जब 8 जुलाई 2026 को हमारी टीम जहानाबाद जिले के हुलासगंज प्रखंड और घोसी थाना क्षेत्र के अंतर्गत फल्गु नदी की अरार (किनारे) पर बसे एक छोटे सा गांव चैती पीपर पहुंची, तो सूरज ठीक माथे पर आ चुका था. गांव के मुहाने पर पुलिस की एक अस्थाई चौकी थी, जहां कुछ जवान एक झोपड़ी की छांव में सुस्ता रहे थे. उन्हें गांव की ‘सुरक्षा’ के लिए तैनात किया गया था – उस खौफनाक मंजर के ठीक चार दिन बाद, जिसने इस शांत बस्ती की रूह को झकझोर कर रख दिया था. मुख्यधारा के मीडिया चैनलों और अखबारों ने इस घटना को ‘बालू के अवैध धंधे में दो गुटों/माफिया गिरोहों के बीच खूनी रंजिश’ का रंग देकर पेश किया था. लेकिन सच वह नहीं था जो कैमरों की चमचमाती लाइटों में परोसा जा रहा था; सच ठीक उसके उलट था.
गांव में दाखिल होते ही हमें सबसे पहले पुरुषों की एक मंडली मिली. उन्होंने हमारी टीम के नेता और अरवल के पूर्व विधायक का. महानंद सिंह को तुरंत पहचान लिया. चेहरों पर खौफ की जगह एक साझा दर्द और संघर्ष की चमक थी. एक-दूसरे से ‘लाल सलाम’ हुआ और जैसे ही हमने 4 जुलाई की सुबह का जिक्र छेड़ा, असलियत की परतें एक-एक कर खुलने लगीं. हम उनके साथ आगे बढ़े, तो वहां महिलाओं की एक टोली खड़ी थी – ठीक उसी जगह, जहां चार दिन पहले गोलियां चली थीं. कुछ स्कूल जाने वाली लड़कियां भी थीं. हम वहीं जमीन पर बैठ गए और 4 जुलाई की उस खौफनाक सुबह का मुआइना शुरू हुआ.
चैती पीपर महज 100 घर रविदास, 10 घर रमानी और 3 घर यादव जाति के गरीबों की एक बस्ती है. सरकार ने कहने को तो फल्गु नदी में बालू उत्खनन पर कानूनी प्रतिबंध लगा रखा है, लेकिन बगल के गांव गिन्जी का रहने वाला विष्णु शर्मा उर्फ विष्णु डॉन स्थानीय घोसी और हुलासगंज थाना के खुले संरक्षण में दिन-रात फल्गु का सीना चीरकर बालू लूटता रहा है. उसका दबदबा ऐसा है कि नदी की तरफ देखना भी जान गंवाने को न्योता देना है.
विपन्नता और सामंती दमन के बीच जी रहे इस गांव की रूनी देवी ने 4 जुलाई की सुबह अपने पति विजय राम (विजय चौधरी) से एक बेहद मामूली, मगर जरूरी बात कही थी: “घर की बेटियां अब जवान हो रही हैं, समाज की गंदी नजरों से उन्हें बचाना है. उनके लिए घर में एक शौचालय बनाना जरूरी है. जाइए, नदी से एक-दो बोरा बालू उठा लाइए.”
एक तरफ देश में करोड़ों रुपये बहाकर ‘खुले में शौच मुक्त’ (ODF) अभियानों की ढोल पीटी जाती है, वहीं जमीन पर दलित महिलाओं को आज भी खुले आसमान के नीचे शौच के लिए जाना पड़ता है, जहां बालू माफिया के गुंडों की गिद्ध-दृष्टि हमेशा बनी रहती है. जब विजय राम शौचालय के लिए बालू लाने नदी की तरफ बढ़े, तो विष्णु डॉन के गुंडों ने उन्हें सरेआम धमकाया – “अगर बालू को हाथ भी लगाया, तो लाश बिछा देंगे.” गरीबों ने अपने हक के लिए इस बार सिर झुकाने के बजाय प्रतिवाद किया. कहासुनी हुई, मामला उस वक्त शांत लगा, लेकिन यह केवल तूफान के आने से पहले की खामोशी थी.
