो सकती है. फिर भी, उनकी शिकायतें हमसे हैरतअंगेज ढंग से मिलती-जुलती हैं. शिक्षकों की कमी है, बुनियादी ढांचा टूट रहा है और इसके पीछे सरकारी बजट में कटौतियों की राजनीति है.
अलग-अलग देशों में इन आंदोलनों के कुछ खास पहलू भी हैं. यूरोप में स्कूलों की बदहाली के साथ-साथ अमेरिका-इजरायली धुरी द्वारा ईरान पर थोपी गई जंग से बढ़ती महंगाई और आवास संकट के खिलाफ भी गुस्सा सामने आ रहा है. अल्बानिया के शासक देश के संसाधनों और जमीन को अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर के हाथों सौंपने की तैयारी में हैं. वहीं यूरोप के कई देशों में आम लोगों की जिंदगी इसलिए बदतर हो रही है क्योंकि सरकारें सामाजिक जरूरतों पर खर्च करने के बजाय युद्धों और सैन्य तैयारियों पर अरबों डाॅलर बहा रही हैं.
ला तोताल: दो संप्रभुताओं की टक्कर
फ्रांसीसी विचारक फ्रेडरिक लाॅर्दों जैसे लोग इस उभार को ‘ला तोताल-, यानी ‘सब कुछ एक साथ’, के रूप में समझते हैं. उनका तर्क है कि फ्रांस आज दो संप्रभुताओं के टकराव के बीच खड़ा है. एक तरफ वित्तीय बाजारों की संप्रभुता है, जो चाहती है कि हर सरकारी नीति उसकी मर्जी से तय हो. दूसरी तरफ जनता की संप्रभुता है, जो अपनी जिंदगी और अपने भविष्य के फैसलों पर अपना अधिकार चाहती है. ‘फाइनेंशियल टाइम्स’ ने इसी संकट को ‘बाॅन्ड बाजार और बैरिकेड के बीच फंसा फ्रांस’ कहा था.
मार्क्स और एंगेल्स ने ‘कम्युनिस्ट घोषणापत्र’ में लिखा था कि आधुनिक राज्य पूरे पूंजीपति वर्ग के साझा हितों का प्रबंधन करने वाली समिति है. आज का फ्रांस इस बात की एक खुली मिसाल है.
नुस्खा बार-बार दोहराया जाता है. पहले अमीरों और बड़ी पूंजी को टैक्स में छूट दो. फिर घाटा बढ़ने पर उसी घाटे और ‘बाजार के डर’ का हवाला देकर पेंशन, आवास भत्तों, स्कूलों और अस्पतालों में कटौती थोप दो. जनता विरोध में सड़कों पर उतरे, तो उसे ऐसे दुश्मन की तरह कुचलो मानो उसे सवाल पूछने का भी हक न हो.
नतीजा यह है कि राज्य मानो दो मंत्रालयों में सिमटकर रह गया है: बजट मंत्रालय, जो बाजार के दोस्तों की सेवा करता है, और गृह मंत्रालय, जो जनता को दुश्मन मानकर उससे निपटता है. इसीलिए फ्रांस के स्कूली छात्रों को आज उस पुलिस का सामना करना पड़ रहा है जो उन पर बेरहमी से टूट पड़ती है.
लाॅर्दों की चेतावनी यह भी है कि असली वित्तीय तूफान अभी आया नहीं है. निजी कर्ज और एआई से जुड़े सट्टे के बुलबुले फूटेंगे, तो बैंकों को फिर जनता के पैसे से बचाया जाएगा. इसलिए यह लड़ाई सिर्फ स्कूलों के बजट की नहीं, बल्कि पूरे आर्थिक और राजनीतिक ढांचे की है. अब निगाहें मजदूर वर्ग की भूमिका पर टिकी हैं.
