वर्ष 35 / अंक - 22 / इतिहास आगे तभी बढ़ा है जब बदलाव हुआ: रोमिला थापर

इतिहास आगे तभी बढ़ा है जब बदलाव हुआ: रोमिला थापर

इतिहास आगे तभी बढ़ा है जब बदलाव हुआ: रोमिला थापर

(प्रख्यात इतिहासकार और विशिष्ट सार्वजनिक बुद्धिजीवी रोमिला थापर से अमित बरुआ की बातचीतः संस्मरण, हिंदुत्व और भारत की बहुलता पर)

अमित बरुआ: प्रोफेसर रोमिला थापर का साक्षात्कार लेना अपने आप में एक दुर्लभ सौभाग्य है. और उन्हें परिचय देना – या विरोधाभासी रूप से कहें तो, परिचय न देना – भी उतना ही दुर्लभ है, क्योंकि उन्हें किसी परिचय की जरूरत नहीं. नौ दशकों में फैला उनका व्यक्तित्व – एक इतिहासकार के रूप में, एक सार्वजनिक बुद्धिजीवी के रूप में, एक शिक्षक के रूप में, और  भारत के सर्वाधिक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय – जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय – के एक आधार-स्तंभ के रूप में. वे उस विश्वविद्यालय के निर्माण की धुरी रही हैं. उन पर अक्सर हमले होते रहे हैं – इसलिए कि उन्होंने वह इतिहास लिखा जिसे मैं धर्मनिरपेक्ष और बहुलतावादी इतिहास कहूंगा, जबकि उनके आलोचकों को लगता है कि उन्होंने इतिहास को एकायामी बना दिया है. लेकिन अगर आप उनके काम को देखें – उनके विचारों और चिंतन के विकास को – और जैसा कि वे अपनी नई और बेहद पठनीय आत्मकथा ‘जस्ट बीइंग’ में बताती हैं, तो यह स्पष्ट होता है कि छह-सात दशकों के इतिहास-लेखन में वे एक सार्वजनिक बुद्धिजीवी के रूप में किस तरह विकसित होती रही हैं. बहरहाल, कोई निर्णय सुनाना मेरा काम नहीं. मैं सीधे सवालों पर आता हूं और प्रोफेसर रोमिला थापर से पूछता हूं – पहले फ्रंटलाइन में आने के लिए आपका शुक्रिया.

रोमिला थापर: शुक्रिया.

अमित बरुआ: प्रोफेसर थापर, मेरा पहला सवाल. जब आपने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा दी, तो आपको ‘निम्नस्तरीय’ आंका गया. क्या इस मूल्यांकन ने उस विशाल और प्रभावशाली कार्य को आकार दिया जो बाद में सामने आया?

रोमिला थापर: नहीं, बिल्कुल नहीं. दरअसल, जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूं तो कभी-कभी मुझे खुद हैरानी होती है कि इस मूल्यांकन से मैं कितनी अविचलित रही. मुझे लगता है यह इसलिए था क्योंकि मैंने तभी तय कर लिया था कि जो करना चाहती हूं वही करूंगी. विभिन्न विषयों और प्रसंगों के साथ उलझती रही, और अंततः इतिहास पढ़ने की ओर आई. फिर सवाल यह था – कौन-सा इतिहास? कुछ लोगों ने सलाह दी कि यूरोपीय इतिहास पढ़ो, बाहर जाओ, वहां पढ़ो और लौटकर पढ़ाओ, क्योंकि शिक्षकों की कमी है. दूसरों ने कहा, भारतीय इतिहास में पुनर्व्याख्या की गुंजाइश हमेशा रहती है. तो मेरी रुचि उसी दिशा में मुड़ी – एक बार फिर भारतीय इतिहास की ओर.

अमित बरुआ: तो क्या उस समय आप पश्चिमी विश्वविद्यालयों से बहुत प्रभावित थीं, या वह सच में एकमात्र विकल्प था?

रोमिला थापर: नहीं. अधिकतर लोग ऑक्सब्रिज जाते थे और सामान्य डिग्रियां लेते थे, लेकिन फिर अक्सर वे इतिहास के शिक्षक नहीं बनते थे – दूसरे क्षेत्रों में चले जाते थे. मेरी रुचि आंशिक रूप से इसलिए भी थी कि यह सब किसी तरह नया था. लंदन विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज (SOAS) में जिस तरह इतिहास को पढ़ाया जा रहा था, जिन बातों पर जोर दिया जा रहा था, वह यहां पढ़े गए इतिहास से बिल्कुल अलग था. मुझे उस अंतर को समझने में सच्ची दिलचस्पी हुई.

अमित बरुआ: और प्राचीन इतिहास ही क्यों – मध्यकालीन या आधुनिक क्यों नहीं? यह चुनाव कैसे हुआ?

