वर्ष 35 / अंक - 29 / संघ परिवार अपनी ‘बंगाल प्रयोगशाला’ तैयार करने में...

संघ परिवार अपनी ‘बंगाल प्रयोगशाला’ तैयार करने में जरा भी समय बर्बाद नहीं कर रहा है: विपक्ष के लिए इंतजार करना और देखते रहना ठीक नहीं होगा

संघ परिवार अपनी ‘बंगाल प्रयोगशाला’ तैयार करने में जरा भी समय बर्बाद नहीं कर रहा है: विपक्ष के लिए इंतजार करना और देखते रहना ठीक नहीं होगा

भारतीय जनता पार्टी को पश्चिम बंगाल में सत्ता हासिल करने के लिए दशकों तक इंतजार करना पड़ा. आखिरकार मई में यह इंतजार खत्म हुआ और अब बंगाल को संघ के वैचारिक और राजनीतिक सांचे में ढालने का काम जोर-शोर से शुरू हो गया है. सत्ता में आने के सिर्फ दो महीने बाद ही संघ ब्रिगेड ने तूफानी गति से काम शुरू कर दिया है और बंगाल के लोगों को अपने उग्र सांप्रदायिक एजेंडा से परिचित कराने के लिए तेज और सघन अभियान शुरू कर दिया है. फासीवादी आतंक का सरकारी-निजी साझेदारी माॅडल, जिसमें सरकार जमीनी स्तर पर हिंसक समूहों के साथ हाथ मिलाकर उन्हें ताकत देती है, पूरे राज्य में दिन-रात काम कर रहा है. इस बीच, सरकार अपनी नीतियों को लागू करने और बुलडोजर शक्ति से लैस एनकाउंटर राज का माहौल बनाने में जरा भी समय बर्बाद नहीं कर रही है.

पिछले दशक में भारत में फासीवादी शासन की तीन मुख्य विशेषताएं दिखी हैं – भीड़ द्वारा हत्या, बुलडोजर राज (सरकारी भाषा में ‘बुलडोजर न्याय’) और ‘मुठभेड़ मौत’ के नाम पर चुनिंदा लोगों का सफाया. नई सरकार गर्व के साथ इन तीनों चीजों का प्रदर्शन कर रही है. तृणमूल कांग्रेस नेता अभिषेक बनर्जी पर अंडे फेंकने की पहली घटना ने शुरुआत में ही एक नया रुझान स्थापित कर दिया और पश्चिम बंगाल का मुख्य मीडिया, जो अब पूरी तरह से नई सरकार के साथ है, ने इसे तुरंत टीएमसी युग के भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता के आक्रोश प्रदर्शन कहकर चलता कर दिया. मीडिया ने तो इसके लिए ‘एग थेरेपी (अंडा इलाज)’ जैसा नया शब्द भी गढ़ दिया, जबकि यह भीड़ द्वारा कानून को अपने हाथ में लेने का स्पष्ट लक्षण था.

मुठभेड़ राज

गुजरात में अमित शाह ने मुठभेड़ हत्या को एक रणनीति के रूप में अपनाया. इनमें से एक मामले में तो उन्हें जेल भी जाना पड़ा – उस न्यायिक युग में जब शक्तिशाली लोगों को अभी भी पूरी छूट हासिल नहीं थी. इसके बाद उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री आदित्यनाथ ने मुस्लिम समुदाय के सदस्यों के घरों, मस्जिदों, दुकानों या अन्य संस्थानों को बुलडोजर से ढहा देने के साथ ही मुठभेड़ हत्या को शासन की एक घोषित नीति के रूप में शामिल कर लिया. पश्चिम बंगाल के भाजपा मुख्य मंत्री ने इस नीति को एक फिल्मी संवाद की तरह बना दिया है – ‘सकाले जामा, राते खरोच’ यानी, सुबह पुलिस को सौंपो और रात तक मार डालो. इस नीति का पहला प्रयोग कोलकाता के पास बरुईपुर इलाके में 11 वर्षीय बच्ची के साथ हुए जघन्य बलात्कार और हत्या के मामले में देखा जा चुका है. मुठभेड़ का शिकार प्रभास मंडल मूल अपराध का चश्मदीद गवाह था जिसने पहले ही कुछ लोगों के नाम बताए थे, जिनमें एक स्थानीय भाजपा नेता भी शामिल था.