1968 में फ्रांस के करीब एक करोड़ मजदूर हड़ताल पर चले गए थे. कुछ मजदूरों ने कारखानों पर कब्जा कर लिया था. उस दौर की एक मशहूर पुकार थी: हमें रोटी का टुकड़ा नहीं, पूरी बेकरी चाहिए. आज आंदोलन की अगुवाई स्कूली बच्चे कर रहे हैं, लेकिन ट्रेड यूनियनों की आम हड़ताल अभी बाकी है. वह जब होगी, तभी पता चलेगा कि यह आंदोलन व्यवस्था को चुनौती देने में कितनी दूर तक जा सकता है.
संकट, दक्षिणपंथ और फासीवाद का खतरा
जब पूंजीवाद गहरे संकट में होता है और जनता के पास अपनी मजबूत, संगठित राजनीतिक ताकत नहीं होती, तब शासक वर्ग घोर दक्षिणपंथ को सामान्य बनाने लगता है. फ्रांस में मरीन ले पेन के अगले राष्ट्रपति चुनाव में आगे आने की चर्चा आम हो चुकी है. जर्मनी में एएफडी जैसी दक्षिणपंथी ताकतों को मुख्यधारा के अखबारों में लगातार जगह मिल रही है.
कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के महासचिव रहे जाॅर्जी दिमित्रोव ने फासीवाद को वित्तीय पूंजी के सबसे प्रतिक्रियावादी, सबसे अंधराष्ट्रवादी हिस्सों की खुली आतंकवादी तानाशाही बताया था. जब वित्तीय पूंजी अपने ही बनाए संकट में फंसती है, तो बीच का रास्ता भी अक्सर वामपंथ के बजाय दक्षिणपंथ के लिए रास्ता साफ कर देता है.
नवउदारवाद सिर्फ एक आर्थिक नीति नहीं, बल्कि एक क्रूर आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक व्यवस्था है. इसने चौंका देने वाली असमानता पैदा की है, सार्वजनिक संस्थाओं को कमजोर किया है और दौलत तथा सत्ता को मुट्टी भर अभिजात्य वर्ग के हाथों में समेट दिया है. इसने ऐसी जमीन तैयार की है जहां तानाशाही और फासीवादी राजनीति फलती-फूलती है.
दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में अलग रूपों में दिखाई देने वाली इन सत्ताओं की बुनियाद में चालीस साल की नवउदारवादी लूट है. अब इस व्यवस्था को नफरत, नस्लवाद और जनसंहार की राजनीति के सहारे जिंदा रखने की कोशिश हो रही है.
भारत में इसका ठोस रूप पिछले एक दशक का फासीवादी निजाम और चहेते पूंजीपतियों का गठजोड़ है. इस गठजोड़ ने लोकतांत्रिक संस्थाओं, शिक्षा-व्यवस्था और चुनावी प्रक्रिया को गंभीर रूप से कमजोर किया है. कंपनियां इतनी विशाल हो चुकी हैं कि वे धीरे-धीरे खुद राज्य की तरह काम करने लगी हैं. अमेरिकी विदेश मंत्री मार्काे रुबियो के भारत दौरे के दौरान अंबानी के साथ कारोबारी समझौतों को लेकर हुई चर्चाओं ने भी काॅरपोरेट ताकत और सरकारी सत्ता के रिश्ते पर सवाल खड़े किए.
भारत को कभी ईस्ट इंडिया कंपनी ने उपनिवेश बनाया था. आज वैसा ही दौर नए रूप में लौटता दिखाई देता है, जहां निजी पूंजी सार्वजनिक जीवन और राष्ट्रीय नीतियों पर अपना शिकंजा कस रही है.
इस निजाम में पुलिस कानून की रक्षक कम और सत्ता की बेलगाम ताकत ज्यादा बनती जा रही है. निहत्थे आंदोलनकारियों को पीटना, उनकी आंखें फोड़ना, हाथ-पैर तोड़ना और नौजवान लड़कियों के साथ हिंसा करना दमन की उसी संस्कृति को दिखाता है. पोस्टर और तख्तियां जांचकर यह तय करने की कोशिश भी होती है कि कौन-सा नारा लगाया जा सकता है और कौन-सा नहीं.