रोमिला थापर: मुझे लगता है दो कारण थे. एक तो यह कि प्राचीन इतिहास आधुनिक इतिहास से कहीं अधिक दूर था, इसलिए कुछ नया और अलग करने की संभावना लगती थी. दूसरी बात – अब पीछे मुड़कर देखती हूं तो – यह बात उस समय की है जब मैं काॅलेज में दाखिला लेने वाली थी, या ले ही रही थी. स्कूल खत्म होने और विश्वविद्यालय शुरू होने के बीच छह महीने का अंतर था. उन दिनों दिसंबर में स्कूल खत्म होता था और काॅलेज जून में खुलते थे. तो मुझे लगा, छह महीने की शानदार छुट्टियां मिलेंगी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. मेरे पिताजी – जो यहां-वहां शौक पालने और उनमें डूब जाने के बड़े कायल थे – मद्रास के दौरे पर गए. वे फौज में डाॅक्टर थे, बहुत दौरे करने पड़ते थे. एक दोपहर उन्हें फुर्सत मिली और किसी ने संग्रहालय जाने की सलाह दी. वे दक्षिण भारतीय कांस्य-मूर्तियों की दीर्घा में गए और उन मूर्तियों की सुंदरता देखकर स्तब्ध रह गए. साठ के दशक में उन्हें इन वस्तुओं के बारे में कभी बताया ही नहीं गया था. तो वे ढेर सारी किताबें खरीद लाए, पुणे लौटे जहा हम रह रहे थे, और पढ़ने बैठ गए. कोई पखवाड़े बाद बोले, ‘यह अकेले पढ़ना नहीं होता, किसी से बात करने की जरूरत है.’ मां ने तुरंत मना कर दिया – मेरी बहन वहीं थी और बच्चे होने वाले थे – मां ने कहा दोनों बिल्कुल व्यस्त रहेंगी. तब उन्होंने मेरी तरफ देखा और कहा, ‘तुम तो छुट्टियों में हो.’ तो मुझे हां कहना पड़ा. इस तरह मैंने भारतीय कला-इतिहास की किताबों के अध्याय पढ़ने शुरू किए. कला-इतिहास ने मुझे उतना नहीं पकड़ा, लेकिन उसके पीछे का इतिहास मन पर छाने लगा. और मुझे लगता है यही वह मोड़ था जब मैंने सोचा कि शायद मुझे यह जानना चाहिए कि प्रारंभिक भारतीय इतिहास को नए तरीके से करने की क्या संभावनाएं हैं. सबका जोर यही था – लंदन विश्वविद्यालय का SOAS यहां से बिल्कुल अलग होगा. और मुझे वह फर्क जानना था.

अमित बरुआ: ठीक है. और जब आप विदेश से पढ़कर लौटीं तो वापस आने का फैसला किया. जैसा आपने ‘जस्ट  बीइंग’ में बताया है, आपने कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में पद लिया जो तब ठीक से बना भी नहीं था – और वहां गाड़ी चलाकर जाने और अकेले रहने के कुछ बड़े दिलचस्प किस्से हैं. तो यह सब कैसा था? और वापस क्यों आईं, जबकि चाहतीं तो वहीं रह सकती थीं?

रोमिला थापर: यह एक ऐसा सवाल है जो मुझे परेशान करता था, क्योंकि दिल्ली या कुरुक्षेत्र में जब भी कुछ गड़बड़ होती तो मन में आता – अगर इंग्लैंड में होती तो यह नहीं होता. यह भावना थी. लेकिन साथ ही, मुझे लगता है मेरी पीढ़ी उभरते हुए राष्ट्रवादियों की पीढ़ी थी. हम जगह-जगह नारे लगाते थे, गांधीजी की प्रार्थना-सभाओं में जाते थे. और मुझे लगता है एक खिंचाव दूसरी दिशा में भी था – कि तुम्हारे पास योगदान देने के लिए कुछ है जो महत्वपूर्ण है. चाहे वह योगदान कितना भी सीमित क्यों न हो, एक भावना थी – ठीक है, हमने आजादी पाई, एक नया समाज बना रहे हैं, मैं इसमें कैसे हिस्सा लूं? बस कुछ ऐसा था.

.... और ये भावनाएं जिंदगी भर चलती रहती हैं. आप सोचते रहते हैं – काश लौटी न होती तो यह मिलता. और फिर जब कुछ मिलता है तो लगता है – अच्छा किया कि लौट आई, इसीलिए यह मिला.

अमित बरुआ: हां, और कुछ और मजेदार किस्से भी हैं – जैसे जब आप दोस्तों के साथ गई थीं तो आपकी गाड़ी पर पथराव हुआ. तो जाहिर है, साठ का दशक बड़ा रोमांचक था.

रोमिला थापर: बहुत रोमांचक था. और उसमें जो अच्छी बात थी वह यह कि उस समय भारत में रहने का अर्थ था – तरह-तरह की अप्रत्याशित चीजें होती रहती थीं, जिनकी कोई कल्पना भी न करता, और जो किसी सुव्यवस्थित समाज में अपेक्षित मानी जातीं. हम अभी संभावनाओं को टटोलने की प्रक्रिया में थे, और यह महत्वपूर्ण था.

अमित बरुआ: आपने पहले राष्ट्रवाद का जिक्र किया और बताया कि आपकी पीढ़ी उससे कितनी प्रेरित थी. क्या आप यह भी कहेंगी कि आपकी पीढ़ी आदर्शवादी थी – कि आप बदलाव में यकीन रखती थीं?

रोमिला थापर: ओह, बिल्कुल. उदाहरण के लिए – स्कूल के आखिरी साल में, मैं शायद पंद्रह साल की थी – अचानक एक दिन अगस्त की शुरुआत में सिस्टर सुपीरियर से बुलावा आया. वह एक काॅन्वेंट था, ननों और साधारण शिक्षकों दोनों का. उन्होंने कहा, ‘पंद्रह को एक छोटा समारोह होगा. हम एक पौधा लगाएंगे, झंडा बदला जाएगा – यूनियन जैक उतरेगा, तिरंगा चढ़ेगा – और हम चाहते हैं कि तुम, भारतीय प्रीफेक्ट के रूप में, एक छोटा भाषण दो.’ मैं डर गई. कहने लगी – नहीं होगा मुझसे. घबराती फिरी – क्या बोलूंगी, कैसे बोलूंगी? हमारी इतिहास और साहित्य की शिक्षिका ने कहा, ‘घबराओ मत. बस वही सोचो जो तुम आपस में बात करती हो – वे सारी भारतीय लड़कियां जो स्कूल आती हैं – और हमें वही बताओ.’

