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अमेरिका की 250वीं सालगिरह : दुनिया उस प्रतिरोध को भी याद कर रही है जिसने उसे झुका दिया

अमेरिका की 250वीं सालगिरह : दुनिया उस प्रतिरोध को भी याद कर रही है जिसने उसे झुका दिया

-- मनमोहन

जब 4 जुलाई को अमेरिका अपनी आजादी की घोषणा की 250वीं सालगिरह मना रहा था, उसी समय दुनिया की निगाहें ईरान पर भी टिकी थीं, जहां इस्लामी क्रांति और इस्लामी गणराज्य के रहबर, शहीद सैय्यद अली खामेनेई की अंतिम विदाई की रस्में शुरू हो रही थीं. यह महज एक ऐतिहासिक संयोग नहीं था. एक तरफ दुनिया का सबसे पुराना मौजूदा साम्राज्य अपनी स्थापना का जश्न मना रहा था, तो दूसरी तरफ पश्चिम एशिया में करोड़ों लोग ऐसे नेता को विदा कर रहे थे जिसकी पूरी राजनीतिक विरासत अमेरिकी साम्राज्यवाद के प्रतिरोध से जुड़ी रही. 4 जुलाई 2026 को इन दोनों घटनाओं का यह ऐतिहासिक संयोग बदलते वैश्विक शक्ति-संतुलन और उभरती नई विश्व व्यवस्था की गहरी राजनीतिक कहानी बयान करता है.

सैय्यद अली खामेनेई का जनाजा जल्दी ही आधुनिक पश्चिम एशिया के इतिहास की सबसे बड़ी जन-श्रद्धांजलियों में बदल गया. ईरान और इराक के कई शहरों में लगभग एक सप्ताह तक चली अंतिम विदाई की रस्मों में करोड़ों लोगों ने हिस्सा लिया. सिर्फ तेहरान में ही एक करोड़ से ज्यादा लोग सड़कों पर उमड़े, जबकि सौ से अधिक देशों के प्रतिनिधिमंडल श्रद्धांजलि देने पहुंचे. इसे कई पर्यवेक्षकों ने ‘सदी का जनाजा’ कहा.

लेकिन यह जनाजा सिर्फ मातम  का अवसर नहीं था. यह ईरानी समाज की राजनीतिक चेतना, उसकी ऐतिहासिक स्मृति और प्रतिरोध की संस्कृति का सार्वजनिक प्रदर्शन भी था. सड़कों पर उमड़ा जनसैलाब दुनिया को यह संदेश दे रहा था कि ईरान की राजनीति को सिर्फ चुनावों, संस्थाओं या सत्ता संघर्षों के जरिये नहीं समझा जा सकता. उसकी जड़ें साझा ऐतिहासिक अनुभवों, राष्ट्रीय संप्रभुता की भावना और साम्राज्यवादी दबावों के खिलाफ लंबे प्रतिरोध में भी हैं. इस जनसैलाब ने यह भी दिखाया कि प्रतिरोध की राजनीति अपने नेतृत्व की शहादत के साथ समाप्त नहीं होती, बल्कि कई बार उससे और व्यापक सामाजिक वैधता हासिल करती है.

यही कारण था कि वॉशिंगटन ने इस अंतिम विदाई को केवल एक धार्मिक या राष्ट्रीय आयोजन की तरह नहीं देखा. बाद में सामने आया कि अमेरिकी विदेश मंत्री मार्काे रुबियो ने 26 जून को दुनिया भर के अमेरिकी दूतावासों को गोपनीय निर्देश भेजकर मेजबान सरकारों को चेतावनी देने को कहा था कि इस जनाजे में आधिकारिक भागीदारी को ‘गैर-मित्रतापूर्ण कदम’ माना जाएगा और इसका असर द्विपक्षीय संबंधों पर पड़ सकता है. खबरों के मुताबिक कई देशों पर आर्थिक और कूटनीतिक दबाव डाला गया. नतीजतन कम से कम तेरह देशों ने अपने प्रतिनिधिमंडल वापस बुला लिए या उनका स्तर घटा दिया, जबकि कई सरकारों ने मध्यस्थों के जरिये ईरान से अपनी मजबूरी जताई.

