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अखिल भारतीय किसान महासभा : पांचवें राष्ट्रीय सम्मेलन की ओर बढ़ते कदम

अखिल भारतीय किसान महासभा : पांचवें राष्ट्रीय सम्मेलन की ओर बढ़ते कदम

अखिल भारतीय किसान महासभा का पांचवा राष्ट्रीय सम्मेलन, 20-21 सितम्बर 2026 को, जालंधर (पंजाब) के देश भक्त यादगार हाॅल में होने जा रहा है. सम्मेलन भारत के किसान आंदोलन में एक ऐतिहासिक तारीख दर्ज करने जा रहा है. सम्मेलन दो क्रान्तिकारी वाम किसान संगठनों ‘अखिल भारतीय किसान महासभा’ और ‘जम्हूरी किसान सभा’ के एकीकरण के ऐतिहासिक क्षण का गवाह बनेगा.

सम्मेलन की शुरुआत एक विशाल  किसान-मजदूर एकता रैली के माध्यम से होगी, जिसमें भाकपा(माले) के महासचिव कामरेड दीपंकर भट्टाचार्य मुख्य अतिथि और आरएमपीआई के महासचिव कामरेड मंगतराम पासला विशिष्ट अतिथि के रूप में अपना सम्बोधन करेंगे. रैली को किसान महासभा के अध्यक्ष कामरेड रूलदू सिंह मानसा, महासचिव कामरेड राजा राम सिंह, जम्हूरी किसान सभा के अध्यक्ष कामरेड डाॅ सतनाम सिंह अजनाला, महासचिव कामरेड कुलवंत सिंह सिद्धू, आइसा की अध्यक्ष कामरेड नेहा बोरा जैसे राष्ट्रीय नेता विशेष रूप से सम्बोधित करेंगे. सम्मेलन में देश के 21 राज्यों से 700 किसान प्रतिनिधि हिस्सा लेंगे.

अखिल भारतीय किसान महासभा (AIKM) का पांचवां राष्ट्रीय सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है, जब ‘विदेशी व्यापार संधि (FTA) के जरिए भारत की खेती में साम्राज्यवादी एकाधिकारी निगमों की वैश्विक पूंजी और कारपोरेट पूंजी का संयुक्त हमला किसी भी वक्त से बहुत ज्यादा है. अभी दुनिया के 3.83 बिलियन लोग कृषि प्रणालियों पर अपनी आजीविका के लिए निर्भर हैं. विश्व की सर्वाधिक आबादी वाले भारत की आबादी ही विश्व आबादी का 18 प्रतिशत पहुंच चुकी है. नवीनतम आर्थिक सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि कृषि कार्यों पर अपनी आजीविका के लिए निर्भर भारत की आबादी की संख्या अब बड़ी तेजी से घट रही है. हमारी खेती-किसानी पर बढ़ते कारपोरेट और साम्राज्यवादी हमलों का ही नतीजा है कि एक दशक पूर्व तक हमारी 58 प्रतिशत आबादी की आजीविका कृषि पर निर्भर थी, वो अब घटकर 46.1 प्रतिशत पर आ गई है. कृषि जैसे स्थाई आजीविका के साधन से बेदखल हो रही हमारी आबादी का बड़ा हिस्सा अब विनिर्माण जैसे क्षेत्र में सबसे असुरक्षित और अस्थाई रोजगार के क्षेत्र में धकेला जा रहा है. खेती के कारपोरेटीकरण के इस रास्ते ने भारत की इतनी बड़ी आबादी के सामने अपनी आजीविका की असुरक्षा और खाद्य संकट के दरवाजे खोल दिए हैं.

