वर्ष 35 / अंक - 43 / भारत में फासीवाद कैसे काम करता है

भारत में फासीवाद कैसे काम करता है

भारत में फासीवाद कैसे काम करता है

-- जेसन स्अेनली

( नरेंद्र मोदी के हिंदू राष्ट्रवादी राज में भारत जिस फासीवादी रास्ते पर चला है, उसकी तुलना दुनिया भर के फासीवादी तरीकों और इतिहास से की जा सकती है, चाहे वह नाजी जर्मनी हो या ट्रंप का अमेरिका )

फासीवाद पर मेरे काम में भारत की जगह बहुत अहम रही है. फासीवाद पर मेरी दोनों किताबों, ‘हाउ फासिज्म वर्क्स’ और ‘इरेजिंग हिस्ट्री’, में भारत मुख्य मिसाल के तौर पर आया है.

भारत का ताना-बाना थोड़ा अलग है. कोई भी दो फासीवादी हालात एक जैसे नहीं होते. भारत में सदियों पुरानी जाति-व्यवस्था मौजूद है. पश्चिमी समाजों में फासीवाद नस्ल की बुनियाद पर खड़ा होता है. जाति और नस्ल के रिश्ते पर बीसवीं और इक्कीसवीं सदी में काफी कुछ लिखा जा चुका है. लेकिन ‘बलि का बकरा’ बनाने की जो पुरानी आजमाई हुई चाल होती है, भारत में वही चली गई है. यहां मुसलमान अल्पसंख्यकों को निशाना बनाकर अलग-अलग जातियों को एक झंडे के नीचे जोड़ा जा रहा है. और इसके पीछे एक ऐसा अभियान दिखता है जो नस्ली सफाए की तरफ जा रहा है, या कम से कम उसकी धमकी तो दे ही रहा है. विचारक रेने जिरार्ड का कहना था कि जब अलग-अलग तबकों को एक करना हो, तो किसी बेगुनाह को ‘बलि का बकरा’ बनाया जाता है ताकि सब मिलकर उस पर हमला बोलें और आपस में जुड़ जाएं. इसलिए यह यूरोप के फासीवाद से थोड़ी अलग बनावट है.

दूसरे गैर-पश्चिमी देशों के बारे में भी हमें सोचना होगा कि वहां फासीवाद कैसा दिखेगा. मिसाल के लिए केन्या में 40 से ज्यादा कबीले हैं. वहां ऐसा कोई पुराना ढांचा ही नहीं है जिस पर फासीवाद जैसी चीज टिक सके. हम यह सवाल उठा सकते हैं कि क्या ईदी अमीन जैसा तानाशाह फासीवादी था. लेकिन युगांडा का ढांचा और उसकी बुनियाद इतनी अलग है कि वहां फासीवाद जैसी यूरोपीय धारणा लागू करना शायद बहुत उलझा हुआ मामला होगा.

तो जब इतने फर्क हैं, जाति है, धर्म है, मुस्लिम अल्पसंख्यक हैं, तब भारत मेरे काम में इतना अहम क्यों है? इसलिए कि हिंदू फासीवाद के सिद्धांतकारों, वी. डी. सावरकर और एम. एस. गोलवलकर, ने खुलकर नाजियों के यहूदियों के साथ बर्ताव को भारत के मुसलमानों को निशाना बनाने का आधार माना. और हिंदुत्व की जो फासीवादी धारा है, उसके तौर-तरीके हूबहू फासीवाद के उन उसूलों और रणनीतियों से मिलते हैं जो मैंने ‘हाउ फासिज्म वर्क्स’ में गिनाई हैं.

उस किताब का पहला अध्याय है ‘मिथकीय अतीत’. इसमें एक काल्पनिक सुनहले अतीत को गढ़ा जाता है जिसमें सब कुछ ‘पाक और साफ’ था. हिंदुत्व का दावा है कि भारत का अतीत पाकीजगी से भरा था, फिर बाहरी हमले हुए और सब ‘नापाक’ हो गया. यह मिथकीय अतीत की सीधी मिसाल है. और पाकीजगी की इस जबान में प्रवासियों की तुलना दीमक, कीड़े-मकोड़ों और बीमारी से की जाती है. आज के भारत की राजनीति में यह बात हम सब रोज सुनते हैं.

