वर्ष 35 / अंक - 44 / ब्राजील में लूला की जीत से लैटिन अमेरिका में ट्रम्...

ब्राजील में लूला की जीत से लैटिन अमेरिका में ट्रम्प की साम्राज्यवादी योजनाओं को बड़ा झटका

ब्राजील में लूला की जीत से लैटिन अमेरिका में ट्रम्प की साम्राज्यवादी योजनाओं को बड़ा झटका

भाकपा(माले) लिबरेशन, ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला डा सिल्वा, ‘वर्कर्स पार्टी’ (पार्टिडो डाॅस ट्रैबल्होडोरेस, PT) और ब्राजील की जनता को बधाई देती है. 25 अक्टूबर को हुए राष्ट्रपति चुनाव के दूसरे दौर (रनऑफ) में लूला ने पूर्व राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो के बेटे और कट्टर-दक्षिणपंथी उम्मीदवार फ्लावियो बोल्सोनारो को हराकर जीत हासिल की. यह जीत कट्टर दक्षिणपंथियों और लैटिन अमेरिका में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की साम्राज्यवादी योजनाओं के लिए एक बड़ा झटका है.

लूला का राजनीतिक सफर ब्राजील के मजदूर वर्ग के संघर्षों से जुड़ा है. पेरनामबुको में खेतिहर मजदूरों के एक गरीब परिवार में जन्मे लूला बचपन में ही साओ पाउलो चले गए थे. वहां उन्होंने एक मेटल वर्कर (धातु कर्मी) के रूप में काम किया और बाद में एक ट्रेड यूनियन नेता के रूप में उभरे. 1970 के दशक के अंत में ब्राजील की सैन्य तानाशाही के खिलाफ मजदूरों की बड़ी हड़तालों के जरिए वे चर्चा में आए और 1980 में ‘वर्कर्स पार्टी’ के संस्थापकों में से एक बने. 2002 में पहली बार और 2006 में दोबारा राष्ट्रपति चुने गए लूला, 2022 का चुनाव जीतकर 2023 में फिर से राष्ट्रपति बने. हालिया जीत उनके राष्ट्रपति चुनाव की चैथी जीत है. यह फैक्ट्री के फर्श से लेकर राष्ट्रपति पद तक के उनके असाधारण राजनीतिक सफर को दर्शाती है, जो लोकतंत्र और सामाजिक न्याय के लिए ब्राजील के मजदूर वर्ग के संघर्षों से आकार लेने वाला सफर है.

लूला की जीत ट्रम्प की उन साम्राज्यवादी योजनाओं के लिए एक बड़ा झटका है, जिनका मकसद लैटिन अमेरिका को अमेरिकी वर्चस्व के अधीन लाना और इस पूरे क्षेत्र को वाशिंगटन के ‘पिछवाड़े’ (यानी पूरी तरह से अपने नियंत्रण वाला इलाका) में बदलना था. ‘मोनरो डाॅक्ट्रिन (Monroe Doctrine) की तर्ज पर, ट्रम्प प्रशासन पूरे अमेरिकी महाद्वीप में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता था. इसके लिए वह सैन्य हस्तक्षेप, आर्थिक दबाव और राजनीतिक दबाव का इस्तेमाल करता था, ताकि स्वतंत्र नीति अपनाने वाली सरकारों को अपने अधीन किया जा सके. वेनेजुएला में अमेरिकी दखल और क्यूबा के खिलाफ बढ़ती धमकियां उसके इस आक्रामक एजेंडे को उजागर करती हैं. इस क्षेत्रीय सत्ता के खेल में ब्राजील एक बहुत अहम मोहरा था, जहां बोल्सोनारो का खेमा ट्रम्प के उस नजरिए के साथ खड़ा था, जिसमें पूरे महाद्वीप पर अमेरिका का वर्चस्व हो. अपनी जीत की रैली में लूला का जोरदार बयान प्रतिरोध की भावना को दर्शाता है: ‘हम किसी के पिछवाड़ा (गुलाम) नहीं हैं!’

जैयर बोल्सोनारो के खिलाफ कानूनी कार्रवाई के बीच, ब्राजील पर दंडात्मक शुल्क (टैरिफ) लगाना और बोल्सोनारो खेमे का समर्थन करना, यह दिखाता है कि कैसे देश की राजनीतिक दिशा को प्रभावित करने के लिए आर्थिक दबाव का इस्तेमाल किया गया. अमेरिकी साम्राज्यवाद ने ब्राजील की चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने और माहौल को बोल्सोनारो के धुर-दक्षिणपंथी (ति-तपहीज) खेमे के पक्ष में मोड़ने के लिए ‘बिग टेक’ (बड़ी टेक कंपनियों) और सोशल मीडिया के हेरफेर का भी सहारा लिया. एलन मस्क  – जो अमेरिका और वैश्विक स्तर पर धुर-दक्षिणपंथी विचारधारा के एक बड़े फाइनेंसर हैं और ‘एक्स (X)’ (ट्विटर) के मालिक हैं – उन्होंने एक ऐसा राजनीतिक माहौल बनाने में मदद की, जहां धुर-दक्षिणपंथी ताकतें जनमत को अपने हिसाब से ढालने के लिए डिजिटल प्लेटफाॅर्म का फायदा उठाती हैं.