भारत की खेती और ग्रामीण समाज में बड़े पैमाने पर वित्तीय पूंजी और पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली के प्रवेश के बावजूद आज भी सामंतवाद के भद्दे अवशेषों की प्रधानता है. वहीं किसानों के बीच से आने वाले 85 प्रतिशत गरीब और सीमांत किसानों में ज्यादातर की उत्पादन के आधुनिक साधनों तक सीधी पहुंच नहीं है. सरकारों की सुनियोजित उपेक्षा और प्रतिकूल नीतियों की वजह से आज भारतीय कृषि गहरे और दीर्घकालिक संकट में फंसी हुई है. इस संकट से बाहर निकलने के लिए जिस कारपोरेटीकरण की नीतियों और कृषि उत्पादों के लिए हो रहे असमान व्यापार समझौतों के साथ नरेंद्र मोदी सरकार अमेरिकी साम्राज्यवादी बहुराष्ट्रीय निगमों के आगे आत्मसमर्पण के रास्ते पर चल पड़ी है, भारत के किसानों की विशाल बहुसंख्या के लिये वह अब जीवन-मरण का प्रश्न बन गया है. साम्राज्यवादी वैश्विक पूंजी तथा बड़ी कारपोरेट कम्पनियों के सामने यह भारत के समृद्ध प्राकृतिक एवं मानव संसाधनों-उपजाऊ जमीन, प्रचुर पानी, संसाधन समृद्ध वन, उत्पादक मगर सस्ता श्रम और एक संभावित विशाल ग्रामीण बाजार को हस्तगत करने और उसका दोहन करने का खुला अवसर है. भारतीय कृषि और मेहनतकश किसान समुदाय को तबाही के इस संकट तथा साम्राज्यवादी हमले से बचाना आज वक्त की पुकार है.

भारत के पास दुनिया का सबसे बड़ा कृषि क्षेत्र (1753693 वर्ग कि.मी.) है, जो सरकार के संरक्षण में चल रहे कारपोरेट भूमि हड़प अभियान के चलते लगातार घट रहा है. भारत की जमीन और जलवायु दुनिया के किसी भी देश से कृषि उत्पादन के लिए बेहतर है. हमारे देश में 20 अलग-अलग कृषि जलवायु क्षेत्र हैं. दुनिया भर में मौजूद 60 मिट्टी किस्मों में से भारत में 46 मिट्टी किस्में मौजूद हैं. इसलिए भारत की मिट्टी व जलवायु में दुनिया में पैदा होने वाले ज्यादातर खाद्यान को पैदा करने की क्षमता है. खाद्य संप्रभुता के लिहाज से देखें तो प्राप्त आंकड़ों के अनुसार 2013 में ही दुनिया के कुल खाद्यान उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी दालों में 25 प्रतिशत, चावल में 22 प्रतिशत, गेहूं में 13 प्रतिशत और कपास में 25 प्रतिशत पहुंच गयी थी. भारत दुनिया के कुल दुग्ध उत्पादन का 24.64 प्रतिशत उत्पादन कर पहले नंबर पर है. मांस उत्पादन में भारत का नंबर पांचवां और मछली उत्पादन में दूसरा है. हम मसाले, चाय, काॅफी, चावल का भारी मात्रा में निर्यात करने तथा दुनिया में सर्वाधिक फल और सब्जी पैदा करने वाला देश है. मगर चिंता की बात है कि देश की नरेंद्र मोदी सरकार भारत की कृषि और किसानों की इस क्षमता को और विकसित करने के लिए ठोस कदम उठाने के बजाय कृषि को हतोत्साहित कर इस क्षेत्र में कारपोरेट और बहुराष्ट्रीय निगमों के दखल को बढाने की नीतियां बनाने में जुटी है.

भारत की मिट्टी और जलवायु की वो उत्पादन क्षमता ही है कि आज न सिर्फ भारत के बड़े कारपोरेट घरानों की नजर भारत की खेती और कृषि बाजार पर है, बल्कि दुनिया की कई बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियां भी इस पर एकाधिकार के लिए प्रयासरत हैं. भारत के बीज बाजार के तीन चौथाई (75%) पर बहुराष्ट्रीय कम्पनियां पहले ही कब्जा कर चुकी हैं. साम्राज्यवादी बहुराष्ट्रीय निगम भारत की मौजूदा कृषि व व्यापार नीतियों को बदलने के लिए अपनी सरकारों, विश्व बैंक और डब्ल्यूटीओ के माध्यम से भारत सरकार पर दबाव डालते रहे हैं. वर्ष 2020 में नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा लाए गए तीन कृषि कानून (जिन्हें 13 माह तक दिल्ली के बार्डरों को घेरकर चले एक बड़े ऐतिहासिक किसान आन्दोलन के दबाव में वापस लेना पड़ा था), 25 नवम्बर 2024 को लाया गया “कृषि विपणन (बाजार) पर राष्ट्रीय नीति ढांचा (फ्रेमवर्क)” का मसौदा, नया बीज बिल, नया बिजली बिल और अन्न के भंडारण में कारपोरेट एकाधिकार की नीति, इसी दबाव का नतीजा है. इधर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत की मोदी सरकार को धमकी भरे शब्दों में अमेरिकी कृषि उत्पादों सहित अमेरिकी उत्पादों के लिए शून्य टैरिफ पर भारत के दरवाजे खोलने को कहा है. जबकि भारत से अमेरिका जाने वाले उत्पादों पर 100 प्रतिशत टेरिफ लगाने का बिल अमेरिकी सीनेट में पास कर दिया है. मोदी सरकार ने भारत की खेती-किसानी और व्यापार पर हमला करने वाले ट्रंप के आगे घुटने टेक दिए हैं. ट्रंप और अमेरिका के आगे नरेंद्र मोदी सरकार का यह पूर्ण समर्पण (जिसे हमने रूस और ईरान से तेल खरीद के मामले में भी देखा है) और चार नए श्रम कोड ने भारत को साम्राज्यवाद और कारपोरेट की एक नई गुलामी के रास्ते पर धकेल दिया है.

