पंजाब अब चुनावी तैयारियों की ओर बढ़ने लगा है. वहां फरवरी 2027 में विधान सभा चुनाव होने तय हैं. चर्चा है कि पार्टी टूटने के भय से आम आदमी पार्टी (आप) की राज्य सरकार कुछ पहले भी चुनाव कराने की सिफारिश कर सकती है. सत्ताधारी आम आदमी पार्टी (आप) के पंजाब से जुड़े छह राज्य सभा सांसदों के भाजपा में चले जाने के बाद भाजपा की कोशिश पंजाब में आप और कांगेस के कुछ विधायकों को भी तोड़ने की है. भाजपा इस बार किसी भी हालात में पंजाब में अपनी सरकार बनाने के प्रयास में जुटी है. इसके लिए केन्द्रीय एजेंसियों को इस्तेमाल कर आप और कांग्रेस के विधायकों को तोड़ने के लिए दबाव बनाने की कोशिशें जारी हैं. अभी पंजाब में हो रहे नगर निकाय चुनावों में भी भाजपा ने पूरा जोर लगाया है. जितना खर्च अन्य पार्टियों के उम्मीदवार कर रहे हैं, उससे कई गुना ज्यादा भाजपा के उम्मीदवार कर रहे हैं. तीन चार गलियों वाले एक वार्ड में जहां अन्य उम्मीदवारों के एक या दो प्रचार वाहन घूम रहे हैं, उतने ही क्षेत्र में भाजपा उम्मीदवारों के 7-8 तक प्रचार वाहन घूमते दिख रहे हैं.
पंजाब में देश के अन्य हिस्सों की तरह घुसपैठिया या मुस्लिम विरोधी ध्रुवीकरण की राजनीति के बल पर भाजपा की नैया पार नहीं लग सकती है. इसलिए यहां हिन्दुओं में भय पैदा करने और उनके वोटों के ध्रुवीकरण के लिए खालिस्तान के एजेंडे को गर्म करने की कोशिशें भाजपा-आरएसएस और केन्द्रीय एजेंसियां कर सकती हैं. अभी 5 मई 2026 को जालंधर और अमृतसर में हुए विस्फोटों को लोग इसी कोशिश का हिस्सा मान रहे हैं. पंजाब में चर्चा है कि केंद्र सरकार इस ध्रुवीकरण को तेज करने के लिए असम की जेल में बंद ‘वारिस पंजाब दे’ के प्रमुख और सांसद अमृतपाल को चुनाव से पहले रिहा कर सकती है. पंजाब में यह भी आम चर्चा है कि राम रहीम के सिरसा डेरे, राधास्वामी के व्यास डेरे, सचखंड डेरे सहित कई धार्मिक डेरों/समूहों को भाजपा इस चुनाव को जीतने के लिए इस्तेमाल करने के प्रयासों में जुटी हुई है. पंजाब के दलितों के बीच पिछले चार वर्षों से आरएसएस-भाजपा का नेटवर्क फैलाने की कोशिशें जारी हैं. इसके लिए बड़े पैमाने पर दलित कार्यकर्ताओं को धन और पद का लालच देकर खरीदने, दलित बस्तियों में मंदिरों के निर्माण और धार्मिक आयोजनों के लिए धन बांटने का खेल जारी है.
