-- जोया हसन
भारत की राजनीति में महिलाएं आजादी की लड़ाई के समय से ही आगे रही हैं. लेकिन सरकार चलाने और विधानसभाओं व दूसरी फैसला लेने वाली संस्थाओं में उनकी भागीदारी अभी भी बहुत कम है. लोकसभा की 543 सीटों में से महिलाओं के पास सिर्फ करीब 14 प्रतिशत सीटें हैं, जबकि राज्यों की विधानसभाओं में औसतन सिर्फ करीब 9 प्रतिशत सीटें उनके पास हैं. महिलाएं इसलिए पीछे रह जाती हैं क्योंकि चुनाव लड़ने का टिकट पाना आसान नहीं है, और यह टिकट ज्यादातर पार्टियों की उन कमेटियों के हाथ में होता है जिनमें महिलाओं की गिनती बहुत कम होती है. यही वजह है कि पिछले पचास सालों से महिला संगठन और बड़ी महिला नेता लगातार यह मांग करती आई हैं कि विधानसभाओं और लोकसभा में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित की जाएं, ताकि उनकी राजनीतिक भागीदारी बढ़े. पिछले पांच दशकों से यह मांग महिलाओं के आंदोलन और मुहिम के केंद्र में रही है, लेकिन अभी तक यह लागू नहीं हो पाई है.
महिला आरक्षण बिल पहली बार 1996 में संसद में लाया गया था. इसके बाद अलग-अलग सरकारों ने इसे बार-बार संसद में पेश किया, लेकिन यह कभी कानून नहीं बन पाया. इससे पता चलता है कि इसका राजनीतिक विरोध कितना गहरा रहा है. इस विरोध की बड़ी वजह यह डर था कि पुरुष नेताओं की सत्ता को यह आरक्षण हिला सकता है और उनके राजनीतिक कैरियर को खतरे में डाल सकता है – मानो उनके पैरों तले जमीन खिसक जाएगी. करीब तीन दशक बाद, सितंबर 2023 में, संसद ने संविधान का 106वां संशोधन कानून पास किया, जिसे ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ कहा गया. इसमें लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित करने का प्रावधान रखा गया, और यह आरक्षण अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए पहले से आरक्षित सीटों में भी लागू होगा.
लेकिन सब पार्टियों के समर्थन के बावजूद यह कानून अभी तक लागू नहीं हुआ है, क्योंकि इसे अगली जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन (यानी चुनाव क्षेत्रों की सीमाएं फिर से तय करने) से जोड़ दिया गया. 2010 में राज्यसभा से पास हुए पुराने महिला आरक्षण बिल में ऐसी कोई शर्त नहीं थी, लेकिन नारी शक्ति वंदन अधिनियम में इन दोनों शर्तों को जोड़ दिया गया, जिससे यह 2024 के आम चुनाव में लागू नहीं हो सका. विपक्षी पार्टियों और महिला संगठनों ने इन शर्तों की आलोचना की और कहा कि इनकी वजह से महिलाओं का प्रतिनिधित्व अनिश्चित काल तक टलता रहेगा, और सरकार असल में जेंडर न्याय के इस सुधार को चुनाव क्षेत्रों को नए सिरे से बांटने और शायद गड़बड़ी (गेरीमैंडरिंग) करने का मौका बना रही है. सरकार ने इन आरोपों को खारिज कर दिया और संसद को भरोसा दिलाया कि 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद परिसीमन आयोग बनाया जाएगा और जनगणना समय पर पूरी हो जाएगी. लेकिन इनमें से कुछ भी नहीं हुआ.
तीन साल बाद, हालांकि, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की सरकार का रुख बदलता दिखा. खबरों के मुताबिक सरकार अगली जनगणना या परिसीमन का इंतजार किए बिना ही महिला आरक्षण लागू करना चाहती थी, और इसके बजाय 2011 की जनगणना के आधार पर इसे जल्दी लागू करने पर विचार कर रही थी. यह बात अजीब है, खासकर तब जब देश में नई जनगणना का काम पहले से ही चल रहा है.