अमित बरुआ: और क्या आपको याद है कि आपने क्या कहा था?

रोमिला थापर: दो बातें मुझे अब भी याद हैं, क्योंकि कभी-कभी लगता है वे जीवन भर मेरे साथ रहीं. एक – इतने लंबे औपनिवेशिक दौर के बाद एक स्वतंत्र राष्ट्र होना कैसा होगा? यह बात लोगों में थी. और दूसरी – हम किस तरह का समाज बनाना चाहते हैं, क्योंकि अब यह हमारे हाथ में है. ये दो विचार – या कहें तो दो समस्याएं – जीवन भर साथ रहीं. 1947 के बाद यह सब सामान्य जीवन का हिस्सा बन गया.

अमित बरुआ: हां. तो यह साक्षात्कार हम आपके इस सुंदर घर में कर रहे हैं, और जैसा आपने जस्ट बीइंग में लिखा है, आप 1967 से यहां रह रही हैं. तो मैं पूछना चाहता था – यह लगभग कई दशकों का सफर है – क्या इस जड़ से जुड़े होने ने, आपकी व्यापक यात्राओं के बावजूद, दुनिया को समझने में मदद की? क्योंकि आपकी किताब बताती है कि आपने बड़े पैमाने पर यात्राएं कीं और विदेशों में मित्रों की गिनती करना तो नामुमकिन है.

रोमिला थापर: मैंने उन सबका भरपूर उपयोग किया. मुझे नहीं लगता कि जड़ से जुड़ाव एकतरफा काम करता है. इसकी अच्छी बात यह है – अगर आप कुछ अलग करने निकल जाते हैं और वह नहीं चलता, तो हमेशा यह भरोसा रहता है कि वापस आ सकते हैं, जहां थे वहां लौट सकते हैं. यह एक सुरक्षित आधार है. यह हमेशा ठीक रहने की गारंटी थी, एक तरह से. और उस समय तो और भी – भारत में एक मध्यवर्ग उभर रहा था, हम नई बातें, नए तरीके, नए एजेंडे की बात कर रहे थे. तो इस जड़ से जुड़ाव के बावजूद खोज की एक गहरी भावना थी, और वह भावना बहुत प्रबल थी.

अमित बरुआ: और क्या आप कहेंगी कि एक महिला शिक्षाविद, एक महिला सार्वजनिक बुद्धिजीवी के रूप में, जो आपने हासिल किया उसके लिए आपको पुरुषों से अधिक मेहनत करनी पड़ी?

रोमिला थापर: ओह, हां. बिल्कुल. कोई शक नहीं. जब मुझे दिल्ली विश्वविद्यालय में रीडरशिप मिली, तो एक सहयोगी लगातार – मजाक में ही नहीं, बल्कि कुछ और भाव से भी – कहते, ‘देखो, यह काम किसी मर्द को मिलना चाहिए था, क्योंकि उसके परिवार का बोझ होता है. तुम अकेली हो, तुम्हें कहीं भी नौकरी मिल जाए चलेगा. लेकिन किसी मर्द के लिए यह जरूरी था.’ यानी कि आप परिवार के मुंह का निवाला छीन रही हो. उस दौर में ऐसी बातें बहुत आम थीं. हंसते हुए कही जाती थीं, मजाक में, और आपसे उम्मीद की जाती थी कि आप भी मजाक में ही लें. लेकिन यह तकलीफदेह था.

अमित बरुआ: और दुनिया की आपकी समझ में – आपकी शिक्षा, इतिहास में आपकी रुचि, पुरातत्व में आपकी गहरी पैठ – आपने ‘जस्ट बीइंग’ में यह भी बताया है कि चीन की एक यात्रा में आपने माओ और झोऊ एनलाई से मुलाकात की, जो शायद बहुत कम भारतीयों को नसीब हुआ होगा. तो आप क्या कहेंगी – क्या पुरातत्व के आपके ज्ञान ने, आपकी यात्राओं ने, आपकी बौद्धिक समझ को, प्राचीन भारतीय या किसी भी अन्य इतिहास को देखने के नजरिए को समृद्ध किया?

