वर्ष 35 / अंक - 20 / चुनाव के बाद के संकेत: जीत का उन्माद, आतंक और आर्थ...

चुनाव के बाद के संकेत: जीत का उन्माद, आतंक और आर्थिक बंदी

चुनाव के बाद के संकेत: जीत का उन्माद, आतंक और आर्थिक बंदी

पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के नाटकीय विधान सभा चुनाव नतीजों को आए हुए एक हफ्ता बीत चुका है. इस हफ्ते पश्चिम बंगाल में चुनाव के बाद बड़े पैमाने पर हिंसा और तोड़-फोड़ देखने को मिली, जबकि भाजपा ने एसआइआर के जरिये मिली अपनी जीत को भय पर भरोसे की जीत के तौर पर पेश किया. इस आतंक-अभियान का शिकार आम मुसलमानों की जान और रोजी-रोटी, विपक्षी पार्टियों के दफ्तर और कार्यकर्ता, लेनिन की मूर्तियां और यहां तक कि सिद्धू-कान्हू की मूर्तियां भी बनी हैं; और साथ ही, बंगाल के मुस्लिम धरोहर और सामंतवाद-विरोधी व उपनिवेशवाद-विरोधी विद्रोहों के स्मारक और बंगाल की उन महान हस्तियों के चित्र भी, जिन पर अब भगवा रंग पोते जाने का खतरा मंडरा रहा है. जीत के इस उन्मादी जश्न के बीच हम राज्य प्रशासन में एक स्पष्ट बदलाव भी देख रहे हैं – एक ऐसा बदलाव जिसमें उन अधिकारियों को ‘दो-और-लो’ के आधार पर इनाम दिया जा रहा है, जिन्होंने पश्चिम बंगाल में एसआइआर चुनावों की देखरेख की थी. विशेष पर्यवेक्षक सुब्रत गुप्ता अब नए मुख्य मंत्री के प्रधान सलाहकार बन गए हैं, और सीईओ मनोज अग्रवाल नए मुख्य सचिव बनाए गए हैं.

हिंसा के आम पैटर्न और दिशा में एक रहस्यमय अपवाद है चंद्रनाथ रथ की हत्या. चंद्रनाथ रथ भारतीय वायु सेना के पूर्व तकनीकी कारोबारी थे और पिछले छह सालों से शुभेंदु अधिकारी के कार्यकारी सहायक के तौर पर काम कर रहे थे. 6 मई को चंद्रनाथ रथ की हत्या ने उन तीन पिछली रहस्यमयी मौतों की यादें ताजा कर दीं, जो अतीत में शुभेंदु अधिकारी के लिए काम करने वाले लोगों की हुई थीं - 2013 में प्रदीप झा, 2018 में शुभव्रत चक्रवर्ती और 2021 में पुलक लाहिड़ी. ये सभी सिलसिलेवार मौतें आज भी रहस्य के घेरे में हैं. अब जब शुभेंदु अधिकारी पश्चिम बंगाल की पहली भाजपा सरकार में मुख्य मंत्री बन गए हैं, तो इस पूरी कड़ी की विश्वसनीय जांच होनी चाहिए.

शुभेंदु अधिकारी 2016 के पश्चिम बंगाल चुनावों से पहले राष्ट्रीय सुर्खियों में आए थे, जब उन पर रिश्वत लेने के एक स्टिंग ऑपरेशन का वीडियो वायरल हो गया था. प्रधान मंत्री मोदी और तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, दोनों ने ही टीएमसी के खिलाफ प्रचार करने के लिए इस वीडियो का इस्तेमाल किया था. लेकिन असम में अपने प्रतिरूप हिमंत विश्व शर्मा के नक्शेकदम पर चलते हुए, जिन्हें भाजपा में शामिल होने से पहले भाजपा ने ही भ्रष्टाचार का प्रतीक बताकर निशाना बनाया था, शुभेंदु अधिकारी भी 2020 में भाजपा में शामिल हो गए. अब असम में हिमंत विश्व शर्मा, बिहार में सम्राट चैधरी और पश्चिम बंगाल में शुभेंदु अधिकारी, ये तीन राजनेता जिन्होंने अपने कैरियर की शुरूआत क्रमशः कांग्रेस, राजद और टीएमसी से की थी और जिन पर भ्रष्टाचार तथा आपराधिक मामलों के गंभीर आरोप थे, उन्हें भाजपा ने उनके संबंधित राज्यों के मुख्य मंत्री के रूप में पुनस्र्थापित कर दिया है. और ये सभी, योगी ब्रांड के बुलडोजर राज के नफरती जहर उगलने वाले प्रतीक बनकर उभरे हैं.

तमिलनाडु में राज्यपाल ने सबसे बड़ी एकल पार्टी या चुनाव-पूर्व गठबंधन के नेता को आमंत्रित करने की संवैधानिक परिपाटी से हटकर काम किया, और तब तक इंतजार किया जब तक टीवीके ने बहुमत समर्थन का लिखित प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर दिया. कांग्रेस, वीसीके, भाकपा, माकपा और आइयूएमएल के समर्थन से टीवीके प्रमुख सी. जोसेफ विजय ने आखिरकार तमिलनाडु के मुख्य मंत्री के रूप में शपथ ले ली है. शुरूआती संकेत बताते हैं कि टीवीके खुद को भारतीय गणराज्य का संघीय ढांचा बरकरार रखने वाली धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक शक्ति के रूप में स्थापित कर रहा है. इस लिहाज से हम कह सकते हैं कि तमिलनाडु और केरलम, दोनों ही राज्य भारत के दक्षिणी क्षेत्र में भाजपा की चुनावी बढ़त को लगातार नकार रहे हैं और उसका प्रतिरोध कर रहे हैं.

4 मई के नतीजों के राजनीतिक नतीजों के अलावा, अब हमें मोदी सरकार द्वारा थोपी गई अघोषित आर्थिक आपातकाल का भी सामना करना पड़ रहा है. कमर्शियल कुकिंग गैस की कीमतों में भारी बढ़ोतरी और अर्थव्यवस्था पर इसके दूरगामी असर के साथ-साथ, अब प्रधान मंत्री की तरफ से हमें खर्च में कई किस्म की कटौती करने की बिल्कुल नई सलाह भी मिली है. प्रधान मंत्री, जो कम से कम पचास गाड़ियों के काफिले के साथ चलते हैं और 8,000 करोड़ के आलीशान विमान में सफर करते हैं, चाहते हैं कि लोग घर से काम करें, पेट्रोल और कुकिंग तेल का इस्तेमाल कम करें और अगले एक साल तक विदेश यात्रा न करें. सरकार की वैदेशिक और आर्थिक नीतियों की नाकामियों, खास तौर पर देश की विदेश नीति और व्यापारिक हितों को अमेरिका-इजरायल गठजोड़ के हाथों गिरवी रखने, के चलते यह आर्थिक संकट और गहरा हो गया है. और अब सरकार इस संकट का बोझ आम लोगों पर डालने में जुटी हुई है. अघोषित आर्थिक बंदी (लाॅकडाउन), लोकतंत्र को खुलेआम कमजोर करने और लोगों को उनके चुनावी अधिकारों से वंचित करने का यह मेल फासीवादी आक्रामकता के एक नए स्तर को दर्शाता है. वामपंथी, प्रगतिशील और फासीवाद-विरोधी ताकतों को नई ऊर्जा, दृढ़ संकल्प और एकता के साथ इस बढ़ते हमले का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए.

16 May, 2026