इतना ही नहीं, खामेनेई का अंतिम विदाई जुलूस अभी मशहद में अपनी आखिरी मंजिल तक पहुंचा भी नहीं था कि ट्रंप प्रशासन ने दक्षिणी ईरान पर फिर हवाई हमला कर दिया. मातम के माहौल में की गई यह बेहद निंदनीय बमबारी इस बात का संकेत थी कि वॉशिंगटन इस जन-श्रद्धांजलि के राजनीतिक असर को लेकर कितना बेचैन था. दूसरी ओर, विभिन्न देशों पर डाला गया दबाव यह भी दिखाता था कि अमेरिकी साम्राज्यवाद सिर्फ देशों की नीतियों को ही नहीं, बल्कि उनकी स्मृति, शोक और राजनीतिक प्रतीकों को भी नियंत्रित करना चाहता है.

उधर, अमेरिका अपनी स्वतंत्रता की 250वीं सालगिरह की पूर्व संध्या पर बिल्कुल अलग तरह का राजनीतिक संदेश दे रहा था. ट्रंप ने घोषणा की कि ‘कम्युनिस्ट खतरा’ अमेरिका के लिए प्रथम विश्व युद्ध, द्वितीय विश्व युद्ध, पर्ल हार्बर और 9/11 से भी बड़ा खतरा है, और कहा कि ‘आप या तो कार्ल मार्क्स के प्रति वफादार हो सकते हैं या अमेरिका के प्रति.’

यह बयान केवल चुनावी बयानबाजी नहीं था. यह अमेरिकी समाज के भीतर समाजवादी राजनीति और बढ़ते जन-असंतोष के खिलाफ एक नए फासीवादी अभियान का ऐलान था. इसका मतलब था कि समाजवादियों और वामपंथी आंदोलनों को राज्य के दुश्मन के रूप में पेश किया जाए और उनके खिलाफ वही दमनकारी तरीके इस्तेमाल किए जाएं, जो पिछले पच्चीस वर्षों में तथाकथित ‘आतंकवाद के खिलाफ जंग’ के नाम पर विकसित किए गए.

अमेरिकी साम्राज्यवाद का संकट अब केवल विदेश नीति तक सीमित नहीं रह गया है. दुनिया पर अपना प्रभुत्व बनाए रखने की बढ़ती मुश्किलों के साथ-साथ उसके भीतर भी लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमले, नस्लवाद, अंधराष्ट्रवाद, प्रवासी-विरोध और असहमति के दमन की प्रवृत्ति तेज हुई है. इतिहास गवाह है कि संकटग्रस्त और जनविरोधी शासन अक्सर किसी काल्पनिक दुश्मन का भय पैदा करके अपनी नाकामियों से जनता का ध्यान हटाने की कोशिश करते हैं.

ट्रंप का यह भाषण उसी राजनीति का उदाहरण था. इसीलिए अमेरिका की 250वीं सालगिरह केवल उसकी स्थापना का उत्सव नहीं है. यह उस ऐतिहासिक परियोजना की भी याद दिलाती है जिसने पिछले ढाई सौ वर्षों में मूल निवासियों की जमीनों पर कब्जा, युद्धों, आर्थिक दबाव, तख्तापलटों और सैन्य हस्तक्षेपों के जरिये खुद को दुनिया की सबसे शक्तिशाली साम्राज्यवादी ताकत में बदल लिया. लेकिन आज वही शक्ति बढ़ते कर्ज, अंतहीन युद्धों, कमजोर पड़ते वैश्विक प्रभुत्व और बदलते अंतरराष्ट्रीय शक्ति-संतुलन के दौर में अपने सबसे गहरे संकटों में से एक का सामना कर रही है.