रोमिला थापर: ओह, बिल्कुल. यह तो बिल्कुल केंद्रीय था. मैं कहूंगी कि शुरुआत जिज्ञासा से हुई – पुराने जमाने में भारत में क्या हुआ, और दुनिया में क्या हुआ. मैंने इस सबसे कितना सीखा, यह अलग सवाल है, लेकिन तीव्र जिज्ञासा तो थी ही. पुरातत्व में मैं कैसे आई? थोड़ा-बहुत पढ़ा था, क्योंकि प्राचीन इतिहास में पुरातत्व जरूरी है. दिल्ली में जब पुरातत्व की रिपोर्टें पढ़ती थी तो तकनीकी रूप से मुश्किल लगती थीं – कोई औपचारिक प्रशिक्षण नहीं था. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के एक पुरातत्वविद, बी.के. थापर से मैंने एक बार जिक्र किया कि इसे समझने के लिए क्या करूं. वे हंसे और बोले, ‘एक ही रास्ता है – खुदाई में शामिल हो जाओ. बिना व्यावहारिक अनुभव के यह अधूरापन बना रहेगा.’ मैंने पूछा, ‘मतलब?’ उन्होंने कहा, ‘तीन साल, हर साल तीन महीने, उस स्थल पर आओ जहां हम खुदाई कर रहे हैं’ – यह राजस्थान में कालीबंगन था – ‘और हम तुम्हें पूरी प्रक्रिया से गुजारेंगे.’ तो मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभागाध्यक्ष से बात की – हमें क्रिसमस पर एक महीने की छुट्टी मिलती थी – और कहा कि क्या मैं अगले-पिछले महीने के व्याख्यान दोगुने कर दूं और बीच का महीना लेकर जाऊं? उन्होंने कहा, ‘छात्रों से पूछो.’ जो मुझे बहुत असामान्य लगा, लेकिन मैंने पूछा. और छात्र बोले, ‘हां हां, बिल्कुल, दोगुने व्याख्यान दे दो और जाओ. बड़ा मजा आएगा, और लौटकर सब बताना.’ तो तीन साल, हर साल तीन महीने खुदाई की. पुरातत्व बहुत बेहतर समझ में आया. मैं पहले दर्जे की पुरातत्वविद नहीं बनी, लेकिन बहुत कुछ सीखा, जो अच्छा था. और इसने यह भी सिखाया कि किसी विषय को – जैसे कहें, वैदिक संस्कृत में भाषाविज्ञान जरूरी है – बस इतना कहकर नहीं छोड़ा जा सकता कि ‘यह जरूरी है.’ आपको उसकी अहमियत को समझना होगा. और यह इतिहास के गहरे विश्लेषण के लिए एक अलग दृष्टिकोण खोलता है. सबसे बड़ी बात यह है कि इसने मुझे उस चीज के लिए तैयार किया जो 1960 के दशक में अनिवार्य हो गई थी – अंतरविषयी अध्ययन. आप केवल एक विषय तक नहीं रहते. अगर आप प्राचीन भारत के समाज का अध्ययन कर रहे हैं, तो सामाजिक मानवविज्ञान भी पढ़ते हैं – इसलिए नहीं कि उसे इतिहास पर बिंदु-दर-बिंदु लागू करना है, बल्कि इसलिए कि वह आपके स्रोतों से पूछे जाने वाले प्रश्नों के लिए सुझाव और विचार दे सकता है. साथी इतिहासकारों ने मुझ पर आरोप भी लगाया है कि मैंने अपनी कक्षाओं और किताबों में बहुत अधिक मानवविज्ञान ला दिया – जो सच नहीं है. मैंने बस अंतरविषयी अध्ययन का उपयोग शायद उससे अधिक अर्थपूर्ण तरीके से किया है जितना उसके बिना होता.

अमित बरुआ: मैं फिर जड़ों के सवाल पर वापस आना चाहता हूं. आपके परिवार की जड़ें उस भूमि में भी हैं जो आज पाकिस्तान है, और आप वहां बचपन में रहीं जब आपके पिता वहां तैनात थे. आजादी के साथ हमने विभाजन का बोझ भी उठाया, और शायद किसी न किसी रूप में आज भी उठाते हैं. तो क्या आप कहेंगी कि आपके परिवार का उपमहाद्वीप के दोनों हिस्सों में बंटा होना – यह अलगाव और जड़ों का यह जुड़ाव – भारत या उपमहाद्वीप की आपकी समझ में क्या भूमिका निभाता है?

रोमिला थापर: अब जब पीछे मुड़कर देखती हूं – यह कोई ऐसा विषय नहीं जिस पर मैंने बहुत सोचा हो, लेकिन फिर भी. हां. और इसमें यह भी जुड़ता है कि मैं चार बार – सम्मेलनों और संगोष्ठियों के लिए – लाहौर और पेशावर गई. लाहौर खास तौर पर. और फिर हर नवंबर वापस जाने का सिलसिला था. दादी का एक नियम था – तीनों बेटों के अपने-अपने कमरे थे, और उन्हें अपने परिवारों के साथ नवंबर में लाहौर आना था, क्योंकि जैसा उन्होंने बिल्कुल सही कहा था – चचेरे भाई-बहनों को एक-दूसरे को जानते हुए बड़ा होना चाहिए. अब मैं उसके लिए बहुत शुक्रगुजार हूं, चाहे उस समय मन में आता था – ओह, फिर लाहौर? कोई नई जगह नहीं? – लेकिन अब जानती हूं कि अपने चचेरे भाई-बहनों से एक निकटता है, बस इसलिए कि हम साल में कम से कम एक महीना साथ बड़े हुए. तो वह तो था ही. जड़ों का जुड़ाव – मुझे लगता है हर किसी के पास होता है. कहीं न कहीं तो जड़ें होनी ही चाहिए. और मेरे लिए – लाहौर लौटने के उस सिलसिले ने, और फिर एक पंजाबी परिवार में विभाजन के बाद लाहौर के धुंधलाते जाने और सरहद के पार की जिंदगी को लेकर जो रहस्यमयी जिज्ञासा बची रही, उसने – बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. इसने मेरे भीतर मिश्रित समाजों, बहुलवादी समाजों की संभावनाओं को खोला. उस जड़ से जुड़ाव से जो बहुलवाद मुझे मिला, वह मेरे साथ बना रहा. और आज जब एक संस्कृति, एक धर्म, सब कुछ एकवचन – इस पर इतना जोर है, तब यह और भी जरूरी लगता है. क्योंकि यह उस सच्चाई के विरुद्ध है जो मैंने जीवन भर महसूस की – कि भारतीय संस्कृति और समाज एक अद्भुत बहुलवादी समाज है. और यह समझ मेरे जीवन के सफर में बड़ी मददगार रही है.

