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आंकड़ों का महाझूठ: मोदी सरकार के 7.8% जीडीपी दावे की असलियत

आंकड़ों का महाझूठ: मोदी सरकार के 7.8% जीडीपी दावे की असलियत

आजकल टेलीविजन के प्राइम-टाइम पर्दों, सरकारी विज्ञापनों और अखबारी सुर्खियों में एक ही सुर गूंज रहा है – ‘भारत 7.8% की ऐतिहासिक विकास दर से दौड़ रहा है, हम विश्व की सबसे तेज रफ्तार से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था हैं और जल्द ही 5 ट्रिलियन डाॅलर के साथ तीसरी सबसे बड़ी आर्थिक महाशक्ति बनने जा रहे हैं.’ बिश्केक में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के मंच से लेकर घरेलू रैलियों तक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन आंकड़ों को ‘हर्क्युलियन उपलब्धि बताते हुए सवाल उठाने वालों को ‘निराशावादी’ और ‘झूठ फैलाने वाला’ करार दे चुके हैं. साथ ही देश की जनता को नसीहत दी जा रही है कि वे विदेश यात्राओं, विदेशों में शादी करने और सोने की खरीदारी से बचें और ‘वोकल फाॅर लोकल’ का पालन करें, जबकि सत्ता प्रतिष्ठान अपनी शाही फिजूलखर्ची और प्रचार तंत्र पर अरबों रुपये पानी की तरह बहा रहा है.

लेकिन सरकारी नारों के इस शोर से बाहर निकलकर जरा अपने इर्द-गिर्द की ठोस जमीन को देखिए. क्या आपके कस्बे और मोहल्ले की दुकानों पर पहले जैसी रौनक बाकी है? क्या उच्च शिक्षा हासिल कर चुके आपके घर के नौजवानों को सम्मानजनक और सुरक्षित रोजगार मिला? क्या हर महीने सिकुड़ते घरेलू बजट और थाली में दाल-सब्जी की बढ़ती कीमतों से कोई राहत मिली? इन सवालों का सीधा और बेबाक जवाब है – नहीं.

तो फिर यह 7.8% की तेज रफ्तार तरक्की आखिर दर्ज कहां हो रही है? कड़वी सच्चाई यह है कि यह विकास देश के खेतों, कारखानों, मंडियों और आम नागरिकों की जेबों में नहीं, बल्कि मोदी सरकार के एक्सेल शीट्स, बदले हुए पैमानों और सांख्यिकीय जादूगरी के भीतर सिमटा हुआ है. दुनिया के कई मुख्यधारा के अर्थशास्त्री, जिनमें से कई कभी खुद इसी प्रशासनिक व्यवस्था के प्रमुख स्तंभ रहे हैं, आज एक आवाज में कह रहे हैं कि राष्ट्रीय आंकड़ों को कुछ इस तरह गढ़ा गया है ताकि जनता को विकास के झूठे नशे में रखकर भाजपा सरकार की नाकामियों पर पर्दा डाला जा सके. आइए, इस कथित ‘आर्थिक चमत्कार’ की परतें खोलते हैं.

सांख्यिकीय विश्वसनीयता पर सवाल

सरकारी दावों की पहली गंभीर दरार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तब उजागर हुई जब अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने अपनी ‘आर्टिकल IV’ समीक्षा रिपोर्ट में भारत के राष्ट्रीय लेखा सांख्यिकी की प्रणालीगत गुणवत्ता को सी-ग्रेड की निम्न श्रेणी में रखते हुए इसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए. आईएमएफ ने इंगित किया कि जिन आंकड़ों के आधार पर देश की आर्थिक नीतियां तैयार की जा रही हैं, उनमें कई गंभीर तकनीकी खामियां हैं:

पुराना और अप्रासंगिक आधार वर्ष: किसी भी आधुनिक अर्थव्यवस्था में विकास का सही आकलन करने के लिए हर पांच-सात साल में आधार वर्ष बदला जाता है. भारत आज भी 2011-12 के पुराने आधार वर्ष पर अटका हुआ है, जबकि अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार इसे कम से कम 2021-22 पर अद्यतन हो जाना चाहिए था.