कहासुनी के ठीक एक घंटे बाद, विष्णु डॉन के नेतृत्व में अपराधियों का एक पूरा गिरोह आधुनिक और पारंपरिक हरवे-हथियारों से लैस होकर, राइफलें चमकाते हुए टोले में घुस आया. वह कोई साधारण हमला नहीं था च वह एक सोची-समझी साजिश थी – इस टोले को हमेशा के लिए शांत करने के लिए एक ‘सुनियोजित जनसंहार’ की साजिश. गोलियों की तड़तड़ाहट से पूरा आसमान दहल उठा. रेशमी देवी के सिर को छूती हुई एक गोली निकली और वे लहूलुहान होकर गिर पड़ीं. अजय राम के पेट में सीधी गोली लगी. सुधीर राम के पैर में गोली धंस गई. कुल 5 लोग पल भर में खून से लथपथ जमीन पर तड़प रहे थे. माफिया गिरोह ने पुरुषों को बंधक बना लिया था और उन्हें अपने साथ घसीटकर ले जाने लगे.
ग्यारहवीं कक्षा में पढ़ने वाली सुधीर राम की बहन कंचन ने कांपते होठों और सुलगती आंखों से कहानी आगे बढ़ाई. उसने बताया कि उस वक्त वह अपनी बहनों के साथ छत पर खड़ी थी. अपनी आंखों के सामने भाइयों को तड़पते और गोलियों की बौछार देखकर कुछ सेकंड के लिए उसका कलेजा कांप गया. लेकिन अगले ही पल, न जाने कहां से उसके भीतर एक असीम साहस का विस्फोट हुआ. दरवाजों के भीतर छुप जाने और रोने-बिलखने के बजाय, चैती पीपर की औरतें लाठी-डंडे लेकर सीधे चल रही गोलियों के बीच कूद पड़ीं. जब अपराधी दिनेश राम को गोली मारने के बाद, उसकी बोटी-बोटी काट डालने की नीयत से अपने साथ ले जाने लगे, तब महिलाओं ने मोर्चा संभाल लिया. निहत्थी औरतें बंदूकधारियों पर भारी पड़ गईं.
उन्होंने अपराधियों को शारीरिक रूप से दबोच लिया, अपने मर्दों को उनकी गिरफ्त से छुड़ाया और मुख्य सरगना विष्णु शर्मा (विष्णु डॉन) को अपनी फौलादी पकड़ में लेकर आधे घंटे तक बंधक बनाए रखा. स्थानीय पुलिस पर उन्हें रत्ती भर भरोसा न था, इसलिए उन्होंने सूझबूझ दिखाते हुए सीधे आला अधिकारियों को फोन लगाया और विष्णु शर्मा को उनके सुपुर्द किया. महिलाओं के इस अप्रत्याशित पलटवार के बीच, खुद अपराधियों द्वारा चलाई गई अंधाधुंध गोलीबारी की जद में आने से उनके अपने ही एक साथी, माफिया धीरज शर्मा की मौत हो गई.
इस अदम्य साहस को देखकर मन के भीतर जनकवि गोरख पांडेय की वह अमर कविता जीवंत हो उठती है, जो कभी सामंत-पुलिस गठजोड़ के दमन के खिलाफ लड़ती कैथरकला की औरतों के लिए लिखी गई थी. उसका नया संस्करण हैं ये चैती पीपर की औरतें.
अरे, क्या हुआ? क्या हुआ?
इतनी सीधी थीं गऊ जैसी,
इस कदर अबला थीं!
कैसे बंदूकें छीन लीं?
बालू माफिया गुंडों से टकरा गईं,
उसको पकड़कर पुलिस के हवाले कर गईं,
अपने मर्दों को छुड़ा ले गईं
चैती पीपर की औरतें!
जब हमारी टीम कंचन के सामने बैठी, तो उसकी आंखों में आंसू नहीं, बल्कि व्यवस्था को चीर देने वाले सुलगते सवाल थे. उसने प्रशासन और मीडिया की पक्षपातपूर्ण भूमिका पर उंगली उठाते हुए कहा – ‘प्रशासन और मीडिया कह रहा है कि यह दो माफिया गुटों के बीच का संघर्ष है. मैं कहती हूं – ‘आइए, हमारे घरों को देखिए. हमारी इन टूटी झोपड़ियों को देखिए. हम एक शौचालय की दीवार खड़ी करने के लिए बालू की एक-एक बोरी को तरस रहे हैं. क्या हम गोली और बंदूक रखते हैं? प्रशासन हमारे साथ ऐसा बर्ताव क्यों कर रहा है? अगर हमारे पास बंदूकें होतीं, तो क्या हम विष्णु शर्मा को आधे घंटे तक जिंदा पकड़कर रखते? क्या हम उसे जिंदा पुलिस के हवाले करते, उसकी वहीं हत्या नहीं कर देते? हमारे पास सिर्फ हमारी लाठियां थीं और यह हौसला था कि अगर मरना ही है, तो लड़कर मरेंगे!’