अमित बरुआ: आपकी किताब में परिवार के बारे में कुछ दिलचस्प टिप्पणियां हैं. आप पारिवारिक रिश्तों को एक जुआ बताती हैं, जबकि दोस्तियों को अधिक स्वतंत्रता से उपजा हुआ बताती हैं. तो क्या आपको लगता है कि पारिवारिक बंधन और दोस्तियों में कोई अंतर्विरोध है, या वे एक-दूसरे के पूरक हैं?

रोमिला थापर: एक हद तक वे पूरक हैं. जब आप बच्चे होते हैं तो हमेशा कहा जाता है – ‘ठीक से पेश आओ, यह परिवार है.’ परिवार जीवन में एक सचेत सामग्री बन जाता है. लेकिन मुझे लगता है – जो बात उस अध्याय में मुझे बहुत गहरी लगी वह यह है – परिवार दिया हुआ है. मां है, बाप है, भाई-बहन हैं, और ईश्वर आपकी मदद करे, आपको उनके साथ जीना सीखना है और उनकी बात माननी है. जबकि दोस्ती में आप किसी दूसरे इंसान को जानते-परखते हैं और धीरे-धीरे कहते हैं – हां, इस इंसान से मेरा मेल है, इस दोस्ती में कुछ अर्थपूर्ण है. तो दोस्तियां कहीं अधिक चुना हुआ रिश्ता हैं, जबकि पारिवारिक रिश्ते दिए हुए हैं – उन्हें या तो आप स्वीकार करते हैं या अस्वीकार.

अमित बरुआ: एक और बात जो मैं पूछना चाहता था – आपने किताब में लंदन और दिल्ली के बारे में लिखा है. और अगर थोड़ी जुर्रत करूं तो कहूंगा कि दिल्ली आपका शहर है, क्योंकि आप एक दिल्ली-वाली हैं, इतने बरसों से यहां हैं. एक जगह आप लिखती हैं कि लंदन में नए विचारों और छवियों का आकर्षण खुला, सुनाई देने वाला और दृश्यमान है. जबकि दिल्ली में, आपके अनुसार, संभावनाओं को तलाश करना पड़ता है. इस बात को थोड़ा और खोल सकती हैं?

रोमिला थापर: मुझे लगता है यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप दिल्ली के किस इलाके में हैं, किस संस्कृति में. मुझे उस अंश में यह स्पष्ट कर देना चाहिए था – छावनी की दिल्ली और लुटियन की नई दिल्ली, वह कोई ऐसी अजीब दुनिया नहीं थी, क्योंकि जीवन भर उसी माहौल में रहे थे, काॅलेज तक. विदेश जाने पर वह बदला. तो वह दिल्ली जानी-पहचानी थी, उसमें पूरी तरह हिस्सा लेते थे. दूसरी दिल्ली – जब हम छोटे थे, हमारे लिए दूसरी दिल्ली पुरानी दिल्ली थी. छावनी तब बहुत छोटी थी. आज जो काॅलोनियां हैं, तब बहुत कम थीं. मुझे याद है, जब पिताजी ने लिखा कि उन्होंने शकूरपुर में एक प्लाॅट खरीदा है, तो सबने लिखा – ‘क्या पागल हो गए हो? वहां तो जंगल है, वीराना है, वहां क्या करोगे?’ यह दिल्ली में आए तीव्र और तेज बदलाव का प्रतीक है. और यह बदलाव वह नहीं जिसे मैं पसंद करती हूं, क्योंकि मैं चाहती थी कि दिल्ली थोड़ा अलग तरह से विकसित होती. लेकिन उन दिनों दिल्ली की अच्छी बात – तब, अब उतनी नहीं – यह थी कि आप जिस संस्कृति में जाना चाहें जा सकते थे. अगर इत्र चाहिए, कबाब-बिरयानी चाहिए, तो सब था – बस जरा मेहनत करके जाना होता था. और लंदन के साथ भी यही समानता थी उस दौर में. लंदन में भी एक ही इलाके से आए लोग आपस में एक जगह रहते थे. ईस्ट एंड और वेस्ट एंड का फर्क था. फिर धीरे-धीरे वह मिट गया – आज ईस्ट एंड लगभग वेस्ट एंड जैसा हो गया है. लेकिन बड़े शहरों की यह एक दिलचस्प खूबी है – उनमें स्थान-दर-स्थान विविधता और अंतर मिलता है.

अमित बरुआ: तो प्रोफेसर थापर, अब अगर हम आपके इतिहास-लेखन और एक सार्वजनिक बुद्धिजीवी के रूप में आपके हस्तक्षेप की बात करें – तो आपकी क्या समझ है? आपने इतिहास देखा है, उसका विश्लेषण किया है, और जहां तक मैं जानता हूं आप किसी भी दल की सदस्य कभी नहीं रही हैं. तो दक्षिणपंथ आपसे इतनी नफरत क्यों करता है?

