वर्ष 35 / अंक - 28 / अयोध्या में चंदा चोरी घोटाले के बारे में कुछ और बा...

अयोध्या में चंदा चोरी घोटाले के बारे में कुछ और बातें

अयोध्या में चंदा चोरी घोटाले के बारे में कुछ और बातें

अयोध्या में राम मंदिर ट्रस्ट से जुड़ा घोटाला हर दिन और बड़ा होता जा रहा है. मोदी सरकार के दौर में हुए कई दूसरे घोटालों के उलट, यह एक ऐसा घोटाला है जिसे न तो मोदी सरकार नकार पाई और न ही गोदी मीडिया दबा पाया. इस घोटाले के तार ‘श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट’ और उसे बनाने वाली मोदी सरकार, दोनों से समान रूप से जुड़े हुए हैं. यह घोटाला सीधे तौर पर आरएसएस और विहिप (विश्व हिंदू परिषद) से जुड़ा है, और दोनों संगठनों को इस घोटाले और करोड़ों आस्थावान हिंदुओं पर इसके असर को आधिकारिक तौर पर स्वीकार करना पड़ा है, इन हिंदुओं का भरोसा इस घटना से डगमगा गया है. यह एक ऐसा घोटाला है जिसमें अयोध्या के स्थानीय पत्रकार और तामाम वकील पूरी सच्चाई सामने लाने और न्याय के लिए लड़ने को दृढ़संकल्प हैं.

पिछले चार दशकों से अयोध्या संघ ब्रिगेड की आक्रामक लामबंदी की रणनीति के केंद्र में रहा है. इस अभियान का पहला चरण 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद के विध्वंस के साथ खत्म हुआ, जो भारत की संवैधानिक भविष्य-दृष्टि और कानून के राज के ढांचे का खुला उल्लंघन था. अगले सत्ताइस सालों तक भारतीय राज्य और समाज – जिसमें कार्यपालिका, न्यायपालिका, मुख्यधारा का मीडिया और आम नागरिक समाज शामिल हैं – ने तमाम किस्म की बुनियादी हिचकिचाहट और कमजोरियां दिखाईं, जिससे संघ ब्रिगेड को शुरू में ही यह विध्वंस करने का हौसला मिला था.

मोदी युग की शुरूआत और कार्यपालिका व न्यायपालिका के बीच बढ़ती नजदीकी के प्रभाव से 2019 में सर्वोच्च न्यायालय ने एक अजीब-सा फैसला सुनाया जिसमें बाबरी मस्जिद के विध्वंस को घोर आपराधिक कृत्य तो माना गया, लेकिन मंदिर बनाने के लिए मस्जिद की वही जमीन सौंप दी गई और केंद्र सरकार को राम मंदिर के निर्माण की देखरेख तथा प्रबंधन के लिए एक ट्रस्ट बनाने का निर्देश दिया गया. तब से नरेंद्र मोदी भारत की जनता के प्रति जवाबदेह और जिम्मेदार चुने हुए प्रधान मंत्री के बजाय प्राचीन भारत के ‘पुरोहित-राजा’ की तरह व्यवहार करने लगे हैं. मोदी सरकार के लिए अयोध्या आज उत्तर भारत के पारंपरिक मंदिर शहर से कहीं ज्यादा सत्ता और धार्मिक पर्यटन व व्यापार का केंद्र बन गया है.

यह पहली बार नहीं है जब अयोध्या राम मंदिर परियोजना को लेकर भ्रष्टाचार के आरोप सामने आए हैं. चंदे में हेराफेरी के आरोपों के मौजूदा मामले से पहले भी राम मंदिर निर्माण अभियान के अलग-अलग चरणों में भ्रष्टाचार के अनेकानेक आरोप लग चुके हैं. और इनमें से अधिकतर आरोप अयोध्या के भीतर से ही आए जो अयोध्या मालिकाना हक विवाद के मूल पक्षकारों में से एक, निर्मोही अखाड़ा ने लगाए थे. 1980 के दशक के आखिर और 1990 के दशक की शुरूआत में महंत सीताराम ने विहिप पर दुनिया भर के भक्तों से इकट्ठा किए गए 1,400 करोड़ रुपये से ज्यादा धन धोखे से हड़प लेने का आरोप लगाया था. बाद के चरण में राम शिलाओं के दुरुपयोग के आरोप भी लगे. हाल ही में ऊंची कीमतों पर जमीन हस्तांतरण के कई मामले सामने आए हैं – जिनमें 2 करोड़ रुपये में खरीदी गई जमीन को जल्द ही 18.5 करोड़ रुपये में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को हस्तांतरित करने का मामला भी शामिल है.

संघ-भाजपा प्रतिष्ठान और एक-के-बाद-दूसरी बनी सरकारों ने इन सभी आरोपों को सुनियोजित तरीके से नजरअंदाज किया. मस्जिद गिराने का असंवैधानिक कृत्य, धार्मिक भावनाओं का चुनावी फायदा उठाना और वित्तीय अनियमितताओं के आरोप - जब तक मंदिर नहीं बना था, तब तक इनमें से किसी भी बात का ज्यादा असर नहीं पड़ा. लेकिन मंदिर निर्माण के बाद लोगों की सोच बदलने लगी है. 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले निर्माण पूरा न होने के बावजूद मंदिर के उद्घाटन कर देने से भी भाजपा को उम्मीद के मुताबिक चुनावी फायदा नहीं मिला. उत्तर प्रदेश में भाजपा लोकसभा की ज्यादातर सीटें हार गई, जिसमें खुद अयोध्या की सीट भी शामिल है. स्वयं नरेंद्र मोदी वाराणसी में बहुत कम अंतर से और विवादित हालात में जीत पाए. और अब चंदे में हेराफेरी का घोटाला न सिर्फ मंदिर ट्रस्ट के लिए, बल्कि पूरे संघ-भाजपा प्रतिष्ठान के लिए सबसे बड़ा नैतिक संकट बनकर उभरा है.

