वर्ष 35 / अंक - 44 / फ्रांस की सड़कों पर उतरे लाखों प्रदर्शनकारी

फ्रांस की सड़कों पर उतरे लाखों प्रदर्शनकारी

फ्रांस की सड़कों पर उतरे लाखों प्रदर्शनकारी

– अस्मिता पाठक

(पिछले एक महीने में फ्रांस की सड़कों पर 8 लाख से ज्यादा प्रदर्शनकारी उतर आए हैं. हालांकि यह विरोध-प्रदर्शन शुरू में छात्रों के एक ऐसे आंदोलन के रूप में हुआ था, जो बेहतर बुनियादी ढांचे और शिक्षा के लिए ज्यादा फंडिंग की मांग कर रहा था, लेकिन राष्ट्रीय सरकार की सख्त कार्रवाई ने इस आंदोलन के स्वरूप और उद्देश्यों को व्यापक बना दिया है. साथ ही, इसने देश के समक्ष खड़े आर्थिक संकट को भी पूरी तरह से उजागर कर दिया है.

2008 के आर्थिक संकट के बाद से फ्रांस में प्रति व्यक्ति जीडीपी की वार्षिक विकास दर 1% से भी कम पर अटकी हुई है, और युवाओं के बीच बेरोजगारी की दर 20% के चौंकाने वाले स्तर पर पहुंच गई है. इससे एक ऐसा दुष्चक्र बन गया है जहां सरकार पर्याप्त टैक्स राजस्व नहीं जुटा पा रही है. इसकी वजह से उसे उधार लेना पड़ रहा है. आज फ्रांस पर कुल कर्ज उसकी पूरी जीडीपी से भी ज्यादा हो गया है.

प्रदर्शनकारियों ने रूढ़िवादियों और उदारवादियों से दूरी बना ली है, लेकिन उन्होंने फ्रेंच लेफ्ट’ का स्वागत किया है, जिसकी आवाज जीन-ल्यूक मेलनचाॅन के रूप में सामने आती है. ‘ला फ्रांस इंसोमिस’ के नेता मेलनचाॅन ने सार्वजनिक रूप से मांग की है कि ‘बैंक ऑफ फ्रांस’ और ‘यूरोपीय सेंट्रल बैंक’ के ’यूरोसिस्टम’ के प्रति देश के कर्ज को ‘फ्रीज’ (स्थगित) कर दिया जाए. उनके इस कदम से ‘यूरोजोन’ में दरार पड़ सकती है.

कुछ मायनों में, फ्रांस उस समस्या का प्रतिनिधित्व करता है जो यूरोप के प्रमुख साम्राज्यवादी देशों में फैली हुई हैः जर्मनी, स्पेन और इटली जैसी अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाएं भी भारी महंगाई के दौर से गुजर चुकी हैं. स्पेन और इटली में भी युवाओं के बीच बेरोजगारी 20% से ज्यादा है, और वहां भी राष्ट्रीय कर्ज तेजी से बढ़ रहा है. यूरोप के इन संकटों को वहां के राजनीतिक वर्ग की अमेरिका के इशारों पर चलने की आदत और भी गंभीर बना देती है. यह राजनीतिक वर्ग आम मजदूर वर्ग की मांगों पर ध्यान देने के बजाय, सैन्यीकरण और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जोखिम भरे साहसिक कदमों को बढ़ावा देता है.) – संपादक

2025 में, पेरिस स्थित मेरे विश्वविद्यालय में एक लेक्चर खत्म होने के बाद, मैंने कुछ छात्रों को प्रोफेसर से बात करते देखा. उन्हें जल्दी निकलना था, और मैंने प्रोफेसर को कहते सुना कि वे दूसरी कक्षाएं खत्म होने से पहले उन्हें ज्यादा से ज्यादा समय देने की कोशिश करेंगी. उस समय मुझे यह बात कुछ खास नहीं लगी; वह एक आम दिन जैसा ही लग रहा था, इसलिए मैंने उस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया. हालांकि, जब मैं इमारत से बाहर निकली, तो मैंने उन्हीं छात्रों को बाहर एक मेगाफोन के साथ खड़े देखा. उन्होंने मुख्य गेट पर एक बैनर टांग रखा था और नारे लगा रहे थे, ‘फ्री, फ्री फिलिस्तीन!’ क्या इसीलिए वे क्लास से जल्दी निकल आए थे? क्या प्रोफेसर इसी बारे में बात कर रहे थे?