रोमिला थापर: यह एक अजीब बात है. मैंने इस पर थोड़ा सोचा है – बहुत नहीं, क्योंकि मैं इसे अपनी जिंदगी में दखल नहीं देने देती. यह एक अलग चीज है जिसे मैं बहुत पहले ही खारिज कर चुकी हूं. शुरुआत में – इतिहास समाज-निर्माण के लिए बहुत महत्वपूर्ण है. कुछ इतिहासकार मित्र तो यहां तक कहते हैं कि जिसे हम ऐतिहासिक परंपरा कहते हैं, वह दरअसल एक आविष्कार है – शायद कभी थी ही नहीं, और आज तो निश्चित रूप से यह एक निर्मित चीज है. तो इतिहास उस नए समाज के निर्माण में बेहद अहम है जो हम बना रहे हैं. और राष्ट्रवाद के लिए तो यह और भी जरूरी है. इसीलिए आज – जो राजनीतिक दल राष्ट्रवाद पर, साम्प्रदायिकता पर, एक धर्म और एक समाज के विचार पर इतना जोर दे रहे हैं – उन्होंने हिंदू राष्ट्रवाद को एक ऐसी विचारधारा में तब्दील कर दिया है जो एक धर्म, एक समुदाय, एक जन की संस्कृति और विकास को केंद्र में रखती है. तो एक तरफ बहुलता की संभावना है, और दूसरी तरफ राजनीतिक चुनाव एक खास धर्म और संस्कृति की एकवचनता की तरफ झुकता जा रहा है. जो लोग – जैसे मैं – यह तर्क देते हैं कि भारतीय संस्कृति और इसलिए भारतीय इतिहास एक व्यापक, विविध पृष्ठभूमि से आता है, उन्हें वे लोग नापसंद करते हैं जो भारतीय संस्कृति को एक एकल, बंद चीज बनाना चाहते हैं – सिर्फ एक धर्म की, बहुसंख्यक समुदाय की. तो मेरे जैसे किसी व्यक्ति के प्रति नापसंदगी का एक कारण यह है कि मैं एक वृहत्तर, अधिक खुले समाज का इतिहास लिखती हूं. उन्हें एक बंद समाज का इतिहास, एक बहुसंख्यकवादी इतिहास चाहिए. यह एक कारण है. दूसरा यह है कि जब हम इतिहास को एक खुले समाज के रूप में देखते हैं, तो यह मानना पड़ता है कि शुरुआत से ही असहमति थी, विरोध था. इतिहास कोई एक विचार नहीं था जो चलता रहा, चलता रहा. विभिन्न विचार थे, असहमतियां थीं, विरोधी मत थे. और इस बहुलता का तर्क उन्हें मंजूर नहीं जो एकल सत्ता चाहते हैं. यह सिलसिला न जाने कितनी बातों में चलता है. शुरुआत हुई NCERT की पाठ्यपुस्तकों से. मेरी किताब पर आपत्तियां क्या थीं? दो. एक – मैंने लिखा कि आर्य गोमांस खाते थे, जिसके ढेर सारे प्रमाण हैं, मैंने दिए भी – लेकिन नहीं, यह हटाना होगा. दूसरी – मैंने क्यों कहा कि शूद्रों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं होता था? इसके भी ढेर सारे प्रमाण हैं. लेकिन यह उनकी पसंद का सवाल है. दरअसल बात यह है – एक दल अतीत पर समाज की एक खास तस्वीर थोपना चाहता है और कहना चाहता है कि इतिहास इस तस्वीर का समर्थन करता है. जबकि हम कुछ इतिहासकार कह रहे हैं – इतिहास उस तस्वीर का नहीं, एक अलग तस्वीर का समर्थन करता है. यही एक बुनियादी फर्क है.

अमित बरुआ: तो शायद इसीलिए वे आपके पीछे पड़े रहते हैं. और जैसा आपने ‘जस्ट बीइंग’ में बताया है – बाद में जो पाठ्यपुस्तकें आईं, जिनसे आपका कोई संबंध नहीं था, उनके लिए भी वे आप पर हमले करते रहे. और क्या आपको लगता है कि 2014 के बाद से भारत में एक तरह की बौद्धिक पतनावस्था आ रही है? क्या भारत कभी लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और समतावादी राह पर वापस लौट सकेगा?

रोमिला थापर: यह बहुत चिंताजनक है. हम यह सवाल अपने आप से कई बार पूछ चुके हैं, और इस पर चर्चाएं भी होती हैं. एक उदाहरण लें – प्रवासन का सवाल. हम वैसे इतिहासकार हैं जो कहते हैं – हां, प्रवास हुए. आर्यभाषी लोग प्रवासी के रूप में आए. उसके बाद शक, कुषाण, हूण, फिर तुर्क, गुरिद – सब प्रवासी थे. उन्होंने भारतीय समाज के साथ क्या किया? उन्होंने उसे कुछ नए तरीकों से खोला, नए विचार लाए – कुछ अपनाए गए, कुछ छोड़ दिए गए. लेकिन नए विचार आए. यह उन्हें परेशान करता है, क्योंकि उनके लिए यह कहना अनिवार्य है कि भारत में जो कुछ भी हुआ, उसकी जड़ें भारत में हैं, भारत उसका स्रोत है. बाहर से कुछ नहीं आया.

अमित बरुआ: और भारत विश्वगुरु है.

रोमिला थापर: और भारत विश्वगुरु है, इसलिए भारत को आज बाहर से कुछ नहीं लेना चाहिए. क्योंकि ऐसा नहीं है, और इसका निष्कर्ष यह है कि भारत न केवल विश्वगुरु है, बल्कि विश्वगुरु होने के कारण वह एक ऐसा समाज है जो एकल लक्ष्य से बंधा है, और इसी एकल जड़ से सब कुछ व्याख्यायित होता है.

अमित बरुआ: तो यह एकवचन का यह जुनून – अगर मैं ऐसे कहूं – क्या यह एक तरह की असुरक्षा से उपजा है? क्योंकि हमेशा यही कहा जाता है – हमारा धर्म खतरे में है, दूसरे बढ़ रहे हैं. क्या यह कोई असुरक्षा है?

रोमिला थापर:  मुझे लगता है यह उस सत्ता की असुरक्षा है जो वे चाहते हैं लेकिन पूरी तरह हासिल नहीं हुई. आदर्श रूप में संघ परिवार और हिंदुत्व के लिए, भारत एक हिंदू समाज होना चाहिए, और वे इस विचार को स्थापित करने में लगे हैं. और अगर यह पूरी तरह नहीं होता, तो हां – एक आत्मविश्वास की कमी है.

