[ ग्लोबल जस्टिस रिपोर्ट एक व्यापक शोध पहल है जो वर्ष 2100 तक मानव विकास और पर्यावरणीय स्थिरता के बीच तालमेल बिठाने का खाका पेश करती है. यह दस्तावेज दुनिया भर में आय और संपत्ति की भारी असमानता को कम करने को जलवायु संकट से निपटने के लिए एक अनिवार्य शर्त मानता है. रिपोर्ट के मुख्य स्तंभों में ऊर्जा प्रणालियों का तेजी से कार्बन-मुक्त होना, काम के घंटों में कमी और संसाधनों के सीमित उपयोग पर आधारित जीवनशैली शामिल है. इसका लक्ष्य एक ऐसी व्यवस्था बनाना है जहां विश्व की निर्धन आबादी की संपत्ति में वृद्धि हो और सभी देशों को शिक्षा एवं स्वास्थ्य के समान अवसर मिलें. यह प्रस्ताव वर्तमान अंतरराष्ट्रीय वित्तीय ढांचे में आमूल-चूल सुधार और वैश्विक स्तर पर अमीरों पर कर लगाने की बात करता है ताकि एक न्यायपूर्ण और रहने योग्य भविष्य सुनिश्चित किया जा सके. कुल मिलाकर, यह रिपोर्ट सामाजिक न्याय को पर्यावरणीय सुरक्षा के साथ जोड़कर एक नई लोकतांत्रिक वैश्विक व्यवस्था का रास्ता खोजने का दवा करती है.]
सारांश
जून में हुई ‘वर्ल्ड इनइक्वलिटी काॅन्फ्रेंस’ में मशहूर अर्थशास्त्री थाॅमस पिकेटी और वर्ल्ड इनइक्वलिटी लैब के 45 शोधकर्ताओं की टीम ने ‘ग्लोबल जस्टिस रिपोर्ट’ पेश की. यह इस सदी के अंत तक ‘धरती की सीमाओं के भीतर समानता और समृद्धि’ हासिल करने की एक प्रभावशाली और तर्कपूर्ण योजना है. व्यापक आर्थिक विश्लेषण के आधार पर तैयार की गई इस 135 पन्नों की रिपोर्ट में दुनिया की अर्थव्यवस्था को नए सिरे से गढ़ने का एक महत्वाकांक्षी खाका पेश किया गया है. इसका मकसद ऐसी वैश्विक अर्थव्यवस्था बनाना है जिसमें दुनिया की संपत्ति को साझा किया जाए और हर व्यक्ति के जीवन स्तर को बेहतर बनाया जाए. साथ ही, ऊर्जा व्यवस्था को तेजी से कार्बन-मुक्त किया जाए, ताकि ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन 1.8 डिग्री सेल्सियस की अपेक्षाकृत सुरक्षित सीमा के भीतर रखा जा सके.
यह उम्मीद जगाने वाली सोच आज के समय में खास तौर पर महत्वपूर्ण है. आज दुनिया जलवायु संकट, देशों के बीच बढ़ते आर्थिक और भू-राजनीतिक टकराव तथा लगातार गहरी होती आर्थिक असमानता से जूझ रही है. ऐसे दौर में यह प्रस्ताव एक नई उम्मीद और वैकल्पिक रास्ते की संभावना सामने रखता है.
इस प्रस्ताव का मुख्य लक्ष्य है कि वर्ष 2100 तक दुनिया के सभी देशों की आय में पूरी तरह बराबरी लाई जाए. इसके लिए हर व्यक्ति की मासिक आय का लक्ष्य 5,000 यूरो (लगभग 5.50 लाख रुपये) रखा गया है. इसे हासिल करने के लिए दुनिया की सबसे गरीब 50 प्रतिशत आबादी की कुल वैश्विक संपत्ति में हिस्सेदारी को मौजूदा 2 प्रतिशत से बढ़ाकर 30 प्रतिशत करना होगा. इसके उलट, दुनिया के सबसे अमीर 0.001 प्रतिशत लोगों की संपत्ति में हिस्सेदारी 6 प्रतिशत से घटाकर महज 0.05 प्रतिशत रह जाएगी. रिपोर्ट इसे ‘बहुत बड़े पैमाने पर संपत्ति का पुनर्वितरण’ कहती है. इसका सीधा मतलब यह होगा कि अरबपतियों का मौजूदा वर्ग लगभग खत्म हो जाएगा.
