-- अभिजित मजूमदार
पश्चिम बंगाल में भाजपा का सत्ता पर आखिरकार कब्जा किसी आजाद और निष्पक्ष जनादेश के जरिए नहीं हुआ, बल्कि पूरी चुनावी प्रक्रिया को सुनियोजित और शातिराना तरीके से तोड़-मरोड़ कर हासिल किया गया. चुनाव आयोग महज सत्ता के एक पालतू और आज्ञाकारी औजार में तब्दील हो गया, जिसने लोकतांत्रिक अधिकारों और संवैधानिक मर्यादाओं पर हुए इस अभूतपूर्व हमले को खुली छूट दी.
चार महीने तक चले तथाकथित ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) अभियान के नाम पर लगभग 91 लाख वोटरों के नाम मतदाता सूची से काट दिए गए. इसके साथ ही पूरे राज्य में 2 लाख 40 हजार से अधिक केंद्रीय अर्धसैनिक बल तैनात कर दिए गए, जिससे बंगाल का माहौल ऐसा बना दिया गया मानो किसी संसदीय लोकतंत्र में चुनाव नहीं, बल्कि सैन्य कब्जा चल रहा हो. गांवों और कस्बों की सड़कों पर बुलेटप्रूफ युद्धक वाहनों का प्रदर्शन किया गया, जबकि मुख्यधारा मीडिया के बड़े हिस्से ने इस तानाशाही कब्जे के पक्ष में माहौल बनाने का काम किया. मतगणना केंद्रों पर डराने-धमकाने और पारदर्शिता को जानबूझकर बाधित करने की खबरों ने साफ कर दिया कि किस तरह पूरी चुनावी मशीनरी का भाजपा के पक्ष में दुरुपयोग किया गया. यह सब ऐसे समय में हुआ जब ममता बनर्जी सरकार के खिलाफ जनता में गहरा आक्रोश मौजूद था, जिसे भाजपा ने बेहद चालाकी से अपने फासीवादी एजेंडे को थोपने के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया.
सत्ता हथियाते ही भाजपा-आरएसएस गठजोड़ ने त्रिपुरा के कुख्यात ‘दमनकारी माॅडल’ की तर्ज पर दहशत और सांकेतिक वर्चस्व का एक सुनियोजित खूनी खेल शुरू कर दिया. लेनिन और सिदो-कान्हू जैसे महान क्रांतिकारियों की प्रतिमाओं को तोड़ा गया और उनका अपमान किया गया. बुलडोजर रैलियां निकालकर अल्पसंख्यक समुदायों को आतंकित किया गया, मुसलमानों द्वारा चलाए जा रहे दुकानों, होटलों और रेस्तराओं को ध्वस्त किया गया और गरीबों की बस्तियों को निशाना बनाया गया. पूरे राज्य में भय, उत्पीड़न और असुरक्षा का माहौल सुनियोजित तरीके से फैलाया गया.
इस खुले दमन के साथ-साथ एक आक्रामक वैचारिक हमला भी चलाया गया. संघ परिवार ने बंगाल पुनर्जागरण के महानायकों स्वामी विवेकानंद, बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय, रवींद्रनाथ टैगोर, राजा राममोहन राय और अन्य – की विरासत को हथियाने की कोशिशें तेज कर दीं. उनके मानवतावादी, सार्वभौमिक और सांप्रदायिकता-विरोधी विचारों को विकृत कर उन्हें एक संकीर्ण बहुसंख्यकवादी सांचे में ढालने की साजिश रची जा रही है. वहीं दूसरी ओर, यह सत्ता खुले तौर पर श्यामा प्रसाद मुऽर्जी की सांप्रदायिक राजनीति का महिमामंडन कर रही है, जो बंगाल विभाजन के प्रमुख पैरोकारों में से एक थे और जिन्होंने 1951 में जनसंघ की स्थापना की थी. इसका सीधा मकसद ध्रुवीकरण और विभाजनकारी राजनीति को वैधता देना है.
फासीवादी हमलों की इस लगातार तेज होती मुहिम के सामने बंगाल की वामपंथी और जनवादी ताकतों ने झुकने से इनकार कर दिया. डर, हिंसा और तोड़फोड़ का सामना करते हुए भाकपा(माले) लिबरेशन की पश्चिम बंगाल राज्य कमेटी ने सभी वामपंथी दलों, जनवादी संगठनों और इंसाफपसंद नागरिकों से एकजुट होकर प्रतिरोध खड़ा करने का आह्वान किया.
इस आह्वान के जवाब में 7 मई को कोलकाता समेत राज्य के कई जिलों में विरोध-प्रदर्शनों का आयोजन किया गया. कोलकाता में भाकपा(माले) लिबरेशन, एसयूसीआई(सी) के कार्यकर्ताओं और नागरिक समाज से जुड़े अनेक जनवादी लोगों ने धर्मतल्ला स्थित ऐतिहासिक लेनिन प्रतिमा के सामने जुटकर विरोध दर्ज किया – वही प्रतिमा जिसे भगवा ताकतें लगातार अपने निशाने पर रखती रही हैं. यह जमावड़ा धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र और वामपंथी एकजुटता के एक शक्तिशाली उद्घोष में तब्दील हो गया.
