वर्ष 35 / अंक - 44 / जेएनयू में निष्कासन और प्रतिरोध के बीच संघर्ष

जेएनयू में निष्कासन और प्रतिरोध के बीच संघर्ष

जेएनयू में निष्कासन और प्रतिरोध के बीच संघर्ष

– दानिश अली

साल 2026 को पूरे देश में, जंतर-मंतर से लेकर विश्वविद्यालय परिसरों तक फैले छात्र विरोध प्रदर्शनों की लहर के लिए याद किया जाएगा. जंतर-मंतर पर होने वाले प्रदर्शनों से कई महीने पहले ही, जब असहमति को लोकतांत्रिक अधिकार के बजाय एक ‘परेशानी’ के रूप में देखा जाने लगा है, तब जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) सार्वजनिक शिक्षा, सामाजिक न्याय और छात्रा लोकतंत्र के लिए एक अहम लड़ाई का मैदान बनी हुई है.

भाजपा-आरएसएस गठजोड़ द्वारा लंबे समय से ‘राष्ट्र-विरोधी’ करार दिए गए जेएनयू ने हमेशा निजीकरण, फीस में बढ़ोतरी और ‘डेप्रिवेशन पाॅइंट सिस्टम’ (वंचित समूहों को मिलने वाले अतिरिक्त अंक) जैसी सकारात्मक नीतियों को खत्म करने की कोशिशों का विरोध किया है. साथ ही, जाति, लिंग और सामाजिक पदानुक्रम (hierarchies) पर अपनी बेबाक चर्चाओं के जरिए इसने सत्ता में बैठे लोगों को असहज भी किया है. नवंबर 2025 से, जेएनयू के छात्र न केवल अपने अधिकारों के लिए, बल्कि छात्र लोकतंत्र को बचाने और परिसर में असहमति की गुंजाइश बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

ताजा विवाद का मुख्य कारण सेंट्रल लाइब्रेरी में ‘फेशियल रिकग्निशन टेक्नोलाॅजी’ (एफआरटी) और मेट्रो-स्टाइल गेट लगाना है. इसे ‘अवैध छात्रों’ को दूर रखने के लिए सुरक्षा उपाय बताया गया, लेकिन इन चीजों के लगने से निगरानी (सर्विलांस) बढ़ने और लोकतांत्रिक जगह के सिकुड़ने को लेकर चिंताएं पैदा हो गई हैं. छात्रों के विरोध पर प्रशासन के रुख ने इस विवाद को और भड़का दिया है. जेएनयूएसयू के सभी चार पदाधिकारियों और पूर्व यूनियन अध्यक्ष को यूनिवर्सिटी से निष्कासित कर दिया गया और उन पर बीस-बीस हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया. इसके बाद उन्हें परिसर में आने से रोक दिया गया, कैंपस के सभी गेटों पर निष्कासित छात्रों की तस्वीरें लगा दी गईं, हाॅस्टल रिकाॅर्ड से उनके नाम हटा दिए गए, मेस की सुविधाएं बंद कर दी गईं, स्काॅलरशिप रोक दी गई और उनका शैक्षणिक भविष्य खतरे में पड़ गया.

आठ अन्य छात्रों पर भी उन्नीस-उन्नीस हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया. उन्हें दिए गए नोटिस में बेशर्मी से इस बात का जिक्र किया गया कि वे विरोध स्थल पर मौजूद थे, जहां उन्हें ताली बजाते, मुस्कुराते और नारे लगाते देखा गया था. जेएनयू प्रशासन द्वारा अनुशासन की इस अजीबोगरीब व्याख्या में, ताली बजाना भी एक दंडनीय अपराध बन गया. अब सवाल यह उठता है कि क्या अगला सर्कुलर भौहें ऊपर उठाने पर रोक लगाएगा, या मुस्कुराने के लिए भी पहले से अनुमति लेनी पड़ेगी?

ये मनमाने कदम ‘चीफ प्राॅक्टर ऑफिस’ (सीपीओ) के उस कठोर मैनुअल के जरिए उठाए गए हैं, जिसे छात्र यूनियन दमन का एक हथियार मानती है. प्रशासनिक भवनों और आवासीय क्षेत्रों के सौ मीटर के दायरे में विरोध प्रदर्शनों पर लगी पाबंदियों ने कैंपस के एक बड़े हिस्से को छात्रों की पहुंच से बाहर कर दिया है. ‘राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों’ से जुड़ा इसका प्रावधान एक सीधा सवाल खड़ा करता है: कौन तय करेगा कि क्या इस श्रेणी में आता है, और इसके लिए क्या सुरक्षा उपाय होंगे? अस्पष्ट नियम तब और भी खतरनाक हो जाते हैं, जब उन्हें लागू करने वालों की सोच ही असहमति और छात्र राजनीति को अपराध की तरह देखने की हो.