इस विशाल वैश्विक आर्थिक पुनर्वितरण के काम को चलाने के लिए ‘ग्लोबल जस्टिस फंड’ बनाया जाएगा. इसका पैसा दुनिया के सबसे अमीर 1 प्रतिशत लोगों पर लगाए जाने वाले वैश्विक संपत्ति कर और ऊंची आय पर लगने वाले कर से आएगा. इससे जुटाए गए राजस्व का एक हिस्सा ‘वर्ल्ड साॅवरेन फंड’ में लगाया जाएगा. अनुमान है कि यह कोष धीरे-धीरे दुनिया के कुल सकल घरेलू उत्पाद के 60 प्रतिशत के बराबर संपत्ति जमा कर सकता है और आगे चलकर सरकारों के लिए वित्त जुटाने का मुख्य जरिया कर राजस्व की जगह यह कोष बन सकता है.
इस कोष से मिलने वाले लाभांश को हर देश की आबादी के हिसाब से समान रूप से बांटने का प्रस्ताव है. इसका मतलब होगा कि अमीर देशों की तुलना में गरीब देशों को कहीं अधिक संसाधन मिलेंगे. यह रकम आज विकास सहायता के नाम पर गरीब देशों को दी जाने वाली सहायता से भी बहुत ज्यादा होगी. हालांकि, इन फंडों का इस्तेमाल कुछ स्पष्ट शर्तों के साथ होगा. इनमें जलवायु संकट से निपटने के लिए निवेश, असमानता कम करने के तय लक्ष्य तथा स्वास्थ्य और शिक्षा पर पर्याप्त खर्च जैसी शर्तें शामिल होंगी.
पर्याप्तता का नया नजरिया
इस रिपोर्ट की सबसे खास और नई बात यह है कि इसके विश्लेषण के केंद्र में ‘पर्याप्तता’ (यानी जरूरत भर का इस्तेमाल) की अवधारणा को रखा गया है. रिपोर्ट सही ढंग से यह तर्क देती है कि अगर दुनिया की पूरी आबादी अमीर देशों जैसी जीवनशैली अपना ले, जिसमें निजी उपभोग बहुत ज्यादा हो, तो हम कार्बन उत्सर्जन की उस सीमा के भीतर नहीं रह सकते जो धरती का तापमान 2 डिग्री सेल्सियस से अधिक बढ़ने से रोक सके. इसलिए, रिपोर्ट के अनुसार, पर्याप्तता का मतलब केवल औसत काम के घंटे घटाकर सालाना 1,000 घंटे करना नहीं है. यह लगभग ढाई दिन के कामकाजी सप्ताह के बराबर होगा. इसके लिए जीवन और अर्थव्यवस्था के पूरे ढांचे में बड़े बदलाव की जरूरत होगी.
इसके साथ ही अर्थव्यवस्था को भौतिक वस्तुओं के उत्पादन पर आधारित क्षेत्रों से हटाकर स्वास्थ्य, शिक्षा जैसे गैर-भौतिक क्षेत्रों की ओर बड़े पैमाने पर मोड़ना होगा. इससे अर्थव्यवस्था का जोर ऐसे कामों और गतिविधियों पर बढ़ेगा जिनमें संसाधनों और चीजों की खपत कम होती है. खान-पान की आदतों में भी बड़ा बदलाव जरूरी होगा. मांस की खपत कम करने से बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई पर पूरी तरह रोक लगाई जा सकती है. इससे खेती योग्य जमीन भी बचेगी और ऐसे कृषि तरीकों को कम किया जा सकेगा जिनसे भारी मात्रा में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है.
इसके साथ ही, उत्पादन और उपभोग के तौर-तरीकों में पर्याप्तता लाने के प्रयासों को ऊर्जा व्यवस्था को तेजी से कार्बन-मुक्त करने के साथ जोड़ना होगा. ग्लोबल जस्टिस फंड इस बदलाव को गति देने और इसके लिए जरूरी संसाधन उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा.
