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‘बार काउंसिल ऑफ इंडिया’ की आजादी बचाओ! मनन कुमार मिश्रा को इस्तीफा देना होगा!

‘बार काउंसिल ऑफ इंडिया’ की आजादी बचाओ! मनन कुमार मिश्रा को इस्तीफा देना होगा!

(ऑल इंडिया लाॅयर्स एसोसिएशन फाॅर जस्टिस (AILAJ) का 7 से 15 सितंबर तक आंदोलन, 16 सितंबर 2026 को राष्ट्रीय प्रतिरोध दिवस )

नेशनल एकेडमी ऑफ लीगल स्टडीज एंड रिसर्च (नालसर विधिविश्वविद्यालय, हैदराबाद) की हालिया घटनाओं ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) की आजादी और कामकाज के गंभीर संकट की असलियत एक बार फिर से सबके सामने ला दी है. नालसर के छात्रों ने अपने दीक्षांत समारोह में मुख्य न्यायाधीश (CJI) के आने का विरोध किया, तो बीसीआई का मुखिया मनन कुमार मिश्रा ने अपनी हद से बाहर जाकर गलत आदेश दे दिया कि पूरे पासिंग बैच (साल 2026) को वकालत का रजिस्ट्रेशन नहीं दिया जाएगा, और उन छात्रों के खिलाफ जांच होगी. किसी लाॅ स्टूडेंट्स को पब्लिक इंस्टीट्यूशन की आलोचना करने और जजों और न्यायिक फैसलों से असहमत होने का संवैधानिक अधिकार है. यह एक बुनियादी लोकतांत्रिक नियम है जिसे नजरअंदाज कर दिया गया. पूरे कानूनी बिरादरी और बीसीआई के अंदर ही इतना विरोध हुआ कि कुछ घंटों में उन्हें अपना आदेश वापस लेना पड़ा. मगर जो संस्थान की बदनामी हुई, उसकी भरपाई मुश्किल है.

इस घटना ने कानूनी बिरादरी को बेहद शर्मिंदा किया है, और इसे श्री मिश्रा के तहत बीसीआई के कामकाज और उसकी आजादी पर उठ रहे गंभीर सवालों के साथ देखा जाना चाहिए, जो एक ही समय में बीसीआई चेयरमैन भी हैं और भाजपा के राज्यसभा सांसद भी. समय-समय पर श्री मिश्रा के सार्वजनिक रुख और विचार यह दर्शाते हैं कि वे अपने राजनीतिक दल को खुश करने की चाहत में बार काउंसिल ऑफ इंडिया ;बीसीआईद्ध की आजादी का बलिदान कर देते हैं और बार की गरिमा को बनाए रखना भूल जाते हैं.

इसके अलावा, कैंपेन फाॅर ज्यूडिशियल अकाउंटेबिलिटी एंड रिफाॅर्म्स (CJAR) ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के वित्तीय हालात पर गंभीर सवाल उठाया है और यह आरोप लगाया है कि वर्ष 2020 में स्थापित एक नए बीसीआई ट्रस्ट यानी पर्ल फस्र्ट ट्रस्ट ने पूर्ववर्ती बीसीआई ट्रस्ट के धन पर कब्जा कर लिया और मिश्रा ने स्वयं को आजीवन ट्रस्टी नियुक्त कर लिया. अब बीसीआई के सह-अध्यक्ष वाई.आर. सदाशिव रेड्डी ने कई और गंभीर वित्तीय आरोप लगाए हैं. मिश्रा के इस्तीफे की मांग करते हुए उनके छह पेज के खत में यह आरोप है:

