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यूएन रैपोर्टेयर फ्रांसेस्का अल्बानीज: ‘इस्राइल के साथ भारत के रिश्ते बनाए रखना अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन’

यूएन रैपोर्टेयर फ्रांसेस्का अल्बानीज: ‘इस्राइल के साथ भारत के रिश्ते बनाए रखना अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन’

[ फ्रांसेस्का अल्बानीज संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की विशेष रैपोर्टेयर हैं, जो कब्जाए गए फिलिस्तीनी इलाकों में मानवाधिकार उल्लंघनों पर निगरानी और रिपोर्टिंग का काम करती हैं. उनकी प्रमुख रिपोर्ट “टॉर्चर एंड जेनोसाइड” इस इंटरव्यू की चर्चा का केन्द्रबिंदु है, जिसमें उन्होंने इस्राइल के साथ भारत की बढ़ती साझेदारी की आलोचना करते हुए कहा कि नई दिल्ली अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अपनी जिम्मेदारियों का उल्लंघन कर रही है और इसके लिए उसे जवाबदेही का सामना भी करना पड़ सकता है.

यहां इस इंटरव्यू का हिंदी अनुवाद पेश है.]

मुनीफ खान: नमस्कार और इस विशेष इंटरव्यू में आपका स्वागत है. मैं हूं मुनीफ खान. 23 मार्च 2026 को फ्रांसेस्का अल्बानीज ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के 61वें सत्र में अपनी रिपोर्ट “टॉर्चर एंड जेनोसाइड” पेश की. उनके निष्कर्ष बताते हैं कि अक्टूबर 2023 से इस्राइल ने हिरासत केंद्रों और पूरे गजा में फिलिस्तीनियों के खिलाफ सुनियोजित यातना का इस्तेमाल किया है, जिसे रिपोर्ट में “एक विशाल यातना शिविर” कहा गया है. रिपोर्ट में अक्टूबर 2023 के बाद से 18,500 से ज्यादा गिरफ्तारियों, जिनमें 1,500 बच्चे शामिल हैं, और 4,000 से अधिक लोगों को जबरन गायब किए जाने का भी दस्तावेजी ब्यौरा दर्ज है. कई मामलों में जो लोग गायब हुए हैं, उनके मारे जाने की आशंका है.

फरवरी में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस्राइल यात्रा के दौरान उन्होंने इस्राइली संसद को संबोधित करते हुए इस्राइल के साथ भारत के सांस्कृतिक, राजनीतिक और सैन्य रिश्तों की खुलकर सराहना की. इस यात्रा के दौरान दोनों देशों के रिश्तों को “विशेष रणनीतिक साझेदारी” के रूप में और मजबूत किया गया. इसके दो दिनों बाद अमेरिका और इस्राइल ने ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू कर दिया. हालांकि मीडिया का ज्यादातर ध्यान इस युद्ध पर है, लेकिन फिलिस्तीनियों पर इस्राइल के हमले लगातार जारी हैं. 31 मार्च को इस्राइली संसद ने एक ऐसा मृत्युदंड कानून भी पारित किया, जो सिर्फ फिलस्तीनियों पर लागू होता है.

संयुक्त राष्ट्र की विशेष रैपोर्टेयर फ्रांसेस्का अल्बानीज आज हमारे साथ हैं, ताकि उनकी ताजा रिपोर्ट “टॉर्चर एंड जेनोसाइड” को बेहतर ढंग से समझा जा सके.

मैडम, हमारे साथ जुड़ने के लिए आपका धन्यवाद. मैं अपने पहले सवाल से शुरुआत करना चाहूंगा. अपनी रिपोर्ट में आपने लिखा है कि मंत्री इतामार बेन-गवीर ने आदेश दिया था कि फिलिस्तीनी कैदियों को अंधेरी कोठरियों में रखा जाए, उन्हें लोहे के बिस्तरों से हथकड़ियों में बांधकर रखा जाए और गड्ढेनुमा शौचालय इस्तेमाल करने को मजबूर किया जाए. इसे उन्होंने अपनी तथाकथित “जेल क्रांति” का हिस्सा बताया था. अब बेन-गवीर की पैरवी पर इस्राइल ने फिलिस्तीनी कैदियों को निशाना बनाने वाला मृत्युदंड कानून भी मंजूर कर लिया है. इससे फिलिस्तीनी कैदियों की पहले से ही खतरे में पड़ी स्थिति पर क्या असर पड़ेगा, खासकर मरवान बरगूती जैसे कैदियों पर?