फ्रांस के ज्यादातर सरकारी विश्वविद्यालयों में इस तरह के प्रदर्शन आम बात हैं. छात्र अक्सर ‘घेराबंदी’ करते हैं. यह विरोध करने का एक जाना-माना तरीका है, जिसमें वे भारी चीजों (अक्सर कचरे के डिब्बों) से संस्थान का प्रवेश द्वार बंद कर देते हैं और सारी पढ़ाई-लिखाई रोक देते हैं, ताकि प्रशासन और सरकार पर दबाव बनाया जा सके. फ्रांस के छात्र हाई स्कूल के दिनों से ही एकजुट होना और अपनी राजनीतिक राय रखना सीख जाते हैं. हाल के हफ्तों में यह बात खास तौर पर देखने को मिली है. सितंबर के अंत से ही हाई स्कूल के छात्रा अपनी शिकायतें सामने लाने के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं.

पेरिस के उपनगर क्रेतेइल में ‘लिसी सेंट-एक्सुपरी’ से शुरू हुई यह हड़ताल अब पूरे देश में फैल गई है. फ्रांसीसी अखबार ‘एक्टुपेरिस’ के अनुसार, विरोध की शुरुआत 21 सितंबर को हुई, जब छात्र कम वेतन और पदों की कमी को लेकर शिक्षकों की हड़ताल में शामिल हो गए. अग्निशमन कर्मियों और नर्सों जैसे अन्य सरकारी कर्मचारियों की बढ़ती नाराजगी को देखते हुए, छात्रों ने ‘घेराबंदी’ शुरू कर दी, जो जल्द ही अन्य उपनगरीय स्कूलों में भी तेजी से फैल गई. ‘द गार्डियन’ के मुताबिक, लगभग 400 हाई स्कूलों की घेराबंदी की गई, जिसके बाद हाई स्कूलों के राष्ट्रीय संगठन ‘यूनियन सिंडिकल लिसीन’ ने 29 सितंबर को पूरे देश में घेराबंदी और एकजुट होने का आह्वान किया.

सितंबर के आखिर में हुए प्रदर्शन एक शुरुआत भर थे. इसके बाद, 1 अक्टूबर को यूनियनों ने ‘एक्ट 2’  के तहत हाई स्कूल के विरोध प्रदर्शनों को विश्वविद्यालयों तक पहुंचा दिया. इसमें ला’फाज, ला’यूनियन एतूदियंत और ला’उनेफ जैसी कई यूनियनों ने समर्थन दिया. फ्रांस भर के कई विश्वविद्यालयों ने इस आंदोलन में हिस्सा लिया. सार्वजनिक जगहों पर भी हिंसा देखने को मिली और पुलिस ने क्रूरतापूर्वक दमन किया. शिक्षा मंत्री एडुआर्ड गेफ्रे ने दावा किया कि आंदोलन में हिंसक गुट घुस आए हैं. हाई स्कूल बंद कर दिए गए और पढ़ाई को ऑनलाइन मोड में शिफ्ट करने का आदेश दिया गया. जैसे-जैसे यह आंदोलन पूरे देश में फैला, कई जगहों पर प्रदर्शन हिंसक हो गए; प्रदर्शनकारियों को पीटा गया और उन पर आंसू गैस के गोले छोड़े गए. लेंस में एक भयानक घटना घटी, जहां एक हाई स्कूल छात्र के हाथ में ग्रेनेड फटने से वह बुरी तरह घायल हो गया.

छात्रों का यह विरोध मौजूदा सरकार की उन नीतियों के खिलाफ है, जिनकी वजह से प्रमुख सार्वजनिक क्षेत्रों के बजट में भारी कटौती की गई है. ‘फ्रांस 24’ के अनुसार, सरकार का लक्ष्य बढ़ते सार्वजनिक कर्ज के बीच 43 अरब यूरो की बचत करना है. इन मितव्ययिता उपायों में वेतन और पेंशन को फ्रीज करना और लगभग सभी सार्वजनिक सेवाओं के फंड में कटौती करना शामिल है. अकेले शिक्षा क्षेत्र में, सरकार ने शिक्षकों के 1,588 पद खत्म कर दिए हैं. गेफ्रे ने छात्रों की घटती संख्या का हवाला देते हुए इन कटौतियों का बचाव किया है.