पंजाब में इस बार का चुनाव पहले के किसी भी चुनाव से अलग तरह का होने जा रहा है. इस बार न तो आप और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला है और न ही अकाली कांग्रेस के बीच. पंजाब का चुनाव पहली बार बहुध्रुवीय होने जा रहा है. आम आदमी पार्टी, कांग्रेस, भाजपा, अकाली दल (बादल), अकाली दल (वरिस पंजाब दे) इस चुनाव के प्रमुख पांच खिलाड़ी होंगे, जिनके बीच पंजाब की सत्ता के लिए बहुकोणीय संघर्ष होगा. भाकपा(माले) लिबरेशन और आरएमपीआई अन्य वाम ताकतों को एक मंच पर लाकर कुछ सीटों पर एक मजबूत वाम ब्लाक बनाने की कोशिशों में हैं. एक बड़ा वाम ब्लाक बनाने के लिए सीपीएम-सीपीआइ तैयार होंगी या कोई और रास्ता अपनाएंगी, यह देखना होगा. लेकिन भाकपा(माले) लिबरेशन और आरएमपीआई ने अपने आधार की चुनिन्दा विधानसभा सीटों पर अभी से तैयारियों में जुटने पर सहमति बना ली है. अकाली दल बादल ने हाल में एक बयान जारी कर सीपीएम, सीपीआइ और बसपा के साथ चुनावी तालमेल करने की घोषणा की है. जबकि सीपीएम-सीपीआइ ने उसकी इस घोषणा का कोई खंडन अब तक नहीं किया है.
भाजपा पहली बार पंजाब के राजनीतिक इतिहास में इस बहुकोणीय संघर्ष में एक बड़ी चुनौती बनकर आ रही है. भाजपा की इस चुनौती को किसी भी कीमत पर कम कर आंकना पंजाब की धार्मिक और राजनीतिक परम्पराओं तथा देश के धर्मनिरपेक्ष और संघीय ढांचे के लिए ऐसा नुकसानदायी साबित होगा, जिसकी भरपाई करना फिर कठिन काम होगा. अब तक के व्यवहार से तो दिख रहा कि आप और कांग्रेस भाजपा के इस संभावित खतरे की ओर से पूरी तरह आंखें मूंदे हुए हैं. आप को गलतफहमी है कि राज्य सरकार की कुछ लोक कल्याणकारी योजनाएं उसे फिर से जिता देंगी, जबकि कांग्रेस इस गलतफहमी में है कि आप सरकार के खिलाफ बना गुस्सा उसकी सरकार बनवा देगा. अकाली दल (बादल) और अकाली दल (वारिस पंजाब दे) के लिए भाजपा कोई खतरा नहीं है. ये दोनों दल अगर जरूरत पड़ी तो चुनाव बाद भाजपा के साथ गठबंधन सरकार बनाने की दिशा में बढ़ जाएंगे. भाजपा भी यही चाहती है. क्योंकि खालिस्तान का हौवा जितना अधिक दिखेगा, उतना ही हिन्दू वोटों का ध्रुवीकरण भी होगा. दूसरी ओर जितना अधिक हिन्दू वोटों का ध्रुवीकरण होगा, अकाली दल (वारिस पंजाब दे) को भी उतना ही फायदा होगा.
पंजाब में एक मजबूत वाम ब्लाॅक के निर्माण के लिए भाकपा(माले) लिबरेशन और रिवल्युश्नरी मार्क्सवादी पार्टी ऑफ इंडिया (आरएमपीआई) ने 18 मई को प्रदेश के दर्जनों शहरों, कस्बों में पैट्रोल-डीजल व गैस की बढ़ी कीमतों के साथ ही बढ़ती महंगाई व बेरोजगारी के खिलाफ साझा धरना-प्रदर्शन आयोजित किए. इसके साथ ही 19 से 28 मई के बीच दोनों पार्टियों ने महंगाई, बेरोजगारी, देश में आर्थिक आपातकाल और पंजाब के सवालों पर ‘लोगों के बीच चलो!’ अभियान शुरू किया है. यह अभियान कुछ दिनों और चलेगा तथा इसका पहला चरण 7 जून को लुधियाना में एसआईआर के जरिये पंजाब के गरीबों व मजदूरों के वोट के अधिकार को छीनने की कोशिशों के खिलाफ एक जन सुनवाई कार्यक्रम के जरिये संपन्न होगा.