प्रतिरोध सभा को काॅमरेड दीपंकर भट्टाचार्य, एसयूसीआई(सी) के राज्य सचिव काॅमरेड चंडीदास भट्टाचार्य, पत्रकार अर्क भादुड़ी, सांस्कृतिक कार्यकर्ता जयराज भट्टाचार्य, भाकपा(माले) रेड स्टार के काॅमरेड शंकर तथा प्रतिरोध की कई अन्य प्रमुख आवाजों ने संबोधित किया. वक्ताओं ने बंगाल पर थोपे गए इस तानाशाही कब्जे की कड़ी निंदा की और फासीवाद तथा सांप्रदायिक नफरत के खिलाफ व्यापक जनवादी संघर्ष खड़ा करने का आह्वान किया.
इसके अगले दिन, 8 मई को, लेफ्ट फ्रंट के घटक दलों और भाकपा(माले) द्वारा आयोजित एक विशाल प्रतिरोध मार्च सड़कों पर उतरा. प्रदर्शनकारियों ने भगवा गुंडागर्दी और तोड़फोड़ के खिलाफ नारे बुलंद किए तथा अल्पसंख्यक समुदाय, खासकर उन गरीब दुकानदारों के अधिकारों की रक्षा की मांग उठाई, जिनकी रोजी-रोटी बुलडोजर ब्रिगेड ने बेरहमी से तबाह कर दी थी.
9 मई को, यानी भगवा सरकार के शपथ ग्रहण के दिन, यह जनप्रतिरोध और भी तेज हो उठा. इसी दिन नागरिकों द्वारा एक प्रतिरोध मार्च आयोजित किया गया, जो 1905 में रवींद्रनाथ टैगोर के नेतृत्व में निकले उस ऐतिहासिक जुलूस की सचेत याद में था, जिसने लाॅर्ड कर्जन द्वारा बंगाल को सांप्रदायिक आधार पर बांटने की साजिश के खिलाफ बागबाजार से नाखोदा मस्जिद तक मार्च किया था. उसी ऐतिहासिक विरासत को फिर से जीवित करते हुए इस मार्च ने हिंदू-मुस्लिम एकता, सामाजिक सौहार्द और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के खिलाफ प्रतिरोध का संदेश बुलंद किया. यह ऐसे समय में हुआ जब भाजपा-आरएसएस का पूरा तंत्र लगातार अल्पसंख्यकों को निशाना बना रहा था और बंगाल की साझा सांस्कृतिक विरासत को तोड़ने की कोशिश कर रहा था.
नई सत्ता ने उसी भाषा में जवाब दिया जो हर तानाशाही की पहचान होती है: दमन और पुलिसिया जुल्म. बागबाजार में ही पुलिस प्रशासन ने रैली को रोकने की कोशिश की, लेकिन प्रदर्शनकारियों के कदम पीछे हटने वाले नहीं थे. सड़कों पर इंकलाबी गीतों की गूंज सुनाई देती रही, सरकारी धमकियों के बीच जनसभा निर्भीकता से जारी रही और राज्य की ताकत व दमन के सामने प्रतिरोध की आवाज ने झुकने से साफ इनकार कर दिया.
इन प्रतिरोध प्रदर्शनों की गूंज पूरे बंगाल में सुनाई दी. समाज के जागरूक नागरिकों, सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं, छात्रों, मजदूरों और विभिन्न जनवादी तबकों ने इन आंदोलनों के साथ अपनी एकजुटता जताई, क्योंकि वे समझ रहे थे कि राज्य में फासीवादी राजनीति का उभार कितना गंभीर खतरा बन चुका है. कई बड़े जिला मुख्यालयों में भी विरोध मार्च और एकजुटता सभाओं का आयोजन किया गया, जिसने साफ कर दिया कि सांप्रदायिक तानाशाही और काॅरपोरेट समर्थित फासीवाद के खिलाफ लड़ाई का अभी बस आगाज हुआ है.
आज बंगाल की यह लड़ाई महज चुनावी हार-जीत का मुकाबला नहीं है. यह लोकतंत्र को तानाशाही से बचाने, बहुलतावाद को सांप्रदायिक नफरत से बचाने और बंगाल की प्रगतिशील-जनवादी विरासत को प्रतिक्रियावादी ताकतों द्वारा हथियाए जाने से रोकने की लड़ाई है. बंगाल की सड़कों पर फूट रहा यह प्रतिरोध एक व्यापक जनवादी जवाबी संघर्ष की शुरुआत है – एक ऐसा संघर्ष, जो राज्य की लंबे समय से चली आ रही उपनिवेश-विरोधी लड़ाइयों, सामाजिक सुधार आंदोलनों और वामपंथी संघर्षों की गौरवशाली विरासत से अपनी ताकत हासिल करता है.