उपभोग सूचकांक का पुराना ढांचा: खुदरा महंगाई नापने वाला उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) भी 2011-12 के उपभोग पैटर्न पर ही आधारित है. पिछले डेढ़ दशक में डिजिटल सेवाओं, स्वास्थ्य, शिक्षा और परिवहन पर आम नागरिक का उपभोग खर्च पूरी तरह बदल चुका है, लेकिन सूचकांक आज भी पुराने ढर्रे पर वास्तविक महंगाई को कम करके आंकता है.

उत्पादन और खर्च के आंकड़ों में गहरा असंतुलन: जीडीपी मापने के दो प्रमुख तरीके होते हैं – उत्पादन पद्धति (Gross Value Added) और व्यय पद्धति (Eñpenditure Method). सैद्धांतिक रूप से दोनों का अंतिम योग समान होना चाहिए, लेकिन भारतीय आंकड़ों में दोनों के बीच का अंतर ऐतिहासिक रूप से कई लाख करोड़ रुपयों तक पहुंच चुका है. जब खर्च के आंकड़ों से विकास दर साबित नहीं होती, तो इस विशाल अंतर को ‘सांख्यिकीय समायोजन’ के नाम पर जोड़ दिया जाता है.

राज्यों और स्थानीय निकायों के अद्यतन आंकड़ों का अभाव: 2019 के बाद से राज्यों और नगरपालिकाओं का समेकित डेटा नियमित रूप से साझा ही नहीं किया गया है. यानी जिस थर्मामीटर से देश की आर्थिक सेहत नापी जा रही है, वह खुद भीतर से टूटा हुआ है.

नीति आयोग की बाजीगरी

आंकड़ों के इस हेरफेर की नींव 2015 में रखी गई थी, जब केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (CSO) ने जीडीपी गणना की नई पद्धति लागू की. अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुसार, जब भी कोई नई सीरीज लाई जाती है, तो पिछली सरकारों और अवधियों से तुलना के लिए ‘बैक-सीरीज’ डेटा जारी करना अनिवार्य होता है.

तत्कालीन राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग  द्वारा गठित सुदीप्तो मुंडले समिति ने जब पुरानी गणना पद्धति और नए आधार वर्ष का निष्पक्ष मिलान किया, तो चौंकाने वाले नतीजे सामने आए. गणना में स्पष्ट दिखा कि यूपीए शासनकाल में – विशेषकर 2004 से 2011 के बीच – औसत वार्षिक आर्थिक वृद्धि दर 8% से अधिक थी और कुछ वर्षों में 10% के पार भी गई थी, जो एनडीए शासनकाल की तुलना में कहीं अधिक थी.

मोदी सरकार को यह ऐतिहासिक सच्चाई राजनीतिक रूप से असहज करने वाली लगी. नतीजा यह हुआ कि सांख्यिकी आयोग की उस विशेषज्ञ रिपोर्ट को औपचारिक रूप से ठंडे बस्ते में डाल दिया गया. इसके बाद एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए आंकड़ों को तैयार करने और जारी करने की जिम्मेदारी नीति आयोग को सौंप दी गई, जबकि राष्ट्रीय आय के निष्पक्ष आंकड़े जारी करना हमेशा से एक स्वायत्त सांख्यिकीय संस्था का दायित्व रहा है, न कि किसी नीति-निर्माण करने वाले राजनीतिक थिंक-टैंक का. नीति आयोग ने आंकड़ों की ऐसी नई बैक-सीरीज तैयार की, जिसने कागजों पर पिछली विकास दर को घटा दिया और एनडीए के कार्यकाल को कृत्रिम रूप से बेहतर साबित कर दिया. इसी विवाद में राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग के कार्यवाहक प्रमुख और अन्य स्वतंत्र सदस्यों ने अपने पदों से इस्तीफा दे दिया था.

बेस ईयर का खेल

भारत के पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने विस्तार से समझाया है कि किस तरह आधार वर्ष और पिछली तिमाहियों के आधार को नीचे दबाकर मौजूदा वृद्धि दर को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया है.

