-- रंजन श्रीवास्तव
20 फरवरी 2025, यह वह तारीख थी जब भारतीय जनता पार्टी की नेता रेखा गुप्ता ने मुख्यमंत्री बनने के बाद दिल्ली की जनता को ‘ट्रिपल इंजन’ (केंद्र, राज्य और नगर निगम में एक ही पार्टी की सरकार) का सुनहरा ख्वाब दिखाया गया था. तर्क दिया गया कि जब तीनों स्तरों पर एक ही विचारधारा की सरकार होगी, तो दिल्ली के विकास में कोई अड़ंगा नहीं लगेगा, फाइलें नहीं अटकेंगी, उपराज्यपाल (LG) और मुख्यमंत्री के बीच का टकराव खत्म होगा और नीतियां सीधे जमीन पर उतरेंगी.
लेकिन आज, जब मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के कार्यकाल का एक साल पूरा हो चुका है, तो दिल्ली की सड़कों, झुग्गियों, अस्पतालों, औद्योगिक क्षेत्रों और चौराहों पर एक अलग ही कहानी तैर रही है. यह एक साल उपलब्धियों से अधिक विवादों, वीआईपी संस्कृति, प्रशासनिक पंगुता, गरीबों की अनदेखी और अधूरे वादों का साल रहा है. बीते एक साल के अनुभवों ने दिल्लीवासियों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या उन्होंने बदलाव के नाम पर केवल एक नए राजनीतिक ‘जुमले’ को चुना है?
आधी आबादी से छलावा: 2,500 रु. की ‘गारंटी’ का सफेद झूठ
राजनीति में लोकलुभावन वादे कोई नई बात नहीं हैं, लेकिन जब कोई वादा चुनाव जीतने का मुख्य हथियार बन जाए और सत्ता मिलते ही उसे भुला दिया जाए, तो यह सीधे तौर पर जनता के साथ विश्वासघात की श्रेणी में आता है. चुनाव प्रचार के दौरान मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और उनके शीर्ष नेतृत्व ने दिल्ली की महिलाओं को ‘मोदी की गारंटी’ के तहत हर महीने 2,500 रूपये की ‘सम्मान राशि’ देने का वादा किया था. इस वादे ने चुनाव के नतीजे तय करने में एक निर्णायक भूमिका निभाई थी.
योजना के अनुसार, 8 मार्च 2025 (अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस) से यह राशि महिलाओं के बैंक खातों में पहुंचनी शुरू हो जानी चाहिए थी. आज एक साल से ज्यादा का वक्त बीत चुका है. महंगाई की चौतरफा मार झेल रही दिल्ली की लाखों गृहिणियां, कामकाजी महिलाएं और छात्राएं आज भी बैंक की पासबुक अपडेट कराकर इस उम्मीद में लौट आती हैं कि शायद अगले महीने से पैसे आने शुरू हो जाएं.
जब विपक्ष और मीडिया ने इस वादे पर सवाल पूछे, तो सरकार की ओर से कभी डेटा कलेक्शन की धीमी प्रक्रिया, तो कभी बजट आवंटन की कमी का बहाना बनाया गया.
इस वादे के पूरा न होने से सबसे ज्यादा चोट उस निम्न-मध्यम वर्ग और गरीब तबके को पहुंची है, जिसने इस रु. 2,500 को अपने घरेलू बजट और बच्चों की ट्यूशन फीस का हिस्सा मान लिया था. यह केवल एक आर्थिक विफलता नहीं है, बल्कि उस भरोसे की हत्या है जो एक महिला मतदाता वोट डालते समय ईवीएम (EVM) का बटन दबाकर करती है.
