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दिल्ली, 20 जुलाई: जब जनता की नई उम्मीद और शक्ति से सड़कें जीवंत हो उठीं

दिल्ली, 20 जुलाई: जब जनता की नई उम्मीद और शक्ति से सड़कें जीवंत हो उठीं

दिल्ली 20 जुलाई 2026 का दिन आने वाले कई वर्षों तक याद रखेगी. नवगठित डिजिटल संगठन काॅकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) और प्रगतिशील छात्र संगठनों, विशेष रूप से आइसा, ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर मानसून सत्र के उद्घाटन दिवस पर संसद तक मार्च निकालने का आह्वान किया था. जवाब में सरकार ने पुलिस एडवाइजरी जारी किया कि ऐसे मार्च की अनुमति नहीं है और इसमें शामिल होने वाले लोगों को किसी भी अनधिकृत कार्यक्रम में भाग लेने के लिए दंडित किया जाएगा. महज तीन दिन पहले अमित शाह ने दिल्ली के पुलिस आयुक्त को बदल दिया था. मार्च से दो दिन पहले पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक, जो इसी मांग को लेकर जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठे थे, को सादे कपड़ों में पुलिसकर्मियों ने सफेद चादर में लपेटकर उठा लिया था. मोदी के भारत की ‘नई सामान्य’ आम समझ के मुताबिक इन परिस्थितियों में संसद तक कोई भी मार्च संभव नहीं था.

20 जुलाई को भारी बारिश के बीच जब दिन की शुरूआत हुई, तो दिल्ली को एहसास हुआ कि उसने ऐसा मार्च पहले कभी नहीं देखा था. नौजवानों की लहरें दिल्ली के मध्य भाग की हर सड़क पर उमड़ रही थीं. ये नौजवान दिल्ली पुलिस द्वारा लगाए गए बैरिकेडों को उतनी ही आसानी से पार कर जा रहे थे, जैसे अनुभवी खिलाड़ी स्पर्धाओं में ‘बाधा दौड़’ पार करते हैं. पूरी दिल्ली जंतर-मंतर बन गई थी, हर सड़क संसद भवन की ओर जा रही थी. मानसून सत्र शुरू हुआ, लेकिन विपक्ष के जोरदार विरोध के बीच सत्र को स्थगित करना पड़ गया. जैसे-जैसे दिन चढ़ता गया, पुलिस द्वारा लाठीचार्ज, आंसू गैस के गोले बरसाने और यहां तक कि पत्थरबाजी की खबरें दिल्ली भर से आने लगीं. कई इलाके घने धुएं से ढके युद्ध क्षेत्र जैसे लग रहे थे और कई प्रदर्शनकारी गंभीर रूप से घायल हो गए. फिर भी, हाथों में तिरंगा या संविधान लिए लाठीचार्ज का सामना करते युवाओं के ढेर सारे वीडियो भारत की नई पीढ़ी के साहस और दृढ़ संकल्प को दिखा रहे थे. और जैसे-जैसे शाम हुई, प्रदर्शनकारियों को जंतर-मंतर पर विरोध-प्रदर्शन की जगह पर फिर से कब्जा करते भी देखा गया, जिसे पहले भारी पुलिस हिंसा के जरिए ‘खाली’ करा दिया गया था.

जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन ठीक एक महीने पहले 20 जून को शुरू हुआ था. एक हफ्ते बाद 28 जून को सोनम वांगचुक और आइसा के छह नेताओं ने अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की. जैसे-जैसे दिन बीतते गए और दिल्ली की भीषण गर्मी और उमस में भूख हड़ताल करने वालों की हालत बिगड़ने लगी, तो छह में से तीन छात्र कार्यकर्ताओं को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा, जबकि बाकी तीन ने खाना खाने से इनकार जारी रखा. फिर भी सरकार ने कोई जवाब नहीं दिया, और न ही गोदी मीडिया ने इसकी कोई खबर दिखाई. उन्हें लगा होगा कि खामोशी की इस चाल से प्रदर्शनकारी थककर हार मान लेंगे. लेकिन आखिरकार, लोगों की जुबानी बातचीत और सोशल मीडिया पर बड़े पैमाने पर अपनेवाली खबरों ने मोदी-गोदी की इस धूर्ततापूर्ण रणनीति को मात दे दी. 20 जुलाई को लोगों की भारी भीड़ ने सरकार और मीडिया, दोनों को बिल्कुल हैरान कर दिया.