मिथकीय अतीत का रिश्ता फासीवाद के एक और पैंतरे से जुड़ता है, जिसे मैं ‘यौन चिंता’ यानी औरतों को लेकर पैदा किया गया डर कहता हूं. इसकी सबसे बड़ी मिसालों में से एक भारत का ‘लव जिहाद’ वाला प्रचार है. चारु गुप्ता नाजीवाद और हिंदुत्व, दोनों की जानकार हैं, इसलिए वे इन समानताओं को साफ देख पाती हैं. उन्होंने नाजी जर्मनी के राष्ट्रीय समाजवाद और आज के भारत के बीच की इन समानताओं को बहुत गहराई से दिखाया है.

अब सोचिए कि ‘लव जिहाद’ का असल खेल क्या है? अगर आपके पास ‘पाक’ और पाकीजगी से भरे काल्पनिक अतीत की कहानी है, तो आप जनता के बीच यह खौफ पैदा कर सकते हैं कि अल्पसंख्यक कौम न सिर्फ देश में घुसकर उस पाकीजगी को खराब कर रही है, बल्कि हमारी औरतों, हमारी ‘पाक’ औरतों के लिए भी खतरा बन गई है. यह फासीवाद का आजमाया हुआ पुराना नुस्खा है.

भारतीय मुसलमानों का राजनीतिक सफाया

नाजियों की ‘पीठ में छुरा’ वाली झूठी कहानी के मुताबिक यहूदी सेनेगल के काले सैनिकों को लाकर आर्य नस्ल की जर्मन औरतों के साथ बलात्कार करवा रहे थे, या उनसे संबंध बनवा रहे थे ताकि जर्मनी में गैर-गोरे बच्चे पैदा हों. यानी अपनी औरतों को लेकर डर पैदा करना फासीवाद का अहम हथकंडा है. जैसा कि पत्रकार आइडा बी. वेल्स ने 1892 में बताया था, यह दबदबा रखने वाले समूह की औरतों पर हमला भी है.

‘लव जिहाद’ भी सीधा-सीधा ऐसा ही हमला है. यह अमेरिका में काले मर्दों की माॅब-लिंचिंग के पीछे की विचारधारा और प्रचार से भी ज्यादा सीधा और क्रूर है. क्यों? क्योंकि यह मानकर चलता है कि कोई हिंदू औरत किसी मुसलमान मर्द से प्यार कर सकती है. लेकिन फिर ‘लव जिहाद’ की सोच कहती है, ‘अरे नहीं, वे तो बहकाई गई हैं.’ उनकी अपनी कोई मर्जी नहीं होती. वे हिंदू मर्दों की जायदाद हैं. और जब वे मुसलमानों से शादी करती हैं, तो इसका मतलब है कि उन्हें फंसाया गया है, क्योंकि वे अपने फैसले खुद नहीं ले सकतीं. यह हिंदू आबादी के 50 फीसदी हिस्से को निशाना बनाता है और कहता है कि औरतें मर्दों की संपत्ति हैं. वे मुसलमानों से शादी नहीं कर सकतीं.

जब भी वे किसी मुसलमान से शादी करती हैं, तो यही माना जाता है कि यह उनकी मर्जी से नहीं हुआ और उन्हें ‘बचाना’ जरूरी है. यह लिंचिंग के पीछे की सोच से भी ज्यादा क्रूर है. वहां सोच यह थी कि काले मर्द गोरी औरतों से बलात्कार करते हैं. यहां कहा जा रहा है कि हिंदू औरत अपनी मर्जी से किसी मुसलमान मर्द से शादी करे, तब भी वह इंसान नहीं, एक बेजान चीज है, जिस पर हिंदू मर्दों का अधिकार है.

यह सोच कि प्रवासी एक तरह की गंदगी हैं, पाकीजगी पर खतरा हैं, ये सब फासीवाद की पक्की निशानियां हैं. इसलिए यह लड़ाई पूरी दुनिया की है. ट्रंप, मोदी, नेतन्याहू, पुतिन, ओरबान, ये सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं और एक जैसे हथकंडे इस्तेमाल कर रहे हैं. लेकिन भारत में यह मामला और भी खुला और साफ है.