अमित बरुआ: क्योंकि आज संघ परिवार के पास अपार शक्ति है. मुझे नहीं लगता आरएसएस  ने कभी सोचा होगा कि उनका प्रधानमंत्री तीन कार्यकालों तक रहेगा. पहले वाजपेयी जी थे. तो इतिहास लिखना, पाठ्यपुस्तकें, जो पढ़ायी जाती हैं उसे काटना-छांटना – सब उनके नियंत्रण में है. फिर भी यह असुरक्षा – कि लोग सच में नहीं मानते, या ऐसे विचार हैं जो परेशान कर सकते हैं.

रोमिला थापर: या यह कि यहां-वहां कोई एक व्यक्ति है जो एक विरोधी व्याख्या दे रहा है, और वह व्याख्या पूरी तरह खारिज नहीं हो रही. यह बड़ा डर है – कि हम जो कह रहे हैं उसका एक खंडन मौजूद है, और हम चाहे जितना कहें यह बकवास है – वह है, और लोग उसकी बात कर रहे हैं.

अमित बरुआ: और प्रोफेसर थापर, मैं आपसे आपातकाल के संदर्भ और आज के भारत के बारे में भी पूछना चाहता था – क्योंकि लोगों को इसे समझना थोड़ा मुश्किल लगता है, चूंकि श्रीमती गांधी ने जो किया उसे कानूनी आधार देने की कोशिश की थी. आप ‘जस्ट बीइंग’ में लिखती हैं कि 2014 के बाद से राज्य का नियंत्रण सख्त है और एक स्पष्ट एजेंडे के साथ है. आपको क्या लगता है – बिना किसी कानूनी स्वीकृति के मौजूदा सरकार ने यह कैसे संभव किया है? लोगों पर छापे, लोगों को उठाना, उन दलों को तोड़ना जो भाजपा की लाइन नहीं मानते?

रोमिला थापर: मुझे लगता है यह भारत के लिए एक आघातपूर्ण अनुभव रहा है, क्योंकि भारत एक खुले समाज का आदी था और अचानक वह नहीं रहा. और जब मैं आघातपूर्ण अनुभव कहती हूँ, तो मेरा मतलब यह है कि शुरुआत में यह शायद बेहद उलझन-भरा था, लेकिन लोग उसके साथ ढल गए. मुझे खुद समझ नहीं आता कि वे इतनी आसानी से क्यों ढल गए. ऐसी बहुत-सी परिस्थितियां हैं जो विरोधाभासी हैं – कम से कम विरोधाभासी मानी जाती हैं, चाहे वास्तव में हों या नहीं. लेकिन इन विकल्पों की उस बारीक, सुचिंतित तरीके से पड़ताल नहीं हो रही जो होनी चाहिए. मैं यह नहीं कह रही कि लोगों की भीड़ उठकर सरकार-विरोधी नारे लगाए – वह हो भी सकता है, नहीं भी. लेकिन इतने लोगों को तो होना चाहिए जो इस सवाल पर सोचें – पिछले दस बरसों में जो हुआ उसे देखते हुए, क्या हम किस तरह का समाज बना सकते हैं? क्या इसका मतलब यह है कि बस हो गया, अब ऐसे ही चलता रहेगा? एक इतिहासकार के रूप में मैं इसमें यकीन नहीं रखती, क्योंकि मैं जानती हूं कि कुछ सालों में – एक दशक, दो दशक – बदलाव आएगा. बदलाव आना ही है. इतिहास आगे तभी बढ़ा है जब बदलाव हुआ. सवाल यह है – उस दौर में कौन लोग होंगे जो बदलाव पर विचार करेंगे, उसे खोजेंगे और लागू करेंगे? और यहीं तय होगा कि यह एक धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र बनेगा या किसी और अधिक कठोर चीज में बदल जाएगा – जैसे यूरोप के इतिहास में विश्वयुद्धों के बाद फासीवाद आया. चरम विचारधाराएं दुनिया में हर जगह पृष्ठभूमि में मौजूद रहती हैं. तो यह कुछ ऐसा है जिसके बारे में हमें सोचना और खुद को तैयार करना चाहिए. क्या हम ऐसा समाज चाहते हैं? नहीं चाहते तो क्या करें?

अमित बरुआ: आपने चरम विचारधाराओं का जिक्र किया, और मुझे लगता है ये केवल भारत तक सीमित नहीं हैं – संयुक्त राज्य अमेरिका में भी हैं, खाड़ी क्षेत्र में भी. तो आपकी क्या समझ है – क्या यह इतिहास का एक क्षणिक झटका है, या एक दीर्घकालिक प्रवृत्ति है? जैसा आपने कहा, कुछ भी स्थायी नहीं – लेकिन यह तो इतिहास का काफी लंबा क्षण लग रहा है.

रोमिला थापर: हां, यह पता नहीं. इतिहास को ध्यान से पढ़ें तो कुछ क्षण बहुत लंबे रहे हैं. यह भी शायद उन्हीं में से एक हो. भारत में भी हमने बहुत लंबे क्षण देखे हैं. मैं ऐसी इतिहासकार नहीं हूं जो मानती हो कि इतिहास झटकों में चलता है. मुझे लगता है इतिहास धीरे-धीरे, क्रमशः चलता है. वह किसी भयानक तरीके से बदल सकता है, लेकिन यह हमेशा याद रखना होगा कि बदलाव स्थायी नहीं होता. कोई और बदलाव आएगा जो इसका खंडन करेगा. यह कौन से बदलाव होंगे, यह मत पूछिए, क्योंकि मैंने अभी इसे पूरी तरह सोचा नहीं है. लेकिन इतिहास की गवाही यही है – इतिहास के अध्ययन का सबसे दिलचस्प पहलू यही निरंतर बदलाव है.