यह कार्रवाई तब और तेज हो गई, जब 26 फरवरी को विश्वविद्यालय के गेट से शिक्षा मंत्रालय की ओर निकाले गए एक मार्च के बाद छात्रों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर ली गई. कुल 14 छात्रों को – जिनमें आइसा अध्यक्ष नेहा, जेएनयूएसयू अध्यक्ष अदिति, उपाध्यक्ष गोपिका, जेएनयूएसयू के पूर्व अध्यक्ष नीतीश और मैं खुद शामिल थी – तीन दिनों के लिए तिहाड़ जेल भेज दिया गया. यह बेहद दुखद है कि हमारे देश के सरकारी दफ्तर, जिन्हें आम लोगों की समस्याओं को सुनना चाहिए, वे अब पहुंच से इतने बाहर हो गए हैं. छात्रों को सिर्फ इसलिए अपराधी मानकर जेल में डाल दिया जाता है क्योंकि उन्होंने इन दफ्तरों की ओर मार्च करने की हिम्मत की.


भूख हड़ताल

जेएनयूएसयू और 15 अन्य छात्रों ने 3 अक्टूबर को भूख हड़ताल शुरू की. उनकी मांग थी कि छात्रों के निष्कासन का फैसला वापस लिया जाए और कैंपस से जुड़े अन्य व्यापक मुद्दों पर ध्यान दिया जाए. कई दिनों तक प्रशासन ने बातचीत शुरू करने की कोई कोशिश नहीं की. भूख हड़ताल पर बैठे निकाले गए छात्रों के लिए मेडिकल जांच की सुविधा भी नहीं दी गई, जो दिखाता है कि जेएनयू प्रशासन अपने ही छात्रों के प्रति कितना अमानवीय हो सकता है.

निगरानी और गेट

हमारी मांगें केवल निगरानी (सर्विलांस) के मुद्दे तक सीमित नहीं हैं. हाल ही में सत्य निकेतन में एक इमारत ढहने से कई छात्रों की जान चली गई, जिसने दिल्ली में छात्रों के रहने की असुरक्षित स्थितियों को उजागर कर दिया है. जेएनयू भी इससे अछूता नहीं है, भले ही यहां हाॅस्टल की काफी क्षमता है. छात्रों ने बताया है कि हाॅस्टल और लाइब्रेरी में छतें और पंखे गिर रहे हैं, जिससे कई बार गंभीर चोटें भी आई हैं. मरम्मत की हमारी लगातार मांगों पर प्रशासन का हमेशा यही जवाब होता है कि फंड (धन) उपलब्ध नहीं है. छात्रों की भूख हड़ताल के बाद खोला गया ‘बराक हाॅस्टल’ आज भी मेस और वाई-फाई जैसी सुविधाओं से वंचित है. ऐसे में सवाल उठता है कि अगर बुनियादी सुविधाएं ही न मिलें, तो ऐसे हाॅस्टल का क्या फायदा?

जब भी यूनियन ये सवाल उठाती है, तो प्रशासन का एक ही जवाब होता है – फंड की कमी. फंड में कटौती एक सोची-समझी रणनीति है, जिसके जरिए सरकारी विश्वविद्यालयों को बर्बाद किया जा रहा है. इससे बुनियादी ढांचा (इंफ्रास्ट्रक्चर) चरमरा जाता है और इसी तरह सरकारी विश्वविद्यालयों का निजीकरण किया जा रहा है.

जेएनयू के छात्र ‘रोहित एक्ट’ की तर्ज पर ‘इक्वल अपाॅर्चुनिटी सेल’ (इओसी) में सुधार की मांग कर रहे हैं. विश्वविद्यालयों में जातिगत भेदभाव एक गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है, और एक प्रगतिशील परिसर होने के बावजूद जेएनयू में भी ऐसे कई मामले सामने आए हैं. बेहद शर्मनाक बात यह है कि इस साल की शुरुआत में कुलपति ने दलितों के अनुभवों की तुलना एक गहरी बैठी ‘पीड़ित होने की मानसिकता’ (विक्टिमहुड मेंटालिटी) से की, जिससे चिंताएं और बढ़ गईं. ऐसे माहौल में, परिसर के भीतर भेदभाव से निपटने के लिए एक सक्रिय, स्वतंत्र और जवाबदेह ‘इक्वल अपाॅर्चुनिटी सेल’ का होना बहुत जरूरी है.