फिर भी, अपने 250वें साल में दाखिल होते समय अमेरिका उन कई संकटों से घिरा दिखाई देता है जिन्हें अक्सर ढलते हुए साम्राज्य की निशानी माना जाता है. इनमें दुनिया भर में फैला सैन्य बोझ, भारी सरकारी कर्ज, वैश्विक वित्तीय व्यवस्था पर कमजोर पड़ती पकड़, दुनिया में घटती साख और ऐसा राजनीतिक नेतृत्व शामिल है जो अब भी इस भ्रम में जी रहा है कि 1990 के दशक वाला एकध्रुवीय अमेरिकी दौर आज भी कायम है.

इसलिए अमेरिका की 250वीं सालगिरह सिर्फ उसके उदय की कहानी नहीं है. यह उसके साम्राज्यवादी विस्तार, उसके अंतर्विरोधों और अब उभरते पतन की कहानी भी है. इस कहानी को समझने के लिए हमें उसकी शुरुआत तक लौटना होगा.

बेदखली की नींव पर बना एक मुल्क

अमेरिका किसी खाली पड़ी जमीन पर नहीं बना था. उसकी नींव उन मूल निवासी कौमों की धरती पर रखी गई जो यूरोपीय बसने वालों के आने से हजारों साल पहले से पूरे महाद्वीप में रहती थीं, अपनी राजनीतिक व्यवस्थाएं चलाती थीं, आपस में कारोबार करती थीं और युद्ध भी लड़ती थीं. इसलिए अमेरिकी गणराज्य का इतिहास केवल आजादी का इतिहास नहीं है; वह बेदखली, विस्तार और उपनिवेशी हिंसा का इतिहास भी है. अमेरिका का निर्माण जमीन छीनने पर हुआ, और जमीन छीनने का मतलब था लोगों को उजाड़ना, संधियां तोड़ना, सैन्य हमले करना, भूख और बीमारी के हवाले करना, और जरूरत पड़ने पर जनसंहार का सहारा लेना. हिंसा अमेरिकी राज्य के निर्माण की कोई दुर्घटना नहीं थी, बल्कि उसकी बुनियाद का हिस्सा थी.

व्यापक रूप से स्वीकार किए गए अनुमानों के मुताबिक, यूरोपियों के पहले संपर्क से लेकर बीसवीं सदी की शुरुआत तक, जिस भूभाग को बाद में संयुक्त राज्य अमेरिका कहा गया, वहां मूल निवासियों की आबादी लगभग 90 प्रतिशत या उससे भी ज्यादा घट गई. इस विनाश में उपनिवेशवाद के साथ आई महामारियों की बड़ी भूमिका थी, लेकिन इसके बाद औपनिवेशिक और फिर अमेरिकी सरकारों ने जमीनों पर कब्जा, जबरन विस्थापन, सैन्य अभियानों और मूल निवासी समाज को तोड़ने वाली नीतियों के जरिये इस तबाही को और गहरा किया. 1637 का पीक्वॉट जनसंहार, किंग फिलिप का युद्ध, चेरोकी लोगों का जबरन विस्थापन, डिने (नवाहो) लोगों की ‘लॉन्ग वॉक’, 1864 का सैंड क्रीक जनसंहार और 1890 का वूंडेड नी जनसंहार उसी लंबे अभियान की कड़ियां थीं, जिसके जरिये मूल निवासी कौमों से उनकी जमीन, राजनीतिक ताकत और अपने समाज को बचाए रखने की क्षमता छीन ली गई.

अमेरिकी विस्तार केवल युद्ध के मैदान में नहीं हुआ. उसे कानून और संधियों की भाषा में भी वैधता दी गई. 1789 से 1871 के बीच अमेरिकी सीनेट ने मूल निवासी कौमों के साथ लगभग 370 संधियों की पुष्टि की, लेकिन उनमें से अधिकांश को बाद में तोड़ दिया गया, बदल दिया गया या तब नजरअंदाज कर दिया गया जब संबंधित जमीन पर कब्जा करना अमेरिका के लिए ज्यादा फायदेमंद हो गया. जब यह औपचारिकता भी अनावश्यक लगने लगी, तो 1871 में अमेरिकी कांग्रेस ने मूल निवासी कौमों के साथ संधियां करने की व्यवस्था ही समाप्त कर दी. विस्तार और बेदखली इस तरह एक ही प्रक्रिया के दो नाम बन गए.