भारत में हिटलर को इतिहास का सबसे बुरा आदमी नहीं माना जाता. भारत की आम समझ में हिटलर एक विजेता है. यानी यहां फासीवाद की वह बदनामी नहीं है जो पश्चिम में है. और यही बात हालात को और ज्यादा चिंताजनक बनाती है.

मुसलमानों और गैर-हिंदुओं पर हमलों को हम साफ तौर पर अलग-अलग हिंदू जातियों को एक मंच पर लाने के लिए ‘बलि का बकरा’ बनाने की चाल के रूप में देख सकते हैं. यह सीधे-सीधे फासीवाद की किताबों से निकाला गया फाॅर्मूला है.

भारत में हम फासीवाद की एक और चाल भी देख सकते हैं, जिसे मैं बौद्धिकता-विरोध कहता हूं. यूनिवर्सिटियों पर हमले, उन्हें देशविरोधी और देशद्रोही बताना, छात्रों के आंदोलनों को देशविरोधी और राजद्रोह कहना. इसका मकसद यह है कि आलोचनात्मक सोच-विचार को देश पर हमला बताकर पेश किया जाए.

क्योंकि असल में भारत का इतिहास कहीं ज्यादा जटिल है. यह किसी पाक-साफ हिंदू अतीत का इतिहास नहीं है. और हिंदू धर्म खुद एक जटिल धर्म है, जो आर्य श्रेष्ठता की धारणा में आसानी से फिट नहीं बैठता.

तो यह बौद्धिकता-विरोध कैसे काम करता है? मैं अपने काम और अपनी सक्रियता में दूसरे लोकतांत्रिक रूप से पीछे जाते देशों और दूसरी हुकूमतों से समानताएं निकालता हूं और कहता हूं कि देखिए, कितनी समानताएं हैं. और इन तरीकों में भारत एक तरह से अगुआ है.

अमेरिका में हंगरी के तानाशाह विक्टर ओरबान के तौर-तरीकों की साफ नकल की जा रही है. मसलन, ओरबान ने सेंट्रल यूरोपियन यूनिवर्सिटी को निशाना बनाया और देश के नियमों का ऐसा फंदा कसा कि छात्रों की डिग्रियों को मान्यता मिलना बंद हो गया. आखिरकार उस यूनिवर्सिटी को वियना जाना पड़ा. अमेरिका में भी अब ठीक यही हो रहा है: कोलंबिया यूनिवर्सिटी को घेरा जा रहा है, और अब हार्वर्ड के पीछे पड़े हैं. ओरबान अब अमेरिका में खुले तौर पर हीरो की तरह देखे जा रहे हैं और ट्रंप प्रशासन और ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ आंदोलन को राह दिखा रहे हैं. और भारत में मोदी भी कुछ ऐसा ही कर रहे हैं.

इसमें कोई शक नहीं कि 2019 में नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के खिलाफ हुए आंदोलनों के साथ भारत में जो हुआ, उसे ट्रंप प्रशासन लगभग हर कदम पर दोहरा रहा है. जिसने भी 2019 का भारत देखा है, जिसने देखा कि जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के साथ क्या किया गया, पुलिस कैंपस में घुसी, प्रदर्शनकारियों के पीछे पड़ी, मीडिया ने उन्हें कैसे पेश किया, वह इन समानताओं को पहचान लेगा.

हम देखते हैं कि ‘न्यूयाॅर्क टाइम्स’ अमेरिकी यूनिवर्सिटियों पर बार-बार ‘देशद्रोही’ होने का ठप्पा लगाता है, सिर्फ इसलिए कि वहां इसराइल के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं. भले ही उन प्रदर्शनों में यहूदी छात्र खुद बढ़-चढ़कर शामिल हों. अमेरिका का मीडिया, जैसे ‘न्यूयाॅर्क टाइम्स’ का संपादकीय पन्ना, पिछले दस साल से यूनिवर्सिटियों पर लगातार हमले बोल रहा है, यह कहकर कि वे देशभक्त नहीं हैं, क्योंकि वे काले लोगों के इतिहास को केंद्र में रखती हैं और वैज्ञानिक नस्लवाद की आलोचना करती हैं. भारत के मीडिया में भी आपको ठीक यही दिखेगा. 2019 में मीडिया ने यूनिवर्सिटियों को ‘देशद्रोही’ साबित करने के लिए पूरा जोर लगा दिया था.

