वर्ष 35 / अंक - 20 / अलविदा प्रोफेसर मलविंदर जीत सिंह वड़ैच

अलविदा प्रोफेसर मलविंदर जीत सिंह वड़ैच

अलविदा प्रोफेसर मलविंदर जीत सिंह वड़ैच

हम अपने बीच से 9 अप्रैल 2026 को विदा हो गए वरिष्ठ खोजी इतिहासकार और 1967-68 में पुलिस की नजर में गुरु नानक इंजीनियरिंग काॅलेज, लुधियाना में “नक्सली तैयार करने की नर्सरी” चलाने वाले प्रोफेसर मलविंदर जीत सिंह वड़ैच जी को अपना हार्दिक सम्मान और इन्कलाबी सलाम पेश करते हैं!

प्रो. मलविंदरजीत सिंह वड़ैच ने अपने निवास स्थान पिंड साकेतड़ी (पंचकुला) में आज अंतिम सांस ली. देश की स्वतंत्रता के लिए उठे क्रांतिकारी आंदोलनों के समर्पित तथा प्रबुद्ध इतिहासकार और गुरु नानक इंजीनियरिंग काॅलेज, लुधियाना में लंबे समय तक ह्यूमनिटीज के प्रोफेसर रहे प्रो. मलविंदरजीत सिंह वड़ैच ने कुछ समय पहले ही अपना 96वां जन्मदिन मनाया था.

प्रो. मलविंदरजीत सिंह वड़ैच का परिवार 1947 में बंटवारे के वक्त लद्धेवाला वड़ैच (गुजरांवाला) से इधर आकर पहले कपूरथला में और बाद में स्थायी रूप से पिंड रावर (करनाल) में बस गया था.

उन्होंने 1960 से 1989 तक गुरु नानक इंजीनियरिंग काॅलेज में पढ़ाया. छात्रों में क्रांति व देशभक्ति की विरासत के प्रति जागरूकता, रचनात्मक समझ, खेल संस्कृति, स्व-अनुशासन और सामुदायिक शक्ति का निरंतर निर्माण उनका मूल उद्देश्य रहा. उम्र के आखिरी दो-तीन साल छोड़कर रोजाना सुबह खेल मैदान या सुखना झील के किनारे दौड़ना उनका अटल नियम रहा.

उन्होंने गदर पार्टी के संस्थापक बाबा सोहन सिंह भकना, शहीद भगत सिंह की माता विद्यावती, बाबा हरि सिंह उस्मान, बाबा अर्जन सिंह जगरांवां, बाबा रूड़ सिंह चूहड़चक्क, बाबा पाला सिंह ढुड्डीके, शहीद जतिन दास के भाई किरन दादा तथा अनेक अन्य देशभक्तों की संगत की और उनकी यादों के नोटिस लिए.

1967 में अपने सहयोगियों और विश्वसनीय साथियों के साथ मिलकर उन्होंने ‘युवक केंद्र’ नामक संगठन की स्थापना की और पूरे पंजाब में शहीदों की विरासत और चेतना का परचम लहराया. प्रो. उनके प्रमुख विद्यार्थियों में शहीद भगत सिंह के भांजे प्रो. जगमोहन सिंह, प्रिंसिपल एमएस परमार, प्रोफेसर मिहर चंद भारद्वाज के अलावा साहित्य क्षेत्र के अनेक जाने-माने लोग शामिल हैं.

1989 में नौकरी से सेवानिवृत्ति के बाद प्रो. वड़ैच ने कानून की पढ़ाई की और देशभक्त आंदोलनों के योद्धाओं की सरकार द्वारा जब्त की गई जायदादों को वापस दिलवाने के लिए पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में कुछ समय तक वकालत भी की. वह इस संबंध में अदालत से कई अहम फैसले करवाने में भी कामयाब रहे.

उनके द्वारा लिखी गई खोजपूर्ण पुस्तकों की संख्या तीस से अधिक है. उन्होंने पहले और दूसरे लाहौर षड्यंत्र केस के पूरी कार्रवाई और जजमेंट को लाहौर हाईकोर्ट से हासिल किया व संपादित करके छपवाया.

प्रो. मलविंदरजीत सिंह ने सराभा गांव में गदर लहर के जाने-माने शहीद करतार सिंह सराभा की याद में अस्पताल और मेडिकल काॅलेज खुलवाने में प्रारंभिक योगदान दिया और देश विदेशों में बस रहे अपने अनेक विद्यार्थियों की मदद से इन संस्थाओं को बड़ा फंड इकट्टा करके दिया.

प्रो. वड़ैच ने गहरी खोज करके 17 और 18 जनवरी 1872 को मालेरकोटला में अंग्रेज सरकार द्वारा तोपों द्वारा उड़ा कर शहीद कर दिये गए 66 कूका (नामधारी) बागियों की मुकम्मल सूची, उन के गांवों व पते-ठिकाने समेत तैयार करके इतिहास में एक बड़ा योगदान दिया.

प्रो. मलविंदरजीत सिंह वड़ैच की इच्छा के अनुसार उनका पार्थिव शरीर पीजीआई चंडीगढ़ को शोध कार्यों के लिए सौंप दिया गया. वह अपने पीछे अपनी इकलौती बेटी डाॅ. मिन्ना वड़ैच तथा उनके परिवार के अलावा अपना विशाल वैचारिक परिवार छोड़ गए हैं. 

– सुखदर्शन सिंह नत्त

16 May, 2026