पिछले डेढ़ दशक में लोगों का एक जगह से दूसरी जगह जाना, शहरीकरण और कोरोना महामारी की वजह से हुई सामाजिक-आर्थिक उथल-पुथल ने आबादी के बंटवारे को काफी हद तक बदल दिया है. अगली जनगणना कई मायनों में ऐतिहासिक होगी, क्योंकि आजाद भारत में पहली बार इसमें जाति के आंकड़े भी इकट्टा किए जाएंगे, जो राजनीतिक प्रतिनिधित्व की पूरी सामाजिक बुनियाद को बदल सकते हैं. ऐसे में नई जनगणना के आंकड़ों का इंतजार किए बिना आगे बढ़ना कई खतरे पैदा करता है: इससे असली आबादी और प्रतिनिधित्व के बीच तालमेल बिगड़ सकता है, नए आंकड़े आने पर फिर से राजनीतिक विवाद खड़ा हो सकता है, और आगे चलकर और बदलाव करने पड़ सकते हैं, जिससे व्यवस्था की स्थिरता कमजोर हो सकती है.
2026 के बिल और वे क्यों नाकाम हुए
16 से 18 अप्रैल 2026 तक संसद का जो विशेष सत्र बुलाया गया, उसे ऊपर से देखने पर महिला आरक्षण को जल्दी लागू करने के मकसद से बुलाया गया लग रहा था. इसमें तीन आपस में जुड़े हुए बिल पेश किए गए: संविधान (131वां संशोधन) बिल 2026, केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) बिल 2026, और परिसीमन बिल 2026. इनमें से पहले बिल को पास कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत चाहिए था, जबकि बाकी दो बिलों के लिए सिर्फ साधारण बहुमत काफी था. इन बिलों के जरिए महिला आरक्षण को लोकसभा की सीटें काफी बढ़ाने के साथ जोड़ दिया गया, और इसी के साथ अगले परिसीमन की जमीन भी तैयार कर दी गई – जिसमें राज्यों के बीच लोकसभा सीटों को फिर से बांटा जाना था, चुनाव क्षेत्रों की सीमाएं नए सिरे से खींची जानी थीं, और अनुसूचित जाति व जनजाति के लिए पहले से आरक्षित सीटों समेत, एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जानी थीं.
योजना यह थी कि लोकसभा की सीटें बढ़ाकर 816 कर दी जाएं, लेकिन यह बात बिलों के असली शब्दों में लिखी ही नहीं गई थी. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में भरोसा दिलाया कि किसी भी राज्य का प्रतिनिधित्व में हिस्सा कम नहीं होगा, लेकिन ऐसा भरोसा सिर्फ नेताओं की जुबानी बात से पूरा नहीं हो सकता. अगर राज्यों को यह गारंटी देनी थी कि उनका प्रतिनिधित्व कम नहीं होगा, तो यह बात कानून में साफ-साफ लिखी जानी चाहिए थी, न कि सिर्फ राजनीतिक वादे के तौर पर छोड़ दी जानी चाहिए थी.
लेकिन 131वां संविधान संशोधन बिल पास नहीं हो सका – इसके पक्ष में 298 वोट पड़े और विरोध में 230, जो पास होने के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत से काफी कम था. इसका नाकाम होना पहले से ही तय माना जा रहा था, क्योंकि सरकार ने महिला आरक्षण को लोकसभा की सीटें बढ़ाने की शर्त से जोड़ दिया था, और यह अपने आप में एक बहुत बड़ा संवैधानिक बदलाव है. इसके अलावा, यह बिल तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, असम और पुदुचेरी में चुनाव चल रहे थे, तभी पेश किए गए, और बिना ठीक से चर्चा किए व कानून बनाने के तय नियमों का पालन किए बिना लाए गए, जिस वजह से विपक्षी पार्टियों ने सरकार पर चुनाव के मौसम में जल्दबाजी में संवैधानिक बदलाव थोपने का आरोप लगाया.