फ्रांसेस्का अल्बानीज: सबसे पहले मैं यह कहना चाहूंगी कि यातना और जनसंहार पर मेरी ताजा रिपोर्ट मेरे लिए इस बात का आखिरी और निर्णायक सबूत है कि यह जनसंहार फिलिस्तीनियों को एक कौम के रूप में मिटा देने के मकसद से किया जा रहा है. क्योंकि इस्राइल दुनिया की निगाहों और सार्वजनिक जांच-पड़ताल से दूर, अंधेरे में जो कुछ कर रहा है, वही फिलिस्तीनी जनता के प्रति उसके असली इरादों को पूरी तरह उजागर करता है.

आप जानते हैं, इस्राइल गजा में जो कर रहा है, वह बेहद बर्बर है, लेकिन एक बाड़ है – हालांकि यह आत्मरक्षा भी नहीं है – युद्ध के कुछ नियम और इसकी सीमाएं हैं, और इस्राइल ने इन सबका उल्लंघन किया है. लेकिन फिलस्तीनी औरतों, मर्दों, बच्चों और बुजुर्गों के साथ जो किया जा रहा है, उसकी कोई सफाई नहीं दी जा सकती. और यूरोप, भारत या अमेरिका में जो लोग यह सब देखने से इंकार कर रहे हैं, उन्होंने वही कायराना रास्ता चुना है जो अतीत में भी लोग चुनते रहे हैं. फिलिस्तीनियों को जिस तरह बर्बरता का शिकार बनाया गया है, वह भयावह है. उन्हें जला दिया गया, यातना के दौरान लगी चोटों के बाद बिना बेहोशी की दवा दिए उनके अंग काटे गए. उनके साथ बलात्कार किया गया – यहां तक कि प्रशिक्षित कुत्तों का इस्तेमाल करके – और उन्हें शौचालयों पर मुंह के बल झुकने के लिए मजबूर किया गया. यह सब अपमानित करने के लिए किया गया, इसकी वीडियो रिकाॅर्डिंग की गई, और इसी दौरान आम नागरिक जेलों का “दौरा” कर रहे थे. मेरा मतलब है, यह सब इतना भयावह है कि यकीन करना मुश्किल होता है.

इसलिए बेन-गवीर इस यातना और इस नीति का चेहरा है – यानी यातना को संस्थागत रूप देना. यातना इस जनसंहार की पहचान बन चुकी है. बेन-गवीर ने बस इतना किया है कि जिस चीज को कुछ साल या दशक पहले तक अपवाद माना जाता था, उसे कानूनी और संस्थागत रूप दे दिया.

यातना कोई इत्तफाकी चीज नहीं है. यह हिंसा की उस व्यापक व्यवस्था का केंद्रीय हिस्सा है, जिसका मकसद फिलिस्तीनियों को एक इंसान और एक पूरी कौम के बतौर मिटा देना है – उनके जिस्म और जेहन, दोनों को मिटाना; उनके भविष्य में अस्तित्व बनाए रखने की क्षमता को खत्म करना; यहां तक कि उनके अतीत की सम्मानजनक याद तक को मिटा देना.

मुनीफ खान: मैं आपकी रिपोर्ट में दर्ज सामूहिक गिरफ्तारियों और जबरन गायब किए जाने के मुद्दे पर भी ध्यान दिलाना चाहूंगा. आपने लिखा है कि अक्टूबर 2023 से इस्राइल 18,500 से ज्यादा फिलिस्तीनियों को गिरफ्तार कर चुका है, और 4,000 से अधिक लोगों को जबरन गायब किया गया है – जिनमें से बहुत से लोग शायद अब जिंदा भी नहीं हैं. गिरफ्तारियों और गायब किए जाने का यह विशाल पैमाना हमें इस्राइल की हिरासत व्यवस्था और उसकी मौजूदा रणनीति के मकसद के बारे में क्या बताता है?

फ्रांसेस्का अल्बानीज: जैसा कि मैंने कहा, इसका मकसद तबाही है –  फिलिस्तीनियों को एक कौम के रूप में मिटा देना. यह हमें उस प्रतिशोधी मानसिकता के बारे में बताता है, जिसे इस्राइल – बल्कि इस्राइली समाज – को जेलों की दीवारों के पीछे बेबस निहत्थे लोगों पर खुलकर कुछ भी करने की छूट दी गई है. उन्हें लोगों को पीटने, भूखा रखने और इलाज से वंचित करके मरने देने की खुली छूट मिली हुई है – जिसमें डाॅक्टर भी शामिल हैं. डाॅक्टर खुद कैदियों की पिटाई में शामिल रहे हैं. जैसा कि मैंने कहा, यौन हिंसा और बलात्कार किए गए – लोहे की चीजों से, बोतलों से, मेटल डिटेक्टरों से, यहां तक कि अग्निशामक सिलेंडरों तक का इस्तेमाल पीड़ितों के शरीर में किया गया. और यह सब बर्दाश्त किया गया.