धुएं में घुटती दिल्ली और ‘ऑक्सीजन’ पर मुख्यमंत्री का हास्यास्पद ज्ञान
दिल्ली की आबोहवा हर साल सर्दियों में एक ‘गैस चैंबर’ में तब्दील हो जाती है. यह एक ऐसी क्रोनिक समस्या है जिसके समाधान के लिए जनता ने ‘ट्रिपल इंजन’ सरकार की ओर भारी उम्मीदों से देखा था. यह माना जा रहा था कि अब चूंकि केंद्र और दिल्ली में एक ही सरकार है, तो पंजाब, हरियाणा और अन्य पड़ोसी राज्यों के साथ मिलकर पराली, औद्योगिक उत्सर्जन और प्रदूषण का कोई स्थायी और ठोस समाधान निकाला जाएगा.
हकीकत यह रही कि इस एक साल में वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) ने खतरनाक स्तर के नए रिकाॅर्ड बनाए. प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए पिछले वर्षों में अपनाए गए डस्ट कंट्रोल नाॅर्म्स, कंस्ट्रक्शन बैन की सख्ती और ‘ऑड-ईवन’ जैसे तात्कालिक उपायों को भी इस सरकार ने दरकिनार कर दिया. करोड़ों की लागत से बने स्माॅग टावर सफेद हाथी साबित हुए और सड़कों पर पानी के छिड़काव की मशीनें केवल लुटियंस और वीआईपी इलाकों तक ही सीमित रहीं.
प्रदूषण की इस भीषण त्रासदी के बीच, मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता का एक बयान राष्ट्रीय स्तर पर मजाक का विषय बन गया. एक हालिया तकनीक और पर्यावरण प्रदर्शनी के दौरान उन्होंने सार्वजनिक मंच से पूरे आत्मविश्वास के साथ दावा किया कि ‘सफेदा, कीकर और बबूल जैसे पेड़ ऑक्सीजन नहीं देते हैं.’ यह बयान न केवल उनके बुनियादी वैज्ञानिक ज्ञान के अभाव को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि दिल्ली जैसे अति-संवेदनशील और प्रदूषित शहर का नेतृत्व किस तरह की मानसिकता के हाथों में है. जब प्रदेश का मुखिया ही प्रकाश संश्लेषण जैसी प्राथमिक वैज्ञानिक प्रक्रिया को झुठला रहा हो, तो उस सरकार से पर्यावरण संरक्षण और क्लाइमेट चेंज को लेकर किसी ठोस नीति की उम्मीद करना बेमानी है. त्रासदी यह है कि दिल्ली के बच्चे और बुजुर्ग आज भी काली और जहरीली हवा खींचने को मजबूर हैं.
यमुना की सफाई का सच: छठ पूजा का वीआईपी पाखड और ‘नकली यमुना’
यमुना नदी केवल दिल्ली की जीवनरेखा नहीं है, बल्कि यह इस शहर की सांस्कृतिक पहचान और आस्था का केंद्र भी है. चुनाव से पहले बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगाकर दावा किया गया था कि सत्ता में आते ही यमुना को ऐसा साफ किया जाएगा कि उसमें ‘क्रूज’ चलाए जाएंगे और लोग इसके घाटों पर विदेशी तर्ज पर पिकनिक मनाएंगे. लेकिन हकीकत में ये वादे एक भद्दे और क्रूर मजाक में तब्दील हो गए, जिसका सबसे वीभत्स रूप छठ पूजा के दौरान देखने को मिला.
एक साल बाद, वजीराबाद से लेकर ओखला बैराज तक यमुना का पानी आज भी गाढ़े काले रसायन, औद्योगिक कचरे और जहरीले सफेद झाग से ढका हुआ है. नजफगढ़ नाले और शाहदरा ड्रेन समेत दिल्ली के दर्जनों बड़े नालों का औद्योगिक और घरेलू कचरा आज भी बिना पूरी तरह ट्रीट किए सीधे यमुना में गिर रहा है. सफाई के नाम पर शुरुआत में जो कुछ एरेटर नदी में उतारे गए थे, वे कुछ हफ्तों के फोटो-ऑप के बाद खामोश हो गए या जंग खा रहे हैं.
