-- दीपंकर भट्टाचार्य, महासचिव, भाकपा(माले)
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और वर्तमान में भारत की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को उत्तराखंड में संघ ब्रिगेड की घृणा से भरी जातिवादी मानसिकता का सामना करना पड़ा.
खड़गे जी के भाषण देने के बाद हल्द्वानी के रामलीला मैदान में संघ ब्रिगेड द्वारा ‘शुद्धिकरण हवन’ कराया गया. खड़गे जी ने इस मुद्दे को संसद में उठाया और इसके बाद विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इस चौंकाने वाली जातिगत भेदभाव की घटना के खिलाफ एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत पुलिस मामला दर्ज करने की उचित मांग की.
तथाकथित शुद्धिकरण की यह कवायद वास्तव में दूसरे तरीके से छुआछूत की ही प्रथा थी.
विडंबना यह है कि अब राहुल गांधी पर स्वयं जातिगत भेदभाव का आरोप लगाते हुए हल्द्वानी पुलिस थाने में एफआईआर दर्ज कर दी गई है! आखिर छुआछूत की प्रथा के खिलाफ न्याय की मांग करना अत्याचार कैसे माना जा सकता है?
जब से राहुल गांधी ने मनुस्मृति की मानसिकता को चुनौती दी है – पहले पुणे की अपनी सभा में महिलाओं की स्वतंत्रता के संदर्भ में और फिर बाद की एक प्रेस काॅन्फ्रेंस में हल्द्वानी की घटना की निंदा करते हुए – तब से गोदी मीडिया में स्पष्ट असहजता, यहां तक कि गुस्सा और उपहास देखने को मिल रहा है. कुछ वर्गों द्वारा तो मानो बाकायदा ‘मनुस्मृति बचाओ’ अभियान चलाया जा रहा है.
मनुस्मृति को पितृसत्तात्मक और जातिवादी गुलामी की संहिता तथा संस्थागत अथवा कर्मकांड के रूप में स्थापित अन्याय के रूप में किए जाने वाले उल्लेख को चुनिंदा ‘हिंदू-विरोधी पूर्वाग्रह’ के रूप में पेश किया जा रहा है. राम माधव ने मनुस्मृति को एक प्राचीन नैतिक संहिता बताया, जिसका आज संविधान के युग में बहुत कम प्रासंगिकता है.
यदि मनुस्मृति वास्तव में केवल एक प्राचीन धर्मग्रंथ या पुरानी संहिता होती, जिसका भारत के समकालीन सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश से कोई संबंध नहीं होता, तो आज कोई भी मनुस्मृति की चर्चा नहीं कर रहा होता. यह याद रखना शिक्षाप्रद है कि भारत के संविधान को संविधान सभा द्वारा अपनाए जाने से बाईस वर्ष पहले ही बाबासाहेब डाॅ. भीमराव अंबेडकर ने 25 दिसंबर 1927 को सार्वजनिक रूप से मनुस्मृति को अस्वीकार कर उसका दहन किया था. भारतीय संविधान की यात्रा की शुरुआत ही मनुस्मृति की स्पष्ट अस्वीकृति के साथ हुई थी.
मनुस्मृति और संविधान के बीच का टकराव संविधान को अपनाए जाने के साथ समाप्त नहीं हुआ. वास्तव में, आरएसएस ने अपने मुखपत्री ऑर्गनाइजर में संपादकीय के माध्यम से संविधान को अस्वीकार करते हुए प्रतिक्रिया व्यक्त की थी. उसने संविधान को ऐसा दस्तावेज बताया था जिसमें कुछ भी भारतीय नहीं है और मनुस्मृति को भारत की प्रामाणिक तथा आदर्श संवैधानिक नींव के रूप में प्रस्तुत किया था. आरएसएस पर लगा प्रतिबंध सरदार पटेल ने तभी हटाया, जब आरएसएस ने लिखित रूप में संविधान और राष्ट्रीय ध्वज को स्वीकार करने का आश्वासन दिया.
मोदी सरकार और संघ ब्रिगेड द्वारा संविधान को लगातार कमजोर किए जाने और उसका उल्लंघन किए जाने तथा मनुस्मृति की मानसिकता का लगातार महिमामंडन – चाहे बलात्कार के दोषियों को सम्मानित करने के रूप में हो या दलित पृष्ठभूमि से आने वाले नेताओं का अपमान करने के लिए ‘शुद्धिकरण’ जैसे कर्मकांड आयोजित करने के रूप में – हमें यह बताता है कि मनुस्मृति और संविधान के बीच की लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है. इस संदर्भ में केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और आरक्षण-विरोधी आंदोलन के नेताओं के बीच हुई बैठक को भी ध्यान में रखना प्रासंगिक है.
पितृसत्तात्मक और जातिवादी नैतिक संहिता – चाहे उसे ब्राह्मणवादी व्यवस्था कहें या मनुस्मृति की मानसिकता – की पूर्ण और दृढ़ अस्वीकृति ही भारत को संविधान के उस लक्ष्य की वास्तविक पूर्ति की दिशा में आगे ले जा सकती है, जिसमें भारत एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य हो और जिसका मूल मंत्र न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व हो.