यह क्या दिखाता है? यह कि यह सब अब “सामान्य” बना दिया गया है. लोग जानते हैं. कल मेरी मुलाकघत कुछ इस्राइलियों से हुई – नेसेट (इस्राइली संसद) के सदस्यों और अन्य लोगों से – और वे बेहद पीड़ा में थे, क्योंकि उनका कहना था, “हमें पता है कि आप किस बारे में बात कर रही हैं, क्योंकि हम इसे अपने समाज में देख रहे हैं.” वे भीतर से इसे रोकने की बेताब कोशिश कर रहे हैं, लेकिन उन्हें पीटा जाता है, गिरफ्तार किया जाता है. दूसरी तरफ भारत में आपकी सरकार और इटली में मेरी सरकार उन लोगों को बचाने में लगी हुई हैं, जो इस यातना को मंजूरी देते हैं.

दरअसल आपके देश और मेरे देश – दोनों में – खासकर निगरानी, सुरक्षा और रक्षा तंत्र से जुड़े लोग इससे मुनाफा कमा रहे हैं. भारत जो कर रहा है, वह अविश्वसनीय है. मोदी सरकार जिस तरह इस्राइल का समर्थन कर रही है – ठीक वैसे ही जैसे इटली में मेलोनी सरकार – वह हर सीमा पार कर चुका है.

लेकिन आप जानते हैं, यहां भारत और इटली में एक फर्क है. इटली में अभी हम उस स्तर की संस्थागत हिंसा तक नहीं पहुंचे हैं, जिसे भारत में नागरिकों के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सकता है. मैं यहां जो कुछ हो रहा है, उस पर नजर रखती हूं. मैं दमन के स्तर को देखती हूं. मुझे पता है कि बहुत से पत्रकारों में वह हिम्मत नहीं है जो आप दिखा रहे हैं.

लेकिन इटली में लोग सड़कों पर उतर रहे हैं और सरकार को पीछे हटने पर मजबूर कर रहे हैं. मैं भारत की जनता से यही कहना चाहूंगी:  मुझे पता है कि आपके सामने अपने बड़े संकट हैं. मुझे पता है कि पेट्रोल संकट के बाद भारत में कमजोर तबकों की हालत और बदतर होने वाली है. बहुत से लोगों के पास जिंदगी से निपटने के बेहद सीमित साधन हैं. लेकिन यही इस पूरी समस्या का हिस्सा भी है, क्योंकि आम लोगों को इतना असुरक्षित बना दिया गया है कि वे एक-दूसरे के लिए खड़े ही नहीं हो पा रहे.

मुझे पता है कि एक आम भारतीय इंसान फिलिस्तीनियों के साथ हो रही ज्यादती और उन इस्राइलियों के साथ भी हमदर्दी महसूस करेगा, जो जनसंहार, कब्जे और रंगभेद के खिलाफ खड़े हैं. लेकिन लोग ऐसा कर नहीं पा रहे – क्योंकि उन्हें अपने परिवार संभालने हैं, अपनी रोजी-रोटी चलानी है, और उनके पास एकजुटता दिखाने के साधन नहीं हैं.

दरअसल यही इस पूरी व्यवस्था का मकसद है – ताकि बड़ी पूंजी, वित्तीय व्यवस्था, सैन्य तंत्र और एल्गोरिदम पर कब्जा रखने वाले लोग लगातार और ज्यादा अमीर होते जाएं. दुनिया की सिर्फ 1 फीसदी – बल्कि 0.001 फीसदी आबादी, यानी लगभग 60,000 लोग – दुनिया के सबसे नीचे के 40 फीसदी लोगों की कुल संपत्ति से तीन गुना ज्यादा दौलत पर काबिज हैं. हम करोड़ों लोगों की बात कर रहे हैं.

मुनीफ खानः अब जबकि आपने भारत का जिक्र किया है, मैं सवाल को भारत की तरफ ले जाना चाहता हूं. आपकी रिपोर्ट कहती है कि दूसरे देश हथियारों और राजनीतिक समर्थन के जरिए इस्राइल की यातना व्यवस्था को सक्षम बना रहे हैं. जून 2024 में अल जजीरा की एक रिपोर्ट के मुताबिक, गजा की घेराबंदी के दौरान भारत ने इस्राइल को राॅकेट और विस्फोटक निर्यात किए. वहीं सितंबर 2024 में मिडिल ईस्ट आई की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने इन निर्यातों को रोकने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी. ऐसे में इस्राइल के गैर-कानूनी कब्जे और युद्ध के साथ जुड़ाव को लेकर आप भारत की कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी को किस तरह देखती हैं?