सच तो यह है कि डिजिटल व्यंग्य और असली दुनिया के प्रतिवाद के इस नए मेल पर लोगों की स्वतःस्फूर्त प्रतिक्रिया का पैमाना अभियान से जुड़े संगठनों और दूर से इसे देख रहे विपक्षी दलों की उम्मीदों से कहीं अधिक व्यापक था. अन्ना हजारे के नेतृत्व में 2012 के भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन के निराशाजनक अनुभव को देखते हुए सीजेपी परिघटना और चल रहे संघर्ष में सोनम वांगचुक की भूमिका को लेकर काफी संदेह था. सोनम वांगचुक ने हाल तक अनुच्छेद 370 को हटाने और मोदी सरकार की कई अन्य नीतियों का समर्थन किया था. ऐसे में शिक्षा व परीक्षा प्रणाली के विरोधी के तौर पर उनकी नई भूमिका ने ज्यादा भरोसा नहीं जगाया – भले ही एक शिक्षक, इनोवेटर और जलवायु कार्यकर्ता के तौर पर उनका रिकाॅर्ड काफी अच्छा रहा हो. फिर भी, 20 जुलाई के आह्वान पर लोगों की भारी प्रतिक्रिया ने साफ कर दिया कि इस प्रतिवाद ने भारत के युवाओं के दिलों को गहराई से छुआ था – न सिर्फ शिक्षा, परीक्षा और रोजगार के मुद्दों पर, बल्कि सरकार को जवाबदेह ठहराने के सवाल पर भी.

अभूतपूर्व पैमाने पर लोगों की भागीदारी, खासकर 30 साल से कम उम्र के ‘जेन-जी’ युवाओं की जबरदस्त भागीदारी ने 20 जुलाई को सामाजिक और राजनीतिक बदलाव के लिए एक शक्ति के बतौर जेन-जी दावेदारी के उभरने का पक्का संकेत बना दिया. इसमें पड़ोसी देश बांग्लादेश में जुलाई 2024 या नेपाल में सितंबर 2025 के विद्रोह जैसी झलकियां थीं, जिनकी वजह से उन देशों में सरकारें बदल गईं. यहां मांग सिर्फ केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की थी ताकि उन्हें उनके कार्यकाल में लगातार हुए पेपर लीक के लिए जवाबदेह ठहराया जा सके. अस्पताल से भेजे गए अपने नोट में सोनम वांगचुक ने उस मुख्य मांग का जिक्र तक नहीं किया, उन्होंने कहा कि अगर विपक्ष उन्हें शिक्षा के एजेंडे पर गंभीर संसदीय चर्चा का भरोसा दिलाए, तो वे अपना अनशन खत्म करने को तैयार हैं. सरकार से जवाबदेही तय करने की मांग को घटाकर विपक्ष द्वारा संसद में शिक्षा का एजेंडा उठाने तक सीमित कर देने से उनके समर्थक उलझन में पड़ गए और निराश हुए, क्योंकि विपक्ष हाल के सत्रों में ऐसा बार-बार करता ही रहा था.

20 जुलाई को संसद तक हुए मार्च में शामिल लोगों की तारीफ करनी होगी कि स्पष्टता और तालमेल में साफ कमी के बावजूद मार्च करने वाले नौजवान शांतिपूर्ण और दृढ़ बने रहे. उन्होंने पुलिस की बर्बरता और संघ ब्रिगेड के उन लोगों की उकसावे वाली हरकतों का सामना किया जो दिल्ली के कई हिस्सों में मार्च को बदनाम करने और उस पर हमला करने के लिए पुलिस के साथ मिल गए थे. इससे हमें 26 जनवरी 2021 के ट्रैक्टर मार्च के बाद ऐतिहासिक किसान आंदोलन को बदनाम करने और पटरी से उतारने की मोदी सरकार की साजिश की याद आ जाती है. लेकिन जिस तरह किसान फिर से एकजुट हुए और वापसी की, और आंदोलन तब तक जारी रहा जब तक कि किसान-विरोधी तीन कृषि कानून रद्द नहीं हो गए, उसी तरह भारत अपने युवाओं के लिए ऐसी ही ताकत और हिम्मत की कामना करता है ताकि वे अपनी मुख्य मांगें पूरी होने तक आगे बढ़ते रहें.