विडंबना यह है कि जिन संस्थाओं पर कानून की हिफाजत की जिम्मेदारी है, उन्हीं के भीतर कई बार कानून से ऊपर होने का अहंकार दिखाई देता है. कुछ जगहों पर पुलिस थाने और गृह मंत्रालय जनता के अधिकारों की रक्षा करने के बजाय सत्ता के दमनकारी औजार बनते नजर आते हैं.
सबकी लड़ाई एक
यह ऐसी दुनिया है जिसमें अलग-अलग संघर्षों को एक-दूसरे से काटकर नहीं देखा जा सकता. जो लोग शाहीन बाग पर इसलिए चुप रहे कि वह मुसलमानों की लड़ाई थी, जो रोहित वेमुला और पायल तड़वी की मौतों पर यह कहकर खामोश रहे कि यह दलितों और आदिवासियों का मामला है, जो किसानों की लड़ाई को दूर से देखते रहे या नोटबंदी पर तालियां बजाते रहे, उन्हें अब समझना होगा कि अन्याय की आग किसी एक आंगन तक सीमित नहीं रहती.
आज यह लड़ाई हमारे अपने आंगन और हमारे बच्चों तक पहुंच गई है. इसकी एक वजह यह भी है कि जब पहलू खान की लिंचिंग हुई, जब किसी मुसलमान का घर बुलडोजर से गिराया गया और जब मस्जिदें ढहाई गईं, तब हममें से बहुतों ने उस अन्याय को रोकने के लिए पर्याप्त एकजुटता नहीं दिखाई.
जंतर-मंतर पर गूंजा नारा, ‘जब हिंदू-मुस्लिम राजी, तो क्या करेगा नाजी!’, इसी ऐतिहासिक सबक की अभिव्यक्ति है. यह जाति और धर्म की दीवारों से ऊपर उठती साझा जनवादी एकजुटता का नारा है. और नफरत की राजनीति का सबसे सटीक जवाब भी.
अन्याय का विरोध तभी निर्णायक ताकत बनता है जब हम उसे केवल अपने समुदाय, अपनी जाति या अपने वर्ग तक सीमित नहीं रखते. किसी एक के अधिकारों पर हमला, अंततः सबके अधिकारों को कमजोर करता है. और किसी एक की आजादी की रक्षा, सबकी आजादी की लड़ाई को मजबूत करती है.
‘जुझारू मोहब्बत और एकजुटता’
मार्क्स और एंगेल्स ने ऐतिहासिक नारा दिया था: ‘दुनिया के मजदूरों, एक हो! तुम्हारे पास खोने के लिए अपनी जंजीरों के सिवा कुछ नहीं है’ आज यह पुकार नए जोश और नए रूप में लौट रही है: दुनिया के नौजवानों, एक हो और लड़ो.
आज के नौजवानों के पास हिम्मत है, कल्पना है, गुस्सा है और इतनी बड़ी तादाद है कि वे इतिहास की धारा बदल सकते हैं. वे ऐसे समाज में बड़े हुए हैं जिसे बेरुखी, अकेलेपन, हताशा और नफरत ने जकड़ रखा है. फिर भी इस उजाड़ के बीच क्रांतिकारी उम्मीद बाकी है: इंसाफ की चाहत के साथ एकजुटता को फिर से हासिल करना और मोहब्बत को सार्वजनिक तथा सामूहिक ताकत में बदलना.
यह जुझारू मोहब्बत इस समझ से शुरू होती है कि हमारी जिंदगियां एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हैं. आजादी का मतलब अकेले निकल भागना नहीं है. जब तक दूसरे लोगों को असुरक्षित और बेकदर बनाया जाता रहेगा, हममें से कोई भी सचमुच सुरक्षित नहीं रह सकता.
ऐसी मोहब्बत उन रिश्तों को जन्म देती है जो अकेलेपन को तोड़ सकें, निजी दुख को सार्वजनिक जिम्मेदारी से जोड़ें और हमदर्दी को संगठित प्रतिरोध में बदल दें. जेम्स बाल्डविन और मैल्कम एक्स ने अपने-अपने ढंग से समझाया था कि इंसान को सचमुच जीना सीखने के लिए मोहब्बत करना सीखना होगा. लेकिन यह मोहब्बत महज भावना या निजी जिंदगी तक सीमित नहीं है. यह नफरत, नस्लभेद और इंसानी गरिमा को कुचलने वाली पूरी व्यवस्था के खिलाफ एक सशक्त इनकार है.