इस मुश्किल से निकलने के लिए संघ-भाजपा प्रतिष्ठान एक किस्म की नियंत्रित व सीमित जांच प्रक्रिया चलाना चाहता है, ताकि बड़े लोगों को बचाया जा सके और सारा दोष निचले स्तर के कर्मचारियों पर मढ़ा जा सके. ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय, जो इस घोटाले के मुख्य संदिग्ध माने जा रहे हैं और ट्रस्ट में आरएसएस द्वारा नियुक्त सबसे बड़े पदाधिकारी भी हैं, की जगह अब आरएसएस के ही एक और पदाधिकारी कृष्ण मोहन को लाया गया है.

इस बीच हिंदू रक्षा दल जैसे हिंदुत्ववादी संगठनों ने गैर-हिंदुओं से कहा है कि वे इस हिंदू मामले में दखल न दें, क्योंकि इसमें पैसा सिर्फ हिंदू समुदाय के भीतर ही इधर से उधर हुआ है! विहिप के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष चाहते हैं कि पुलिस उन विपक्षी नेताओं के खिलाफ कार्रवाई करे जो चंदा चोरी की शिकायत कर रहे हैं. और आरएसएस के सरकार्यवाह (जेनरल सेक्रेटरी) हिंदू एकता का आह्वान करते हुए कहते हैं कि ‘हिंदू-विरोधी और देश-विरोधी ताकतों द्वारा इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना का इस्तेमाल कर हिंदू धर्म और समाज को बदनाम करने की साजिश को नाकाम कर दिया जाए’.

चाहे अडानी की कॉरपोरेट धोखाधड़ी हो, उज्जैन में मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री मोहन यादव का जमीन अधिग्रहण का सिलसिला हो, अयोध्या में चंदे की सुनियोजित हेराफेरी हो या फिर महिलाओं के उत्पीड़नकारियों का महिमामंडन हो – संघ ब्रिगेड हमेशा भ्रष्टाचार और पितृसत्तात्मक हिंसा के समर्थन में खड़ा हो जाता है. आरएसएस के भीतर से आवाज उठाने वालों – जैसे अयोध्या चंदा चोरी घोटाले में महिपाल सिंह – को किनारे कर दिया जाता है, या फिर ‘रहस्यमय तरीके से’ रास्ते से हटा दिया जाता है. संघ द्वारा संचालित हर संगठन – भाजपा से लेकर राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट तक – में आरएसएस की एक खूबी साफ दिखती है: पारदर्शिता और जवाबदेही का पूर्ण अभाव. जब कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियांक खड़गे ने आरएसएस से उसके कानूनी कागजात मांगे, तो मोहन भागवत ने आरएसएस की तुलना हिंदू धर्म से करते हुए तर्क दिया कि हिंदू धर्म को किसी रजिस्ट्रेशन की जरूरत नहीं है. किसी भी धर्म को रजिस्ट्रेशन की जरूरत नहीं होती, लेकिन आरएसएस और हिंदू धर्म एक ही चीज तो हैं नहीं.

धर्म के नाम पर आरएसएस लंबे समय से देश के कानूनों और भारतीय संविधान के सिद्धांतों का उल्लंघन करता आ रहा है. राम मंदिर चंदा चोरी का घोटाला पारदर्शिता, कानूनी नियमों और जवाबदेही के मामले में आरएसएस द्वारा लगातार नियमों को तोड़ने का ताजा उदाहरण है. आरएसएस बहुत लंबे समय से अपने अपारदर्शी अस्तित्व और गैर-कानूनी गतिविधियों के बावजूद किसी तरह खुद को बचाता रहा है. आजादी के कुछ ही समय बाद भारत की नई-नई मिली आजादी को खतरे से बचाने के लिए देश के पहले गृह मंत्री सरदार पटेल को महात्मा गांधी की हत्या के पश्चात आरएसएस पर प्रतिबंध लगाने के लिए मजबूर होना पड़ा था. तब आरएसएस ने संविधान का पालन करने और एक सांस्कृतिक संगठन के तौर पर काम करने का वादा करके जल्द ही प्रतिबंध से राहत पा ली थी.

अब हमें आरएसएस मार्का संस्कृति की एक और झलक मिली है, जो धर्म को एक राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करती है और व्यावसायिक फायदे बटोरने और मुनाफा कमाने के लिए हिंदू श्रद्धांलुओं की धार्मिक भावनाओं का शोषण करती है. अयोध्या का यह बड़ा घोटाला भारत के लोगों को आरएसएस को सही ठिकाने पर पहुंचाने का एक और मौका देता है. आरएसएस और मोदी-योगी की ‘डबल इंजन’ सरकार को अपनी लीपापोती की चाल में कामयाब नहीं होने दिया जाना चाहिए. तमाम आरोपों में विश्वसनीय जांच कराना, जवाबदेही तय करना, चंपत राय समेत सभी दोषियों को कड़ी सजा देना और आरएसएस के नियंत्रण वाले मंदिर ट्रस्ट को भंग करना – ये न्यूनतम कदम तो अयोध्या मामले में उठाए ही जाने चाहिए.

11 July, 2026