-- पेद्रो मोंजोन बराता
[ समकालीन फासीवाद आज एक वैश्विक तानाशाही व्यवस्था का रूप ले चुका है, जिसकी अगुवाई अमेरिका और उसके सहयोगी देश कर रहे हैं. सैन्य आक्रामकता, आर्थिक प्रतिबंध, मीडिया प्रचार और संस्थागत कब्जे के जरिए यह व्यवस्था वैश्विक दक्षिण की प्रतिरोधी ताकतों और संप्रभु देशों को दबाने में लगी है. लेख बताता है कि इस चुनौती का मुकाबला बिखरे हुए संघर्षों से नहीं, बल्कि व्यापक जनवादी एकजुटता से ही किया जा सकता है. साथ ही, यह याद दिलाता है कि सूचना, विचारों और ऐतिहासिक स्मृति पर नियंत्रण की लड़ाई आज राजनीतिक सत्ता की लड़ाई जितनी ही महत्वपूर्ण है.]
वैश्विक दक्षिण की जनता की यादों में साल 2026 के पहले चार महीने उस दौर के रूप में दर्ज होंगे, जब समकालीन फासीवाद ने अपनी बची-खुची सारी मक्कारी और ओढ़ी गई नैतिकता का लबादा भी उतार फेंका. यह महज दो विश्वयुद्धों के बीच के फासीवादी शासन की नकल नहीं है. यह अब वर्चस्व कायम करने वाली पार-राष्ट्रीय व्यवस्था में बदल चुका है, जिसकी अगुवाई अमेरिका की शासक अभिजात ताकतें और उनके रणनीतिक साझेदार कर रहे हैं. यह वित्तीय पूंजी, एल्गोरिदम और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क पर आधारित पार-राष्ट्रीय तानाशाही का ऐसा ढांचा है, जो डिजिटल ध्रुवीकरण, लोकतांत्रिक संस्थाओं पर भीतर से कब्जा, सुरक्षा के बाजारीकरण, तथा सैन्य-औद्योगिक गठजोड़, तकनीकी इजारेदारों और प्रतिक्रियावादी सरकारों की मिलीभगत पर टिका हुआ है. इस व्यवस्था में अंतरराष्ट्रीय कानून के जो थोड़े-बहुत असरदार अवशेष बचे थे, उनकी जगह लगातार धमकी और बल प्रयोग ने ले ली है.
संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय कानूनों की अनदेखी किसी लापरवाही या संस्थागत नाकाबिलियत की वजह से नहीं की जा रही है. उन्हें योजनाबद्ध तरीके से खोखला किया जा रहा है, चुनिंदा ढंग से इस्तेमाल किया जा रहा है, और जब वे साम्राज्यवादी केंद्र के रणनीतिक हितों से टकराते हैं तो उन्हें निष्प्रभावी बना दिया जाता है. हकीकत में ताकतवर का कानून ही लागू है, लेकिन उसे राष्ट्रीय सुरक्षा, वित्तीय स्थिरता, मानवाधिकारों की रक्षा और ऐसे ही दूसरे झूठे दावों के पर्दे में छिपाया जाता है. जो चीजें कुछ समय पहले तक ‘कूटनीतिक दबाव’ या ‘चुनिंदा प्रतिबंध’ कहकर पेश की जाती थीं, वे अब तेजी से और संरचनागत रूप से व्यापक तथा मनमाने आर्थिक प्रतिबंधों, प्रत्यक्ष या गुप्त सैन्य हस्तक्षेपों, क्षेत्रीय कब्जों और जनता को योजनाबद्ध मानवीय घुटन में धकेलने की नीतियों में बदल चुकी हैं.
3 जनवरी को वेनेजुएला की सरकार को गिराने की कार्रवाई – जिसमें “ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजाॅल्व” के तहत राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस का अपहरण किया गया – से लेकर 28 फरवरी को शुरू किए गए “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” के तहत ईरान पर अमेरिका और इस्राइल की बेबुनियाद तथा विश्वासघाती सैन्य आक्रामकता तक, जिसका निशाना लेबनान भी बना है, अमेरिकी साम्राज्यवाद ने अपने हमलों को ऐसी सटीकता के साथ एक-दूसरे से जोड़ा है जिसका मकसद प्रतिरोध के सभी केंद्रों को एक ही झटके में कुचल देना है.
लेकिन मई की शुरुआत तक तस्वीर वैसी नहीं थी जैसी वाशिंगटन ने उम्मीद की थी. यह सच है कि लैटिन अमेरिका के कुछ प्रगतिशील राज्य या तो पतन के शिकार हो चुके हैं या निष्क्रिय कर दिए गए हैं. अर्जेंटीना अति-दक्षिणपंथ की प्रयोगशाला बन चुका है. वेनेजुएला विदेशी हस्तक्षेप की चपेट में है. इनके साथ वे दूसरे देश भी जुड़ गए हैं जिन्होंने अपनी विदेश नीति को वाशिंगटन के अधीन कर दिया है – होंडुरास, अल सल्वाडोर, इक्वाडोर, चिली, पराग्वे, कोस्टारिका, पनामा, डोमिनिकन गणराज्य, बोलिविया, गुयाना तथा त्रिनिदाद और टोबैगो. इन सभी ने 7 मार्च को ट्रम्प द्वारा बुलाई गई ‘शील्ड ऑफ द अमेरिकाज’ शिखर बैठक में भाग लिया और अद्यतन मुनरो सिद्धांत के तहत साम्राज्य की महाद्वीपीय रणनीति के साथ अपनी निष्ठा की मुहर लगा दी. एक शक्तिशाली और स्वायत्त क्षेत्रीय मोर्चे, अल्बा (ALBA) और (UNASUR) के सपने को फिलहाल ध्वस्त कर दिया गया है. अब इस पूरे क्षेत्र पर एक और बड़ा खतरा मंडरा रहा है: क्यूबा और निकारागुआ सीधे निशाने पर हैं.
लेकिन जनता – जिसे अक्सर मेजों पर बैठकर विश्लेषण करने वाले लोग उसकी सरकारों के साथ गड्डमड्ड कर देते हैं – पराजित नहीं हुई है. इसके उलट, सबसे कठिन परिस्थितियों में भी लोग संगठन के नए रूप और सीमाओं के पार नए एकजुटतापूर्ण गठबंधन विकसित कर रहे हैं. इसके पीछे वह चेतना और ऐतिहासिक स्मृति काम कर रही है जिसे फासीवाद कभी मिटा नहीं सकता. लेकिन यह निर्णायक है कि क्रांतिकारी आंदोलन उन्हें सही दिशा देने और संगठित करने में सक्षम हों.