विडंबना यह थी कि यह सब कुछ आजादी और मानव अधिकारों की भाषा बोलते हुए किया गया. जिस गणराज्य ने घोषणा की थी कि कुछ अधिकार इंसान से छीने नहीं जा सकते, उसी ने अपने विस्तार की बुनियाद उन लोगों के अधिकारों को कुचलकर रखी जो पहले से उस धरती पर रहते थे. अमेरिकी इतिहास का यह अंतर्विरोध आगे चलकर उसकी विदेश नीति की भी पहचान बन गया. जिस तरह महाद्वीप के भीतर विस्तार को सभ्यता और प्रगति का नाम दिया गया, उसी तरह बाद में दुनिया भर में दखलअंदाजी को लोकतंत्र, सुरक्षा और आजादी के नाम पर वैध ठहराया गया.

महाद्वीप पर कब्जे से वैश्विक साम्राज्यवाद तक

उन्नीसवीं सदी के दौरान अमेरिका ने ‘मैनिफेस्ट डेस्टिनी’ के विचार के सहारे पूरे उत्तरी अमेरिकी महाद्वीप पर अपना नियंत्रण स्थापित किया. लेकिन सदी के आखिर तक उसका विस्तार महाद्वीप की सीमाओं से बाहर निकल चुका था. 1898 का स्पेन-अमेरिका युद्ध इस परिवर्तन का निर्णायक मोड़ साबित हुआ. इसके बाद अमेरिका ने प्यूर्टाे रिको, गुआम और फिलीपींस पर कब्जा कर लिया. क्यूबा को भले ही औपचारिक स्वतंत्रता मिली, लेकिन ऐसी शर्तों के साथ कि वॉशिंगटन को उसके अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप का व्यापक अधिकार मिल गया. फिलीपींस में स्वतंत्रता आंदोलन को कुचलने के लिए अमेरिका ने बेहद क्रूर युद्ध छेड़ा, जिसमें बड़ी संख्या में लड़ाके और आम नागरिक मारे गए.

बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में अमेरिकी साम्राज्यवाद का रूप अपेक्षाकृत सीधा था – सैन्य कब्जा, राजनीतिक नियंत्रण और आर्थिक प्रभुत्व. 1915 में हैती पर कब्जा, पूरे लैटिन अमेरिका और कैरिबियाई क्षेत्र में लगातार हस्तक्षेप, और वहां की सरकारों को अमेरिकी हितों के अनुरूप ढालने की कोशिशें इसी नीति का हिस्सा थीं.

दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिकी साम्राज्यवाद ने नया रूप धारण किया. अब हर देश पर प्रत्यक्ष कब्जा करना जरूरी नहीं रहा. उसकी जगह ऐसी वैश्विक व्यवस्था बनाई गई जिसके केंद्र में अमेरिकी आर्थिक, वित्तीय और सैन्य शक्ति थी. डॉलर अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था की धुरी बन गया. अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएं और सुरक्षा गठबंधन अमेरिकी प्रभुत्व को स्थिर करने के औजार बने. दुनिया भर में फैले सैन्य अड्डों, सुरक्षा समझौतों और आर्थिक निर्भरताओं के विशाल जाल ने वॉशिंगटन को वैश्विक व्यवस्था का केंद्रीय शक्ति केंद्र बना दिया.