लेकिन भारत में उस वक्त कुछ ऐसे मीडिया घराने थे जिनके बारे में यकीन करने की पूरी वजह है कि उन पर सरकार का भारी दबाव था और यह नफरती कवरेज एक सोचे-समझे अभियान का हिस्सा थी. जबकि अमेरिका में मीडिया बिना किसी सरकारी दखल के पिछले दस साल से खुद अपनी मर्जी से यूनिवर्सिटियों पर हमले का रास्ता तैयार कर रहा था.

अब जरा 2019 और नागरिकता संशोधन कानून पर लौटते हैं. भारत का मीडिया यूनिवर्सिटियों पर हमला कर रहा था. जो छात्र ऐसे कानूनों के खिलाफ लड़ रहे थे जो हिंदुओं और मुसलमानों के बीच भेदभाव करके नागरिकता के अलग-अलग दर्जे बनाते हैं, और यही फासीवाद की पहचान है, उन्हें बदनाम किया जा रहा था. और तानाशाही के खिलाफ छात्र ही प्रतिरोध की आवाज बने हुए थे. प्रोफेसरों को निशाना बनाया गया, जैसे 2021 में प्रताप भानु मेहता को अशोका यूनिवर्सिटी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. मेहता उग्र विचारों वाले नहीं हैं, वे एक उदारवादी राजनीतिक विचारक हैं.

इस तरह नामी विद्वानों को निशाना बनाया जाता है. कोलंबिया यूनिवर्सिटी ने कैथरीन फ्रैंके के साथ यही किया. ‘डेमोक्रेसी नाउ!’ कार्यक्रम पर उनकी कही बातों के लिए उन्हें रिटायरमेंट के लिए मजबूर कर दिया गया. कहा गया कि इससे कोलंबिया के यहूदी छात्र असुरक्षित महसूस करने लगे. और वे, मेहता की तरह, ऐसी प्रोफेसर हैं जिन्हें नौकरी देकर किसी भी यूनिवर्सिटी को गर्व होना चाहिए.

बेशक मेहता को प्रिंसटन यूनिवर्सिटी ने तुरंत विशिष्ट विजिटिंग प्रोफेसर बना लिया. फिर भी आप जानते हैं कि वे अब किसी भारतीय यूनिवर्सिटी में वापस नहीं जा सकते. नामी बुद्धिजीवियों को निशाना बनाना, इतिहास और नजरियों को बदलना, यह अब अमेरिका में भी दिख रहा है. पिछली सदी के, कम से कम पिछले 50 साल के, सबसे बड़े लेखकों में से एक, नोबेल विजेता टोनी माॅरिसन की किताबें प्रतिबंधित की जा रही हैं. उनके अमेरिकी होने पर और ऐसी महान विचारक और लेखक होने पर गर्व करने की जगह ऐसा इसलिए हो रहा है कि उनकी किताबें अमेरिका को ऐसे नजरिये से दिखाती हैं जो गोरे बहुसंख्यकों का गुणगान नहीं करता.

यही इतिहास बदलने की हेरा-फेरी भारत की स्कूली किताबों में भी चल रही है. भारत के धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र पर चोट की जा रही है. इतिहास को धीरे-धीरे इस तरह बदला जा रहा है कि महात्मा गांधी को ‘गद्दार’ साबित किया जा सके. अपनी किताब ‘इरेजिंग हिस्ट्री’ में मैंने एक पाठ्यपुस्तक का जिक्र किया है, जिसमें लिखा है कि गांधी का एक मुख्य मकसद भारत से पाकिस्तान को मुआवजा दिलवाना था. जरा सोचिए, इसका सीधा मतलब यही निकलता है कि गांधी को गद्दार बताया जा रहा है.

इतिहास की यह हेरा-फेरी, भारतीय इतिहास से मुस्लिम नेताओं और उनके दौर को मिटाना या कमतर दिखाना, यह किसी भी फासीवादी आंदोलन की नस-नस में समाया होता है. अल्पसंख्यकों के इतिहास को मिटा देना और सिर्फ दबदबे वाले समूह की पहचान को पूरे देश की पहचान बना देना ही उनका मकसद है.