इसे एक सरल उदाहरण से समझा जा सकता है. मान लीजिए किसी व्यक्ति की आय पिछले वर्ष 100 रु. थी और इस वर्ष वह 105 रु. कमाता है, तो उसकी वास्तविक आय वृद्धि 5% हुई. लेकिन यदि सांख्यिकीय संशोधनों के जरिए पिछले वर्ष की आय को कागजों पर घटाकर 80 रु. दर्ज कर दिया जाए, तो वही 105 रु. की कमाई अचानक 31% की चमत्कारी छलांग जैसी दिखने लगेगी. मोदी सरकार ने नाॅमिनल आंकड़ों में पूर्व-संशोधनों के जरिए बेसलाइन इतनी नीचे कर दी कि ऊपर का प्रतिशत अपने-आप उछल गया. यदि इस कृत्रिम बेस-इफेक्ट को हटा दिया जाए, तो भारत की वास्तविक अंतर्निहित विकास दर 3% के आसपास ही ठहरती है.

सरकार के अपने पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार डाॅ. अरविंद सुब्रमण्यम ने 2019 में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के सेंटर फाॅर इंटरनेशनल डेवलपमेंट में प्रकाशित अपने शोध पत्र में स्पष्ट किया था कि 2011-12 के बाद लागू नए जीडीपी फाॅर्मूले के कारण भारत की विकास दर को प्रति वर्ष औसतन 2.5% तक बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जा रहा है. यानी जिस अवधि में सरकारी घोषणाएं 7% का दावा करती हैं, वास्तविक अर्थव्यवस्था की रफ्तार महज 4.5% के आसपास रेंग रही होती है.

भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर डाॅ. रघुराम राजन ने भी इसी संरचनात्मक अंतर्विरोध पर उंगली उठाई है. राजन का सीधा तर्क है कि कोई भी अर्थव्यवस्था वास्तव में 7% या 8% की स्वाभाविक गति से तब तक नहीं बढ़ सकती, जब तक आम मजदूरों के वास्तविक वेतन में ठोस इजाफा न हो रहा हो और बड़े पैमाने पर नए रोजगार पैदा न हो रहे हों. उनके अनुसार, आंकड़ों से ‘सांख्यिकीय फुलाव’ हटा दिया जाए, तो वास्तविक गति 5.5% से 6% से अधिक नहीं है.

डिफ्लेटर का मायाजाल

जीडीपी के आंकड़ों को बेहतर दिखाने के लिए सबसे बड़ा तकनीकी खेल ‘डिफ्लेटर’ के जरिए खेला जाता है. आसान शब्दों में समझें तो जब सरकार मौजूदा बाजार भाव पर निकाली गई जीडीपी (नाॅमिनल जीडीपी) से महंगाई का असर हटाकर असली जीडीपी (रियल जीडीपी) तय करती है, तो उसे ‘डिफ्लेटर’ कहते हैं. अगर आंकड़ों में महंगाई की दर को असलियत से कम दिखाया जाए, तो गणित के हिसाब से असली जीडीपी अपने-आप बढ़ी हुई नजर आने लगती है.

जिस तिमाही में सरकार ने 7.8% की वास्तविक वृद्धि का ढोल पीटा, उस समय सरकारी गणना में जीडीपी डिफ्लेटर, यानी अर्थव्यवस्था की औसत महंगाई, को महज 1.5% से 2.3% के बीच आंका गया. इसके विपरीत, उसी दौर में आम आदमी की दैनिक जरूरतों की चीजें – दाल, खाद्य तेल, हरी सब्जियां, एलपीजी, दूध – की खुदरा महंगाई (CPI) 6% से 7% पर थी, जबकि इनपुट लागतों को दर्शाने वाला थोक मूल्य सूचकांक (WPI) बे समय तक विसंगतियों का शिकार रहा.

भारत में दोहरी अपस्फीति पद्धति लागू नहीं है, जिसके कारण जब वैश्विक स्तर पर कच्चे माल या ईंधन की कीमतें गिरती हैं, तो कंपनियों का शुद्ध मुनाफा बढ़ जाता है – और सरकार इस बढ़े हुए काॅरपोरेट मुनाफे को उत्पादन की वास्तविक भौतिक वृद्धि मान लेती है. सीधी बात यह है कि जब बाजार में आम परिवार का बजट 8% से 10% की महंगाई से तबाह हो रहा हो, तब सरकारी दफ्तरों में महंगाई को 2% मानकर विकास दर का गुब्बारा फुला दिया जाता है. यह जनता की घटती क्रय शक्ति पर पर्दा डालने का सांख्यिकीय औजार भर है.