बुलडोजर का खौफ: ‘जहां झुग्गी, वहां मकान’ से ‘जहां झुग्गी, वहां मैदान’ तक
किसी भी लोकतांत्रिक और कल्याणकारी सरकार की पहली जिम्मेदारी समाज के सबसे हाशिए पर खड़े और कमजोर व्यक्ति का संरक्षण करना होती है. चुनाव के दौरान ‘जहां झुग्गी, वहां मकान’ का नारा दिल्ली की मलिन बस्तियों में रहने वाले लाखों लोगों के लिए एक संजीवनी की तरह था. उन्हें सपने दिखाए गए थे कि उन्हें उनके कच्चे और जर्जर घरों की जगह पक्के फ्लैट दिए जाएंगे, जहां वे सम्मानजनक जीवन जी सकेंगे.
सत्ता में आने के बाद, पुनर्वास की नीतियां तो सरकारी फाइलों में दब गईं, लेकिन एमसीडी और डीडीए (जो अब पूरी तरह राज्य और केंद्र सरकार के साथ हैं) के बुलडोजर पूरी ताकत के साथ सड़कों पर उतर आए. अतिक्रमण हटाने और ‘सौंदर्यीकरण’ के नाम पर दिल्ली के कई इलाकों में अंधाधुंध तोड़फोड़ की गई.
कड़कड़ाती ठंड और चिलचिलाती गर्मी के मौसम में हजारों परिवारों को बिना किसी नोटिस के बेघर कर दिया गया. बच्चों की पढ़ाई बीच में छूट गई, गर्भवती महिलाओं को खुले आसमान के नीचे रातें गुजारनी पड़ीं और दिहाड़ी मजदूरों का रोजगार छिन गया.
विपक्ष ने इस क्रूर प्रशासनिक रवैये को ‘जहां झुग्गी, वहां मैदान’ का नाम दिया. बिना किसी पूर्व वैकल्पिक व्यवस्था या आश्रय के की गई यह कार्रवाई मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन है.
यह सरकार का दोहरा मापदंड है कि जहां एक तरफ अनधिकृत काॅलोनियों में रहने वाले रसूखदार और अमीर लोगों को नियमितीकरण का तोहफा दिया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ शहर का सारा बोझ अपने कंधों पर उठाने वाले गरीब मजदूरों की बस्तियों को रातों-रात मलबे में तब्दील किया जा रहा है.
मजदूरों और गरीबों की दुर्दशा
दिल्ली की चकाचौंध के पीछे उस असंगठित मजदूर वर्ग का पसीना है, जिसकी सबसे ज्यादा अनदेखी की गई है. ‘ट्रिपल इंजन’ सरकार ने सत्ता में आते ही मजदूरों के हितों की रक्षा और न्यूनतम मजदूरी को कड़ाई से लागू करने का दम भरा था, लेकिन जमीनी हकीकत बेहद डरावनी है.
दिल्ली के बवाना, नरेला, ओखला और कीर्ति नगर जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में सरकार ने कागजों पर तो न्यूनतम मजदूरी की दरें तय कर दी हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर श्रम विभाग की मिलीभगत और निष्क्रियता के कारण ठेकेदारी प्रथा चरम पर है. फैक्ट्रियों और निर्माण कार्यों में लगे मजदूरों को आज भी तय मजदूरी की आधी कीमत पर 12 से 14 घंटे काम करने के लिए मजबूर किया जाता है. इस एक साल में सरकार ने श्रम कानूनों का उल्लंघन करने वाली बड़ी कंपनियों या फैक्ट्री मालिकों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की, जिससे स्पष्ट होता है कि सरकार पूंजीपतियों के आगे नतमस्तक है.