फ्रांसेस्का अल्बानीजः अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) ने इस कब्जे को गैर-कानूनी घोषित किया है और कहा है कि इसे पूरी तरह और बिना किसी शर्त के खत्म किया जाना चाहिए. अदालत ने देशों पर यह जिम्मेदारी भी डाली है कि वे उस राज्य के साथ न व्यापार करें, न हथियारों का लेन-देन करें और न उससे हथियार खरीदें, जिस पर गैर-कानूनी कब्जा बनाए रखने का आरोप है – और यह बात तब और गंभीर हो जाती है जब इस्राइल जनसंहार के आरोप में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के कटघरे में खड़ा हो, और जब बेन्यामिन नेतन्याहू पर युद्ध अपराधों और मानवता के खिलाफ अपराधों के आरोप लगे हों.

इसलिए भारत अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अपनी जिम्मेदारियों का उल्लंघन कर रहा है और संभव है कि उसे इसके लिए जवाबदेही का सामना भी करना पड़े. अगर दुनिया सचमुच न्यायपूर्ण होती, और कोई ऐसी अदालत होती जो उन सभी सदस्य देशों पर कार्रवाई कर सकती जिन्होंने इस्राइल का साथ देकर फिलिस्तीनियों को नुकसान पहुंचाया है, तो शायद भारतीय सरकार को भी उस अदालत का सामना करना पड़ता – ठीक वैसे ही जैसे इटली की सरकार को.

इटली में वकीलों ने सरकार के सदस्यों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू की है, क्योंकि इस तरह के कामों को मंजूरी देने वालों की व्यक्तिगत आपराधिक जिम्मेदारी भी बनती है. यही कानून आधारित व्यवस्था की खूबसूरती है. लेकिन बेन्यामिन नेतन्याहू, डोनाल्ड ट्रंप और उनसे जुड़े लोग पूरी व्यवस्था को अपनी ताकत से मोड़ रहे हैं. वे कानूनहीनता को इतना व्यापक और संस्थागत बना रहे हैं कि वह संक्रामक हो चुकी है.

लेकिन मेरे लिए कानूनी जिम्मेदारी जितनी गंभीर है, उतनी ही गंभीर एक और चीज है – भारत जैसे देश की नैतिक जिम्मेदारी. भारत के अपने अंतर्विरोध हैं. जाति व्यवस्था भले ही कानून में खत्म कर दी गई हो, लेकिन समाज में भेदभाव अब भी मौजूद है. फिर भी भारत में इतने बुद्धिजीवी हैं, जिनकी मैं गहरी प्रशंसा करती हूं – सिर्फ अतीत में नहीं, आज भी.

भारत में कई ऐसी आवाजें हैं – जिनमें न्यायाधीश और वकील भी शामिल हैं – जिनकी न्याय के लिए लड़ाई उस जनता के स्वाभिमान को दर्शाती है, जो औपनिवेशिक अतीत के खिलाफ लड़ाई से उभरकर आई है. यह न्याय की ऐसी लड़ाई है, जो इतिहास की गहरी समझ और उससे ईमानदार मुठभेड़ को दिखाती है.

लेकिन मुझे लगता है कि इस्राइल के साथ भारत की साझेदारी उस विरासत के साथ गद्दारी है. अगर उपनिवेशवाद-विरोधी दौर में भारत के महान चिंतकों और नेताओं की भूमिका न होती, तो शायद आज हमारे पास अंतरराष्ट्रीय कानून और न्याय का यह ढांचा भी न होता. लेकिन अब ऐसा लगता है कि भारत की मौजूदा नेतृत्वकारी ताकतें दूसरी तरफ जा खड़ी हुई हैं. कम-से-कम मुझे यही दिखाई देता है.

मुनीफ खान: नेताओं की बात करें तो – मौजूदा ईरान युद्ध शुरू होने से दो दिन पहले भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस्राइल का दौरा किया, दोनों देशों के रिश्तों को “विशेष रणनीतिक साझेदारी” के स्तर तक बढ़ाया, और इस्राइल को “भारतीय मूल के यहूदियों की पितृभूमि” बताया. आपकी रिपोर्ट में जिन तीसरे देशों द्वारा इस्राइल की यातना व्यवस्था को समर्थन देने की बात कही गई है, उसके संदर्भ में भारत द्वारा इस्राइल को “पितृभूमि” कहना और इस विशेष रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करना आप कैसे देखती हैं? खासकर नरेंद्र मोदी की इस यात्रा को.