बिल के नाकाम होने के बाद सरकार ने इससे जुड़े परिसीमन बिल और केंद्र शासित प्रदेश बिल को भी वापस ले लिया, जिससे सीटें बढ़ाने और महिला आरक्षण, दोनों का भविष्य अनिश्चित बना रह गया. लेकिन अगर आगे चलकर यह योजना लागू होती है, तो यह देश में सबके लिए वोट देने का हक मिलने (सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार) के बाद से भारत के प्रतिनिधित्व ढांचे में सबसे बड़ा बदलाव होगा.
लोकसभा का आकार इतना ज्यादा क्यों बढ़ाया जा रहा है, इसकी कोई ठोस वजह नहीं बताई गई. इतनी बड़ी लोकसभा को संभालना मुश्किल हो जाएगा और असली मुद्दों पर गंभीर बहस के लिए मुश्किल से मौका बचेगा. सिद्धांत में तो हर सांसद को बोलने का पूरा मौका देने के लिए लोकसभा को साल भर लगातार चलना पड़ेगा, जिससे उसका काम और भी मुश्किल हो जाएगा. लेकिन असलियत यह है कि पिछले दो कार्यकालों में लोकसभा के बैठने के दिन लगातार कम होते गए हैं.
ज्यादातर विपक्षी पार्टियां चाहती हैं कि लोकसभा की मौजूदा सीटों के अंदर ही महिलाओं को आरक्षण दिया जाए. लेकिन सरकार इस रास्ते पर चलने को तैयार नहीं थी. इसके बजाय, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की सरकार ने पहले सीटें बढ़ाने और फिर आरक्षण देने का रास्ता चुना. सरकार को यह भरोसा था कि महिला आरक्षण का कोई विरोध नहीं करेगा, और परिसीमन को लेकर जो चिंताएं हैं, उन्हें यह कहकर शांत किया जा सकता है कि सभी राज्यों की सीटें बराबर अनुपात में बढ़ाई जाएंगी. लेकिन यह उम्मीद पूरी नहीं हुई. फिर भी, सरकार ने इस नाकामी का ठीकरा जल्दी ही विपक्षी पार्टियों पर फोड़ दिया, उन पर महिला आरक्षण में रुकावट डालने का आरोप लगाया, और खासकर कांग्रेस व उसके साथी दलों को ‘महिला विरोधी’ बताया. जबकि सच यह है कि आरक्षण लागू करने के लिए सरकार ने खुद बहुत कम काम किया.
असल में, नारी शक्ति वंदन अधिनियम भले ही 2023 में सर्वसम्मति से पास हो गया था, लेकिन इसे अधिसूचित (यानी लागू करने के लिए आधिकारिक रूप से घोषित) 16 अप्रैल 2026 की रात को ही किया गया – यानी कानून बनने के करीब तीस महीने बाद. अगर सरकार वाकई गंभीर होती, तो वह महिला आरक्षण को परिसीमन और लोकसभा की सीटें बढ़ाने से अलग कर सकती थी. संविधान में ऐसा कुछ भी नहीं लिखा है जो कहता हो कि महिला आरक्षण के लिए लोकसभा की सीटें बढ़ने का इंतजार करना जरूरी है.
अप्रैल के विशेष सत्र का असली मकसद महिला आरक्षण नहीं था. बल्कि महिला आरक्षण एक बहाना था, जिसकी आड़ में परिसीमन को आगे बढ़ाने की कोशिश की जा रही थी. यह मौजूदा संवैधानिक ढांचे को दरकिनार करके परिसीमन की प्रक्रिया समय से पहले शुरू करने की कोशिश थी, जबकि यह ढांचा 2027 की जनगणना के आंकड़े आने तक ऐसी किसी भी कवायद को रोकता है. इस नजरिए से देखें तो असली मकसद महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाना नहीं, बल्कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले चुनावी नक्शे को नए सिरे से बदलना था.