इस लेख का उद्देश्य मौजूदा स्थिति का आकलन और रणनीतिक विश्लेषण प्रस्तुत करना है. इसका मकसद उन कमजोरियों की पहचान करना है जिनकी भारी कीमत चुकानी पड़ी है, उन खतरों को रेखांकित करना है जो सामने खड़े हैं, और साथ ही उन ताकतों तथा संभावनाओं को भी सामने लाना है जो प्रतिरोध को जीवित रखे हुए हैं और जिनका सही इस्तेमाल इतिहास की धारा को मोड़ सकता है. यह लेख एक बुनियादी बात पर जोर देता है जिसे शुरू से ही साफ समझ लेना चाहिए: सबसे प्रगतिशील राज्य – भले ही वे पूंजीवादी ढांचे के भीतर हों – और वे देश भी जो बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की बहुप्रतीक्षित प्रक्रिया का हिस्सा हैं, उन पर इस तेजी से बढ़ती फासीवादीकरण की प्रक्रिया का मुकाबला करने की ऐतिहासिक जिम्मेदारी है. केवल ‘राष्ट्रीय हित’ के नाम पर निष्क्रिय या तथाकथित तटस्थ बने रहना – यदि वैश्वीकृत दुनिया में ऐसा संभव भी हो – आखिरकार सबके लिए घातक साबित होगा. फासीवाद फलता-फूलता है, पहले सबसे कमजोर और असहाय लोगों को निगलना चाहता है, लेकिन अंततः पूरी दुनिया को हड़प लेने की कोशिश करता है. हिटलर के साथ भी यही हुआ था: उसे तब तक बढ़ने दिया गया जब तक बहुत देर नहीं हो गई और उसके सामने कोई सीमा नहीं खींची गई. इसकी कीमत करोड़ों इंसानों ने अपनी जान देकर चुकाई. इतिहास उस भयावह भूल को दोहरा नहीं सकता.
फासीवाद ने किन कमजोरियों का फायदा उठाया
कोई भी ईमानदार विश्लेषण राष्ट्रीय और जनपक्षीय खेमे की अपनी आंतरिक जिम्मेदारियों से आंख नहीं चुरा सकता. फासीवादी हमला केवल अपनी सैन्य या आर्थिक ताकत के कारण सफल नहीं हुआ है; वह इसलिए भी आगे बढ़ा क्योंकि उसे खुले दरवाजे मिले, क्योंकि संस्थागत ढांचे को ही जनवैधता समझ लिया गया, और क्योंकि लोकतांत्रिक संस्थाओं के भीतर घुसकर काम करने की दुश्मन की क्षमता को कम करके आंका गया.
पहली और सबसे पीड़ादायक कमजोरी यह थी कि सरकार के भाग्य और जनता के भाग्य को एक ही चीज मान लिया गया. वर्षों तक संस्थागत वाम के बड़े हिस्से ने ऐसे व्यवहार किया मानो चुनाव जीत लेना ही जनाधिकारों की गारंटी के लिए काफी हो. लैटिन अमेरिका की अनेक सरकारों ने जमीनी जनसंगठन और जनगोलबंदी की जगह संस्थागत स्थिरता को प्राथमिकता दी. वे साम्राज्य के साथ बातचीत की मेज पर बैठीं, कभी-कभी नेकनीयती के साथ भी, जबकि वाशिंगटन हमला करने की तैयारी कर रहा था. नतीजा सबके सामने है. दूसरे उदाहरणों को छोड़ भी दें, तो अर्जेंटीना में जनता के असंतोष और आर्थिक संकट के खिलाफ पड़े दंडात्मक वोट का फायदा जनविरोधी कार्यक्रम वाली अति-दक्षिणपंथी ताकतों ने उठाया. पैदा हुए राजनीतिक खालीपन ने हावियर मिलेई जैसे व्यक्ति को राष्ट्रपति बनने का रास्ता दे दिया.
इक्वाडोर और बोलिविया में वामपंथी और प्रगतिशील ताकतों के बीच गहरे विभाजन ने दक्षिणपंथ की सत्ता में वापसी को आसान बना दिया और उन परिवर्तनकारी प्रक्रियाओं को बर्बाद कर दिया जिन्हें व्यापक जनसमर्थन हासिल था. यह कोई संयोग नहीं था. यह संस्थागत कब्जे के उस पैटर्न का हिस्सा है जिसमें समकालीन फासीवाद अद्भुत दक्षता रखता है. वह औपचारिक वैधानिकता को ढाल की तरह इस्तेमाल करते हुए वास्तविक संप्रभुता को भीतर से ध्वस्त करता है.
दूसरी और हर जगह मौजूद कमजोरी वैचारिक-सूचनात्मक युद्ध के मोर्चे पर रही है. मोटे तौर पर संस्थागत वाम ऐसी वैकल्पिक संचार व्यवस्था खड़ी नहीं कर सका जो सूचना नाकेबंदी को पूरी तरह तोड़ सके. फासीवाद ने एक विशाल मीडिया मशीन के सहारे जनमत के बड़े हिस्से पर अपना वर्चस्व कायम कर लिया है. यही मशीन दक्षिणपंथी नीतियों को ‘उम्मीद’ के रूप में, आक्रामकता को ‘आत्मरक्षा’ के रूप में, कब्जे को ‘लोकतंत्र बहाली’ के रूप में और जनसंहार को ‘मानवीय संघर्ष’ के रूप में पेश करती है.
इस मोर्चे पर नुकसान बहुत बड़ा रहा है. अनेक समाज या तो वास्तविकता से अनजान रहे हैं या दक्षिणपंथी प्रचार के जरिये उनकी चेतना को प्रभावित और विकृत किया गया है. हालांकि प्रतिरोध की ताकतें इस स्थिति को बदलने की दिशा में कदम उठा रही हैं, लेकिन इन प्रयासों को कहीं अधिक प्रभावशाली बनाना होगा. जैसा कि इस दौर के दूसरे रणनीतिक विश्लेषणों में भी कहा गया है, अर्थों और विचारों की लड़ाई उतनी ही निर्णायक है जितनी भौतिक संसाधनों की लड़ाई. वैचारिक संप्रभुता के बिना राजनीतिक संप्रभुता संभव नहीं है. मुक्तिकामी शिक्षा के बिना जागरूक नागरिकता पैदा नहीं हो सकती. और यदि संस्कृति को साझा सामाजिक संपदा के रूप में संरक्षित न किया जाए, तो बाजार सब कुछ निगल जाता है.