कई बार यह पूरा प्रस्ताव पर्यावरण के क्षेत्र में लंबे समय से काम कर रहे विचारकों द्वारा सुझाए गए टिकाऊ विकास के विचारों और नीतियों की एक लंबी सूची जैसा लग सकता है. लेकिन ग्लोबल जस्टिस प्रोजेक्ट का दायरा पिकेटी की बहुचर्चित किताब ‘कैपिटल इन द ट्वेंटी-फर्स्ट सेंचुरी’ से कहीं व्यापक है. उस किताब में पिकेटी ने विशाल ऐतिहासिक और आर्थिक आंकड़ों के आधार पर अमीरी पर प्रगतिशील वैश्विक कर लगाने की जरूरत को मजबूती से सामने रखा था.
2015 में कुछ अन्य संगठनों ने इस किताब की आलोचना की थी, क्योंकि इसमें आर्थिक विकास की पारिस्थितिक सीमाओं और धरती की प्राकृतिक सीमाओं को पर्याप्त गंभीरता से नहीं लिया गया था. इसलिए यह देखना प्रेरणादायक है कि अब वर्ल्ड इनइक्वलिटी लैब के लेखक इस बहस में सीधे तौर पर शामिल हो रहे हैं. वे ‘ग्रीन ग्रोथ’ (हरित विकास) के उस विचार को पूरी तरह खारिज करते हैं, जो यह मानता है कि हम असमानता को कम किए बिना, अपनी खपत घटाए बिना और दुनिया के संसाधनों को आपस में साझा किए बिना, अर्थव्यवस्था का आकार अनंत तक बढ़ाते हुए पर्यावरण की समस्याओं का समाधान कर सकते हैं.
पर्यावरणीय संसाधनों और अवसरों को साझा करना
रिपोर्ट का कहना है कि तेजी से कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए केवल तकनीक पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है. उनका मानना है कि अगर पूरी दुनिया में कड़े कार्बन बजट के भीतर रहते हुए हरित बदलाव करना है, तो आज के सबसे अमीर देशों को अपने संसाधनों और ऊर्जा की खपत में बहुत बड़ी कटौती करनी होगी. इसके साथ ही इन देशों की अर्थव्यवस्था में सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की वृद्धि लगभग शून्य के आसपास रखनी होगी.
इससे गरीब देशों, खासकर ग्लोबल साउथ के देशों के लिए पर्यावरण और कार्बन की वह जगह बचेगी, जिसमें वे अपनी अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ा सकें. इससे वे तेजी से स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ पाएंगे और साथ ही सभी लोगों को जरूरी सार्वजनिक सेवाएं तथा सम्मानजनक जीवन स्तर भी उपलब्ध करा सकेंगे.
यह कोई बिल्कुल नया नजरिया नहीं है, लेकिन रिपोर्ट इस बात पर विशेष जोर देती है कि उसका ‘टिकाऊ समानता का माॅडल’ एक तरह के ‘वर्ग-आधारित क्षतिपूरक न्याय’ की मांग करता है. पिछले कई दशकों में जीवाश्म ईंधन पर आधारित वैश्विक आर्थिक विकास से सबसे ज्यादा फायदा दुनिया के बेहद अमीर लोगों को हुआ है. इसलिए ग्लोबल जस्टिस प्लेटफाॅर्म के लिए मुख्य रूप से धन भी इन्हीं बेहद अमीर लोगों से लिया जाएगा.
इसके अलावा, यह प्रस्ताव ‘जलवायु समानता’ की अवधारणा से भी काफी हद तक मेल खाता है. यह जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार किए गए ‘साझी लेकिन अलग-अलग जिम्मेदारियों’ के सिद्धांत को ठोस और मापी जा सकने वाली नीतियों में बदलने की कोशिश करता है. इसका अर्थ है कि जलवायु संकट की जिम्मेदारी सभी देशों की है, लेकिन जिन देशों और वर्गों ने ऐतिहासिक रूप से सबसे ज्यादा प्रदूषण किया है, उनकी जिम्मेदारी भी उतनी ही अधिक होनी चाहिए.
रिपोर्ट की एक और बड़ी ताकत यह है कि वह आर्थिक और पर्यावरणीय बदलावों के अनुमानों को सीधे अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार के सवाल से जोड़ती है. इसमें वैश्विक आर्थिक और मौद्रिक व्यवस्था में व्यापक बदलाव और उसके लोकतंत्रीकरण की जरूरत पर जोर दिया गया है. इसके तहत अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष को पुनर्गठित कर संयुक्त राष्ट्र के केंद्रीय बैंक में बदलने का प्रस्ताव है, जो अपनी अलग वैश्विक रिजर्व मुद्रा जारी करे.