लेकिन जहां भी किसी देश ने इस व्यवस्था से बाहर निकलने या अपने प्राकृतिक संसाधनों और विकास की दिशा पर स्वतंत्र नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश की, वहां अमेरिकी हस्तक्षेप सामने आया. 1953 में ईरान में प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसद्देग की सरकार का तख्तापलट, 1954 में ग्वाटेमाला में याकोबो आर्बेन्स की सरकार को गिराना, कांगो में पैट्रिस लुमुम्बा के खिलाफ साजिशें और 1973 में चिली के राष्ट्रपति साल्वादोर अयेन्दे की सरकार को अस्थिर कर ऑगस्तो पिनोशे की तानाशाही का रास्ता साफ करना – ये घटनाएं अलग-अलग नहीं थीं. इनके पीछे एक ही सिद्धांत काम कर रहा था: राजनीतिक स्वतंत्रता तब तक स्वीकार्य है, जब तक वह अमेरिकी आर्थिक और रणनीतिक हितों को चुनौती न दे.

जहां गुप्त दखलअंदाजी पर्याप्त नहीं रही, वहां अमेरिका ने सीधे युद्ध का रास्ता अपनाया. कोरिया, वियतनाम, अफगानिस्तान और इराक इस नीति के सबसे बड़े उदाहरण हैं.

1776 से 2019 के बीच अमेरिका ने दुनिया भर में 392 से अधिक सैन्य हस्तक्षेप किए. इसके बावजूद इक्कीसवीं सदी तक आते-आते यह साफ होने लगा कि दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति होना हमेशा राजनीतिक जीत की गारंटी नहीं है. वियतनाम में उसे पीछे हटना पड़ा. अफगानिस्तान में दो दशक लंबी जंग और खरबों डॉलर खर्च करने के बाद भी उसे वापसी करनी पड़ी. इराक में शासन बदल गया, लेकिन वह राजनीतिक व्यवस्था स्थापित नहीं हो सकी जिसकी वॉशिंगटन ने कल्पना की थी. अमेरिका की सैन्य क्षमता बरकरार रही, लेकिन अपनी राजनीतिक इच्छाशक्ति दुनिया पर थोपने की उसकी क्षमता लगातार कमजोर पड़ने लगी.

आज भी अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा सैन्य खर्च करने वाला देश है. 2025 में उसका रक्षा बजट लगभग 954 अरब डॉलर था, जो उसके बाद आने वाले कई देशों के संयुक्त रक्षा बजट से भी अधिक था. लेकिन केवल सैन्य ताकत किसी साम्राज्य की स्थिरता की गारंटी नहीं होती.

मार्च 2026 तक अमेरिकी सरकारी कर्ज 39 ट्रिलियन डॉलर के पार पहुंच चुका था. प्रमुख अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियां उसकी साख घटा चुकी थीं. डॉलर की वैश्विक प्रधानता को भी पहले जैसी चुनौतीहीन स्थिति हासिल नहीं रही. ब्रिक्स देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार लगातार बढ़ रहा है और पेट्रोडॉलर व्यवस्था, जिसने दशकों तक अमेरिकी वैश्विक प्रभुत्व को सहारा दिया, अब पहले जैसी निर्विवाद नहीं रह गई है.

ये बदलाव अपने आप में अमेरिकी साम्राज्य के अंत की घोषणा नहीं हैं, लेकिन वे यह जरूर संकेत देते हैं कि जिस वैश्विक व्यवस्था पर पिछले कई दशकों तक अमेरिकी प्रभुत्व टिका रहा, उसके भीतर अब गहरे संरचनात्मक बदलाव शुरू हो चुके हैं. इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में ईरान के साथ उसका टकराव और पश्चिम एशिया में उभरता प्रतिरोध एक नए अर्थ ग्रहण करता है.

वैश्विक साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष

अगर अमेरिकी साम्राज्यवाद के इतिहास को समझे बिना 1979 की ईरानी क्रांति को नहीं समझा जा सकता, तो उसी तरह इस क्रांति के अनुभव को समझे बिना सैय्यद अली खामेनेई की राजनीतिक विरासत को भी नहीं समझा जा सकता.