मुठभेड़ हत्या की नीति का अर्थ केवल कानून के शासन की किसी भी अवधारणा का घोर उल्लंघन ही है. इससे पुलिस को बेलगाम शक्ति बनने में मदद मिलती है जबकि अपराध दर पर इसका कोई निवारक प्रभाव नहीं पड़ता. आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में औसतन प्रतिदिन पांच मुठभेड़ें हो रही हैं, फिर भी महिलाओं के खिलाफ दर्ज अपराधों की सूची में यह राज्य शीर्ष पर बना हुआ है. इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बताया कि मुठभेड़ राज किस प्रकार आपराधिक न्याय प्रणाली को बाधित कर रहा है और कोर्ट ने प्रत्येक मुठभेड़ में अनिवार्य एफआइआर और जांच का आदेश दिया, और साथ ही यूपी पुलिस की पक्षपातपूर्ण निष्ठाओं को भी उजागर किया.

अनेकानेक कदम

शासन के इस मनमाने दमनकारी तरीके को वर्तमान में लागू की जा रही नई नीतियों और कानूनों के साथ मिलाकर देखें. सरकार के पास अब किसी को भी बिना मुकदमे के पूरे एक साल तक हिरासत में रखने का अधिकार है और ऐसे बंदियों को अपना प्रतिनिधित्व करने के लिए किसी भी कानूनी वकील रखने का अधिकार भी नहीं होगा. अंतरधार्मिक शादी और लिव-इन रिलेशनशिप को रोकने या उन्हें अपराध की श्रेणी में लाने के मकसद से लाए गए ‘यूनिफाॅर्म सिविल कोड (समान नागरिक संहिता)’ बिल को आगे की जांच के लिए नौ सदस्यों वाली एक कमेटी के पास भेजा गया है. अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए आरक्षण को 17% से घटाकर 7% कर दिया गया है. 2011 के बाद जारी किए गए सभी अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और ओबीसी सर्टिफिकेट की दोबारा जांच अनिवार्य कर दी गई है. राज्य सरकार द्वारा चलाए जा रहे 51 औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (आइटीआइ) को निजी हाथों में देने के लिए चुना गया है. बांग्लादेशी होने के शक वाले लोगों को वापस बांग्लादेश भेजने से पहले उन्हें बंदी बनाए रखने के लिए 11 होल्डिंग सेंटर बनाए गए हैं. यह वापस धकेलना (पुश बैक) कूटनीतिक भाषा में ‘निर्वासन’ नहीं है, बल्कि यह एक गैर-कानूनी और जबरदस्ती किया जाने वाला काम है, जिसमें लोगों को सीमा पार करके बांग्लादेश के इलाके में धकेल दिया जाता है. स्वीटी बीबी और पांच अन्य भारतीय नागरिकों, जिनमें दो नाबालिग भी शामिल थे, को गैर-कानूनी तरीके से बांग्लादेश भेज दिया गया था. एक साल लंबी कानूनी लड़ाई के बाद उनकी वापसी को ‘ऑपरेशन पुश बैक’ के नाम पर हो रही क्रूरता और अन्याय को उजागर करने वाली घटना के बतौर ही देखा जाना चाहिए.

विचारधारात्मक आक्रामकता के आरएसएस एजेंडा के ही अनुरूप नई भाजपा सरकार के लिए इतिहास और संस्कृति पहले ही लड़ाई के मुख्य मैदान बन गए हैं. कोलकाता के एक मुस्लिम-बहुल इलाके में मौजूद एक मशहूर सड़क ‘सुहरावर्दी एवेन्यू’, जो लगभग एक सदी से कलकत्ता यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति और मशहूर डाॅक्टर हसन सुहरावर्दी के नाम से जानी जाती थी, का नाम बदलकर गोपाल मुखर्जी रोड कर दिया गया है – गोपाल मुखर्जी वही व्यक्ति हैं जिन्हें विवेक अग्निहोत्री की प्रचार फिल्म ‘द बंगाल फाइल्स’ में बंगाली हिंदुओं के रक्षक के तौर पर दिखाया गया है. असल में, मुख्य मंत्री ने कोलकाता की सड़कों के नामों की समीक्षा करने और मुगल व पठान नामों को बदलने के लिए विवादित कार्तिक महाराज की अध्यक्षता में एक पैनल बनाने की घोषणा की है. भारत सेवाश्रम संघ के कार्तिक महाराज या स्वामी प्रदीप्तानंद को 2025 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था, जबकि उन पर बलात्कार करने का आरोप है और वे मुसलमानों के खिलाफ हिंसा भड़काने के भी अभियुक्त हैं.