असंगठित क्षेत्र की तबाही

अर्थशास्त्री और जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर अरुण कुमार ने भारतीय जीडीपी गणना के सबसे बड़े संरचनात्मक दोष को बेनकाब किया है. उनके अनुसार भारत की वास्तविक जीडीपी सरकारी आंकड़ों से लगभग 40% से 48% तक कम हो सकती है, क्योंकि वर्तमान प्रणाली देश की 90% श्रमशक्ति को रोजगार देने वाले असंगठित क्षेत्र की वास्तविक स्थिति दर्ज ही नहीं करती.

पिछले एक दशक में मोदी सरकार ने अर्थव्यवस्था को चार बड़े झटके दिए: 2016 की विनाशकारी नोटबंदी ने नगदी-आधारित ग्रामीण और लघु उद्योग की रीढ़ तोड़ दी, जटिल और त्रुटिपूर्ण जीएसटी ने छोटे निर्माताओं, दुकानदारों और व्यापारियों पर अनुपालन का भारी बोझ लादकर बाजार बड़े काॅरपोरेट्स के हवाले कर दिया, 2018 के एनबीएफसी संकट ने छोटे व्यापारों को मिलने वाला कर्ज सुखा दिया, और 2020 के अनियोजित लाॅकडाउन ने करोड़ों प्रवासी मजदूरों और असंगठित इकाइयों को भुखमरी की कगार पर धकेल दिया.

सरकारी सांख्यिकी प्रणाली के पास असंगठित क्षेत्र का कोई स्वतंत्र, त्रैमासिक डेटा-संग्रह तंत्र मौजूद नहीं है. इसलिए मंत्रालय एक घातक और अवैज्ञानिक धारणा बना लेता है: ‘जिस रफ्तार से संगठित काॅरपोरेट क्षेत्र बढ़ रहा है, उसी रफ्तार से असंगठित क्षेत्र भी बढ़ रहा होगा.’

इसे जमीनी हकीकत से समझिए. नोटबंदी और जीएसटी के बाद किराना दुकानों, छोटे वर्कशाॅप्स और स्थानीय बाजारों का कारोबार छीना गया और वह बड़ी ई-काॅमर्स कंपनियों, संगठित रिटेल चेन्स और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की झोली में चला गया. जब किसी माॅल या ई-काॅमर्स प्लेटफाॅर्म का कारोबार 25% बढ़ता है और मोहल्ले की पांच दुकानें बंद हो जाती हैं, तो सरकार केवल उस 25% की बढ़त को दर्ज करती है और मान लेती है कि पूरा व्यापार क्षेत्र फल-फूल रहा है.

जहां संगठित क्षेत्र बढ़ रहा है, वहीं असंगठित क्षेत्र में 5% से 10% की वार्षिक गिरावट दर्ज हुई है. एक सिकुड़ते क्षेत्र को बढ़ते काॅरपोरेट के चश्मे से देखना गंभीर बौद्धिक बेईमानी है. यदि इस विसंगति को सही किया जाए, तो 2016 के बाद से भारत की वार्षिक वास्तविक विकास दर मुश्किल से 1% से 2% बैठती है. इस हिसाब से भारत आज 3.8 ट्रिलियन डाॅलर की नहीं, बल्कि मुश्किल से 2.5 से 2.7 ट्रिलियन डाॅलर की अर्थव्यवस्था है, जो वास्तविक उत्पादन के लिहाज से दुनिया में सातवें या आठवें स्थान पर ठहरती है.

चमकते सेंसेक्स, खाली जेबें

सरकारी प्रचार मशीनरी शेयर बाजार की नई ऊंचाइयों को देश की तरक्की का सबूत मानती है, लेकिन सच यह है कि सेंसेक्स या निफ्टी पूरी अर्थव्यवस्था की असल तस्वीर नहीं दिखाते. 80,000 के पार पहुंच चुका सेंसेक्स सिर्फ यह बयां करता है कि मुट्टीभर शीर्ष काॅरपोरेट घरानों का मुनाफा और बाजार पर उनका एकाधिकार किस हद तक बढ़ गया है.