फ्लेवियो बोल्सोनारो को सत्ता में लाने की कोशिश, कामगार लोगों और ब्राजील की लोकतांत्रिक व राष्ट्रीय संप्रभुता की रक्षा करने वाली ताकतों के खिलाफ दक्षिणपंथी खेमे के एक बड़े हमले का हिस्सा थी. फिर भी, इन कठिन चुनौतियों और पहले दौर में पीछे रहने के बावजूद, लूला ने अपना समर्थन जुटाया और दूसरे दौर (रनऑफ) में जीत हासिल की. यह जन-लामबंदी की मजबूती और उस सामूहिक ताकत को दिखाता है, जो धुर-दक्षिणपंथियों के आक्रामक हमलों के खिलाफ एकजुट होकर खड़ी हुई.

लूला की जीत यह भी दिखाती है कि ब्राजील के लोग फिलिस्तीनी संघर्ष के साथ एकजुट हैं और गाजा में इजरायल द्वारा किए जा रहे नरसंहार का विरोध करते हैं. जब ट्रम्प-नेतन्याहू की आपराधिक धुरी लैटिन अमेरिकी देशों को अपने एजेंडे के आगे झुकाने और फिलिस्तीनी लोगों के खिलाफ इजरायल के अपराधों के विरोध को दबाने की कोशिश कर रही थी, तब ब्राजील ने फिलिस्तीनी अधिकारों के समर्थन में एक मजबूत रुख अपनाया. ब्राजील उन ‘ग्लोबल साउथ’ (विकासशील देशों) में शामिल था, जो दक्षिण अफ्रीका के साथ मिलकर इजरायल को गाजा में नरसंहार और फिलिस्तीनी लोगों के खिलाफ किए गए अपराधों के लिए अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (आइसीजे) में ले गए.

भाकपा(माले) लिबरेशन ब्राजील की जनता, ‘वर्कर्स पार्टी’ और उन सभी प्रगतिशील, लोकतांत्रिक व मजदूर-वर्गीय ताकतों के प्रति अपनी क्रांतिकारी एकजुटता व्यक्त करती है, जो धुर-दक्षिणपंथियों और साम्राज्यवादी खतरों के खिलाफ डटकर खड़ी रहीं.

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लूला की जीत के मायने

लैटिन अमेरिका के एक प्रमुख देश ब्राजील में 6.4 करोड़ वोट हासिल कर जीत दर्ज करते हुए लुइज इनासियो लूला डा सिल्वा ने किसी राष्ट्रपति द्वारा पाए जाने वाले अधिकतम मत का रिकाॅर्ड बनाया. उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी को 40 लाख से अधिक मतों से शिकस्त दी. यह उनका चौथा कार्यकाल होगा. अपने धुर दक्षिणपंथी प्रतिद्वंद्वी के मुकाबले उन्हें 51.79% वोट हासिल हुए. लुला की जीत इस मायने में भी ऐतिहासिक है कि पहले चक्र में हारने के बाद दूसरे चक्र में पहली बार ही किसी राष्ट्रपति को विजय मिली है. लूला ने कहा कि उनकी यह जीत नकारात्मकता और झूठ के खिलाफ जीत है. सजा काट रहे पूर्व राष्ट्रपति के बेटे ने अपनी हार मानने से इनकार कर दिया है, लेकिन उससे अब कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है. मतदान के दो घंटे बढ़ाए जाने पर बोल्सोनारो के समर्थक पक्षपात का आरोप लगा रहे हैं. हालांकि दोनों ही पक्षों ने मौसम खराब होने के कारण मतदान का समय बढ़ाने की मांग की थी. दोनों पक्षों को पता था कि एक-एक वोट का महत्व था. मुख्य चुनाव अधिकारी ने, जिनकी नियुक्ति बोल्सोनारो के पिता ने अपने राष्ट्रपति कार्यकाल में ही की थी, लुला की जीत का ऐलान किया और कहा कि अतिरिक्त समय में वोटर बढ़ने से नतीजों पर कोई असर नहीं पड़ा है. दोनों के मतों में 44 लाख का भारी अंतर है इसलिए चुनाव नतीजों को चुनौती देने का कोई औचित्य नहीं है. इसतरह लूला ने चौथी बार चुनाव जीतकर इतिहास रच दिया.