फ्रांसेस्का अल्बानीज: मैं आपको सच कहूं, तो बेतुकी बातों को समझाने में अपनी ऊर्जा बर्बाद नहीं करना चाहती. इस्राइल 1948 में बनाया गया था – उस समय जब भारत अभी भी अपने औपनिवेशिक-विरोधी संघर्ष से उभर रहा था. दरअसल भारत और ऐतिहासिक फिलिस्तीन – में एक समानता है: दोनों इलाकों का विभाजन ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की देन था. दोनों ब्रिटिश उपनिवेशवाद की प्रक्रिया से निकले. इस्राइल को फिलिस्तीन की जमीन पर ब्रिटिश उपनिवेशवादी दौर में स्थापित किया गया.

आज इस्राइल संयुक्त राष्ट्र का सदस्य है, अंतरराष्ट्रीय समुदाय का सदस्य है, इसलिए उसे उसी तरह व्यवहार करना चाहिए – और भारत को भी. लेकिन मुझे लगता है कि मौजूदा समय में भारत और इस्राइल दोनों उस अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को पतन की ओर धकेल रहे हैं, जिसे हमारी पिछली पीढ़ियों ने बेहद कठिन संघर्षों के बाद बनाया था.

मुनीफ खान: और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी कार्रवाइयों के बारे में आप क्या कहना चाहेंगी? मैं यह जानने को उत्सुक हूं.

फ्रांसेस्का अल्बानीज: जब मैं सरकार की बात करती हूं, तो उसमें प्रधानमंत्री भी शामिल होते हैं. मुझे लगता है कि अब समय आ गया है कि भारत की विदेश नीति पर गंभीरता से पुनर्विचार किया जाए. मुझे भारतीय न्याय व्यवस्था पर भरोसा है.

मुनीफ खान: अगर मैं बातचीत को आपकी रिपोर्ट के दूसरे हिस्से की तरफ ले जाऊं, तो यह भूखमरी और निगरानी के सवाल से जुड़ा है. रिपोर्ट कहती है कि निगरानी, चेहरे की पहचान करने वाली तकनीक, चेकपोस्ट और ड्रोन – ये सब “स्थानिक नियंत्रण” के औजार बनकर लगातार दहशत पैदा करते हैं. ये जेल से बाहर इस्तेमाल होने वाले तरीके किस तरह दिखाते हैं कि यातना सिर्फ जेलों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे फिलिस्तीनी समाज को तबाह करने का हथियार बन चुकी है?

फ्रांसेस्का अल्बानीज: अगर आप जुलाई 2023 में आई मेरी रिपोर्ट देखें – जो विशेष रैपोर्टेयर के तौर पर मेरी दूसरी रिपोर्ट थी – तो वह फिलिस्तीनियों पर इस्राइली कैद व्यवस्था की जांच थी. मैंने उसमें कहा था कि इस्राइल फिलिस्तीनियों को जेल की सलाखों के भीतर भी आजादी और बुनियादी अधिकारों से वंचित करता है, और सलाखों के बाहर भी.

जमीन को टुकड़ों में बांटकर, बंटुस्तान जैसी बस्तियां बनाकर, चेकपोस्ट और फिलिस्तीनियों के लिए प्रतिबंधित इलाके बनाकर, इस्राइल ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी है कि फिलिस्तीनी सिर्फ बिखरे हुए द्वीपों जैसी जगहों में जी सकते हैं – अपनी ही जमीन पर, जहां से वे बाहर भी नहीं जा सकते. यह उस बच्चों के खेल जैसा है जिसमें कहा जाता है कि “फर्श पर धधकता लावा है, जिस पर पैर रखना भी दूभर है.” फिलिस्तीनियों के लिए फिलिस्तीन की जमीन कुछ ऐसी ही बन चुकी है, जब वे उन कैदनुमा इलाकों से बाहर निकलते हैं जिन्हें इस्राइल ने जमीन की घेराबंदी, निगरानी तंत्र और परमिट व्यवस्था के जरिए बनाया है – जो फिलिस्तीनियों का दम घोंटने का एक और तरीका है.

इस तरह इस्राइल सिर्फ 1,500 सैन्य आदेशों के जाल से ही फिलिस्तीनियों की जिंदगी नियंत्रित नहीं करता – जिनके तहत पत्थर फेंकने, घर बनाने, अपने घर में एक मंजिल जोड़ने और उसे गिराने से इनकार करने, “गलत” किताब पढ़ने, बिना अनुमति किसी सभा या शादी में शामिल होने पर जेल भेजा जा सकता है – बल्कि वह यह भी तय करता है कि फिलिस्तीनी कहां रहेंगे, कहां अपना घर बनाएंगे, कहां पढ़ेंगे, देश छोड़ सकते हैं या नहीं, वापस लौट सकते हैं या नहीं. अगर वे इस्राइल से इजाजत लिए बिना ये फैसले करते हैं, तो उन्हें बंधक बनाया जा सकता है, जेल में डाला जा सकता है, जुर्माना लगाया जा सकता है. यह एक जहन्नुम जैसी जिंदगी है. और निश्चित रूप से उन पर हर समय निगरानी रखी जाती है और उन्हें नियंत्रित किया जाता है.