जहां नरेंद्र मोदी सरकार की कारपोरेट और साम्राज्यवाद परस्त नीतियों ने देश के किसानों को लगातार हतोत्साहित किया है. इसके बावजूद किसानों की मेहनत से आज भी भारत की जीडीपी में कृषि का हिस्सा 18 प्रतिशत और औसत वृद्धि दर 4.18 प्रतिशत दर्ज हुई है. कोविड दौर में जब भारत की वृद्धि दर शून्य से नीचे 23 प्रतिशत तक गिर गयी थी, तब यह भारत की कृषि ही थी जिसने 3 प्रतिशत वृद्धि दर को बनाए रखा था. अगर भारत के किसानों को उनके हर उत्पाद का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की कानूनी गारंटी मिल जाए, तो भारत की जीडीपी और औसत वृद्धि दर में कृषि का हिस्सा काफी बढ़ाया जा सकता है. मगर लागत से भी काफी कम मूल्य मिलने के कारण किसान कर्ज में डूबा है. आज किसान का दर्जा न मिलने के कारण छोटा बटाईदार किसान, पर्याप्त रोजगार और बेहतर मजदूरी के अभाव में ग्रामीण मजदूर व गरीब भी माइक्रो फाइनेंस कम्पनियों के कर्ज जाल में फंस कर आत्महत्याएं कर रहे हैं. अभी ग्रामीण क्षत्रों में हो रही आत्महत्याओं में 55 प्रतिशत इसी गरीब तबके से हैं. यही कारण है कि असमान भारत-अमेरिका ट्रेड डील से बाहर होने, एमएसपी का गारंटी कानून, ग्रामीण क्षेत्रों में 200 दिन के रोजगार और 1000 रुपए दैनिक मजदूरी की गारंटी, किसानों-मजदूरों की पूर्ण कर्ज मुक्ति और चार श्रम कोड की वापसी के सवाल पर देश में धारावाहिक आन्दोलन चल रहा है. इन प्रमुख मुद्दों पर भारत के तमाम किसान संगठनों, ग्रामीण मजदूर संगठनों और ट्रेड यूनियनों के बीच साझा संघर्ष के लिए एक समन्वय भी विकसित हुआ है.