पंजाब में एसआईआर की प्रक्रिया अभी जारी है. कई जिलों में इसका पहला चरण हो चुका है, जबकि कई जिलों में 25 मई से शुरू हो रहा है. लुधियाना और मोहाली जैसे जिलों, जिनमें बड़ी संख्या में हिन्दी भाषी प्रवासी मजदूर भी बस गए हैं, मजदूरों के वोट कटने की शिकायतें आ रही हैं. परन्तु पंजाब की राजनीति, मीडिया और बुद्धिजीवियों में अभी इसको लेकर कोई चर्चा तक नहीं है.
राज्य में 2022 का विधानसभा चुनाव ऐतिहासिक किसान आन्दोलन की पृष्ठभूमि में संपन्न हुआ था. पंजाब के किसान संगठनों की एकता और निर्देशन में देश के किसानों ने 13 माह तक दिल्ली को घेरे रखा था. पहली बार मोदी सरकार को संसद से पारित कराए उन तीनों कृषि कानूनों को संसद से ही वापस लेने पर मजबूर होना पड़ा था. इस जीत से उत्साहित पंजाब के कुछ किसान संगठन एक नई पार्टी बनाकर चुनाव मैदान में भी उतर गए थे. लेकिन, पंजाब के लोगों ने उस आम आदमी पार्टी (आप) को भारी बहुमत से सत्ता सौंप दी, जिसकी ऐतिहासिक किसान आन्दोलन में कोई भूमिका नहीं थी. इस किसान आन्दोलन में एक मजबूत केंद्र की भूमिका निभाने वाली वामपंथी पार्टियां भी पिछले चुनाव में हाशिये पर ही रहीं. इसका प्रमुख कारण है पंजाब के कम्युनिस्ट आन्दोलन के एक हिस्से पर किसान यूनियनों के राजनीति से दूरी या चुनाव बायकाट जैसे गैर राजनीतिक चिंतन का प्रभाव. ऐसे कम्युनिस्ट समूह इस गलतफहमी में तो बने रहते हैं कि उनकी सदस्य संख्या बड़ी है, पर जाने-अनजाने वे सत्ताधारी दलों द्वारा अपने राजनीतिक हितों के लिए इस्तेमाल कर लिए जाते हैं.
पंजाब की जमीन – जिसे दसों सिख गुरुओं की पीड़ितों के हित के लिए हर तरह की जुल्मी सत्ता से टकरा जाने और समतावादी समाज के लिए निस्वार्थ भाव से काम करने की शिक्षाओं ने तैयार किया और उसके बाद करतारसिंह सराभा सहित गदरी बाबाओं और शहीद भगत सिंह की कुर्वानियों, मुजारा किसान आन्दोलन और नक्सलबाड़ी लहर के आंदोलनों ने उस जमीन को सींचा, बुहारा – वामपंथ की विचारधारा के लिए उर्वरा रही है. किन्तु 90 के दशक में उभरे खालिस्तानी आन्दोलन के दौरान सीपीएम-सीपीआइ की राज्य दमन का पक्ष लेने तथा सीपीआइएमएल (न्यू डेमोक्रेसी) द्वारा खालिस्तानियों से सीधे टकराने की कार्यनीति ने पंजाब में कम्युनिस्ट आन्दोलन को काफी नुकसान पहुंचाया. इसके उलट भाकपा(माले) लिबरेशन ने खालिस्तान का सैद्धांतिक तौर पर विरोध करते हुए राज्य दमन के खिलाफ पीड़ित जनता की रक्षा के लिए जन संघर्ष का रास्ता अपनाया. पार्टी को उस दौर में राज्य दमन और खालिस्तानियों के हमले का खुद भी शिकार होना पड़ा. हमारी इस सही कार्यनीति ने पंजाब के कम्युनिस्ट आन्दोलन में भाकपा(माले) लिबरेशन का एक अलग स्थान बना दिया. भाकपा(माले) लिबरेशन और आरएमपीआई ने इस बार के चुनाव में वाम ब्लाॅक के निर्माण के साथ कुछ सीटों पर वामपंथ की ओर से भी चुनौती पेश करने का संकल्प लिया है.