समकालीन फासीवाद केवल मिसाइलों से हमला नहीं करता; वह एल्गोरिदमों, झूठ की सुनियोजित फैक्ट्रियों और लोगों को निष्क्रिय बनाने वाली कथाओं के जरिये भी हमला करता है. वह स्मृतियों को खंडित करता है और गुस्से को संगठित प्रतिरोध में बदलने के बजाय निष्क्रिय उपभोग में तब्दील कर देता है. इस घेरेबंदी को तोड़ने के लिए एक स्वायत्त, विकेंद्रित और जनशिक्षा पर आधारित संचार व्यवस्था की जरूरत है – ऐसी व्यवस्था जो केवल पर्दाफाश ही न करे, बल्कि शिक्षित करे, संगठित करे और वास्तविक विकल्पों की दिशा भी दिखाए.
मौजूदा हालात के खतरे
अगर आंतरिक कमजोरियां पराजय के एक हिस्से को समझाती हैं, तो बाहरी खतरे इस चुनौती की वास्तविक विशालता को उजागर करते हैं. मई 2026 की तस्वीर एक ऐसी दुनिया की है जहां हमले बेहद सुनियोजित और एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. भू-राजनीति अब अलग-अलग मोर्चों का खेल नहीं रह गई है, बल्कि आपस में जुड़ी कार्रवाइयों का एक साझा शतरंज का बोर्ड बन चुकी है. और इसी बोर्ड पर क्यूबा के खिलाफ घेरा पहले कभी न देखे गए दबाव के साथ कसता जा रहा है.
अब कोई भी मोर्चा अलग-थलग नहीं है. वाशिंगटन और इस्राइल अपने हमलों का तालमेल वास्तविक समय में बिठा रहे हैं. एक तरफ क्यूबा पर पूर्ण तेल नाकेबंदी थोपकर उसका दम घोंटा जा रहा है और वेनेजुएला के ऊर्जा संसाधनों पर सैन्य हस्तक्षेप के जरिये नियंत्रण मजबूत किया जा रहा है, तो दूसरी तरफ ईरान के खिलाफ युद्ध का मकसद इस्लामी क्रांति को तोड़ना है. इसी मोर्चे पर लेबनान भी आक्रमण का शिकार बनाया जा रहा है. यह तालमेल किसी आकस्मिक योजना का नतीजा नहीं है, बल्कि ‘समग्र युद्ध’ की उस रणनीति का हिस्सा है जो आर्थिक दबाव, प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप, संस्थागत कब्जे और मनोवैज्ञानिक युद्ध को एक साथ जोड़ती है. क्यूबा को दी जा रही धमकियां अब किसी परदे में नहीं छिपी हैं. 10 अप्रैल को पेंटागन ने यूएसए टुडे को पुष्टि की कि उसने राष्ट्रपति ट्रम्प के निर्देश पर क्यूबा के खिलाफ संभावित सैन्य कार्रवाई की अपनी आपात योजनाओं को चुपचाप तेज कर दिया है और विभिन्न सैन्य परिदृश्यों की तैयारी की जा रही है. हमारे तटों को सीधे निशाना बनाने वाली यह खतरनाक उकसाहट उस अभूतपूर्व आर्थिक घेराबंदी में एक नया अध्याय जोड़ती है जो पहले से जारी है. 1 मई को डोनाल्ड ट्रम्प ने खुलकर घोषणा की कि ईरान के खिलाफ अभियान के बाद उनका इरादा ‘तुरंत क्यूबा पर नियंत्रण हासिल करने’ का है. उन्होंने यहां तक संकेत दिया कि क्यूबा के तट के पास विमानवाहक पोत यूएसएस अब्राहम लिंकन की तैनाती ही आत्मसमर्पण करवाने के लिए काफी होगी.
लेकिन शायद सबसे खामोश और सबसे घातक खतरा युद्ध के हथियार के रूप में मानवीय घुटन पैदा करना है. क्यूबा के खिलाफ जो नीति अपनाई जा रही है – आर्थिक नाकेबंदी और ऊर्जा नाकेबंदी का संयुक्त इस्तेमाल – वह महज कोई ‘प्रतिबंध’ नहीं है. यह ऐसा हथियार है जिसे अस्पतालों, परिवहन व्यवस्था और बिजली उत्पादन को ठप करने के लिए तैयार किया गया है. 30 अप्रैल को ट्रम्प ने एक नए कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किए जिसने पहली बार तथाकथित ‘द्वितीयक प्रतिबंध’ लागू करके नाकेबंदी को कहीं अधिक व्यापक बना दिया. इसका मतलब यह है कि दुनिया की कोई भी विदेशी कंपनी या बैंक, चाहे वह किसी भी देश का हो, यदि वह क्यूबा के ऊर्जा, खनन या वित्तीय सेवाओं जैसे प्रमुख क्षेत्रों के साथ लेन-देन करता है, तो उसे भी दंडित किया जाएगा. इस कदम का उद्देश्य उन सभी के लिए कानूनी और वित्तीय जोखिम बढ़ाना है जो किसी भी रूप में क्यूबा की अर्थव्यवस्था को टिकाए रखने में मदद कर सकते हैं. इस तरह क्यूबाई जनता के खिलाफ भूख को युद्ध के हथियार में बदल देने की नीति अभूतपूर्व क्रूरता और अमानवीयता की हद तक पहुंच चुकी है.