दस साल पहले रोहित वेमुला की दुखद संस्थागत हत्या के बाद भारत के विश्वविद्यालयों में छात्र प्रतिवादों में खड़े हो गए थे. सरकार ने छात्रा नेताओं को जेल में डालकर और छात्र आंदोलन को देश-विरोधी साजिश बताकर उसे बदनाम करने की कोशिश की थी. पिफर जनवरी-फरवरी 2020 में छात्रों और नागरिकों, खासकर मुस्लिम महिलाओं, ने नागरिकता कानून में किए गए विभाजनकारी और भेदभावपूर्ण संशोधनों के खिलाफ एक प्रेरणादायक प्रतिवाद आंदोलन शुरू किया था. सरकार ने दिल्ली में सांप्रदायिक हिंसा फैलाकर और कार्यकर्ताओं को यूएपीए के तहत जेल में डालकर उस ऐतिहासिक शाहीन बाग प्रतिवाद आंदोलन को दबा दिया. छह साल बाद भी उमर खालिद और शरजील इमाम जैसे युवा शोधकर्ता बिना किसी मुकदमे के जेल में बंद हैं.

अतीत के विश्वविद्यालय-आधारित छात्र आंदोलनों, शाहीन बाग प्रतिवाद या दिल्ली बाॅर्डर पर हुए किसान आंदोलन के विपरीत इस बार युवा आंदोलन ने दिल्ली के केंद्र में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई. इसने एकता का एक ऐसा मंच तैयार किया जहां विश्वविद्यालयों के छात्र दिल्ली के मोहल्लों के स्थानीय युवाओं के साथ मिल गए, माता-पिता अपने बच्चों के साथ शामिल हुए, और युवतियों ने समुदायों और संस्कृतियों से परे जाकर युवा पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर मार्च किया. आइसा और अन्य वामपंथी छात्र संगठनों के कार्यकर्ताओं ने तमाम मुश्किलों के बावजूद आंदोलन को बनाए रखने और मजबूत करने के लिए अपनी पूरी ऊर्जा और कोशिशें लगा दीं. उन्होंने यह भी दिखाया कि कैसे भूख हड़ताल करने वाले छात्र नेताओं – जैसे नेहा और दानिश, मनीष और आमीन, हृषिकेश और दीपक – ने सोनम वांगचुक, और अभिजीत दिपके तथा सौरव दास जैसे सीजेपी नेताओं के साथ मिलकर काम किया.

बड़े पैमाने पर मताधिकार-हरण, बुनियादी अधिकारों से प्रणालीगत इनकार, बारंबार चुनावी धोखाधड़ी और नफरत, झूठ तथा हर तरफ फैले डर और निराशा के लगातार हमलों के बावजूद, जिसके जरिये सशक्त और मुखर नागरिकों को डरी-सहमी और आज्ञाकारी प्रजा में बदलने की कोशिशें की जाती हैं, जुलाई 2026 का जंतर-मंतर और 20 जुलाई का संसद मार्च उस डर और उदासीनता से निर्णायक रूप से अलग होने का प्रतीक है, जिसने समाज के बड़े हिस्से को अपनी चपेट में ले रखा था. अगर पेपर लीक के पीड़ितों के हक में इंसाफ और शिक्षा मंत्री की जवाबदेही की मांग उठाने के लिए प्रदर्शनकारियों को अपनी जान जोखिम में डालनी पड़ जा रही है, तो क्या प्रधान मंत्री मोदी को अपने पद पर बने रहने का कोई अधिकार रह जाता है ? भारत की जनता ने बहुत कुछ सहा है, अब वे जवाब और जवाबदेही की मांग कर रहे हैं.



23 July, 2026