समय की बात छोड़ भी दें, तो 131वें संशोधन और 2023 के पुराने कानून, दोनों में लागू करने से जुड़ी कई जरूरी बातें अब भी साफ नहीं हैं. यह अभी तय नहीं है कि बढ़ी हुई संसद में आरक्षित सीटें कैसे चुनी जाएंगी. कानून में एक-तिहाई आरक्षण की बात तो कही गई है, लेकिन इसका पूरा तरीका, खासकर आरक्षित सीटों को बदलते रहने (रोटेशन) का नियम, बाद में तय करने के लिए छोड़ दिया गया है. यह कोई छोटी बात नहीं है. रोटेशन से ही तय होता है कि कौन, कहां से, और कितनी बार चुनाव लड़ सकता है, और इसका सीधा असर जवाबदेही और इलाके के विकास पर पड़ता है. मौजूदा कानून में रोटेशन का सिद्धांत तो पुराने कानून से लिया गया है, लेकिन यह नहीं बताया गया कि किन सीटों को आरक्षित किया जाएगा और रोटेशन किस तरीके से होगा. इस अनिश्चितता की वजह से सीटों के बंटवारे को लेकर लंबे समय तक राजनीतिक झगड़े हो सकते हैं और लोगों का भरोसा डगमगा सकता है कि आरक्षण की यह प्रक्रिया सही मायने में निष्पक्ष है.
परिसीमन और राज्यों का प्रतिनिधित्व
अब परिसीमन ही सबसे बड़ा मुद्दा बन गया है. संविधान के मुताबिक लोकसभा की सीटें राज्यों के बीच उनकी आबादी के हिसाब से बांटी जानी चाहिए, ताकि सबका प्रतिनिधित्व बराबर रहे. 1951, 1961 और 1971 की जनगणना के बाद संसदीय सीटों की सीमाएं फिर से खींची गई थीं, लेकिन इसके बाद की सरकारों ने आबादी में बड़े बदलाव होने के बावजूद परिसीमन को टालते रहने का फैसला किया. भले ही उत्तर के राज्यों में आबादी दक्षिण के मुकाबले कहीं तेजी से बढ़ी, फिर भी एक बड़ी राजनीतिक सहमति यह थी कि लोकसभा की सीटों का बंटवारा 1971 के स्तर पर ही कायम रहेगा, जब तक कि 2026 के बाद पहली जनगणना न हो जाए. यह सिर्फ एक तकनीकी कदम नहीं था, बल्कि एक राजनीतिक समझौता था, ताकि जिन राज्यों ने आबादी को काबू में रखने की नीतियां सफलता से लागू कीं, उन्हें संसद में सीटें कम मिलने की सजा न भुगतनी पड़े. इस तरह, भले ही आबादी के हिसाब से पूरी तरह बराबरी न हो, इससे राज्यों के बीच एक तरह का संतुलन बना रहा. यह फैसला इस उम्मीद पर टिका था कि उत्तर के राज्य भी धीरे-धीरे आबादी काबू करने और विकास में दक्षिण के बराबर आ जाएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ, जिससे यह बात और पुख्ता होती है कि सिर्फ आबादी के आधार पर राज्यों की सीटें तय नहीं की जा सकतीं.
मौजूदा बिलों का यह पैकेज उस पुरानी सहमति से हटकर है. लोकसभा को बड़ा करने और सीटों को नए सिरे से बांटने का प्रस्ताव रखकर, यह उस पुराने और विवादित सवाल को फिर से खड़ा कर देता है कि राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व कैसे बांटा जाना चाहिए. असम और जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश में हाल में हुए परिसीमन ने इन चिंताओं को और बढ़ा दिया है, क्योंकि इनसे यह डर पैदा हुआ कि परिसीमन की प्रक्रिया का इस्तेमाल धार्मिक आधार पर सीटों की गड़बड़ी (गेरीमैंडरिंग) के लिए भी किया जा सकता है. जब तक सीटें बांटने का कोई साफ और निष्पक्ष फाॅर्मूला सामने नहीं आता, तब तक यह कह पाना मुश्किल है कि यह कवायद बराबरी के प्रतिनिधित्व और राज्यों के बीच निष्पक्षता में सही संतुलन बनाएगी, या इसका इस्तेमाल सीटों में गड़बड़ी करने के लिए किया जाएगा.