सैय्यद अली खामेनेई ने इस पूरे इतिहास को सिर्फ पढ़ा ही नहीं, बल्कि उसे अपनी जिंदगी में जिया भी था. उनसे पहले इमाम सैय्यद रुहोल्लाह खुमैनी ने अपनी आंखों से देखा था कि 1953 के तख्तापलट के बाद विदेशी ताकतें ईरानी बादशाहत के जरिये किस तरह अपना नियंत्रण कायम रखती थीं. ईरान नाम भर का एक आजाद देश था, लेकिन उसकी राजनीति और अर्थव्यवस्था के बड़े फैसले बाहरी ताकतों के असर में होते थे. उसके प्राकृतिक संसाधन का दोहन किया जाता था, उसके हुक्मरानों को विदेश से सहारा मिलता था और उसका सुरक्षा तंत्र ऐसी व्यवस्था को बचाए रखता था जो ईरानी अवाम को वास्तविक आजादी से महरूम रखती थी.

इसी अनुभव से इस्लामी क्रांति का एक बुनियादी यकीन पैदा हुआ कि कोई भी देश तब तक असली संप्रभुता, इज्जत, आजादी और इंसाफ हासिल नहीं कर सकता, जब तक वह साम्राज्यवादी ताकतों के अधीन रहे. इमाम खुमैनी ने इस संघर्ष को ‘इस्तिकबार-ए-जहानी’ यानी वैश्विक घमंड और दबंगई की अवधारणा के जरिये समझाया. इसका मतलब ऐसी राजनीतिक सोच से है जिसमें ताकतवर देश अपने आपको यह हक देते हैं कि वे कमजोर देशों का भविष्य तय करें, उनके संसाधन पर नियंत्रण रखें, उनकी सरकारों की वैधता तय करें और जो देश उनकी बात न मानें उन्हें सजा दें.

सैय्यद खामेनेई ने इसी सोच को कई दशकों तक आगे बढ़ाया. उन्होंने साम्राज्यवाद-विरोध को महज क्रांतिकारी नारों तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि उसे एक दीर्घकालीन राजनीतिक और रणनीतिक परियोजना का रूप दिया.

विदेशी ताकतों के सहारे चलने वाली बादशाहत को हटाकर ईरान में स्वतंत्र राज्य कायम होने के बाद सैय्यद खामेनेई ने पश्चिम एशिया की उन तमाम जनता और आंदोलनों का साथ दिया जो अमेरिकी साम्राज्यवाद और उसके सहयोगियों के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे. इसमें इस्राइली कब्जे के खिलाफ लेबनानी प्रतिरोध, कब्जे और रंगभेद के खिलाफ फिलिस्तीनी संघर्ष, अमेरिकी कब्जे का विरोध करने वाले इराकी, अमेरिका समर्थित युद्ध का सामना कर रहे यमन के लोग और पूरे क्षेत्र के वे आंदोलन शामिल थे जो बाहर से थोपी गई राजनीतिक व्यवस्थाओं को चुनौती दे रहे थे. इस समर्थन की बुनियाद यह यकीन था कि हर देश और हर जनता को कब्जे, विदेशी दखलअंदाजी और साम्राज्यवादी नियंत्रण का प्रतिरोध करने का पूरा अधिकार है.

इसी ऐतिहासिक प्रक्रिया से प्रतिरोध की धुरी (एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस) उभरी. इसने ऐसे अलग-अलग आंदोलनों को एक साझा मोर्चे पर जोड़ा जो अमेरिकी साम्राज्यवाद, इस्राइली कब्जे और बाहर से थोपी गई राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ लड़ रहे थे. हर आंदोलन का अपना इतिहास, सामाजिक आधार और राष्ट्रीय संदर्भ है, लेकिन उन्हें जोड़ने वाली साझा कड़ी साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष है. सैय्यद खामेनेई यह भी समझते थे कि राजनीतिक आजादी तभी टिक सकती है जब उसके साथ आर्थिक, औद्योगिक और तकनीकी आत्मनिर्भरता भी हो. इसी वजह से उन्होंने प्रतिरोधी अर्थव्यवस्था, घरेलू औद्योगिक क्षमता, मिसाइल कार्यक्रम और स्वदेशी रक्षा उत्पादन पर जोर दिया, ताकि आर्थिक प्रतिबंध किसी देश को झुकाने का हथियार न बन सकें.