  • (क) बीसीआई का करीब 150 करोड़ रुपए इस पर्ल फस्र्ट ट्रस्ट में ट्रांसफर किए गए.
  • (ख) कोई नहीं जानता कि ये ट्रस्ट डीड क्या है, और बीसीआई के कानूनी पैसों को इस ट्रस्ट में डालने का अधिकार किसे मिला.
  • (ग) मिश्रा और उनके रिश्तेदारों और करीबियों की नियुक्ति बिना किसी पारदर्शी नियुक्ति प्रक्रिया के हुई, यानी बिना कोई विज्ञापन, बिना इंटरव्यू, और बिना मेरिट लिस्ट के नौकरियां दे दी गई.
  • (घ) लाॅ काॅलेजों से शिकायत आई है कि जब वो बीसीआई से मान्यता लेने या नवीनीकरण कराने जाते थे, तो उनसे 25 लाख से 1 करोड़ रुपए तक ट्रस्ट में देने को कहा जाता था.

किसी भी मजबूत लोकतंत्र के लिए कानूनी पेशे की आजादी, अखंडता और स्वायत्तता बहुत जरूरी है. वास्तव में, भयमुक्त बार ही वह आखिरी हथियार है जो लोकतंत्र, कानून के शासन और जनता की न्याय तक पहुंच को बनाए रखने में संस्थागत विफलताओं के भयावह प्रभाव का प्रतिरोध कर सकती है. आजादी की लड़ाई में वकीलों ने जो कुर्बानियां दीं, वो उनकी हिम्मत और सत्य के प्रति ईमानदारी की वजह से ही मुमकिन हुई थीं. इसकी तुलना वर्तमान से कीजिए तो विरोधाभास और भी तीखा दिखाई देता है.

नालसर प्रकरण, अध्यक्ष के कार्यालय में शक्ति का केंद्रीकरण, बीसीआई से जुड़े ट्रस्टों और वित्तीय मामलों से संबंधित आरोप, और परिवार-आधारित नियुक्तियों के आरोप – ये सब मिलकर बीसीआई के शासन और स्वतंत्रता पर बुनियादी सवाल उठाते हैं. लाखों अधिवक्ताओं के लिए जिम्मेदार एक वैधानिक निकाय को किसी व्यक्तिगत पदाधिकारी का निजी क्षेत्र नहीं माना जा सकता. न ही कानूनी पेशे का नियामक राजनीतिक निष्ठा और संरक्षण का साधन बन सकता है.

हमारी मांगें:

  1. श्री मनन कुमार मिश्रा तुरंत बीसीआई के चेयरमैन पद से इस्तीफा दें.
  2. यदि वे इस्तीफा नहीं देते, तो बीसीआई के अन्य सदस्य उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित करें. 
  3. नालसर मामले में बीसीआई शक्तियों के दुरुपयोग की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए, विशेषकर यह कि नालसर आदेश किस प्रकार पारित हुआ और बाद में वापस लिया गया. यह भी सार्वजनिक किया जाए कि किन-किन बीसीआई सदस्यों ने मिश्रा के इस रवैये का समर्थन किया था.
  4. बीसीआई और बीसीआई ट्रस्ट – पर्ल से संबंधित वित्तीय हेराफेरी और गलत इस्तेमाल के आरोपों की जांच सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की समिति द्वारा स्वतंत्र ऑडिट के माध्यम से की जाए.
  5. नियुक्तियों और विधि महाविद्यालयों से कथित रूप से मांगे गए भुगतान से संबंधित आरोपों की स्वतंत्र जांच हो.
  6. बीसीआई चेयरमैन और वाइस-चेयरमैन के लगातार कार्यकालों पर बाध्यकारी सीमा तय की जाए.
  7. पारदर्शी और लोकतांत्रिक बीसीआई शासन को बनाए रखा जाए, जिसमें व्यापक कानूनी बिरादरी की सार्थक भागीदारी हो.

बार की आजादी की हिफाजत करो.

बार की आजादी सिर्फ वकीलों का विशेषाधिकार नहीं है, बल्कि ये हर उस इंसान का लोकतांत्रिक अधिकार है जो न्याय माँगने अदालत के दरवाजे पर आता है.

05 September, 2026