जुझारू मोहब्बत इंसाफ का साथ देती है. वह एकजुटता, साझा संघर्ष और अपने तात्कालिक दायरे से बाहर की जिंदगियों की जिम्मेदारी उठाने के साहस में प्रकट होती है. वह अकेलेपन को जुड़ाव में, हताशा को सामूहिक हिम्मत में और गुस्से को संगठित संघर्ष में बदलती है. वह ऐसी दुनिया के लिए लड़ती है जिसमें किसी भी इंसान को बेकार या फालतू न समझा जाए.
तबाही अब दूर क्षितिज पर दिखाई देने वाला खतरा नहीं है. वह नौजवानों के दरवाजे पर आ खड़ी हुई है. इसलिए जरूरत ऐसे व्यापक प्रतिरोध आंदोलन की है जिसे न झूठा प्रचार खामोश कर सके, न दमन और न ही सत्ता का डर. सरकारों और उनके सैन्य-औद्योगिक-अकादमिक गठजोड़ द्वारा चलाई जा रही मौत की मशीनरी को रोकना आज की सबसे बड़ी जरूरतों में से एक है.
लेकिन एकजुटता तभी क्रांतिकारी ताकत बनती है जब नैतिक यकीन संगठित संघर्ष का रूप ले. भारत में छात्रों के नेतृत्व में हुए प्रदर्शनों ने दिखाया है कि संस्कृति एक ओर शिक्षा का हथियार हो सकती है, तो दूसरी ओर सामूहिक प्रतिरोध का माध्यम भी.
मोदी सरकार के भ्रष्ट और लगातार अधिक तानाशाह होते निजाम के सामने छात्रों, बेरोजगार नौजवानों और उनके साथियों ने मीम्स, तंज और इंस्टाग्राम रील्स के जरिए भ्रष्टाचार को बेनकाब किया, सत्ता के झूठे तिलिस्म को तोड़ा और जनांदोलन खड़ा किया. आंसू गैस, पुलिसिया दमन और गिरफ्तारियों के बावजूद उन्होंने सड़कें नहीं छोड़ीं.
उनके प्रतिरोध ने दिखाया कि सत्ता सिर्फ पुलिस, जेल और लाठियों के दम पर नहीं टिकती. वह छवियों, कहानियों और एक बनावटी ‘आम समझ’ के सहारे भी चलती है, जो लोगों को सिखाती है कि किससे डरना है, क्या सच मानना है और किसकी बात माननी है. जब प्रदर्शनकारी संस्कृति को सत्ता के खिलाफ मोड़ते हैं, तो वे उसी जमीन पर लड़ते हैं जहां पहचानें गढ़ी जाती हैं, गुस्से को जुबान मिलती है और निजी दुख सार्वजनिक आक्रोश तथा सामूहिक कार्रवाई में बदलता है.
यह नीचे से राजनीति की नई बुनावट थी. इसने प्रभुत्व कायम करने वाली सांस्कृतिक तकनीकों को अपने हाथ में लेकर उन्हीं को उन सत्ता-तंत्रों के खिलाफ मोड़ा जो सेंसरशिप, चुप्पी और बेदखली पैदा करते हैं. इसने दिखाया कि संस्कृति भी उन निर्णायक मोर्चों में से एक है जहां सत्ता को चुनौती दी जाती है, एकजुटता गढ़ी जाती है और सामूहिक ताकत जन्म लेती है.
लेकिन यह भी याद रखना होगा कि जोश से बगावतें शुरू होती हैं, संगठन से जीती जाती हैं. गुस्से को टिकाऊ ताकत बनाने के लिए विचार, संगठन, साझा कार्यक्रम और लंबे संघर्ष की तैयारी जरूरी है.