यह भी साफ रहना चाहिए कि साम्राज्यवाद-विरोधी इस परियोजना के समर्थन का मतलब ईरान के भीतर मौजूद वर्गीय अंतर्विरोधों से आंखें मूंद लेना नहीं है. बोन्याद फाउंडेशनों, आईआरजीसी से जुड़े कारोबारी नेटवर्कों और मौलवी तबके के आर्थिक हितों ने ईरान के भीतर भी सत्ता और मुनाफे के अपने केंद्र बनाए हैं, जो कई बार मेहनतकश अवाम के हितों से टकराते हैं. इसलिए प्रतिरोध की धुरी के साथ एकजुटता इस समझ पर आधारित है कि साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष और सामाजिक-आर्थिक न्याय की लड़ाई एक-दूसरे की पूरक हैं, उनका विकल्प नहीं.

अमेरिका को लगा कि सैय्यद खामेनेई की हत्या इस पूरी परियोजना को बिखेर देगी. लेकिन उसने न सिर्फ उस व्यक्ति को गलत समझा, बल्कि उन संस्थाओं, राजनीतिक सोच और सामाजिक आधार को भी समझने में नाकाम रहा, जिनके निर्माण में सैय्यद खामेनेई ने निर्णायक भूमिका निभाई थी.

सैय्यद खामेनेई ने इसी साम्राज्यवाद से लड़ते हुए शहादत पाई. उन्होंने पीछे हटकर, समझौता करके या सियासी तौर पर बेमानी होकर जान नहीं गंवाई. वे उस जंग के दौरान शहीद हुए जिसे उनके नेतृत्व वाले ईरान को कमजोर करने और पूरी प्रतिरोधी धुरी को तोड़ने के इरादे से छेड़ा गया था. लेकिन उनकी हत्या वह नतीजा नहीं ला सकी जिसकी वॉशिंगटन को उम्मीद थी.

ईरान ने अमरीकी साम्राज्य को शिकस्त दी और इसराइल को जलील कर दिया है. साम्राज्य ने ऐसी हार का सामना पहले कभी नहीं किया था. उसे इस दर्जे पर कभी इतनी गहराई से तोड़ा नहीं गया, मात नहीं दी गई और झुकाया नहीं गया था. उन्होंने वो कर दिखाया जिसे कोई मुमकिन नहीं मानता था, और दुनिया की सबसे बड़ी फौजी ताकत को बातचीत की मेज पर आने पर मजबूर कर दिया. ये वो लम्हा था जब अमरीकी साम्राज्य को शिकस्त मिली, और इसराइली फौज के कभी न हारने वाले होने का झूठ हमेशा के लिए टूट गया.

यही वजह है कि इस साल की 4 जुलाई दो बिल्कुल अलग ऐतिहासिक रास्तों का प्रतीक बन गई है. एक तरफ वह साम्राज्य है जिसकी नींव बेदखली, युद्ध और लूट पर रखी गई और जो आज भी अपनी ताकत बनाए रखने के लिए हिंसा का सहारा लेता है. दूसरी तरफ वे करोड़ों लोग हैं जो मानते हैं कि कोई भी साम्राज्य हमेशा नहीं रहता, और प्रतिरोध अपने नेताओं की शहादत के बाद भी जिंदा रहता है.

अब सवाल यह नहीं रह गया कि अमेरिकी साम्राज्य का पतन होगा या नहीं. सवाल सिर्फ इतना है कि क्या वह अपेक्षाकृत शांत ढंग से पीछे हटेगा, या अपने साथ पूरी दुनिया को भी हिंसा की एक नई आग में झोंकने की कोशिश करेगा. 2026 का सबक साफ है. साम्राज्य हमेशा के लिए नहीं रहते. दुनिया बदल चुकी है, और अब वह पहले जैसी कभी नहीं रहेगी. एक-ध्रुवीय दुनिया मर चुकी है.

इंसानियत जिंदाबाद!

11 July, 2026