इसे ‘के-शेप्ड’ (K-shaped) रिकवरी कहा जाता है – यानी ऐसी स्थिति जहां ऊपर के 10% अमीर लोगों की संपत्ति और आमदनी आसमान छू रही है, वहीं नीचे की 90% आबादी लगातार पिछड़ती जा रही है. बाजार में लग्जरी गाड़ियां, महंगे फोन और बड़े मकान रिकाॅर्ड तेजी से बिक रहे हैं, लेकिन आम जनता की बुनियादी जरूरतें, उपभोग का स्तर और खरीदारी लगातार घटती जा रही है. गांवों में बिस्कुट, साबुन और तेल जैसे रोजमर्रा के सामान की बिक्री ठहरी हुई है या नीचे जा रही है.

मजदूरों की यह बदहाली किसी विरोधी दल का नहीं, बल्कि खुद सरकार के ‘ई-श्रम’ पोर्टल का आधिकारिक आंकड़ा है. इस पोर्टल पर रजिस्टर्ड करीब 30 करोड़ असंगठित कामगारों में से 94% से ज्यादा ने खुद माना है कि उनकी मासिक कमाई 10,000 रुपये से भी कम है – यानी रोज के 300-330 रुपये से भी कम में एक पूरे परिवार का गुजारा करना असंभव है.

दूसरी तरफ, जिस हड़बड़ी में नए ‘श्रम कानून’ थोपे गए, उसका असली मकसद भी काॅरपोरेट्स के मुनाफे को बढ़ाना ही है. अमेरिका और यूरोप के बाजारों में मंदी और टैक्स की मार झेल रहे हमारे निर्यातक अपने नुकसान की भरपाई मजदूरों से ज्यादा घंटे काम कराकर और उनका वेतन काटकर कर रहे हैं. लेकिन सोचने वाली बात यह है कि जब देश की 90% आबादी के पास खर्च करने के लिए पैसे ही नहीं होंगे, तो बाजार में चीजों की मांग कहां से आएगी? और जब मांग ही पैदा नहीं होगी, तो कोई कंपनी नया निवेश क्यों करेगी?

सस्ता रूसी तेल, निजी रिफाइनरियों की लूट

सरकारी प्रवक्ताओं ने बार-बार दावा किया कि यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने पश्चिमी दबाव को धता बताते हुए रूस से भारी छूट पर कच्चा तेल खरीदा, ताकि आम जनता को महंगाई से बचाया जा सके. यह दावा सफेद झूठ साबित हुआ.

रूस से आने वाले सस्ते कच्चे तेल का सबसे बड़ा हिस्सा सार्वजनिक उपक्रमों के बजाय दो बड़ी निजी रिफाइनरियों – रिलायंस इंडस्ट्रीज और नायरा एनर्जी – ने खरीदा. इन कंपनियों ने सस्ते कच्चे तेल को प्रोसेस किया और घरेलू बाजार में सस्ता पेट्रोल-डीजल देने के बजाय उसे अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरोपीय देशों और अमेरिका को भारी मुनाफे पर निर्यात कर दिया.

भारत की आम जनता से पेट्रोल पर प्रति लीटर 30 रुपये से अधिक का केंद्रीय उपकर और कर वसूला जाता रहा, जबकि निजी रिफाइनरियों ने रिकाॅर्ड ‘सुपर-प्राॅफिट’ कमाया. यही कारण था कि पश्चिमी वित्तीय हलकों और प्रतिबंध लगाने वाली एजेंसियों ने इस बात की तीखी आलोचना की कि भारत ने अपने नागरिकों को ईंधन की महंगाई से राहत देने के बजाय चुनिंदा काॅरपोरेट्स को भारी मुनाफा कमाने का जरिया बना दिया.

निवेश का अकाल, पूंजी का पलायन

सरकार चाहे 7.8% विकास दर के जितने भी कसीदे पढ़ ले, पूंजीपति कभी जुमलों पर पैसा नहीं लगाते. वे विज्ञापनों को देखकर नहीं, बाजार की वास्तविक क्रय शक्ति को परखकर निवेश करते हैं. यही वजह है कि वाणिज्य मंत्रालय के अपने आंकड़े बताते हैं कि भारत में आने वाला शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पिछले वर्षों में घटकर दशक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुका है, और विदेशी निवेशक या तो अपनी पूंजी तेजी से बाहर निकाल रहे हैं या नए कारखाने लगाने से पूरी तरह बच रहे हैं. दूसरी तरफ, 2019 में काॅरपोरेट टैक्स में लाखों करोड़ रुपये की ऐतिहासिक छूट दिए जाने के बावजूद भारतीय उद्योगपति देश में नए कारखाने स्थापित नहीं कर रहे हैं.