देशव्यापी विरोध की घोषणा करते हुए, हाई स्कूल यूनियन ने शिक्षकों की कमी, खराब बुनियादी ढांचे और बहुत व्यस्त टाइम-टेबल का मुद्दा उठाया, जिसकी वजह से छात्रों को स्कूल में बहुत लंबे और थका देने वाले घंटे बिताने पड़ते हैं. छात्रों ने ‘पारकोर्सअप’ को लेकर भी शिकायतें कीं. यह विश्वविद्यालयों में दाखिले के लिए एक फ्रांसीसी प्लेटफाॅर्म है, जिसे 2018 में मैक्रों सरकार ने शुरू किया था. इससे पहले, विश्वविद्यालयों में दाखिला ‘एपीबी’ (एडमिशन पोस्ट-बैक) के जरिए होता था, जो ‘बैकालाॅरियेट’ परीक्षा के नतीजों पर आधारित था. सबसे अहम बात यह थी कि उस समय विश्वविद्यालयों को पूरी तरह से मेरिट के आधार पर छात्रों को चुनने की छूट नहीं थी. ‘पारकोर्सअप’ ने इस प्रक्रिया को बदल दिया; अब इसमें मेरिट को प्राथमिकता दी जाती है और छात्रों का चयन उनके शैक्षणिक प्रदर्शन के आधार पर होता है. छात्रों का तर्क है कि लगातार मूल्यांकन और मेरिट पर जोर देने से नस्लीय और आर्थिक कठिनाइयों की अनदेखी होती है. कम फंड वाले उपनगरीय स्कूलों के छात्रों को इस ‘एल्गोरिदम-आधारित ग्रेडिंग’ के कारण नुकसान उठाना पड़ता है. महत्वपूर्ण बात यह है कि फ्रांसीसी छात्रों ने गैर-यूरोपीय छात्रों के लिए अलग (अधिक) ट्यूशन फीस का विरोध किया है. उन्होंने सीवीईएस (CVES) (यह 100 यूरो की एक ‘छात्र सेवा शुल्क’ है, जिसे नामांकन के समय ट्यूशन फीस के साथ देना पड़ता है.) को खत्म करने की भी मांग की है. मैक्रों सरकार ने ‘बिएनवेन्यू एन फ्रांस’ (फ्रांस चुनें) कार्यक्रम के तहत यह नीति लागू की थी, जिसका उद्देश्य फ्रांस में अंतरराष्ट्रीय छात्रों की संख्या बढ़ाना है. इससे पहले, यूरोपीय और गैर-यूरोपीय, दोनों तरह के छात्रा एक रियायती शुल्क (मास्टर्स के लिए 243 यूरो और बैचलर्स के लिए 170 यूरो) का भुगतान करते थे.

जब छात्र अपने संवैधानिक अधिकार के तहत पर्याप्त फंडिंग की मांग करते हैं, तो सरकार बार-बार बढ़ते कर्ज का हवाला देती है; लेकिन साथ ही, वह सैन्य और हथियारों के सौदों में भारी खर्च करके अपनी अमीरी का प्रदर्शन भी करती है. अल जजीरा के एक लेख, “‘कई खतरे’: मैक्रों ने फ्रांस का सैन्य बजट 40% बढ़ाया” के अनुसार, 2024-2030 के लिए सैन्य बजट 413 अरब यूरो होगा, जो पिछले छह वर्षों में आवंटित 295 अरब यूरो से काफी अधिक है. इसके अलावा, ‘पैलेस्टिनियन यूथ मूवमेंट’ और फ्रांसीसी समूह ‘अर्जेंस पैलेस्टाइन’ की एक जांच से पता चला है कि 2024 में सरकार के दावों के विपरीत, फ्रांस अभी भी इजराइल को सैन्य उपकरण भेज रहा है.

छात्रों की शिकायतों और फ्रांस की बजटीय प्राथमिकताओं के बीच का यह बड़ा विरोधाभास दिखाता है कि सरकार हथियारों के अनुसंधान और विकास पर पैसा खर्च करने में अधिक रुचि रखती है. इन हथियारों का इस्तेमाल न केवल विरोध प्रदर्शन कर रहे अपने ही नागरिकों के खिलाफ हिंसा करने में होता है, बल्कि फिलिस्तीनी संघर्ष क्षेत्रों में भी किया जाता है. इसलिए, छात्र केवल बहुत ज्यादा पढ़ाई के बोझ या टाॅयलेट पेपर की कमी की शिकायत नहीं कर रहे हैं. वे एक ऐसी सरकार से जवाबदेही मांग रहे हैं जो अपने ही लोगों की दयनीय स्थिति से आंखें मूंद लेती है, जबकि दूसरी ओर जनसंहार जैसी हिंसा में भागीदार बनने के लिए अपना खजाना खाली कर रही है.

(लिबरेशन, नवंबर 2026 से साभार)


31 October, 2026