और इस पूरी व्यवस्था से लोग मुनाफा कमा रहे हैं. इस्राइली रक्षा कंपनियां और दूसरी अंतरराष्ट्रीय काॅरपोरेट ताकतें फिलिस्तीनियों को एक “प्रयोगशाला” में बदल देने से लाभ उठा रही हैं.

यह कोई अलग चीज नहीं है. हमारे समाजों का “इस्राइलीकरण” यही है – यानी भारत और इटली जैसे देश, जो इस्राइल को “लोकतंत्र” का माॅडल मानते हैं, धीरे-धीरे वैसे ही बनते जा रहे हैं. भारत में शायद आपको वोट देने का अधिकार तो रहेगा, लेकिन आप पूरी तरह नियंत्रित होंगे. असहमति जताने की कोई वास्तविक गुंजाइश नहीं बचेगी. अगर इस्राइली माॅडल भारत और इटली में वास्तविकता बन गया, तो यही होगा – वोट देने का अधिकार तो रहेगा, लेकिन उसके साथ दमन की गारंटी भी.

मुनीफ खान: बिलकुल – यह दरअसल एक बेहद अहम बात है. फिर से बेन-गवीर पर लौटते हैं – कई मामलों में वह इस पूरी बहस का केंद्रीय चेहरा दिखाई देते हैं. उन्होंने अदालत में खुद यह दावा किया कि जेलों में उनकी भूखा रखने की नीति “डर पैदा करने” के लिए है, जिसके कारण कैदियों का वजन दर्जनों किलो तक घट गया. वहीं गजा के आम लोग भी उसी तरह की घेराबंदी और भूखमरी झेल रहे हैं. क्या आप विस्तार से बता सकती हैं कि जेलों के भीतर और गजा में लागू की जा रही भूखमरी की यह नीति किस तरह आपस में गहराई से जुड़ी हुई है?

फ्रांसेस्का अल्बानीज: बिलकुल. मैं जनसंहार शुरू होने से पहले भी लगातार कहती रही हूं कि जेलों के भीतर जो होता है और जेलों के बाहर जो होता है, दोनों के बीच सीधा रिश्ता है. इस्राइल जेलों में बंद फिलिस्तीनियों – जिन्हें सुरक्षा, मानवीय व्यवहार और सम्मान मिलना चाहिए – के खिलाफ वही दंडात्मक और प्रतिशोधी तरीके इस्तेमाल करता है, जो वह जेलों के बाहर भी करता है.

भूखमरी, इलाज से वंचित करना, जिंदगी चलाने के साधनों से महरूम करना – यह सब जेलों में भी हुआ है, और गजा में तो उससे कहीं ज्यादा भयावह रूप में हुआ है. लोगों को अंधेरे में रखा गया, दवाइयों से वंचित किया गया, सिर छुपाने की जगह तक नहीं दी गई.

आज हालत यह है कि गजा में लगभग 20 लाख फिलिस्तीनी 50 वर्ग किलोमीटर से भी कम इलाके में ठूंस दिए गए हैं. वहां इतनी गंदगी और बदहाली है कि चूहे इंसानों पर हमला कर रहे हैं. लोगों के पास खुद को बचाने का कोई साधन नहीं है – रात में चूहे बच्चों और बड़ों के शरीर तक नोच रहे हैं. अगर यह यातना नहीं है, तो फिर क्या है? यह बर्बरता है.

गजा उस “कंसन्ट्रेशन कैंप” की कल्पना से भी बदतर हो चुका है, जैसा हम सोचते रहे हैं. वहां की बदहाली की हद बयान से बाहर है. सिर्फ छह लोगों को बाहर जाने की इजाजत? जबकि हर दिन सैकड़ों लोगों को निकाला जाना चाहिए. हर दिन गजा में सैकड़ों ट्रकों को राहत सामग्री लेकर पहुंचना चाहिए, लेकिन वहां मुश्किल से कुछ दर्जन ट्रक पहुंचते हैं. यह बेहद क्रूर है.

और जेलों के बाहर भी यही सब वेस्ट बैंक में हो रहा है. भारतीय सरकार अपने लोगों से झूठ बोल सकती है, लेकिन सच सबकी आंखों के सामने है. देखिए कैसे हिंसक सेटलर हर रोज फिलिस्तीनी इलाकों पर हमला कर रहे हैं – लोगों की हत्या कर रहे हैं, बाग जला रहे हैं, घर तबाह कर रहे हैं, रोजी-रोटी और जिंदगी के साधनों को नष्ट कर रहे हैं.