ठीक इसी तरह गजा में जारी जनसंहार और भुखमरी कोई आकस्मिक या सहायक परिणाम नहीं हैं; वे स्वयं एक रणनीतिक लक्ष्य हैं. 2 मई 2026 तक के अद्यतन आंकड़े इसकी भयावहता को साफ दिखाते हैं: अक्टूबर 2023 से अब तक 78,500 से अधिक फिलिस्तीनियों की हत्या की जा चुकी है, 98 प्रतिशत स्कूल तबाह कर दिए गए हैं, और 37 अंतरराष्ट्रीय मानवीय संगठनों के काम करने के लाइसेंस इस्राइल ने रद्द कर दिए हैं. लेकिन हत्याओं से भी आगे बढ़कर, भूख को युद्ध के हथियार में बदल देने की नीति ने एक अभूतपूर्व जनसांख्यिकीय संकट पैदा कर दिया है. हमले की शुरुआत से अब तक गजा की आबादी में 12 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है.
समकालीन फासीवाद इस निष्कर्ष पर पहुंच चुका है कि किसी जनता को तोड़ने के लिए हर गली-मोहल्ले पर सैन्य कब्जा करना जरूरी नहीं है. जीवन के लिए आवश्यक संसाधनों को काट देना, लोगों के अस्तित्व को ही अपराध घोषित कर देना और उनके विनाश को किसी कथित ‘अस्तित्वगत आत्मरक्षा’ का अनिवार्य दुष्परिणाम बताकर पेश कर देना ही काफी है.
साम्राज्यवादी हमलों के इस समन्वय ने एक ऐसा रास्ता अपनाया है जो उसके तौर-तरीके और उसकी कमजोरी दोनों को उजागर करता है. क्यूबा के खिलाफ ऊर्जा नाकेबंदी और ईरान पर आक्रमण शायद संभव नहीं होते यदि पहले गजा पट्टी में फिलिस्तीनियों के सार्वजनिक और दंडमुक्त जनसंहार को अंजाम न दिया गया होता; यदि वेनेजुएला के खिलाफ ‘ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजाॅल्व’ सफल न हुआ होता; और यदि दक्षिणपंथी सरकारों तथा राष्ट्रपति ट्रम्प की बैठक के जरिये प्रतिक्रियावादी ‘शील्ड ऑफ द अमेरिकाज’ गठबंधन का गठन संभव न हुआ होता.
लेकिन साम्राज्यवाद का इस स्तर तक नंगी ताकत और हिंसा का सहारा लेने पर मजबूर होना उसकी संरचनात्मक ताकत का नहीं, बल्कि उसके भीतर गहराते संकट का संकेत है. यह इस बात का प्रमाण है कि भू-राजनीतिक नियंत्रण बनाए रखने के लिए वह पहले से कहीं अधिक सीमा-पार दमन और जबरदस्ती पर निर्भर हो गया है. जब आर्थिक शक्ति पिछड़ने लगती है, जब सहमति टूटने लगती है, जब सांस्कृतिक वर्चस्व अपनी पकड़ खो देता है और जब लोगों को अपने साथ मिला लेने की व्यवस्थाएं विफल हो जाती हैं, तब सत्ता का अंतिम तर्क बल प्रयोग ही रह जाता है. और यह विजय का नहीं, बल्कि ऐतिहासिक पतन का लक्षण है.
यहीं इस लेख की मूल थीसिस पूरी स्पष्टता के साथ सामने आती है: कोई भी राज्य, चाहे वह कितना ही प्रगतिशील क्यों न हो, फासीवाद की इस बढ़त के सामने तटस्थ नहीं रह सकता. निष्क्रियता और संकीर्ण राष्ट्रीय हितों की शरण में जाना कोई व्यवहारिक विकल्प नहीं, बल्कि आत्मविनाश की ओर ले जाने वाला जाल है. फासीवाद सीमाओं पर रुकता नहीं. वह पहले कमजोरों को निगलता है, लेकिन अंततः सब कुछ हड़प लेना चाहता है.
जनता को अपनी सरकारों पर दबाव बनाना होगा ताकि वे उस जड़ता को तोड़ें जो फासीवाद के लिए रास्ता साफ करती है. क्योंकि हमारे समय की इस प्रतिक्रियावादी चढ़ाई के दौर में तटस्थता कूटनीति नहीं है; वह पहले से स्वीकार कर लिया गया आत्मसमर्पण है.
प्रतिरोध की ताकत और गरिमा
फिर भी, इस उदास और भयावह तस्वीर के बीच ऐसे तत्व मौजूद हैं जो उम्मीद और संघर्ष की इच्छा को जिंदा रखते हैं. क्योंकि इस पूरे दौर ने एक बात साफ कर दी है: जनता, अनेक राज्यों के विपरीत, पूरी तरह कब्जे में नहीं लाई जा सकती. अब बुनियादी फर्क स्पष्ट हो चुका है. ऐसे राज्य हो सकते हैं जिन्हें अपने नियंत्रण में लिया जा सके, निष्क्रिय बनाया जा सके या साम्राज्य की सेवा में लगा दिया जा सके. लेकिन जनता, यदि वह अपने संगठन और चेतना को बनाए रखे, तो उसे इस तरह अधीन नहीं किया जा सकता.
वेनेजुएला में घटनाक्रम के आगे बढ़ने, जनता के हितों पर पड़ते प्रभाव और राष्ट्रीय संप्रभुता में बढ़ते हस्तक्षेप के साथ-साथ सक्रिय और फैलते हुए जनप्रतिरोध की संभावना भी बढ़ेगी. यह शायद वैसा प्रतिरोध नहीं होगा जैसा कई विश्लेषक कल्पना करते हैं – न कोई औपचारिक ढांचा, न कोई आसानी से पहचाने जाने वाला नेतृत्व. यह मोहल्लों, बस्तियों और समुदायों में फैला हुआ प्रतिरोध होगा, जो एकजुटता पर आधारित अर्थव्यवस्था के नेटवर्कों और क्रांतिकारी बुद्धिजीवी तबकों के सहारे आगे बढ़ेगा. यह वह प्रतिरोध होगा जो विदेशी कब्जे को अपनी नियति मानने से इंकार करेगा. अर्जेंटीना में सामाजिक आंदोलनों ने नई ऊर्जा के साथ सड़कों का रुख किया है. कोलंबिया में किसान, आदिवासी और अफ्रीकी मूल के समुदाय राज्य के भीतर और उसके समर्थन में जनशक्ति के वैकल्पिक ढांचे खड़े करना जारी रखे हुए हैं.