समावेशी शिक्षा के लिए संघर्ष

छात्र जेएनयू की अपनी प्रवेश परीक्षा, ‘JNUEE’ को फिर से शुरू करने की मांग कर रहे हैं. उनका तर्क है कि ‘नेशनल टेस्टिंग एजेंसी’ (एनटीए) की परीक्षाओं में हुई गड़बड़ियों ने केंद्रीकृत परीक्षा प्रणाली पर भरोसे को काफी कम कर दिया है. उनका मानना है कि विश्वविद्यालय की अपनी प्रवेश प्रणाली, यहां की शैक्षणिक जरूरतों के हिसाब से ज्यादा बेहतर थी. यौन उत्पीड़न के मामलों से निपटने के लिए जेएनयूकी चुनी हुई व्यवस्था, ‘जीएसकैश’ को बहाल करना भी एक पुरानी मांग है. 2017 में इसे खत्म कर इसकी जगह ‘आइसीसी’ नाम की एक संस्था बना दी गई थी. छात्र एक ऐसी स्वतंत्र और प्रतिनिधि संस्था की मांग कर रहे हैं, जो यौन उत्पीड़न की शिकायतों पर समय रहते निष्पक्ष कार्रवाई सुनिश्चित कर सके. ऐसे समय में जब दिल्ली भर के छात्र, खासकर युवा महिलाएं, लैंगिक न्याय के लिए सड़कों पर उतर रहे हैं, यह बहुत जरूरी है कि जेएनयू खुद ‘जीएसकैश’ के लिए अपने आंदोलन का नेतृत्व करे.

आर्थिक न्याय भी मायने रखता है. ‘दो हजार में दम नहीं, पांच हजार से कम नहीं’ – यह नारा बढ़ती महंगाई के बीच ‘मेरिट-कम-मीन्स’ फेलोशिप की राशि न बढ़ने को लेकर छात्रों की निराशा को दर्शाता है. अन्य मांगों में शामिल हैं: सेंट्रल लाइब्रेरी में बैठने की अधिक जगह, दिव्यांग छात्रों के हाॅस्टल में 24 घंटे काम करने वाली लिफ्ट, ट्रांसजेंडर आरक्षण और उनके लिए उचित आवास, सड़कों की मरम्मत, तथा स्टेडियम और यूनियन कार्यालय का नवीनीकरण. छात्रों की एकजुटता ने प्रशासन को पीछे हटने पर मजबूर किया.

जेएनयू छात्रों के लगातार और एकजुट विरोध, जिसमें 17 दिनों तक चली भूख हड़ताल भी शामिल थी,  ने विश्वविद्यालय प्रशासन को कई मांगों को मानने के लिए मजबूर कर दिया है. इन मांगों में जेएनयूएसयू के पदाधिकारियों और पूर्व अध्यक्ष के निष्कासन को रद्द करना, प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी वापस लेना, और छात्र आंदोलनों से जुड़ी प्राॅक्टोरियल जांच को खत्म करना शामिल है. यह समझौता छात्रों के उस सामूहिक संघर्ष की एक बड़ी जीत है, जो प्रशासन द्वारा असहमति को दबाने और कैंपस में लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को कमजोर करने की कोशिशों के खिलाफ लड़ा गया था. इस भूख हड़ताल ने निर्वाचित छात्र प्रतिनिधियों के खिलाफ की गई दंडात्मक कार्रवाई के विरोध को, शिक्षा तक समान पहुंच, सुरक्षित और सम्मानजनक हाॅस्टल सुविधाओं तथा एक लोकतांत्रिक और समावेशी विश्वविद्यालय की व्यापक मांगों के साथ जोड़ दिया है.

यह लड़ाई कभी भी सिर्फ लाइब्रेरी में कैमरे और गेट लगाने तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह असहमति जताने के अधिकार, सार्वजनिक शिक्षा की रक्षा और खुद विश्वविद्यालय के लोकतांत्रिक स्वरूप को बचाने की लड़ाई थी.


31 October, 2026