एक तस्वीर सब कुछ बयान कर देती है: फिलिस्तीनियों को उनके पूरी तरह मिटा दिए जाने के खौफ से लगातार प्रताड़ित किया जा रहा है. जेलों के भीतर कैदियों को तबाह हुए गजा की तस्वीरें दिखाई जाती थीं, ताकि उन्हें यह एहसास कराया जा सके कि उनका सब कुछ नष्ट हो चुका है – उनके घर, उनके बच्चे – ताकि उनके भीतर दोबारा जिंदगी की उम्मीद तक को मार दिया जाए.

ठीक यही काम वेस्ट बैंक में भी किया गया है. स्मोत्रिच के आदेश पर ऐसे पोस्टर लगाए गए हैं, जिनमें “नए इस्राइल” का नक्शा दिखाया गया है – ऐसा इस्राइल जिसमें फिलिस्तीनियों के लिए कोई जगह नहीं है. यह बेहद क्रूर है. जैसा कि मैंने अपनी रिपोर्ट में कहा है, यह एक यातनापूर्ण माहौल है.

मुनीफ खान: आपकी रिपोर्ट में मैंने एक और बेहद भयावह बात देखी – इसमें कानूनी पहुंच को बाधित करने की बात है, यानी धमकी और प्रतिबंधों के जरिए वकीलों की पहुंच रोकना; जेलों में डाॅक्टरों की मिलीभगत से रिकाॅड्र्स को गलत बनाना; और संयुक्त राष्ट्र के 50 से ज्यादा कर्मचारियों को उनके काम के कारण प्रताड़ित किया जाना. इसमें यह भी कहा गया है कि डाॅक्टरों, पत्रकारों, कार्यकर्ताओं और मानवाधिकार रक्षकों को विशेष रूप से निशाना बनाया गया. ये संस्थागत विफलताएं और चुनिंदा निशाना बनाना यह कैसे साबित करता है कि यातना व्यक्तिगत हरकत नहीं बल्कि एक राज्य-नीति है?

फ्रांसेस्का अल्बानीजः यह सिर्फ एक राज्य-नीति से भी आगे की बात है. यह सामूहिक यातना की एक पूरी व्यवस्था है, जो एक जनसंहार की प्रक्रिया में गहराई से जुड़ी हुई है. मैंने अपनी रिपोर्ट में कहा है: डाॅक्टरों ने इसे मंजूरी दी है, और कुछ रब्बियों ने इसे जश्न की तरह मनाया है. आम नागरिक तक जेलों का “टूर” करने गए हैं ताकि देख सकें कि फिलिस्तीनियों के साथ कैसे बर्ताव किया जा रहा है. यह एक ऐसा पूरा समाज है जिसे सब कुछ पता है.

असल में, एक ही व्यक्ति था – मुझे लगता है उसका नाम एफताल यरूशलेम  है – कृपया उस इस्राइली अधिकारी का नाम जांच लें जिसने चाकू से बलात्कार और एक फिलिस्तीनी कैदी के सामूहिक बलात्कार का वीडियो लीक किया था. इसके लिए कोई औचित्य नहीं है, और न ही कोई निंदा – बिल्कुल कोई निंदा नहीं.

तो आप समझिए, इसे ईश्वर के नाम पर कैसे सही ठहराया जा सकता है? कुछ लोग कहते हैं कि इस्राइल की आलोचना करना यहूदी-विरोध है, लेकिन क्या यहूदी धर्म कभी इस बात को स्वीकार कर सकता है कि इंसानों के साथ चाकू के साथ बलात्कार किया जाए और उसे प्रसारित किया जाए?

जो एकमात्र व्यक्ति गिरफ्तार हुआ, वह वही है जिसने वीडियो लीक किया था. जिन्होंने यह किया, उन पर आरोप लगाए गए थे, लेकिन बाद में वे आरोप हटा दिए गए. इस्राइल में आपका स्वागत है.

बेशक, ऐसे इस्राइली भी हैं जो इसके खिलाफ खड़े हैं, और हम उन्हें भी उसी उदासीनता के साथ छोड़ रहे हैं, जैसे हम फिलिस्तीनियों के साथ करते हैं.

मुनीफ खानः आप अपने आठवें पैराग्राफ में लिखती हैंः “जब किसी एक ही समूह के खिलाफ समय और स्थान के अलग-अलग हिस्सों में बार-बार यातना का इस्तेमाल किया जाता है, तो यह जनसंहार की मंशा  का सबूत हो सकता है, जैसा कि जेनोसाइड कन्वेंशन के अनुच्छेद II में कहा गया है.” तो ये यातना से जुड़े निष्कर्ष पहले से मौजूद संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टों और अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) के निष्कर्षों के संदर्भ में कहां फिट होते हैं?

