वर्ष 35 / अंक - 30 / जंतर-मंतर आंदोलन: पाँच हफ़्तों तक गूंजता जश्न-ए-प्...

जंतर-मंतर आंदोलन: पाँच हफ़्तों तक गूंजता जश्न-ए-प्रतिरोध

जंतर-मंतर आंदोलन: पाँच हफ़्तों तक गूंजता जश्न-ए-प्रतिरोध

पांच हफ्तों तक चले बे-मिसाल युवा आंदोलन ने मोदी सरकार के घमंड और 2014 से सत्ता में आने के बाद से नरेंद्र मोदी के चारों तरफ गढ़ी गई अपराजेयता की छवि पर अब तक की सबसे बड़ी चोट पहुंचाई है. पुलिस की भयानक बर्बरता से लेकर जनता की सोच को भटकाने के तमाम हथकंडों तक, सरकार ने नाकाम शिक्षा मंत्री को बचाने के लिए हर तरीका आजमाया, लेकिन इस बार कुछ भी काम नहीं आया. खासकर आखिरी एक हफ्ते में, आंदोलन को रोकने की सारी कोशिशें — 18 जुलाई को सुबह-सुबह सोनम वांगचुक को जंतर मंतर से जबरन उठा ले जाने से लेकर, 20 जुलाई को संसद मार्च पर हुए भयानक पुलिस दमन के बाद मोदी की बार-बार आधी रात की वीडियो अपीलों तक — सरकार पर ही भारी पड़ीं. इन कदमों ने आंदोलन को पूरे देश में और तेज़ कर दिया, जिसके बाद सरकार के पास धर्मेंद्र प्रधान की बलि देने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा.

आंदोलन ने अपनी सबसे तात्कालिक मांग तो हासिल कर ली है, लेकिन देशभर में आंदोलनकारियों पर हो रहा ज़ुल्म और उत्पीड़न रुका नहीं है. बिहार की जेलों में सैकड़ों कार्यकर्ता अब भी बंद हैं, और भी लोगों को झूठे मामलों में फंसाकर गिरफ्तार किया जा रहा है. गिरफ्तार हुए बड़े नेताओं में जेएनयूएसयू के पूर्व महासचिव और पालीगंज से दोबारा चुने गए सीपीआई(एमएल) विधायक संदीप सौरव, जेएनयूएसयू के पूर्व अध्यक्ष धनंजय कुमार, बिहार आइसा के नेता सबा अफ़रीन और दीपंकर, पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष शांतनु शेखर और कई और लोग शामिल हैं. पश्चिम बंगाल में, भाजपा सरकार हाल ही में बनाए गए सख्त 'गुंडा दमन कानून' का इस्तेमाल करके आंदोलनकारियों को गिरफ्तार कर रही है, और खासकर मुस्लिम युवाओं को निशाना बना रही है.

सीजेपी के साथ सरकार की जो समझौते की बात हुई थी, उसके मुताबिक सभी गिरफ्तार आंदोलनकारियों को रिहा करने और उन पर लादे गए मुकदमों तथा आरोपों को वापस लेने का भरोसा दिया गया था, लेकिन इसका उल्लंघन हो रहा है. दिल्ली पुलिस द्वारा बर्बर बल प्रयोग और पेलेट गन के इस्तेमाल, तथा सादे कपड़ों में मौजूद लोगों द्वारा आरएएफ और अन्य सुरक्षा बलों के साथ मिलकर प्रदर्शनकारियों की पिटाई के भी पर्याप्त दस्तावेजी सबूत मौजूद हैं. बिहार से पुलिस द्वारा AK47 असॉल्ट राइफलों के इस्तेमाल की खबरें भी सामने आई हैं. आरएएफ की इंस्पेक्टर जनरल सीमा धुंढिया ने कथित तौर पर एक आंतरिक समीक्षा में भीड़ नियंत्रण के नाम पर असंगत, अत्यधिक और गैरज़रूरी बल प्रयोग को स्वीकार किया है. पुलिस द्वारा अपने ही नियमों की इन खुलेआम धज्जियां उड़ाने की जवाबदेही कौन लेगा? दिल्ली पुलिस अमित शाह के गृह मंत्रालय के अंदर काम करती है. जब तक पुलिस के दोषी अफसरों पर कार्रवाई नहीं होती, अमित शाह की जवाबदेही तय नहीं होती और देशभर के युवा आंदोलनकारियों को आम माफी नहीं मिलती, तब तक आंदोलन का यह दौर पूरी तरह खत्म नहीं हो सकता.

धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग उनके कार्यकाल में बार-बार हुए पेपर लीक की जवाबदेही तय करने के लिए उठी थी. अब सरकार पेपर लीक की समस्या को फास्ट-ट्रैक अदालतें बनाकर और दोषियों को सख्त सजा देकर सुलझाने की बात कर रही है. लेकिन यह तथाकथित ‘फास्ट-ट्रैक’ नुस्खा दरअसल पेपर लीक की असली बीमारी का कोई इलाज नहीं है. बस कुछ अहम बातों पर गौर करें. नेशनल टेस्टिंग एजेंसी ने हाल ही में अपने लगभग 200 कर्मचारियों में से 47 को बर्खास्त कर दिया है, यह सार्वजनिक किये बिना कि उनके नाम, पद और कथित रूप से पेपर लीक में उनकी क्या भूमिका थी. जब हर चार में से एक कर्मचारी पर लीक में शामिल होने का शक हो, तो यह खुद एनटीए की साख पर ही सवाल खड़ा करता है. अब वक्त आ गया है कि एनटीए को भंग करके उसकी जगह संसद के कानून से बनी एक नई एजेंसी लाई जाए, जो पारदर्शिता और जवाबदेही के मानकों का कड़ाई से पालन करे.

ठीक जिस वक्त सरकार फास्ट-ट्रैक अदालतें बनाने और सजा बढ़ाने की बात कर रही है, उसी दौरान 2024 के नीट पेपर लीक के एक मुख्य आरोपी को सीबीआई से क्लीन चिट मिल गई. और यह भी याद रखने वाली बात है कि जिस दिन नरेंद्र मोदी ने पेपर लीक में शामिल लोगों को ‘तुरंत और सख्त सजा’ दिलाने के लिए फास्ट-ट्रैक अदालतें बनाने का ऐलान किया, उसी दिन उनकी सरकार ने राज्यसभा में कुछ हैरान करने वाले आंकड़े भी पेश किए, जो भारत में फास्ट-ट्रैक अदालतों की असली हकीकत बयां करते हैं. अप्रैल 2026 तक 775 फास्ट-ट्रैक विशेष अदालतों में 2 लाख 49 हजार से ज्यादा मामले लंबित पड़े थे, जिनमें से 398 अदालतें सिर्फ पॉक्सो (बच्चों के यौन उत्पीड़न से सुरक्षा) कानून के मामलों के लिए बनाई गई थीं.

छात्र-युवा आंदोलन केंद्रीकृत नीट परीक्षा व्यवस्था के पुनर्गठन की, और ज़रूरत पड़े तो उसे पूरी तरह बदलने की भी, मांग कर रहा है, जो राज्यों के उस संघीय अधिकार को कमजोर कर रही है जिसके तहत वे अपनी भाषाई और शैक्षणिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए परीक्षाएं आयोजित करते हैं. राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 के भेदभावपूर्ण और समावेशी न होने वाले स्वरूप के खिलाफ भी लगातार नाराजगी बढ़ रही है, जिसे कोविड के दौर में कृषि कानूनों और श्रम संहिताओं के साथ पारित किया गया था. इस नई नीति ने कम और मध्यम आय वाले परिवारों के छात्रों के लिए उच्च शिक्षा को बेहद महंगा बना दिया है, और चार साल के डिग्री कोर्स के लिए बनाए गए मनमाने मानदंड ज्यादा से ज्यादा छात्रों को डिग्री पूरी किए बिना ही कॉलेज छोड़ने पर मजबूर कर रहे हैं. सच तो यह है कि 22 जुलाई को पटना में हुए विशाल प्रदर्शन और 25 जुलाई को आइसा और आरवाईए द्वारा बुलाए गए बिहार बंद के पीछे नीट पेपर लीक और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग जितनी वजह है, उतनी ही वजह एनईपी और बिहार की चरमराती शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ नाराजगी भी है.