दिल्ली की जानलेवा ठंड में फुटपाथ पर सोने वाले बेघर मजदूरों के लिए ‘रैन बसेरे’ ही एकमात्र सहारा होते हैं. मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के इस एक साल के कार्यकाल में दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड पूरी तरह से पंगु नजर आया. अधिकांश रैन बसेरों में क्षमता से अधिक भीड़ है, टाॅयलेट उफन रहे हैं और महिलाओं के लिए सुरक्षित आश्रय स्थलों की भारी कमी है. बुनियादी सुविधाओं के अभाव के चलते हजारों मजदूर खुले आसमान और फ्लाईओवरों के नीचे सोने को मजबूर रहे. इस साल ठंड के मौसम में कई बेघर मजदूरों की जान जाने की खबरें भी आईं, जिसे सरकार ने केवल ‘प्रशासनिक आंकड़े’ मानकर नजरअंदाज कर दिया.
श्रमिक कल्याण बोर्ड और राशन प्रणाली की पंगुता
दिल्ली के लाखों निर्माण मजदूरों के कल्याण के लिए करोड़ों रुपये का फंड ‘श्रमिक कल्याण बोर्ड’ में जमा है. लेकिन मजदूरों के बच्चों की शिक्षा, चिकित्सा और बेटियों की शादी के लिए मिलने वाली वित्तीय मदद की फाइलें लालफीताशाही के जाल में उलझ गई हैं. साथ ही, सार्वजनिक वितरण प्रणाली का बुरा हाल है. प्रवासी मजदूरों को तकनीकी खामियों, ई-पीओएस मशीनों की खराबी और कोटेदारों की मनमानी के कारण राशन के लिए घंटों लाइनों में लगने के बाद भी खाली हाथ लौटना पड़ रहा है.
शिक्षा और स्वास्थ्य के ढहते स्तंभ
दिल्ली ने पिछले एक दशक में शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक ऐसा माॅडल तैयार किया था जिसकी चर्चा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हुई थी. नई सरकार से यह अपेक्षा थी कि वह दलगत राजनीति से ऊपर उठकर इन माॅडलों को और बेहतर बनाएगी. लेकिन मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के कार्यकाल का यह सबसे काला अध्याय रहा है कि उन्होंने ‘राजनीतिक प्रतिशोध’ के चलते पिछली सरकार की कई जन-कल्याणकारी और सफल योजनाओं को ठंडे बस्ते में डाल दिया.
सरकारी स्कूलों में बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और भविष्य निर्माण के लिए चलाए जा रहे ‘हैप्पीनेस करिकुलम’ (Happiness Curriculum) और ‘एंटरप्रेन्योरशिप करिकुलम’ (Business Blasters) की फंडिंग रोक दी गई है. गरीब तबके के मेधावी छात्रों के लिए शुरू की गई मुफ्त ‘IIT&NEET कोचिंग’ योजना को बजट की कमी का हवा-हवाई हवाला देकर बंद कर दिया गया है, जिससे हजारों गरीब छात्रों के डाॅक्टर-इंजीनियर बनने के सपने टूट गए. प्राइवेट स्कूलों की फीस पर लगाम कसने के लिए जो सख्ती पहले दिखती थी, वह अब पूरी तरह नदारद है. नए शिक्षा सत्र में स्कूलों ने बेतहाशा फीस वृद्धि की है, और सरकार का शिक्षा विभाग मूकदर्शक बना हुआ है. मध्यम वर्ग इस मनमानी फीस वसूली के आगे खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है.
दिल्ली की प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा की रीढ़ बन चुके ‘मोहल्ला क्लीनिकों’ की हालत दयनीय हो गई है. वहां डाॅक्टरों की भारी कमी है, जरूरी दवाइयां उपलब्ध नहीं हैं और पैथोलाॅजी टेस्ट की संख्या में भारी कटौती कर दी गई है. सरकार ने इनका नाम बदलकर ‘आयुष्मान आरोग्य मंदिर’ करने और उन्हें नया रूप देने का वादा किया था, लेकिन इसकी रफ्तार इतनी धीमी है कि आम जनता को मामूली मौसमी बीमारियों के लिए भी पिफर से बड़े सरकारी अस्पतालों की लंबी लाइनों में धक्के खाने पड़ रहे हैं.
