सालों से मोदी सरकार, संघ ब्रिगेड की आइटी सेल और गोदी मीडिया ने लोगों को मनगढ़ंत अंदरूनी दुश्मनों के खिलाफ भड़काने और प्रभावित करने के लिए नए-नए नाम गढ़ने में महारत हासिल कर ली है. ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ से लेकर ‘अर्बन नक्सल’ तक, और ‘राष्ट्र-विरोधी’ से लेकर ‘आंदोलनजीवी’ तक, उन्हें बस नए शब्द बनाने होते थे और मीडिया व जनमानस उन्हें हाथों-हाथ ले लेता प्रतीत होता था. लेकिन अब समय बदल गया है. भारत के मुख्य न्यायाधीश ने बेरोजगार युवाओं के लिए ‘काॅकरोच’ शब्द का इस्तेमाल किया जिससे उन्हें भारी विरोध का सामना करना पड़ा, हालाकि बाद में यह उन्होंने ‘स्पष्ट’ किया कि उनका मतलब सिर्फ फर्जी डिग्री वाले वकीलों से था. भारत के युवाओं के लिए अपमानजनक गाली की तरह इस्तेमाल किए गए एक शब्द ने भारत में जेन-जी के प्रतिरोध का पहला बड़ा जोशीला आंदोलन खड़ा कर दिया. ‘दिमागी नक्सल’ शब्द के साथ भी अब कुछ ऐसा ही पलटवार देखने को मिल रहा है.
भारत के आक्रोशित और आंदोलन में उतरे युवाओं को भयभीत करने के बजाय ‘दिमागी नक्सल’ ठप्पा ने भी ‘काॅकरोच’ शब्द जैसी ही प्रतिक्रिया पैदा की. देखते ही देखते ‘दिमागी नक्सल पार्टी’ डिजिटल रूप में सामने आ गई जिसका नारा है “सोचो, रिसर्च करो, प्रतिरोध करो”; और भारत के नागरिक गर्व के साथ ‘दिमागी नक्सल’ ठप्पे को सम्मान के प्रतीक के बतौर दिखाने लगे हैं. यहां तक कि विपक्ष के नेताओं, जिनमें कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और यूपीए सरकार में गृह मंत्री रहे पी. चिदंबरम भी शामिल हैं जिनका ‘ऑपरेशन ग्रीनहंट’ अभियान अमित शाह के ‘ऑपरेशन कगार’ का पूर्ववर्ती रूप था, ने भी खुद को दिमागी नक्सल घोषित कर दिया. इस मुद्दे पर भाजपा खुद घिर गई और उसे सफाई देनी पड़ी. लेकिन वे जितना ज्यादा सफाई देने की कोशिश कर रहे हैं, उतना ही ज्यादा वे झूठ के अपने ही जाल में फंसते चले जा रहे हैं.
सबसे पहले किरेन रिजिजू ने दिमागी नक्सल ठप्पा को धारा 370 और भारत के उत्तर-पूर्वी इलाके के प्रवेश द्वार ‘चिकन नेक’ को अवरुद्ध करके उत्तर-पूर्व में जनजीवन को बाधित करने के कथित खतरे के खास संदर्भ में समझाने की कोशिश की. फिर आरएसएस के मुखपत्र ‘ऑर्गनाइजर’ ने इस शब्द की जड़ें यूपीए दौर की राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) से जोड़ीं. एनएसी के किसी भी सदस्य का 1967 के नक्सलबाड़ी किसान विद्रोह या क्रांतिकारी कम्युनिस्ट धारा, जिसे आम तौर पर नक्सलवाद के नाम से जाना जाता है, से कोई लेना-देना नहीं था, माओवाद के तौर पर पहचानी जाने वाली अपेक्षाकृत अधिक हिंसक धारा की तो बात ही छोड़ दें. जाहिर है, समस्या एनएसी के सदस्यों और उनके पिछले रिकाॅर्ड से नहीं थी, बल्कि एनएसी द्वारा प्रस्तावित और यूपीए शासनकाल में लागू किए गए अधिकारों पर आधारित कल्याणकारी कानूनों से थी.