ऐसे राज्य भी हैं जो अब भी उस ऐतिहासिक चेतना के सहारे डटे हुए हैं जिसे कोई नाकेबंदी मिटा नहीं सकती. क्यूबा और निकारागुआ आज भी अपने पैरों पर खड़े हैं. विशेष रूप से क्यूबा, साम्राज्यवादी तूफान के बीच कोई अलग-थलग पड़ा देश नहीं है. वह वैश्विक स्तर पर संघर्ष का एक रणनीतिक मोर्चा है, साम्राज्यवाद-विरोधी प्रतिरोध की एक प्रयोगशाला है और यह परखने की कसौटी भी है कि दक्षिणी दुनिया में संप्रभु विकास की परियोजनाएं कितनी टिकाऊ हो सकती हैं.
जैसा कि ट्रांसनेशनल इंस्टीट्यूट, प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल के शोधकर्ताओं और आइजैक सैनी जैसे विद्वानों ने रेखांकित किया है, क्यूबा की रक्षा करना कोई अतीत की यादों या क्रांतिकारी रोमानी कल्पनाओं से जुड़ा अभ्यास नहीं है. यह अपने सबसे शुद्ध रूप में मुक्ति की भू-राजनीति है. इसका अर्थ है यह समझना कि जहां आत्मनिर्णय के सिद्धांत को तोड़ा जाता है, वहां दुनिया की सभी जनता के अधिकारों और नैतिक आधार को कमजोर किया जाता है.
क्यूबा ने आर्थिक घेराबंदी और प्रत्यक्ष सैन्य धमकियों का जिस दृढ़ता के साथ सामना किया है, वह अध्ययन का विषय है. 16 अप्रैल को क्रांति के समाजवादी चरित्रा की घोषणा की 65वीं वर्षगांठ पर आयोजित समारोह में राष्ट्रपति मिगेल दियाज-कानेल ने संभावित सैन्य आक्रमण के संदर्भ में स्पष्ट शब्दों में कहा था: ‘हम ऐसा नहीं चाहते, लेकिन इसे रोकने के लिए तैयारी करना हमारा कर्तव्य है, और यदि यह अपरिहार्य हो जाए तो उसे पराजित करना भी हमारा कर्तव्य है.’ क्रांतिकारी सशस्त्र बल उच्च स्तर की तैयारी बनाए हुए हैं और समूची जनता के दीर्घकालिक प्रतिरोध युद्ध की तैयारी जारी रखे हुए हैं.
दूसरी ओर मेक्सिको ने अपने सिद्धांतों के प्रति असाधारण दृढ़ता और क्यूबा के साथ अनुकरणीय एकजुटता का परिचय दिया है. उसने ऐसी स्वतंत्र नीति अपनाई है जो मैक्सिकन विदेश नीति की सर्वाेत्तम परंपराओं का सम्मान करती है. जनवरी में कच्चे तेल की आपूर्ति रोक दिए जाने के बावजूद राष्ट्रपति क्लाउदिया शाइनबाउम की सरकार नौसेना के जहाजों के माध्यम से खाद्य सामग्री और अन्य आवश्यक वस्तुओं की मानवीय सहायता भेजती रही है और द्वीप को ईंधन की आपूर्ति बहाल करने के लिए सक्रिय रूप से काम कर रही है. बाहरी दबावों को अस्वीकार करते हुए क्यूबा के साथ व्यापार करने के मेक्सिको के संप्रभु अधिकार की यह रक्षा पूरे क्षेत्र के अन्य देशों के लिए गरिमा और स्वतंत्रता का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है.
पश्चिम एशिया में ईरान की प्रतिक्रिया प्रतिरोध के ऐसे उदाहरण के रूप में सामने आई है जिसने घटनाक्रम को निर्णायक रूप से प्रभावित किया है. यह साम्राज्यवादी आक्रमण की बेतहाशा रफ्तार पर लगा सबसे बड़ा अवरोध साबित हुआ है. 28 फरवरी को शुरू की गई सैन्य आक्रामकता और अयातुल्लाह खामेनेई की हत्या के बाद इस्लामी क्रांति के टूट जाने की जो उम्मीद की जा रही थी, वह पूरी नहीं हुई. इसके विपरीत, ईरान ने अपनी रक्षात्मक क्षमता का प्रभावशाली प्रदर्शन किया.
‘ऑपरेशन ट्रू प्राॅमिस 4’ के तहत ईरानी सशस्त्रा बलों ने जवाबी कार्रवाई की सौ दौर संचालित कीं, जिनमें सैकड़ों बैलिस्टिक और हाइपरसोनिक मिसाइलों तथा ड्रोन का इस्तेमाल पश्चिम एशिया में फैले अमेरिकी सैन्य अड्डों और कब्जाए गए फिलिस्तीनी क्षेत्रों में इस्राइली ठिकानों के खिलाफ किया गया.
नेता की हत्या से वह परिणाम नहीं निकला जिसकी उम्मीद की गई थी. इसके उलट, तेहरान, कघेम और मशहद की सड़कों पर विशाल जनसमूह उतर आया. प्रत्यक्ष आक्रमण ने जनता के संकल्प और सरकार के प्रति समर्थन को और मजबूत किया. इस जवाबी प्रतिरोध का असर इतना व्यापक रहा कि उसने वाशिंगटन और तेल अवीव के बीच मौजूद तालमेल में भी दरार पैदा कर दी और दोनों के बीच बढ़ते मतभेदों को उजागर कर दिया.
हालांकि दोनों ने आक्रमण की शुरुआत एक संयुक्त अभियान के रूप में की थी, लेकिन अब उनके लक्ष्य अलग-अलग दिखाई देने लगे हैं. व्हाइट हाउस ऐसी बातचीत आधारित राह तलाश रहा है जो उसे लंबे और महंगे सैन्य दलदल में फंसने से बचा सके, जबकि नेतन्याहू सरकार संघर्ष को और अधिक भड़काने पर जोर दे रही है. ईरान को कमजोर करने के बजाय यह विभाजन इस बात की पुष्टि करता है कि प्रतिरोध ने युद्धभूमि और वार्ता-मेज – दोनों जगह अपने लिए अनुकूल परिस्थितियां पैदा कर ली हैं और साम्राज्यवादी गठबंधन को अपनी आंतरिक विरोधाभासों को उजागर करने पर मजबूर कर दिया है.