सड़कों और सीवर की दुर्दशा
दिल्ली के बुनियादी ढांचे की हालत किसी टीयर-3 या टीयर-4 शहर से भी बदतर हो चुकी है. बाहरी दिल्ली, बुराड़ी, और राजेंद्र नगर जैसे रिहायशी इलाकों में सीवर ओवरफ्लो एक स्थायी समस्या बन गई है. गंदा पानी लोगों के घरों में घुस रहा है. हल्की सी बारिश में भी आईटीओ, मिंटो ब्रिज और रिंग रोड जैसे प्रमुख इलाके तालाब में तब्दील हो जाते हैं. सड़कों पर गड्ढ की भरमार है, जिसके कारण आए दिन जानलेवा सड़क हादसे हो रहे हैं, लेकिन लोक निर्माण विभाग (PWD) कुंभकर्णी नींद सो रहा है.
‘महंगी कुर्सी’ का विवाद: अहंकार का प्रतीक
इन विकराल और जमीनी समस्याओं के बीच, हाल ही में मुख्यमंत्री कार्यालय से जुड़ी एक तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हुई जिसने ‘आम आदमी के लिए काम करने वाली सरकार’ के मुखौटे को पूरी तरह तार-तार कर दिया. मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के कार्यालय में उनके इस्तेमाल के लिए एक बेहद ‘महंगी और लग्जरी ऑफिस चेयर’ मंगवाई गई. इस कुर्सी की लाखों की कीमत और उसके भव्य डिजाइन ने जनता के दुखों पर नमक छिड़कने का काम किया .
जब दिल्ली की जनता टूटी सड़कों पर चलने को मजबूर है, सीवर के गंदे पानी के बीच रहने को अभिशप्त है, छठ पूजा में जहरीले पानी में खड़ी है, और महिलाएं अपने 2500 रुपये के हक का इंतजार कर रही हैं, तब प्रदेश की मुखिया का लाखों रुपये की लग्जरी कुर्सी पर बैठना उनके संवेदनहीन रवैये को दर्शाता है.
यह सिर्फ एक कुर्सी का विवाद नहीं है, बल्कि यह सत्ता के उस घमंड और अहंकार का प्रतीक है जो बीजेपी और उसके नेताओं को अपनी जनता की जमीनी हकीकत और उनके दुखों से कोसों दूर कर देता है.
अपने ही बोझ तले दबा ‘ट्रिपल इंजन’
‘ट्रिपल इंजन’ का जो आकर्षक नारा दिल्ली के विकास को बुलेट ट्रेन की रफ्तार देने के लिए गढ़ा गया था, वह आज एक ऐसे बेकाबू इंजन में तब्दील हो चुका है जो अपनी ही पटरी से उतर गया है और जनता को कुचल रहा है. महिलाओं से किया गया आर्थिक मदद का वादा एक क्रूर मजाक बन गया है. पर्यावरण और प्रदूषण पर हास्यास्पद बयानों ने दिल्ली को दुनिया भर में शर्मसार किया है. ‘नकली यमुना’ बनाकर छठ पर्व पर जो राजनीतिक पाखंड किया गया, उसने जनता की आस्था को गहरी चोट पहुंचाई है. शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे संवेदनशील विभागों को राजनीतिक द्वेष की भेंट चढ़ा दिया गया है. और सबसे बढ़कर, मजदूरों का शोषण और गरीबों के घरों पर चलता बुलडोजर यह बताता है कि यह सरकार अपने ही सबसे कमजोर नागरिकों के प्रति कितनी निर्मम है.