2019 में भारत में यूनिवर्सिटियों पर हमले उससे भी आगे गए जो आज हम अमेरिका में देख रहे हैं, लेकिन हम तेजी से उसकी बराबरी कर रहे हैं. 2019 के सीएए-विरोधी आंदोलन में शामिल कुछ लोगों, जैसे छात्रओं के संगठन पिंजरा तोड़ की देवांगना कलीता और नताशा नरवाल, पर राजद्रोह के आरोप लगाए गए. अमेरिका में हम अभी से देख रहे हैं कि छात्रों को छात्र अखबारों में लेख लिखने की वजह से सड़क से उठा लिया जा रहा है और लुइजियाना की क्रूर जेलों में घसीटा जा रहा है.

अब प्रतिरोध की बात करते हैं. यहां मैं बांग्लादेश का जिक्र करना चाहता हूं, जहां प्रतिरोध की अगुआई छात्रों ने की. इससे हम देख सकते हैं कि छात्र और यूनिवर्सिटियां कितनी अहम हैं. और जो लोग लोकतंत्र को खत्म करना चाहते हैं, वे भी यह अहमियत बखूबी समझते हैं.

यूनिवर्सिटियों का डटे रहना बेहद जरूरी है, क्योंकि इन लोकतांत्रिक संस्थानों में ऐसे युवा छात्र हैं जो आजादी से प्यार करते हैं और उसके लिए सड़क पर उतरने का हौसला रखते हैं. इसलिए बांग्लादेश ने जैसा प्रतिरोध दिखाया, वैसे प्रतिरोध के लिए हमें भारत की तरफ देखना होगा, और ‘बलि का बकरा’ बनाने की इस चाल का मुंहतोड़ जवाब देना होगा.

हमें यह समझना होगा कि भारत में कई उत्पीड़ित समूह हैं और उत्पीड़ितों के बीच एकजुटता बनानी होगी. अमेरिका में महान विद्वान और नागरिक अधिकार कार्यकर्ता डब्ल्यू. ई. बी. डू बोइस ने बताया था कि कैसे गरीब गोरे और गरीब काले लोग मजदूर आंदोलन में एकजुट हो रहे थे, क्योंकि उन्हें अहसास हो गया था कि उनका उत्पीड़न एक जैसा है. उत्तर के उद्योगपतियों और दक्षिण के बागान-मालिकों ने नस्ल को उन लोगों के बीच दीवार बना दिया जिन्हें वरना एक होना चाहिए था. उन्होंने गरीब गोरों से कह दिया, ‘हम सब गोरे हैं. तुम्हारे पास पैसा नहीं है, हम तुम्हारे साथ कूड़े जैसा बर्ताव करते हैं, पर कम से कम तुम गोरे तो हो.’ नस्ल ऐसे ही काम करती है. जिम क्रो दौर में अमेरिका के दक्षिण की फासीवादी हुकूमत ऐसे ही चलती थी. वह गरीब गोरों को यह कहकर अपने साथ जोड़ लेती थी, ‘हम तुमसे मेहनत-मजदूरी का काम तो वैसे ही करवाते रहेंगे, पर अमीर गोरों के लिए, लेकिन तुम कम से कम गोरे तो हो.’

जब ‘बलि का बकरा’ बनाने की राजनीति को चुनौती देनी हो, तो लोगों की रोजी-रोटी और जिंदगी के भौतिक यानी असली हालात और सबकी बराबर की जद्दोजहद को उभारना सबसे जरूरी होता है. फासीवाद के निशाने पर अल्पसंख्यक होते हैं, बुद्धिजीवी होते हैं, मीडिया, यूनिवर्सिटियां और औरतें होती हैं. क्योंकि उनका मानना होता है कि सिर्फ दबदबे वाला समूह ही बच्चे पैदा करे, क्योंकि देश पर केवल उन्हीं का अधिकार होना चाहिए. और बाकी लोग हमेशा ‘बाहरी घुसपैठिए’ माने जाते हैं.