अंततः, ऐतिहासिक स्मृति का महत्व बेहद गहरा है. लैटिन अमेरिका की जनता के पास स्वतंत्रता संग्रामों, सैन्य तानाशाहियों और तख्तापलटों के खिलाफ लड़ी गई लड़ाइयों की जीवित स्मृतियां मौजूद हैं. यह स्मृति एक रणनीतिक पूंजी है, जिसे फासीवाद निराशा, भ्रम और झूठे प्रचार के जरिये मिटाने की कोशिश करता है. लेकिन यह आज भी गरिमा, संगठन और प्रतिरोध की एक संभावित ऊर्जा बनी हुई है.
इसी तरह फिलिस्तीनी प्रतिरोध, दक्षिणी लेबनान के संघर्षों और स्वयं इस्लामी क्रांति की स्मृति उन लोगों के संकल्प को मजबूत करती है जो आज पश्चिम एशिया में आक्रमण का सामना कर रहे हैं. ऐतिहासिक स्मृति वह मजबूत जमीन है जिस पर प्रतिरोध अपनी जड़ें जमाता है.
साम्राज्य में पड़ती दरारें
इस भयावह परिदृश्य के सामने निराशावाद का शिकार हो जाना एक घातक भूल होगी. क्योंकि प्रतिरोध की रणनीतिक संभावनाओं के अलावा, फासीवाद – चाहे वह कितना भी शक्तिशाली क्यों न दिखाई दे – गंभीर अंतर्विरोधों से ग्रस्त है. ये अंतर्विरोध उस व्यवस्था के अंतिम दौर के संकट की उपज हैं जो तथाकथित पैक्स अमेरिकाना पर टिकी हुई थी.
निष्कर्षणवादी-आर्थिक माॅडल, जो खनिज, तेल, गैस, भूमि, श्रम और अन्य संसाधनों के तेज दोहन पर टिका है, अब अपनी सीमाएं दिखा चुका है. चीन समेत स्थापित और उभरती शक्तियों के बढ़ते प्रभाव के बीच यह व्यवस्था तेजी से कमजोर पड़ रही है, और मार्च-अप्रैल की घटनाओं ने वे दरारें भी उजागर कर दी हैं जिनका लाभ उठाया जा सकता है.
पहला अवसर साम्राज्य की उस बेताब कोशिश में छिपा है जिसमें वह अपनी ताकत को एक साथ बहुत सारे मोर्चों पर फैला रहा है. अमेरिका और इस्राइल पश्चिम एशिया (गजा, ईरान, लेबनान), लैटिन अमेरिका (क्यूबा की घेराबंदी और वेनेजुएला में हस्तक्षेप) और प्रशांत क्षेत्र – जहां चीन के साथ रणनीतिक प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है – सभी जगह एक साथ युद्ध और टकराव में उलझे हुए हैं. यह प्रतिस्पर्धा लगातार अधिक संसाधनों की मांग करती है और मौजूदा पूंजीवादी संकट के भीतर इसका कोई समाधान दिखाई नहीं देता. चीन को पीछे छोड़ना अब संभव नहीं है; आने वाले समय में एशियाई शक्ति के पक्ष में यह अंतर और बढ़ेगा. दूसरी ओर, टैरिफ और आर्थिक दबावों की नीति ने स्वयं अमेरिका के भीतर संघर्षों को जन्म दिया है और उसके सहयोगियों के साथ भी दरारें पैदा की हैं. कई सहयोगी देश अब अमेरिका और इस्राइल के युद्धोन्मादी अभियानों से दूरी बनाने लगे हैं. इस तरह अनेक मोर्चों पर फैली आक्रामकता ने साम्राज्यवादी केंद्रों के भीतर ही अंतर्विरोध पैदा कर दिए हैं.
अमेरिका में सीनेट ने ईरान के खिलाफ ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ की छिपी हुई भारी लागतों की जांच शुरू कर दी है. इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि ट्रम्प प्रशासन के खिलाफ विरोध लगातार व्यापक होता जा रहा है. ‘नो किंग्स’ आंदोलन के तहत 28 मार्च को अमेरिका के सभी 50 राज्यों में आयोजित लगभग 3,300 कार्यक्रमों में 90 लाख से अधिक लोग सड़कों पर उतरे. इसके अलावा 16 यूरोपीय देशों में भी युद्ध, सत्तावाद और ट्रम्प प्रशासन की विदेश नीति के खिलाफ प्रदर्शन हुए. यह संख्या जून 2025 के ‘नो किंग्स’ प्रदर्शनों की तुलना में लगभग दोगुनी थी. यह तथ्य साम्राज्य की आंतरिक कमजोरियों और उसके भू-राजनीतिक विस्तार की सीमाओं को स्पष्ट करता है. यह ऐसी दरारें पैदा करता है जिनका अंतरराष्ट्रीय एकजुटता आंदोलन को लाभ उठाना चाहिए.
इस्राइल में भी सैनिकों के परिवार ‘अनंत युद्ध’ के खिलाफ संगठित होने लगे हैं. आम लोग अब अपने ही शहरों के विनाश के प्रभावों को महसूस कर रहे हैं. उनके सामने वही तबाही खड़ी है जिसे उन्होंने गजा पर थोपा था. दूसरा अवसर दक्षिण अमेरिकी राजनीति के पुनर्गठन में मौजूद है. लैटिन अमेरिका की वे सरकारें जो अमेरिका के साथ गठजोड़ करके अतिदक्षिणपंथी रास्ते पर बढ़ रही हैं, जल्द ही आंतरिक संकटों का सामना करेंगी, क्योंकि उनकी जनता नवउदारवादी नीतियों के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिणाम भुगत रही है.
जनआंदोलनों के अंतरराष्ट्रीय समन्वय ने हाल के वर्षों में महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं. नवंबर 2025 में मार देल प्लाटा में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में 12 देशों के 150 से अधिक प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया. इस सम्मेलन का आयोजन अल्बा मूविमिएंतोस, साओ पाउलो फोरम, अर्जेंटीना के प्रमुख ट्रेड यूनियन महासंघों और दक्षिणी कोन के ट्रेड यूनियन महासंघों की समन्वय समिति ने मिलकर किया था. वहां जनसंप्रभुता की रक्षा और क्षेत्र में दक्षिणपंथी उभार के विरोध की प्रतिबद्धता दोहराई गई.