इससे अमेरिकी डाॅलर और कुछ अन्य बड़ी मुद्राओं को मिलने वाला असाधारण विशेषाधिकार खत्म होगा. आज इन देशों को दूसरे देशों की तुलना में बहुत कम ब्याज दर पर कर्ज लेने की सुविधा मिलती है. इस विशेषाधिकार को खत्म करने से ग्लोबल साउथ के देशों से ग्लोबल नाॅर्थ के देशों की ओर होने वाला दौलत का विशाल उलटा हस्तांतरण भी रुकेगा.
अन्य सभी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को भी कड़े नियमों और सभी देशों के लिए समान मतदान अधिकारों के आधार पर चलाने की बात कही गई है. इससे प्रभावशाली देशों को मिलने वाले विशेष अधिकार और वीटो की ताकत भी खत्म होगी.
इस नए अंतरराष्ट्रीय ढांचे में विश्व व्यापार संगठन (WTO) के नियमों में सुधार और विवादों को सुलझाने की मौजूदा व्यवस्था में भी बदलाव शामिल होगा. वहीं, ग्लोबल जस्टिस फंड के लिए उपलब्ध कराए जाने वाले विशाल वित्तीय संसाधन व्यवहार में संयुक्त राष्ट्र की पूरी व्यवस्था के बड़े पुनर्गठन का आधार बन सकते हैं. इससे संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न एजेंसियां मजबूत होंगी, मानवाधिकारों की सुरक्षा बेहतर होगी और अंतरराष्ट्रीय कानूनों को अधिक प्रभावी बनाया जा सकेगा.
धनिकतंत्र से लोकतंत्र की ओर
जैसा कि रिपोर्ट में कहा गया है, वैश्विक शासन व्यवस्था को ‘धनिकतंत्र से लोकतंत्र’ में बदलने के ये प्रस्ताव दुनिया में पहले से चल रही कई अन्य पहलों और योजनाओं से भी जुड़े हुए हैं. उदाहरण के लिए, 2022 की ब्रिजटाउन पहल भी वैश्विक संपत्ति कर और अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक व्यवस्था में सुधार की एक-दूसरे को मजबूत करने वाली भूमिका पर जोर देती है. संयुक्त राष्ट्र की यूएन टैक्स कन्वेंशन का उद्देश्य भी अंतरराष्ट्रीय कर व्यवस्था को अधिक लोकतांत्रिक बनाना और अवैध वित्तीय लेन-देन पर रोक लगाना है. वहीं, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका की अगुवाई में जी 20 की पहलों में भी जलवायु नीतियों और स्वच्छ ऊर्जा की ओर बदलाव के लिए वैश्विक संपत्ति कर लगाने की वकालत की जा रही है.
ऐसे कई अन्य नेटवर्क और संगठन भी हैं जो इसी तरह के कर सुधार और वैश्विक शासन व्यवस्था में बदलाव की दिशा में काम कर रहे हैं. इनमें प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल का काम भी शामिल है, जिसने एक नई अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था के निर्माण के लिए ‘कार्य योजना’ सामने रखी है. 2010 के स्टिग्लिट्ज आयोग और 1980 के ब्रांट आयोग की रिपोर्टों का भी ग्लोबल जस्टिस रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है. इन दोनों ने अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक व्यवस्था और वैश्विक रिजर्व प्रणाली में सुधार को लेकर महत्वपूर्ण सुझाव दिए थे.
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि रिपोर्ट के लेखक ‘विकास से आगे बढ़कर गरीबी खत्म करने की रूपरेखा’ का विशेष रूप से उल्लेख करते हैं. यह एक महत्वपूर्ण पहल है, जिसका समन्वय अत्यधिक गरीबी और मानवाधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र के पूर्व विशेष प्रतिवेदक ओलिवियर डी शुटर ने किया है. इसका उद्देश्य ऐसी वैश्विक अर्थव्यवस्था बनाने के लिए नीतियों का एक व्यापक खाका तैयार करना है, जिसके केंद्र में मानवाधिकार और पारिस्थितिक न्याय हों.