अमित बरुआ: और अगर आप दुनिया को देखें – चीन का उभार, अमेरिका जो दुनिया के साथ और खुद अपने साथ जो कर रहा है – तो आपका क्या अनुमान है? क्या यह वैश्विक उथल-पुथल, यह वैश्विक अव्यवस्था जारी रहेगी?

रोमिला थापर: यह तब तक जारी रहेगी जब तक इसे चुनौती देने के लिए पर्याप्त दबाव नहीं बनता. जब लोगों को लगे कि वे एक ऐसी स्थिति में हैं जहां से इसे चुनौती दी जा सकती है और कहा जा सकता है रुको, हम यह व्यवस्था नहीं चाहते, हम दूसरी व्यवस्था चाहते हैं – तब यह टूटना शुरू होगा. लेकिन जब तक लोग संतुष्ट हैं. और यहां भी – आज सच में क्या हो रहा है, यह जानना मुश्किल है. चुनाव होते हैं, कुछ कहते हैं बिल्कुल ठीक हैं, सब अपनी मर्जी से वोट दे रहे हैं. दूसरे लोग कहते हैं – नहीं, सब प्रबंधित है, हेरफेर हो रहा है. तो हम सामान्य लोग नहीं जानते कि कोई हेरफेर है या यह बिल्कुल सामान्य है. और शायद यह तभी स्पष्ट होगा जब यह और अधिक तीव्र हो जाएगा – और तब शायद यह या वह होगा.

अमित बरुआ: तो आप कह रही हैं कि इतिहास का एकमात्र स्थिरांक बदलाव है.

रोमिला थापर: यह बहुत बड़ा स्थिरांक है.

अमित बरुआ: तो मैं आपको और नहीं थकाऊंगा, लेकिन एक आखिरी सवाल जरूर पूछूंगा – इन दशकों के सफर में, क्या आपको कोई अफसोस है? कुछ जो आप कर सकती थीं और नहीं किया, या जो आपको लगता है कि बेहतर कर सकती थीं?

रोमिला थापर: बहुत ज्यादा नहीं. और इसका एक बड़ा कारण जेएनयू था – जेएनयू  का निर्माण. यह हम में से बहुतों की जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा रहा है. और जब मैं यह कहती हूं तो मेरा मतलब सिर्फ एक नया विश्वविद्यालय बनाने और उसमें बस जाने से नहीं है. वह विचार था जिसके साथ हम में से कई लोग शुरुआती दिनों में – 1971 में, जब विश्वविद्यालय चलना शुरू हुआ – जुड़े थे. लोग पूछते थे, ‘इस नए विश्वविद्यालय में क्या कर रहे हो? इतना उत्साहित क्यों हो?’ और हम कहते थे – नए पाठ्यक्रम बना रहे हैं, नए पाठ्यक्रम विषय नए तरीके से पढ़ाए जाएंगे, ज्ञान के प्रति एक नया दृष्टिकोण है. और इन सबके साथ-साथ हमने यह भी विस्तार से तय किया था कि हम एक ऐसा विश्वविद्यालय बनाएंगे जो दुनिया को साबित करेगा कि भारतीय बुद्धिजीवी और शिक्षाविद सर्वश्रेष्ठ के बराबर एक विश्वविद्यालय बना सकते हैं.

अमित बरुआ: और आपने किया.

रोमिला थापर: और हमने किया. मुझे लगता है हमने सच में एक शानदार विश्वविद्यालय बनाया. और इसीलिए जब पिछले दस बरसों में जेएनयू के साथ जो हुआ उसे देखती हूं, तो एक स्तर पर दिल टूटता है. मैंने जेएनयू जाना बंद कर दिया, क्योंकि उन जगहों से गुजरने और आज के माहौल में वहां के लोगों से मिलने का मन नहीं होता. लेकिन व्यक्तिगत रूप से, हम सबके लिए – कुछ असाधारण कर गुजरने का एक एहसास था, चाहे उस समय हमें यह असाधारण न लगा हो. अब हम जानते हैं कि वह था. तो मुझे लगता है इस तरह की गतिविधियां – 1947 के बाद एक नए समाज, एक नई संस्कृति के निर्माण में – एक जबरदस्त भावना थी कि हम कुछ सच में सार्थक कर रहे हैं. हम पीढ़ियों के छात्रों को बौद्धिक बना रहे हैं. उन्हें सोचना सिखा रहे हैं. और मेरे लिए यही सबसे महत्वपूर्ण है. एक शिक्षक के रूप में मुझे लगता है कि मैं अपने जीवन में जो सबसे जरूरी चीज दे सकती हूं वह यह है – युवा लोगों को सोचना सिखाना. क्या सोचें, किस बारे में सोचें.

अमित बरुआ: तो इसी के साथ, प्रोफेसर थापर, फ्रंटलाइन से बात करने के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया. यह एक सौभाग्य और सम्मान रहा. और मुझे यकीन है कि आपकी यह अद्भुत किताब – जिसमें आप बाद में मेरे लिए कुछ लिख देंगी – लोग इसे संजोकर रखेंगे और पढ़ेंगे. बहुत-बहुत शुक्रिया.

रोमिला थापर: शुक्रिया. बहुत शुक्रिया.

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30 May, 2026