इस घटना ने पूरे जहानाबाद जिले को राजनीतिक रूप से दो हिस्सों में बांट दिया है. भाजपा-नीत सरकार में आने के बाद सामंती तत्वों और बालू माफिया का मनोबल सातवें आसमान पर है. भूमिहार समुदाय के कुछ संकीर्ण तत्व इस शुद्ध आपराधिक दमन को ‘जातीय रंग’ देने की घिनौनी कोशिश कर रहे हैं. संवेदनहीनता की हद देखिए कि स्थानीय विधायक ऋृतुराज के पिता अरुण सिंह, मृत बालू माफिया धीरज शर्मा के घर मातम मनाने बगल के गांव रामपुर तो पहुंच गए, लेकिन महज कुछ दूरी पर स्थित पीड़ित दलित बस्ती चैती पीपर में पैर रखना भी उन्होंने गवारा नहीं समझा.
वहीं, दूसरी ओर इस हमले के खिलाफ चंद्रवंशी समाज भी अब एकजुट होने लगा है. ग्रामीणों के भीतर इस बात का भारी अफसोस है कि उन्होंने गलतफहमी में आकर ऐसे लोगों को वोट दिया, जो आज हत्यारों के पक्ष में खड़े हैं. लेकिन इस दमन ने गरीबों के भीतर एक अभूतपूर्व और अटूट एकता को जन्म दे दिया है. रविदास, रमानी और यादव समाज आज कंधे से कंधा मिलाकर इस आतंक के खिलाफ उठ खड़ा हुआ है. प्रगतिशील जमात का साफ मानना है कि यह लड़ाई दो गुटों की नहीं, बल्कि बालू माफिया के आतंक और ग्रामीण गरीबों के अधिकारों व मान-सम्मान के बीच का सीधा संघर्ष है. यहां तक कि प्रशासन भी दो खेमों में बंट गया है.
इस पूरे खौफ के बीच कंचन एक और दर्दनाक पहलू सामने लाती है. वह बताती है कि गांव की लड़कियों की पढ़ाई पूरी तरह ठप्प हो गई है, क्योंकि आगे पढ़ने के लिए उन्हें गिन्जी हाई स्कूल ही जाना होगा, जहां का रास्ता अब पूरी तरह असुरक्षित और मुश्किल-सा हो गया है. कंचन का यह सवाल इस बहरी व्यवस्था के मुंह पर तमाचा है कि क्या प्रशासन उनकी शिक्षा के वैकल्पिक रास्तों की कोई सुरक्षित व्यवस्था करेगा, या इन बेटियों का भविष्य भी इस माफिया तंत्र की बलि चढ़ जाएगा?
भाकपा(माले) ने इस बर्बर घटना पर तत्काल संज्ञान लिया. 5 जुलाई को जिला सचिव विजय कुमार, रविन्द्र यादव, प्रभात कुमार, इंद्रेश पासवान, अरुण बिंद और संजय चन्द्रवंशी आदि नेताओं के गांव के दौरे के बाद, 6 जुलाई को ही घोसी में एक विशाल प्रतिवाद मार्च आयोजित किया गया. माले कार्यकर्ताओं ने सामंती ताकतों और माफियाराज को दक्षिण बिहार की धरती पर दोबारा पैर पसारने नहीं देने की हुंकार भरी. इसी कड़ी में, 11 जुलाई 2026 को जहानाबाद में जिलास्तरीय विशाल प्रतिवाद मार्च का आह्वान किया गया है, जिसमें चैती पीपर के पीड़ित परिवार और वो जाबांज महिलाएं खुद शामिल होकर इस बहरी व्यवस्था की चूूलें हिलाएंगी.
चैती पीपर की यह जंग महज बालू की लड़ाई नहीं है. यह लड़ाई प्राकृतिक संसाधनों की लूट, सामंती अहंकार, और सत्ता-प्रशासन के गठजोड़ के खिलाफ – समाज के अंतिम पायदान पर खड़े गरीबों के सम्मान, अस्मिता और अधिकारों की लड़ाई है. दबंग भूल गए हैं कि बिहार के गरीबों पर जब-जब जुल्म ढाने की कोशिश हुई है, तब-तब उनहोंने इतिहास का रुख मोड़ दिया है. इस बार इतिहास लिखने की कमान पुरुषों ने नहीं, बल्कि चैती पीपर की साहसी और जांबाज औरतों ने अपने हाथों में ले ली है.
चैती पीपर के इस ऐतिहासिक महिला प्रतिरोध को सलाम! चैती पीपर की महिलाओं व बेटियों की बहादुरी और उनके क्रांतिकारी जज्बे को लाल सलाम!