आज सत्ता के संरक्षण में देश में हर तरफ कारपोरेट भूमि लूट का अभियान चल रहा है. विकास के नाम पर बड़े पैमाने पर जबरन भूमि अधिग्रहण कर किसानों और ग्रामीण गरीबों को उनकी जमीनों से बेदखल किया जा रहा है. ऐसा ही भूमि के डिजिटल रिकार्ड के नाम पर भी किया जा रहा है. आदिवासी क्षेत्रों खासकर छत्तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा आदि में देश के संविधान द्वारा आदिवासियों को दिए गए संरक्षण के बावजूद आदिवासियों की जमीन, जंगल व नदियां पर सत्ता के चहेते बड़े कारपोरेट घरानों का जबरन कब्जा कराया जा रहा है. देश के हिमालयी राज्यों की नदियों, जैव विविधता से भरपूर वन व हिमालयी क्षेत्रों, देश के जल संभरण क्षेत्रों और समुद्र व कोस्टल क्षेत्रों पर सत्ता के संरक्षण में बड़ी परियोजनाओं के लिए कारपोरेट का दखल, भूमि लूट और पागलपन से भरा पर्यटन बढ़ गया है. इससे हिमालय व कोस्टल क्षेत्र की जैव विविधता को भारी खतरा पैदा हो गया है. पूरी दुनिया के साथ ही भारत में भी कारपोरेट मुनाफे के लिए पर्यावरण को पहुंचाए गए इस नुकसान से हुए जलवायु परिवर्तन का भारी असर हमारी खेती पर दिखने लगा है. पृथ्वी के बढ़ते तापमान के कारण फसल चक्र में बदलाव दिखने लगे हैं. बढ़ती लू और गरमी से खेती में काम करने वाले किसानों और मेहनत करने वाले लोगों की मौतों में इजाफा दिखने लगा है. समय पर वर्षा का न होना, सूखाग्रस्त और मरुस्थल क्षेत्रों के भूगोल में हो रही बढ़ोतरी, बेमौसम भारी बारिश, ओला, भारी हिमपात, बाढ़, तूफान, बढ़ते समुद्री तूफान और हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते भूस्खलन व ग्लेशियरों का सिमटना इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं. इसलिए भारत और दक्षिण एशिया क्षेत्र में दुनिया की सबसे बड़ी आबादी की मुख्य आजीविका खेती-किसानी को इस कारपोरेट हमलों से बचाना और पर्यावरण की रक्षा हमारे संघर्ष के एजेंडे में प्रमुख रूप में शामिल हो जाने चाहिए.

अखिल भारतीय किसान महासभा मानती है कि भारत के सच्चे लोकतंत्रीकरण एवं आधुनिकीकरण की कुंजी भारतीय कृषि से जुड़ी सारी चीजों के सर्वांगीण लोकतंत्रीकरण और आधुनिकीकरण में निहित है. इसके लिये वस्तुतः एक ऐसी कृषि क्रांति जरूरी है, जिसकी बुनियाद भारत की खेती में हर तरह के कारपोरेट और साम्राज्यवादी दखल तथा सामन्ती अवशेषों के निषेध पर आधारित हो. यही कृषि क्रांति हमें जनता के समृद्ध एवं प्रगतिशील भारत के लक्ष्य तक पहुंचा सकती है. अखिल भारतीय किसान महासभा इस लक्ष्य को हासिल करने के लिये हर संभव तरीके से अपना सर्वस्व दांव पर लगा देगी. इसी लक्ष्य के लिये औपनिवेशिक जमाने से चले आ रहे गौरवशाली किसान-आदिवासी विद्रोहों एवं जुझारू किसान आंदोलनों की समूची श्रृंखला के दौरान हजारों-हजार किसान योद्धाओं ने अपना जीवन न्यौछावर किया है. अखिल भारतीय किसान महासभा का गठन पटना में 10 मई 2010 को एक राष्ट्रीय किसान सम्मेलन के जरिये हुआ. 10 मई 1857 भारत के महान प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की शुरूआत का दिन है, जिस संग्राम से दसियों लाख किसानों और कारीगरों ने (प्रधानतः किसान वर्ग-उत्पत्ति से आये) भारतीय सैनिकों के साथ कंधे से कंधा मिलाया था. इस महान विरासत को संजोए रखने के लिये अखिल भारतीय किसान महासभा हर वर्ष 10 मई को “किसान दिवस” के रूप में मनाने का संकल्प लेती है.