क्यूबा के समर्थन में चल रहे अभियान के इर्द-गिर्द भी दुनिया भर के एकजुटता आंदोलन संगठित हो रहे हैं, जो वैश्विक साम्राज्यवाद-विरोधी चेतना को मजबूत कर रहे हैं. हवाना में आयोजित मई दिवस समारोह इसका सशक्त उदाहरण था. 38 देशों से आए 800 से अधिक मित्रों और 152 ट्रेड यूनियन तथा एकजुटता संगठनों के प्रतिनिधियों ने पांच लाख से अधिक क्यूबाई नागरिकों के साथ साम्राज्यवाद-विरोधी मंच तक मार्च किया. इस कार्यक्रम में सेना के जनरल राउल कास्त्रो और राष्ट्रपति मिगेल दियाज-कानेल भी मौजूद थे.
उरुग्वे जैसे देशों के प्रतिनिधिमंडल – जो लगभग पचास मजदूरों, छात्रों और पेंशनभोगियों के साथ 250 किलोग्राम दवाइयां और दूध पाउडर लेकर पहुंचे – यह दिखाते हैं कि क्यूबा के साथ एकजुटता कोई प्रतीकात्मक या भावनात्मक प्रदर्शन नहीं, बल्कि जीवंत और बढ़ती हुई राजनीतिक प्रथा है. ऐसे मंच 2005 के ‘एफटीएए नहीं’ शिखर सम्मेलन की स्मृतियों को पुनर्जीवित करते हैं और जनआंदोलनों को फिर से सड़कों पर पहल हासिल करने की संभावनाएं प्रदान करते हैं.
तीसरा अवसर दक्षिण-दक्षिण सहयोग के नए पुनर्निर्माण में निहित है. दो दशकों से अधिक समय के साम्राज्यवाद-विरोधी और नवउदारवाद-विरोधी संघर्षों से विकसित अल्बा मूविमिएंतोस आज इस प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है. 25 देशों के 400 से अधिक संगठनों को जोड़ने वाला यह नेटवर्क प्रगतिशील सरकारों पर निर्भर हुए बिना जनता से जनता के सीधे रिश्तों को मजबूत करता है. यही कारण है कि यह पारंपरिक कूटनीतिक ढांचों की तुलना में कहीं अधिक लचीला और सक्रिय है.
इसी दिशा में मानवता की रक्षा के लिए बुद्धिजीवियों, कलाकारों और सामाजिक आंदोलनों का नेटवर्क (REDH) जैसी संस्थाओं ने वैचारिक और राजनीतिक एकजुटता का मजबूत आधार तैयार किया है. 6 से 9 मई तक हवाना में आयोजित होने वाली अल्बा मूविमिएंतोस की चौथी महाद्वीपीय सभा की तैयारियों में ब्राजील के भूमिहीन मजदूर आंदोलन और 20 से अधिक जनसंगठनों द्वारा आयोजित एकजुटता बेड़े जैसी पहलें शामिल हैं. यह नाकेबंदी के खिलाफ प्रतिरोध और क्यूबाई क्रांति के समर्थन का प्रतीकात्मक लेकिन राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण कदम है. सीधी सैन्य धमकियों और आर्थिक घेराबंदी के इस दौर में ‘हथियारबंद सभा’ के नारे के साथ बुलाई गई यह बैठक महज विचार-विमर्श का मंच नहीं होगी, बल्कि साम्राज्यवादी हमलों के खिलाफ वैश्विक प्रतिरोध के समन्वय का केंद्र बनेगी.
अंततः, प्रतिबद्ध बुद्धिजीवियों, स्वतंत्र मीडिया और वैकल्पिक संचार नेटवर्कों की भूमिका भी एक महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करती है. मार्च के दौरान पूरे क्षेत्र के बुद्धिजीवियों ने अपने मंचों का इस्तेमाल केवल निंदा करने के लिए नहीं, बल्कि हजारों कार्यकर्ताओं को दुष्प्रचार अभियानों की पहचान करने और अपनी वैकल्पिक कथाएं गढ़ने का प्रशिक्षण देने के लिए भी किया.
अल मयादीन के स्पेनिश विभाग की निदेशक वफीका इब्राहीम जैसी हस्तियां – जिन्होंने इस्राइली बमबारी में अपने परिजनों को खो देने के बाद भी अपना काम जारी रखा – इस बात का प्रतीक बन चुकी हैं कि साहसी शब्द भी एक हथियार होता है. लेकिन इस साहस की कीमत कई बार जीवन देकर चुकानी पड़ती है. इसलिए हमें फातिमा फतूनी, अली शुएब और मोहम्मद फतूनी जैसे उन पत्रकारों को याद रखना चाहिए जिन्होंने स्वतंत्र पत्रकारिता की राह में अपनी जान कुर्बान कर दी. उनके बलिदान प्रतिरोध के झंडों की तरह हमेशा याद रखे जाएंगे.
आगे बढ़ने की रणनीति: कुछ सबक
इस विश्लेषण से कुछ स्पष्ट रणनीतिक निष्कर्ष निकलते हैं जिन्हें जनआंदोलनों, प्रतिबद्ध बुद्धिजीवियों और प्रतिरोध कर रहे राज्यों को गंभीरता से लेना चाहिए. समकालीन फासीवाद को केवल नारे दोहराकर या बिखरी हुई निंदा के जरिये नहीं रोका जा सकता. इसके लिए संगठन, वैचारिक स्पष्टता, अंतरराष्ट्रीय समन्वय और ऐतिहासिक धैर्य की जरूरत है. सबसे पहली जरूरत विखंडन को दूर करने की है. वामपंथ और व्यापक जनपक्षीय खेमे की बिखराव की स्थिति लैटिन अमेरिका के अनेक देशों में पराजय का प्रमुख कारण रही है. संकीर्ण गुटीय आग्रहों को छोड़कर ऐसे क्षेत्रीय समन्वय मंच बनाने होंगे जो केवल सरकारों पर निर्भर न हों, बल्कि संगठित सामाजिक आधार और शक्तिशाली वैकल्पिक मीडिया पर टिके हों. सभी जनआंदोलनों की एकता निर्णायक महत्व रखती है.
दूसरा, वेनेजुएला के अनुभव की आलोचनात्मक समीक्षा आवश्यक है ताकि यह समझा जा सके कि कहां गलतियां हुईं और किन परिस्थितियों में साम्राज्य के साथ असमान शर्तों पर बातचीत करना खतरनाक साबित होता है. संप्रभुता उम्मीदों से नहीं, तैयारी से सुरक्षित होती है.