क्योंकि देश की अधिकांश फैक्ट्रियां अपनी कुल क्षमता के महज 70-74% पर ही चल रही हैं, और जब तक मौजूदा फैक्ट्रियों में बना माल खरीदने वाले ग्राहक बाजार में नहीं होंगे, तब तक कोई भी समझदार उद्योगपति नई फैक्ट्री क्यों लगाएगा? इस अविश्वास का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि आज भारत के कई बड़े औद्योगिक समूह अपनी पूंजी देश में लगाने के बजाय वियतनाम, इंडोनेशिया, यूएई और अमेरिका जैसे देशों में ले जा रहे हैं. जब देश का अपना निवेशक ही अपने बाजार पर भरोसा करने को तैयार नहीं है, तब विदेशी धरती पर जाकर 7.8% विकास दर का ढिंढोरा पीटना केवल अपनी नाकामियों और जमीनी सच्चाइयों से मुंह मोड़ने जैसा है.

बीमारी को नकारने से इलाज संभव नहीं

आंकड़ों की हेराफेरी से सुर्खियां तो बन सकती हैं, लेकिन अर्थव्यवस्था की सेहत नहीं सुधारी जा सकती. पूर्व सोवियत संघ के पतन से पहले भी वहां की सरकारी एजेंसियां कागज पर उत्पादन के रिकाॅर्ड तोड़ रही थीं, जबकि दुकानों से बुनियादी राशन गायब था.

जब इस सरकार से कभी जुड़े रहे अरविंद सुब्रमण्यम, रघुराम राजन जैसे अर्थशास्त्री और पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग इन खामियों को उजागर कर रहे हैं, तो सरकार का दायित्व बनता है कि वह इनका जवाब दे. लेकिन सत्ता ने आत्म-समीक्षा के बजाय आंकड़ों को गढ़ने वाली संस्थाओं की स्वायत्तता पर ही ताला लगा दिया. राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (NSSO) के उपभोग व्यय सर्वेक्षण को 2017-18 में इसलिए खारिज कर दिया गया था क्योंकि उसने चार दशकों में पहली बार ग्रामीण उपभोग में गिरावट दिखा दी थी.

यह 7.8% विकास दर किसी आम इंसान की रोजी-रोटी की जद्दोजहद को आसान नहीं बना सकती – न मजदूरों की असली मजदूरी बढ़ा सकती है, न किसानों की आमदनी में इजाफा कर सकती है, न किसी बेरोजगार युवा को रोजगार दे सकती है.

क्योंकि एक असल और सेहतमंद अर्थव्यवस्था वही होती है जहां किसान को उसकी मेहनत का सही दाम मिले, मजदूर को सम्मानजनक और जीवन चलाने लायक वेतन मिले, युवाओं को पक्की नौकरियां मिलें और छोटे कारोबार बिना किसी डर के आगे बढ़ सकें.

इसलिए अब वक्त आ गया है कि देश की जनता मोदी के ‘5 ट्रिलियन इकोनाॅमी’ और ‘तीसरी महाशक्ति’ जैसे झूठे जुमलों की महा-ठगी को सिरे से खारिज करे और सत्ता से सीधे सवाल पूछे: जब विकास दर 7.8% है, तो हमारा असली वेतन लगातार क्यों घट रहा है? करोड़ों पढ़े-लिखे युवाओं के लिए पक्की नौकरियां आखिर कहां गायब हैं? और आम परिवार की रोजमर्रा की थाली लगातार छोटी और महंगी क्यों होती जा रही है?

जब तक देश के असंगठित क्षेत्र, छोटे उद्योगों, किसानों और मेहनतकश अवाम को आर्थिक नीतियों के केंद्र में नहीं रखा जाएगा, तब तक ‘आर्थिक महाशक्ति’ के मोदी सरकार के सारे दावे अपनी नाकामियों को छुपाने और सिर्फ सत्ता में बने रहने की कवायद हैं, और जनता के साथ एक क्रूर मजाक भी.

– (प्रस्तुति: मनमोहन)

05 September, 2026