हममें से बहुत लोगों की चिंता यह है कि आज भारत में जो हो रहा है, वह नस्ली सफाए से लेकर जनसंहार तक की जमीन तैयार कर रहा है. मैं भारत को लेकर चिंतित रहा हूं. मेरी किताब ‘हाउ फासीज्म वर्क्स’ 2018 में छपी थी और भारत उसमें एक मुख्य मिसाल है, क्योंकि हम देखते हैं कि इसके लिए किस तरह की भाषा से माहौल बनाया जा रहा है, कानूनी व्यवस्था में क्या हो रहा है, और जो कुछ दिखता है वह नूरेम्बर्ग कानूनों जैसा है. उन कानूनों ने 1930 के दशक में बर्लिन में मेरे पिता से, जो यहूदी थे, उनकी नागरिकता छीन ली थी. राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) और नागरिकता संशोधन कानून के बीच ऐसा ढांचा दिखता है जो बहुत-बहुत से भारतीयों की नागरिकता छीनने का खतरा पैदा करता है.

और जब आप इसकी आलोचना करते हैं तो आपसे कहा जाता है, ‘अरे, हम तो प्रवासियों की मदद कर रहे हैं. हम गैर-मुस्लिम प्रवासियों को आने दे रहे हैं.’ जिम क्रो की तरह यहां भी ऊपर से निष्पक्ष दिखने वाले तरीकों से भारतीयों की एक बड़ी आबादी की नागरिकता छीनी जा रही है.

हम पहले से देख रहे हैं कि भारत के गैर-हिंदू नागरिकों के साथ दोयम दर्जे के नागरिकों जैसा बर्ताव हो रहा है, उन्हें गिरफ्तार किया जा रहा है और सामूहिक देश-निकाले के लिए तैयार किया जा रहा है. फिर भी भारतीय लोकतंत्र का ढांचा कुछ जगहों पर टिका हुआ है, शायद भारत के संघीय ढांचे की वजह से. देश के अलग-अलग राज्यों के पास कुछ ताकत है और प्रतिरोध करने की क्षमता भी. अब तक, हालांकि गैर-हिंदुओं की लिंचिंग आए दिन होती है, भारत ने वह रेखा पार नहीं की है. असम के प्रयोग के बाद भी, उन लोगों को इकट्टा करने के लिए विशाल यातना शिविर नहीं बने हैं जिनकी नागरिकता और भारत से रिश्ता इसलिए छीन लिया गया कि उनके पास ‘सही कागजात’ नहीं हैं. अमेरिका की तरह यहां अभी देश-निकाले के विशाल केंद्र लोगों से ठसाठस भरे नहीं हैं.

लेकिन जैसा अमेरिका में दिख रहा है, ट्रंप के पहले कार्यकाल में जो भाषा थी, वह अब नीति में बदली जा रही है. भारत को लेकर मेरी चिंता यह है कि कई वजहों से यह प्रक्रिया कुछ धीमी पड़ी है, पर भाषा तो मौजूद है, और अमेरिका की तरह वह भी जल्द नीति बन सकती है.

जब हम दूसरे गैर-पश्चिमी देशों को देखते हैं तो एक पुरानी बहस है. जैसे अफ्रीकी दर्शन में, लेओपोल्ड सेदार सेंघोर के अफ्रीकी समाजवाद के साथ, कि क्या किसी गैर-पश्चिमी देश की जमीनी हालत पश्चिमी देश से इतनी मिलती है कि वही अवधारणाएं लागू की जा सकें. मुझे लगता है कि भारत में, तमाम तरह के समूहों और भाषाओं की उलझी हुई विविधता के बावजूद, हिंदू राष्ट्रवाद के ‘बलि का बकरा’ बनाने वाले तंत्र ने भारत को यूरोपीय फासीवाद जैसा ढांचा खड़ा करने लायक बना दिया है. नरेंद्र मोदी खुद एक पंथ जैसे नेता हैं. वे हू-ब-हू मुसोलिनी जैसे नहीं दिखते, न ही हिटलर जैसे, लेकिन उनके इर्द-गिर्द एक लगभग धार्मिक पंथ जैसा अंध-समर्पण जरूर है. वे यूरोपीय फासीवाद के मायने में वही ‘सर्वाेच्च नेता’ हैं. और आखिरकार, हमारे सामने यह खुला इतिहास मौजूद है कि कैसे हिंदू राष्ट्रवादियों ने नाजी जर्मनी के प्रभाव को स्वीकारा और उसी से अपने लिए औचित्य खोजा.

(साभार: How Fascism Works: The Politics of Us and Them : Stanley, Jason )

24 October, 2026