परंपरा का चुनाव

इस बीच, श्यामा प्रसाद मुखर्जी को पश्चिम बंगाल का जनक माना जाने लगा है. 20 जून को ‘पश्चिम बंगाल दिवस’ घोषित किया गया है – यह वह दिन है जब स्वतंत्रता-पूर्व भारत के बंटवारे के दौरान अविभाजित बंगाल को दो हिस्सों में बांटा गया था. पश्चिम बंगाल के इतिहास को नए सिरे से गढ़ने के इन पूर्वाग्रहपूर्ण प्रयासों के बीच एक और वैचारिक बयान तब आया जब कोलकाता के स्कूलों में मध्याह्न भोजन का काम इस्काॅन को सौंपा गया. इस्काॅन ने तुरंत घोषणा की कि शाकाहार को बढ़ावा देने के लिए भोजन की सूची से अंडे हटा दिए जाएंगे. मध्याह्न भोजन की सूची और बच्चों के पोषण की खुली अनदेखी से कहीं आगे पश्चिम बंगाल में इस्काॅन की बढ़ती मौजूदगी को राज्य के व्यापक सांस्कृतिक संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए.

महान भक्ति आंदोलन के प्रतीक चैतन्य महाप्रभु की धरती होने के नाते पश्चिम बंगाल में हमेशा से वैष्णव परंपरा का मजबूत प्रभाव रहा है जिसे ‘गौड़ीय वैष्णववाद’ के नाम से जाना जाता है. 16वीं सदी की इस परंपरा को 19वीं और 20वीं सदी की शुरूआत में हरिचंद ठाकुर (1812-1878) और उनके बेटे गुरुचंद ठाकुर (1847-1937) ने जाति-विरोधी दिशा में आगे बढ़ाया और इसे मटुआ धर्म के रूप में मजबूत किया. यह वह दौर था जब ज्योतिबा और सावित्रीबाई फुले बड़े पैमाने पर शिक्षा को, खासकर महिलाओं और दमित जातियों की शिक्षा को, सशक्तीकरण और क्रांतिकारी सामाजिक जागृति के हथियार के तौर पर बढ़ावा दे रहे थे. चैतन्य के गौड़ीय वैष्णववाद से लेकर हरिचंद-गुरुचंद के मटुआ धर्म तक, इस पूरी विरासत को अब इस्काॅन हथिया लेना चाहता है – आक्रामक हिंदुत्व के अपने एजेंडे में आरएसएस के एक शक्तिशाली वैश्विक वैचारिक सहयोगी के तौर पर यह इस्काॅन काम कर रहा है.

भाजपा बिना एक पल गंवाए अपना पूरा एजेंडा लागू करना चाहती है. उसका मानना है कि अभी लोहा गरम है और उसपर पूरी ताकत से चोट करना चाहिए. जैसे नरेंद्र मोदी अभी भी जनता का ध्यान नेहरू और कांग्रेस में उलझाए रखते हैं, वैसे ही पश्चिम बंगाल में भाजपा ममता बनर्जी और टीएमसी का इस्तेमाल ध्यान भटकाने वाले पर्दे के तौर पर करना चाहेगी, जिसके पीछे वह बे-रोकटोक अपनी योजना को अंजाम दे सके.

टीएमसी पहले ही तीन भागों में बंट चुकी है. बागी विधायकों को ‘असली टीएमसी’ के रूप में खड़ा किया जा रहा है ताकि ममता बनर्जी को उनकी पार्टी से बेदखल किया जा सके. टीएमसी के अधिकांश लोकसभा सांसदों को राष्ट्रवादी नागरिक पार्टी नामक गठबंधन में रखा जा रहा है, जबकि तीन राज्यसभा सांसदों को लिखा-पढ़ाकर सीधे भाजपा में शामिल कर लिया गया है. इस बीच, जमीनी स्तर पर हर तरफ से उठने वाले विरोध को सुनियोजित भीड़ हिंसा और सरकारी हस्तक्षेप के जरिए दबाने की कोशिश की जा रही है. भाजपा को एक क्षणिक घटना और उसके एजेंडे को शासन के नाम पर सिर्फ एक तिकड़म समझना पश्चिम बंगाल के धर्मनिरपेक्ष प्रगतिशील मत के लिए बड़ी गलती होगी. संघ ब्रिगेड पश्चिम बंगाल को भारत के फासीवादी पुनर्निर्माण की अपनी परियोजना के लिए एक और सुरक्षित प्रयोगशाला बनाने के लिए काफी गंभीर है. अगर भाजपा एक पल भी बर्बाद नहीं कर रही है, तो क्या वामपंथी या सचमुच का कोई विपक्ष इंतजार करने की जोखिम उठा सकता है?

(‘द वायर’ से साभार)

18 July, 2026