4 अक्टूबर को हुए पहले चक्र में 45% मतों  के साथ लूला 47% मत पाने वाले बोल्सोनारो से पिछड़ गए थे. लेकिन जिन 3.3 करोड़ लोगों ने पहले चक्र में वोट नहीं दिया था, उन पर केंद्रित करने से लूला के प्रचार अभियान को आवेग मिला. लूला ने कहा – मेरा यह कार्यकाल ब्राजील के लिए किसी भी राष्ट्रपति के कार्यकाल से अच्छा साबित होगा. इस कार्यकाल में मैं ब्राजील की जनता की आवाज सबसे अधिक सुनूंगा. मैं सभी के लिए काम करूंगा और ब्राजील की संप्रभुता की रक्षा करूंगा.’ उन्होंने ट्रंप की ओर इशारा करते हुए कहा कि ब्राजील किसी का पिछवाड़ा नहीं है. लूला ने कहा कि लोग वोट डालने गए क्योंकि हम लोगों को समझाने में सफल रहे कि देश में लोकतंत्र की रक्षा के लिए उनका वोट डालना कितना जरूरी है.

अर्धरात्रि में अपने समर्थकों को संबोधित करते हुए लूला ने तब ट्रंप को भी कड़ा संदेश दे दिया जब उन्होंने कहा कि ब्राजील ने धुर दक्षिणपंथी ताकतों, विदेशी हस्तक्षेप तथा मेटा जैसे सोशल मीडिया हस्तक्षेप को ब्राजील की जनता ने पराजित किया है. अपने भावुक भाषण में लूला ने महिलाओं और बुजुर्गों को समर्थन के लिए धन्यवाद दिया. साथ ही, सड़कों पर गोलबंदी के लिए नौजवानों की तारीफ की. उन्होंने कहा कि चुनाव से उन्होंने बहुत से सबक सीखे हैं. वे शासन के अपने तरीके में बदलाव करेंगे और सरकार के फैसलों में जनता की और अधिक भागीदारी को सुनिश्चित करेंगे. नौजवानों में बोल्सोनारो के राष्ट्रपति बनने पर सरकारी शिक्षा, स्वास्थ्य व परिवहन पर सरकारी खर्च की कटौती को लेकर भारी आशंकाएं थीं, इसलिए वे उसके खिलाफ भारी तादाद में लूला की रैलियों में निकले. लूला ने कहा कि उनका संदेश उन तक पहुंच गया है. वे एकीकृत स्वास्थ्य व्यवस्था में और निवेश बढ़ाएंगे, राष्ट्रीय एआइ सिस्टम विकसित करेंगे और सरकारी विश्वविद्यालयों को और विस्तार देंगे.

चुनाव अभियान के दौरान लूला की टीम ने व्यक्तियों की तुलना करने के बजाय ठोस वायदों पर आधारित प्रगतिशील एजेंडे पर जोर दिया. लूला ने कहा, ‘इस चुनाव में हमें बाहर से डिजिटल प्लेटफाॅर्म से आने वाले प्रचार का मुकाबला करना पड़ा. हमें उन्हें नियंत्रित करना पड़ेगा.’ मेटा ने इस बात को स्वीकार किया कि उसके एआइ टूल ने लूला के पक्ष के प्रचार को बाधित किया और उसी तकनीक से बोल्सोनारो के प्रचार को मदद पहुंचाई. जनता के समर्थन के बल पर लूला ने ट्रंप को भी शिकस्त दी जिन्होंने उनके प्रतिद्वंद्वी को अपना समर्थन दे रखा था. लूला की जीत पूरे लैटिन अमेरिका में दक्षिणपंथी नेताओं के उभार के लिए भी धक्का है. उनकी जीत अमेरिका की लैटिन अमेरिका में रक्षा रणनीति के लिए भी सबक है.

वे मेहनतकश गरीबों के रक्षक के बतौर अपनी छवि बनाने में सफल रहे. उन्होंने सार्वभौम स्वास्थ्य सेवा और नकद भुगतान योजना को लागू किया जिसने करोड़ों गरीबों को गरीबी से बाहर निकाला. वे काॅर्पाेरेट लाॅबी के खिलाफ जाकर 6 दिन के सप्ताह के बजाय 40-44 घंटे काम के सप्ताह के पक्ष में और ऊंचे काॅर्पाेरेट मुनाफे पर टैक्स, जंगलों की कटान को रोकने के लिए ताकतवर एग्री बिजनेस और खनन निगमों के खिलाफ खड़े हुए. उनकी छवि लोक कल्याणकारी नीतियों को लागू करने वाले और लोकतंत्र तथा राष्ट्रीय संप्रभुता के लिए लड़ रहे राजनेता के बतौर उभरी. वहीं इसके विपरीत, बोल्सोनारो की छवि चरम नव उदारवादी नीतियों के पक्षधर, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी और घरेलू काॅर्पोरेट घरानों के प्रतिनिधि, अमीरपरस्त, ट्रम्प के पिठ्ठू और लोकतंत्र विरोधी नेता की बनी. जनता ने लूला को अपना राष्ट्रपति चुना. उनकी इस ऐतिहासिक जीत की गूंज पूरे लैटिन अमेरिका में सुनाई पड़ेगी. ब्राजील की इस कहानी में भारत के लिए भी कई सबक छिपे हैं.           

– लाल बहादुर सिंह 

31 October, 2026