राजनीतिक नतीजे
परिसीमन बिल का नाकाम होना सत्ताधारी पार्टी के लिए एक बड़ा राजनीतिक झटका था. इसके बावजूद, ऐसा लगता है कि सरकार लोकसभा बढ़ाने के प्रस्ताव के साथ महिला आरक्षण के बिल फिर से लाने पर अड़ी हुई है, भले ही उसके पास अब भी दो-तिहाई बहुमत नहीं है. लोकसभा को करीब 50 प्रतिशत बढ़ाने की इस योजना को सभी राज्यों के लिए बराबर और निष्पक्ष बताया जा रहा है. लेकिन असल में इससे उत्तर के ज्यादा आबादी वाले राज्यों की राजनीतिक ताकत कहीं ज्यादा बढ़ जाएगी, जहां आबादी अब भी तेजी से बढ़ रही है, जबकि दक्षिण के राज्यों का हिस्सा घट जाएगा, हालांकि उन्होंने आबादी को काबू में रखा है और देश की अर्थव्यवस्था में उनका योगदान भी बड़ा है. सिर्फ आबादी के आधार पर सीटें बांटने का मतलब है कि गिनती की ताकत को विकास के काम और अच्छे शासन से ऊपर रखा जा रहा है. इससे हिंदी पट्टी का राजनीतिक दबदबा और मजबूत होगा, जो लोकसभा बड़ी होने का एक तय नतीजा है. इससे बीजेपी और उसके बहुसंख्यकवादी एजेंडे को भी मजबूती मिलेगी, क्योंकि पार्टी का मुख्य आधार हिंदी पट्टी में ही है, जहां उसका जनाधार मजबूत है और यह उसे संसद में बड़े बहुमत में बदल सकता है.
सीटें बढ़ाने, महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े ये प्रस्ताव एक खास राजनीतिक हालात से निकले हैं: 2024 के आम चुनाव में सत्ताधारी पार्टी को अपने दम पर बहुमत नहीं मिल पाया. लेकिन इन संवैधानिक बदलावों का मकसद सिर्फ अगला चुनाव जीतना नहीं है. इनका मकसद पूरे राजनीतिक ढांचे को इस तरह बदलना है कि बीजेपी का राजनीतिक दबदबा बनाए रखना आसान हो जाए, और पार्टी हिंदी पट्टी में टिके हुए एक मजबूत, शायद स्थायी, बहुमत के करीब पहुंच जाए.
इससे अलग-अलग इलाकों, समाज के तबकों और महिलाओं के बीच राजनीतिक ताकत का पूरा संतुलन बदल सकता है, और यह भी बदल सकता है कि किसे, कहां से, और कितने अनुपात में प्रतिनिधित्व मिलता है. ये बदलाव आखिरकार भारत के लोकतंत्र को मजबूत करेंगे या कमजोर, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि ये बराबरी, संघवाद और निष्पक्षता के बीच संवैधानिक संतुलन बनाए रखते हुए राजनीतिक भागीदारी को कितना बढ़ा पाते हैं.
खासतौर पर, सबसे बड़ी चुनौती यह है कि आबादी के आधार पर प्रतिनिधित्व और राज्यों के बीच संघीय संतुलन, दोनों को साथ लेकर कैसे चला जाए – यानी ज्यादा आबादी वाले राज्यों का दबदबा इतना न बढ़ जाए कि बराबरी के प्रतिनिधित्व का लोकतांत्रिक सिद्धांत ही कमजोर पड़ जाए. इससे महिला आरक्षण की जरूरत कम नहीं होती – यह मांग बहुत पहले से लंबित है और इसे अब बिना किसी देरी के लागू किया जाना चाहिए. महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने की इस जरूरी मांग को संवैधानिक बदलावों के उस बड़े पैकेज से जोड़ने की कोई वजह नहीं है, जिसके भारत के लोकतंत्र पर पड़ने वाले असर को लेकर अभी भी गहरा विवाद बना.
https://theleaflet.in/governance-and-policy/womens-reservation-delimitation-and-the-future-of-representation