जंतर मंतर आंदोलन ने नीट-यूजी 2026 पेपर लीक की वजह से हुई 21 छात्रों की आत्महत्याओं का मुद्दा भी उठाया. सरकार अब हर पीड़ित परिवार को मुआवजा देने पर राजी हुई है. लेकिन कर्ज में डूबे किसानों की आत्महत्याओं और माइक्रोफाइनेंस से जुड़ी महिलाओं की आत्महत्याओं की तरह, छात्रों की आत्महत्याएं भी हाल के सालों में बेहद चिंताजनक स्तर तक पहुंच गई हैं. 2021 से 2026 के बीच के मध्य तक नीट से जुड़ी कम से कम 93 छात्र आत्महत्याओं की खबरें सामने आई हैं. और अगर सिर्फ़ नीट नहीं, बल्कि छात्र आत्महत्याओं की पूरी तस्वीर देखें, तो एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि 2014 से 2024 तक, यानी मोदी राज के पहले दस वर्षों में, देश में 1 लाख 23 हजार से ज्यादा छात्रों ने आत्महत्या की. आज हम जिस युवा आक्रोश या जेन-ज़ी की बेचैनी को डिजिटल दुनिया में सीजेपी के विस्फोटक उभार, चुनावी स्तर पर तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के नतीजों और सामाजिक स्तर पर जंतर-मंतर आंदोलनों के अभूतपूर्व फैलाव और तीव्रता में देख रहे हैं, उसके पीछे वंचना, मोहभंग और बुनियादी अधिकारों से इनकार का एक लंबा और विविध सिलसिला छिपा हुआ है.

जंतर मंतर आंदोलन की तात्कालिक कामयाबी फिलहाल भले ही धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और सार्वजनिक शिक्षा जैसे लंबे समय से नज़रअंदाज़ और सबसे जरूरी सवाल पर बढ़ता ध्यान, और लोकतंत्र में जवाबदेही की केंद्रीय भूमिका पर ज्यादा ध्यान जाने तक सीमित लगे, लेकिन भारत में पहली बार जेन ज़ी ने इस प्रतिरोधी मानसून की शुरुआत करके, जनप्रतिरोध की एक नई जीवंत संस्कृति, नई जनभाषा और लगभग जश्नधर्मी माहौल रचकर और नफरत-झूठ, डर-उदासीनता के मजबूत जाल को चीरकर, जंतर मंतर ने लोकतांत्रिक पुनर्जागरण की नई राहें खोल दी हैं.

बिहार और असम सरकारों द्वारा मुकदमे वापस लेने के लिए आम माफी का ऐलान इस बात को ज़ाहिर करता है कि इस आंदोलन की गूंज अभी भी थमी नहीं है. आने वाले दिनों में इस असर को और तेज करना है, समाज के तमाम तबकों और संघर्ष के मोर्चों के बीच एकता और एकजुटता के नए रिश्ते मजबूत करने हैं. जंतर-मंतर की इस क्रांतिकारी भावना को पूरे देश में फैला देना है, ताकि हक-हुकूक के लिए उठने वाली जन-प्रतिरोध की आवाजें दूर-दूर तक गूंज उठें.

( संपादकीय, एमएल अपडेट, 28 जुलाई, 2026 )

31 July, 2026