तीसरा, एकजुटता को ठोस रूप लेना होगा. केवल समर्थन प्रस्ताव और निंदा पर्याप्त नहीं हैं. क्यूबा के खिलाफ नाकेबंदी और सैन्य धमकियों का जवाब ईंधन, खाद्य सामग्री और दवाओं की आपूर्ति के माध्यम से घेराबंदी को तोड़कर देना होगा. गजा में जारी जनसंहार और भुखमरी के खिलाफ भी ठोस मानवीय सहायता और राजनीतिक समर्थन आवश्यक है.
चौथा, वैचारिक-सूचनात्मक युद्ध को जीतना होगा. इसके लिए दुष्प्रचार की पहचान करने वाली तकनीकी क्षमताओं और वैकल्पिक मीडिया के महाद्वीपीय नेटवर्क दोनों की आवश्यकता है. जनता तक सही संदेश पहुंचाना बेहद महत्वपूर्ण है ताकि उन्हें दक्षिणपंथी प्रचार के जरिये गुमराह न किया जा सके.
पांचवां, संकीर्ण राष्ट्रवादी सोच को पीछे छोड़ते हुए क्यूबा की रक्षा को सर्वाेच्च रणनीतिक प्राथमिकता माना जाना चाहिए. लैटिन अमेरिका के इतिहास को समझने वाले जानते हैं कि क्यूबा केवल एक और देश नहीं है, वह प्रतिरोध की अग्रिम चौकी है. उसका पतन पूरे क्षेत्र के जनपक्षीय आंदोलन के लिए गहरा झटका होगा.
अंत में, अपनी गरिमा का सौदा करने से इंकार करना होगा. इतिहास का एक कड़वा सबक यह है कि साम्राज्य के साथ असमान परिस्थितियों में, सिद्धांतों और जनता के हितों की कीमत पर किया गया ‘समझौता’ अंततः पराजय और अधीनता को ही आसान बनाता है.
समकालीन फासीवाद रियायतों की भाषा नहीं समझता. वह केवल सिद्धांतों और संगठित शक्ति की भाषा समझता है. इसलिए संदेश स्पष्ट होना चाहिए: ऐसा कोई समझौता स्वीकार्य नहीं हो सकता जो आत्मसमर्पण या संप्रभुता के परित्याग की ओर ले जाए. जैसा कि फिदेल कास्त्रो ने कहा था: ‘कोई भी क्रांतिकारी सिद्धांत सौदेबाजी का विषय नहीं है. स्वतंत्रता पर सौदा नहीं हो सकता, संप्रभुता पर सौदा नहीं हो सकता, समाजवाद का सौदा नहीं हो सकता.’
एकजुट होकर प्रतिरोध करो, या अलग-अलग होकर पराजित हो जाओ
मई 2026 की शुरुआत में स्थिति गंभीर है और चुनौती असाधारण. अनेक प्रगतिशील राज्यों को कब्जे में ले लिया गया है या निष्क्रिय बना दिया गया है. साम्राज्यवाद ने लैटिन अमेरिका में वह प्रभुत्व फिर से हासिल कर लिया है जिसे कभी खोया हुआ माना जा रहा था. संस्थागत वामपंथ 1990 के दशक के बाद के अपने सबसे कमजोर दौर से गुजर रहा है. फासीवाद ने अपना सबसे क्रूर चेहरा दिखाया है – गजा में जारी जनसंहार और भुखमरी, वेनेजुएला में हस्तक्षेप और क्यूबा के खिलाफ बढ़ती हुई घेराबंदी.
फिर भी, जनता पराजित नहीं हुई है
वेनेजुएला का सबक कड़वा है. लेकिन ईरान का सबक बेहद महत्वपूर्ण है. वह दिखाता है कि साम्राज्यवाद, चाहे उसके पास कितनी भी सैन्य शक्ति और संसाधन हों, रोका जा सकता है; उसका सामना दृढ़ता, स्पष्टता और अटूट संकल्प के साथ किया जा सकता है.
और एक और सबक भी है – क्यूबा, फिलिस्तीन, कोलंबिया के आदिवासी समुदायों, ब्राजील और अर्जेंटीना के सामाजिक आंदोलनों तथा मेक्सिको के अडिग रुख से मिलने वाला सबक. यदि जनता संगठित हो, यदि उसके पास ऐतिहासिक स्मृति और वर्ग चेतना हो, यदि उसका नेतृत्व अपनी गरिमा पर समझौता न करे, तो वह सबसे भयंकर आक्रमणों का सामना कर सकती है और अंततः विजय भी हासिल कर सकती है.
जनता और राज्य के बीच का अंतर कोई अकादमिक बहस नहीं है. यह एक रणनीतिक सवाल है. राज्यों पर कब्जा किया जा सकता है. सरकारों को गिराया जा सकता है. संस्थाओं को साम्राज्य की सेवा में लगाया जा सकता है. लेकिन जनता, यदि वह शिक्षित, संगठित और सचेत रहे, यदि वह अपनी ऐतिहासिक स्मृति और संघर्ष की इच्छा को जीवित रखे, तो उसे कभी पराजित नहीं किया जा सकता.
इतिहास समाप्त नहीं हुआ है. फासीवाद का अंतिम शब्द नहीं होगा. यदि किसी का अंतिम अध्याय लिखा जाएगा, तो वह साम्राज्य का होगा. क्यूबा की हर उस बस्ती में जो नाकेबंदी का मुकाबला गरिमा और रचनात्मकता से करती है, हर उस जनआंदोलन में जो अधीन सरकारों को चुनौती देता है, और गजा तक पहुंचने वाली हर उस खाद्य खेप में जो सैन्य घेराबंदी को धता बताती है, भविष्य की कहानी लिखी जा रही है.
क्योंकि जैसा कि यह पूरा विश्लेषण दिखाता है, तटस्थता पहले से स्वीकार किया गया आत्मसमर्पण है, जबकि संगठित एकजुटता विजय की शुरुआत.
स्रोत: Al Mayadeen English, 26 मई 2026.
(लेखक साओ पाउलो में क्यूबा के पूर्व राजदूत और अंतरराष्ट्रीय नीति अनुसंधान केंद्र के शोधकर्ता हैं)