थाॅमस पिकेटी और दुनिया के कई अन्य प्रसिद्ध अर्थशास्त्रियों ने भी इस योजना का समर्थन किया है. हाल के वर्षों में यह सबसे व्यापक नीतिगत दस्तावेजों में से एक है, जो यह बताता है कि ‘धरती की प्राकृतिक सीमाओं के भीतर रहते हुए बेहतर जीवन’ कैसे सुनिश्चित किया जा सकता है. इसके लिए ग्लोबल साउथ के देशों के बीच सहयोग बढ़ाने, जलवायु संकट से हुए नुकसान की भरपाई के लिए वित्तीय सहायता देने और हर व्यक्ति के लिए सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा की न्यूनतम गारंटी सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया है.
डी शुटर की एक महत्वपूर्ण पहल ‘ग्लोबल फंड फाॅर सोशल प्रोटेक्शन’ बनाने का प्रस्ताव है. कम आय वाले देशों में सामाजिक सुरक्षा के लिए लगातार बनी रहने वाली धन की कमी को दूर करने के लिहाज से यह प्रस्ताव शायद अधिक व्यावहारिक है. यह संयुक्त राष्ट्र के अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) जैसी मौजूदा संस्थाओं को आधार बनाते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वित्त जुटाने के ऐसे स्रोत तलाशता है, जिन्हें अपेक्षाकृत जल्दी लागू किया जा सकता है.
लेकिन हमेशा की तरह असली सवाल यह है कि इन नीतियों को लागू करने के लिए जरूरी राजनीतिक परिस्थितियां कैसे पैदा होंगी. आज धुर-दक्षिणपंथी और प्रतिक्रियावादी राजनीतिक ताकतें तथा उनके अरबपति समर्थक जिस तकनीक-आधारित तानाशाही की दिशा में दुनिया को ले जाना चाहते हैं, उसके विकल्प के रूप में इन नीतियों को कैसे लागू किया जाएगा? पिकेटी और उनकी टीम ने ‘गार्डियन’ में लिखे एक लेख में बिल्कुल सही कहा है कि इन बदलावों के रास्ते में असली बाधा तकनीकी असंभवता नहीं है. असली समस्या है – ‘सामाजिक प्रगति के साझे नजरिये का अभाव, जो एक साथ ठोस भी हो और आमूलचूल बदलाव की दिशा भी दिखाती हो.’
पिकेटी और डी शुटर, दोनों की योजनाएं यह स्पष्ट करती हैं कि दुनिया को टिकाऊ और न्यायपूर्ण विकास की दिशा में ले जाने वाले किसी भी बड़े सामाजिक-आर्थिक बदलाव का शक्तिशाली ताकतें विरोध करेंगी. इनमें सबसे तीखा विरोध अति-अमीर वर्ग की ओर से आएगा, क्योंकि मौजूदा व्यवस्था से सबसे ज्यादा लाभ उसी को मिलता है.
दोनों रिपोर्टें यह भी थोड़ा बताती हैं कि जमीनी स्तर से प्रतिरोध की जवाबी ताकत खड़ी करनी होगी. वे प्रगतिशील राजनीतिक दलों, मजदूर संगठनों और नागरिक समाज के संगठनों की सामूहिक कार्रवाई का स्पष्ट समर्थन करती हैं. ग्लोबल जस्टिस रिपोर्ट ने तो अपने निष्कर्ष को ही ‘सामाजिक न्याय के लिए वैश्विक नागरिक आंदोलन’ का उपशीर्षक दिया है. ‘सामाजिक न्याय के लिए एक वैश्विक जन आंदोलन’. रिपोर्ट विनम्रता से अपने विश्लेषण को उस बड़े सामूहिक आंदोलन को सौंपती है, जो दुनिया भर में पहले से ही (भले धीमी रफ्तार से) आगे बढ़ रहा है. तो इन रिपोर्टों में चाहे जितनी भी कमियां या सीमाएं हों, हम बस यही उम्मीद कर सकते हैं कि ये उस बड़े जन-समर्थन को जगाएं, जो दुनिया के सीमित संसाधनों को बांटने के लिए बहुत जरूरी है – इससे पहले कि बहुत देर हो जाए.
(प्रस्तुति: मनमोहन)