फ्रांसेस्का अल्बानीजः ये निष्कर्ष पहले से मौजूद सबूतों को और मजबूती से साबित करते हैं कि जनसंहार की मंशा मौजूद है. साथ ही ये अपने आप में एक अलग अपराध भी हैं, जिन्हें उस देश के राष्ट्रीय कानून के तहत भी जांचा और मुकदमा चलाया जा सकता है, जहां ये अपराध हुए हों. कई देशों में यातना देने को अपराध माना गया है, इसलिए पीड़ित वहां आरोपियों पर मुकदमा कर सकते हैं.

कुछ मामलों में यह भी तर्क दिया जा सकता है, क्योंकि यहां एक ऐसा माहौल बनाया गया है जो खुद यातनापूर्ण है – और 4,000 जबरन गायब किए गए लोगों के परिवारों या अभी भी जेलों में बंद लोगों को गहरी मानसिक यातना झेलनी पड़ रही है. डाॅक्टर अबू सफिया जैसे मामलों को देखिए.

इसके अलावा, इस्राइल के पास फिलिस्तीनियों को हिरासत में रखने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है. देखिए, मैं इस्राइल से ग्रस्त नहीं हूं – मुझे परवाह नहीं है. मैं बस अपना काम कर रही हूं, एक संयुक्त राष्ट्र विशेष रैपोर्टेयर के रूप में, जिसे अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघनों की जांच और रिपोर्ट करने के लिए नियुक्त किया गया है. यही मेरा यूएन का मैंडेट है, और मैं इसे पूरी ईमानदारी से निभाने की कोशिश करती हूं. लेकिन सच कहूं तो यह बहुत थका देने वाला काम है – 300 से ज्यादा दिन मैंने रोज इस सबका दस्तावेजीकरण किया है, और मुझे सदस्य देशों और समाज दोनों को यह समझाना पड़ता है कि लोगों को यातना देना, उनका बलात्कार करना गलत है. अगर इसे भी नकारा जा रहा है, तो हम किस तरह के अमानवीय हालात का सामना कर रहे हैं? सबूत देखिए – वे इतने भारी हैं कि उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

मुनीफ खानः यह मुझे मेरे आखिरी सवाल पर लाता है, जो आपकी रिपोर्ट से परे है. आपकी रिपोर्ट कहती है कि हिरासत के भीतर और बाहर यातना जनसंहार के मानदंडों को पूरा करती है और यह रंगभेद तथा सेटलर-औपनिवेशिक व्यवस्था से जुड़ी हुई है. इन सभी घटनाक्रमों के बाद – मृत्युदंड कानून, क्षेत्रीय युद्ध, और लगातार विदेशी समर्थन – क्या अब भी दूसरे देशों के लिए इस यातना और जनसंहार को रोकने के बारे में गंभीर होने के लिए कोई रास्ते बचे हैं?

फ्रांसेस्का अल्बानीज: रास्ते मौजूद हैं. बस उन्हें अपनाने की जरूरत है. कोलंबिया, दक्षिण अफ्रीका, स्पेन, स्लोवेनिया, मलेशिया – कई देश सही दिशा में कोशिश कर रहे हैं. लेकिन सच यह है कि हम एक वैश्विक रंगभेदी मानसिकता के खिलाफ लड़ रहे हैं, जहां कुछ शोषक अभिजात वर्ग लोकतंत्रों में आम नागरिकों और मतदाताओं से कहीं ज्यादा प्रभाव रखते हैं.

आम नागरिकों को जागना होगा और समझना होगा कि अंततः मानवता का अंत और अंतरराष्ट्रीय कानून का अंत – और उसकी प्रभावशीलता का क्षरण – जो आज गजा में हो रहा है, वह सिर्फ गजा तक सीमित नहीं है. यह ईरान, पश्चिम एशिया सहित, लेबनान और पूरे क्षेत्र में फैल रहा है – जिसे हकीकत में अमेरिका और इस्राइल ने इस संघर्ष में घसीट लिया है.

यह उस पूरी व्यवस्था का अंत है जो भविष्य में हमें और हमारे बच्चों को सुरक्षा दे सकती थी.

UN Rapporteur Albanese % ‘Maintenance Of India’s Ties With Israel % A Violation Of International Law’
https:èkèkyoutuben6jKHDOjmmk?si=EWCRtwqXLDI7H7rs

(हिन्दी रूपांतरण: मनमोहन)


16 May, 2026