किसान महासभा के निर्धारक सिद्धांत

  1. अखिल भारतीय किसान महासभा आज के दौर में असमान व्यापार समझौतों से भारत की खेती-किसानी पर बढ़ते साम्राज्यवादी वैश्विक पूंजी के हमलों और कारपोरेट एकाधिकार को मजबूत बनाने के लिए लाए गए सभी कानूनों व नीतियों का डटकर विरोध करेगी.
  2. किसान महासभा नरेंद्र मोदी के राज में देश में चौतरफा चल रही कारपोरेट भूमि लूट के खिलाफ संघर्षरत है. यह भूमि लूट तमाम तरह की परियोजनाओं, औद्योगिक गलियारों, सैटेलाइट टाउनशिप तथा खनन पट्टों के नाम पर की जा रही है. इसमें बड़े पैमाने पर कृषि भूमि, आदिवासियों की जमीन व बेशकीमती जंगल तथा कोस्टल क्षेत्र को तबाह किया जा रहा है. किसान महासभा इस कारपोरेट भूमि लूट को रोकने और देश में एक कृषि भूमि संरक्षण कानून लाने के लिए संघर्ष को जारी रखेगा.
  3. किसान महासभा भारत में जमींदारी प्रथा के सम्पूर्ण विनाश के लिए भारतीय कृषि को तमाम किस्म के सामंती अवशेषों से मुक्त कराने के लिये अनवरत संघर्ष करेगी. साथ ही कारपोरेट खेती के खिलाफ किसानों के हितों की रक्षा के लिए एक क्रांतिकारी भूमि सुधर के एजेंडे को आगे बढ़ाएगी.
  4. किसान महासभा भारत से व्यापार एवं विनिमय अथवा वैज्ञानिक व तकनीकी सहयोग एवं विकास से जुड़े समस्त वैदेशिक समझौतों तथा सम्बंधें की समानता के आधार पर पुनर्रचना के लिये समूची ताकत से लड़ेगी.
  5. किसान महासभा देश के गरीब, सीमांत, मध्यम किसानों की शक्ति पर निर्भर होकर वैश्विक पूंजी के हमलों और कारपोरेट एकाधिकार के खिलाफ राष्ट्रव्यापी साझे किसान आंदोलनों की हिमायती है. किसान महासभा सामंती अवशेषों, कारपोरेट वर्चस्व अथवा साम्राज्यवादी हस्तक्षेप के खिलाफ संघर्षों में उन आधुनिक पूंजीवादी कुलक और धनी किसान शक्तियों के साथ कार्यवाही में एकता की संभावनाएं तलाशने में नहीं हिचकिचाएगी, जो इन सवालों पर लड़ने के इच्छुक हों और मजदूरों तथा गरीबों के प्रति सम्मान की दृष्टि रखते हों.
  6. किसान महासभा आदिवासी एवं देशज जनों, कोस्टल क्षेत्र के निवासियों के अधिकारों की रक्षा करने को संकल्पबद्ध है, जो मेहनतकश किसान समुदाय का विशाल हिस्सा हैं. मगर फिर भी उनको सुनियोजित ढंग से अपने निवास-स्थल से उजाड़ा जा रहा है, तथा उनको जमीन तथा प्राकृतिक संसाधनों पर परम्परागत और संवैधानिक रूप से हासिल अधिकारों से वंचित किया जा रहा है.
  7. अपने लक्ष्यों एवं उद्देश्यों की प्राप्ति के लिये किसान महासभा हमेशा खेत मजदूरों, अन्य ग्रामीण मजदूरों तथा छोटे कारीगरों, मछुआरों और साथ ही औद्योगिक एवं अन्य किस्म के मजदूरों के व्यापक हिस्से के साथ घनिष्ठ तथा समावेशी संश्रय कायम करने की कोशिश करेगी.
  8. किसान महासभा जीवन के हर क्षेत्र में तमाम किस्म के दकियानूसी, पुरुषसत्तावादी और साम्प्रदायिक अथवा संकीर्णतावादी विचारों एवं प्रथाओं के खिलाफ संघर्ष करेगी तथा धर्मनिरपेक्ष, आधुनिक, प्रगतिशील एवं जन-पक्षीय मूल्यों को बुलंद करेगी.
  9. किसानों को उनके अपने संघर्षों में एकताबद्ध और गोलबंद करते हुए किसान महासभा देश में लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के लिए भारतीय जनता के व्यापक क्रांतिकारी एवं लोकतांत्रिक आंदोलन की अन्य शाखाओं के साथ घनिष्ठ एकता और सहयोग विकसित करने के लिये सेतु का काम करेगी.
  10. किसान महासभा साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ाई में दुनिया की जनता की अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता को बढाने के लिये प्रयास करेगी. दुनिया के हर कोने में आजादी, न्याय और जन-कल्याण को आगे बढ़ाने के लिए चल रहे न्यायपूर्ण जन आंदोलनों को समर्थन देगी.
  11. किसान महासभा जलवायु परिवर्तन का कारण बने कारकों से हमारी खेती, फसलचक्र और पर्यावरण को हो रहे भारी नुकसान से चिंतित है, क्योंकि इसका प्रभाव पूरी पृथ्वी पर पड़ने के बावजूद इसकी सबसे बड़ी कीमत किसानों, मजदूरों और देशजजनों को ही चुकानी पड़ती है. हम जलवायु परिवर्तन से हो रहे नुकसान को रोकने के लिए संघर्षरत विश्व समुदाय के साथ अपनी एकजुटता प्रदर्शित करते हैं.

05 September, 2026