संघ-भाजपा प्रतिष्ठान के जाने-माने वैचारिक दूत और राजनीतिक प्रबंधक राम माधव का कहना है कि ‘दिमागी नक्सल’ को परिभाषित करने की कोई जरूरत नहीं है. वे इसे एक वैश्विक घटना का रूप देते हैं और इसे अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन के कई जाने-माने नेताओं – माओ और चे ग्वेवारा से लेकर भारत में चारू मजुमदार, कानू सान्याल व कनाई चटर्जी और नेपाल में पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ तक – से वैचारिक और ऐतिहासिक रूप से जोड़ने की जुगत भिड़ाते हैं. राम माधव का तर्क है कि ‘थोड़ी-बहुत अस्पष्टता... अहानिकर और मजेदार होती है’. और यही ‘थोड़ी-बहुत अस्पष्टता’ भाजपा आईटी सेल के हाथों में बड़े पैमाने पर लोगों को निशाना बनाने का जरिया बन जाती है, जहां पत्रकार राजदीप सरदेसाई से लेकर शिक्षकों के आंदोलन की नेता नंदिता नारायण तक, असहमति रखने वाले तमाम लोगों पर दिमागी नक्सल का ठप्पा लगा दिया जा सकता है.
अगर ‘दिमागी नक्सल’ शब्द पर सच में उस तरह चर्चा होती जिसे राम माधव ‘अहानिकर और मजेदार’ कहते हैं, तो शायद इस पर ज्यादा बहस नहीं होती. लाल किले से अपने भाषण में मोदी ने ‘दिमागी नक्सलियों’ की पहचान करने और उन्हें अलग-थलग करने की बात कही थी. भाजपा के अलग-अलग सोशल मीडिया अकाउंट्स से चलाए जा रहे डिजिटल प्रचार में मीम्स (सचित्र वक्तव्यों) और रील्स की बाढ़ आ गई है, जो ‘दिमागी नक्सलियों’ को खत्म करने के लिए हिंसक युद्ध का संकेत दे रहे हैं. और यह हिंसा सिर्फ डिजिटल दुनिया तक ही सीमित नहीं है; हमने यादवपुर विश्वविद्यालय पर हमले या पश्चिम बंगाल और राजस्थान में ‘स्कूल की जांच करो’ अभियान पर हुए हमलों में इसकी असली झलक देखी है. एक ‘जख्मी ताकतवर नेता’ की अगुवाई वाली घबराई हुई सरकार के लिए दिमागी नक्सल शब्द का इस्तेमाल शायद बुद्धिजीवियों के खिलाफ गैर-कानूनी तरीके से सजा देने, तोड़-फोड़ मचाने और हिंसा करने वाले अभियान को हवा देने की एक सनकी कोशिश ही हो सकती है.
जंतर-मंतर पर हुए विरोध-प्रदर्शन और जेन-जी व जेन-अल्फा में लगातार बढ़ती जागरूकता और अपनी बात रखने की हिम्मत ने मोदी सरकार और संघ ब्रिगेड के लिए एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है. यह परिघटना किसी खास इलाके या सामाजिक समूह तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका दायरा भौगोलिक रूप से बहुत बड़ा है और अलग-अलग वर्गों, संस्कृतियों और पीढ़ियों के लोगों के बीच इसका असर है. घबराई हुई मोदी सरकार कई तरह से जवाब देने पर विचार कर रही है - डिजिटल प्रचार अभियान और मंत्रियों को ‘एक दिन, एक विश्वविद्यालय’ की जिम्मेदारी सौंपने से लेकर ‘दिमागी नक्सलियों’ के खिलाफ मुहिम चलाने तक. ठीक इसी समय, मोहन भागवत अपनी विदेश यात्रा के दौरान एक उदार और समावेशी छवि पेश करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं, ताकि भारत में संघ ब्रिगेड के नफरत से भरे फासीवादी एजेंडे और आक्रामकता को छिपाया जा सके. बहरहाल, भारत के लोगों, विदेशों में रहने वाले भारतीयों और दुनिया भर में भारत पर नजर रखने वालों को अब आरएसएस और भाजपा को परखने का काफी अनुभव हो गया है; वे उन्हें मीठी-मीठी बातों से नहीं, बल्कि केंद्र में एक दशक से ज्यादा और गुजरात जैसे राज्यों में कई दशकों से सत्ता में रहे संघ ब्रिगेड का सामना करने के कड़वे अनुभवों से आंकते हैं.